पीलू मोदी तो उन्हें इतना मानते थे, कानपुर से लोकसभा चुनाव के लिए टिकट ऑफर की थी। दरअसल हुआ यह कि दिलीप सोमनाथ शुक्ल की सिफारिश के लिए उनके पास गए थे। पीलू मोदी इतने दबंग और धाकड़ थे कि अपने सामने किसी को बैठना पसंद नहीं करते थे लेकिन दिलीप पहुंचते तो उनके लिए अपने बगल में कुर्सी डलवाते…

शैलेश अवस्थी-
दिलीप शुक्ला….एक निडर हरफनमौला पत्रकार
मैं दिलीप शुक्ला “आज”…कोई 45 साल पहले यह उनकी अदा थी अपना परिचय देने की…यह नाम सुनते ही बड़ी से बड़ी हस्ती उनके सामने खड़ी हो जाती और फिर उनसे बात करके, उनके ज्ञान और चुम्बकीय व्यक्तित्व से उनकी मुरीद हो जाती। वह अपने अंदाज और अपनी शर्त पर पत्रकारिता करते रहे। न तो दफ्तर की पाबंदियां मानी और न ही किसी एक डेस्क पर बैठकर काम करना पसंद किया। कभी-कभी तो दफ्तर में 15-20 मिनट रुकते…उनका बाहर कोई इंतज़ार करता और फिर उसके साथ शहर की आबोहवा देखने निकल पड़ते।
उस दौर के देश के दिग्गज पत्रकार एसपी सिंह, उदयन शर्मा, अजय सिंह, एमजे अकबर, रामपाल सिंह, संतोष भारतीय, कन्हैयालाल लाल नंदन और कुर्बान अली सहित कई उनके निकटतम रहे।
एक बार अचानक दफ्तर में बिना बताए कई दिन गायब रहे, घर पर भी खबर नहीं। इससे उनके संपादक विनोद शुक्ला नाराज़ हो गए और दफ्तर गेट पर बोल दिया- बिना उनकी अनुमति दिलीप को अंदर न आने दें।
दिलीप को यह खल गया, हालांकि विनोदजी उन्हें भाई जैसा ही मानते थे पर दफ्तर का भी अनुशासन ज़रूरी था। दिलीप “आज”को नमस्कार कर उसी उक्त बिना किसी को इत्तिला किये, दिल्ली चले गए और तीसरे दिन कानपुर खबर आई कि उन्होंने वहां “असली भारत” अखबार जॉइन कर लिया।
उस दौर में चौधरी चरण सिंह के इस अखबार का बड़ा रसूख था। यह बात विनोद शुक्ल को पता लगी तो वह दिल्ली गए और दिलीप से बोले…”बड़े भाई की बात का बुरा मान गए”…उनकी आंखों में प्यार देख दिलीप भावुक हो गए, दोगुना वेतन और बड़ा पद छोड़ फिर “आज” अखबार वापस आ गए, कम वेतन पर। इसके बाद कभी विनोद शुक्ल का साथ नहीं छोड़ा।
“दैनिक जागरण” लखनऊ गए तो वहां भी चर्चा में रहे। लखनऊ में विधान परिषद के सदस्य नागेन्द्रनाथ सिंह दिलीप को इतना मानते थे कि अपना सरकारी आवास उनका घर बना दिया। मैं गवाह हूं कि वीरेंद्र शाही जैसे दबंग विधायक उनके गिलास में पानी भरते थे, हरिशंकर तिवारी उनकी आवाभगत करने के बाद बाहर तक विदा करने आते थे, राजमंगल पांडे जैसे दिग्गज राजनेता से अगर वह कुछ दिन न मिलें तो वह खुद उनके पास पहुंच जाते।
संजय सिंह, अकबर अहमद डंपी, बलराम सिंह, वासुदेव सिंह, मुलायम सिंह यादव और न जाने कितने नेता उनके करीबी रहे। पीलू मोदी तो उन्हें इतना मानते थे, कानपुर से लोकसभा चुनाव के लिए टिकट ऑफर की थी। दरअसल हुआ यह कि दिलीप सोमनाथ शुक्ल की सिफारिश के लिए उनके पास गए थे। पीलू मोदी इतने दबंग और धाकड़ थे कि अपने सामने किसी को बैठना पसंद नहीं करते थे लेकिन दिलीप पहुंचते तो उनके लिए अपने बगल में कुर्सी डलवाते।
दिलीप जी ने सोमनाथ शुक्ल की सिफारिश की तो उन्होंने इनकार करते हुए वह ऑफर उनके लिये रख दिया। दिलीप उठ गए और बोले “मेरा यह चरित्र नहीं कि अपने स्वार्थ के लिए किसी से गद्दारी करुं। दिलीप शुक्ल ने अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू तब किया जब वह इलाहाबाद संसदीय सीट से इस्तीफा देकर बुरे दिनों से गुज़र रहे थे।
जगजीवन राम का इंटरव्यू लिया पर कई दिन तक प्रकाशित नहीं हुआ तो उनके पुत्र सुरेश राम ने संकोच से पूछा…भाई जी इंटरव्यू का क्या हुआ…दिलीप जी का जवाब था…छप जाएगा..छप जाएगा..धीरज धरो..” राजीव गांधी भी उनसे छोटी मुलाकात कर प्रभावित हुए थे। उस दौर के कई राजनेताओं से उनके करीबी रिश्ते थे।
कोई 30 साल पहले का वाकया…कानपुर में एक दबंग, ज़िद्दी आईएएस बड़े प्रशासनिक अफसर की पोस्टिंग हुई। वह किसी को भी हड़का देते, यह दिलीप के पत्रकार मन को बुरी लगी। फ़ोन कर खरी-खोटी सुना दी। उन्होंने उन्हें पकड़ने के लिए कई थानों की फ़ोर्स भेज दी। दिलीप जी वहां से निकल चुके थे, उन्हें पता लगा तो वह रात 12 बजे उस बड़े अफसर के घर चुनौती देकर पहुंचे। वहां कई थानों का फोर्स था, पर वहीं ख़री-खरी सुनाने लगे। वहां मौजूद हर अफसर सकते में था कि यह कैसा शख्स जो शेर की मांद में घुसकर ललकार रहा है। वह बड़े अफसर उन्हें अपने कैम्प ऑफिस ले गए।
दिलीप जी ने उन्हें कई उदाहरण देकर समझाया कि “आप पब्लिक सर्वेंट हो, अहंकार शोभा नहीं देता, आप ईमानदार हो तो सब बेईमान भी नहीं हैं। दिलीप जी मस्ती में बोले जा रहे थे और वह सुन रहे थे। दिलीप जी के बारे में तफसील से जानकारी करने के बाद उस अफसर ने गलती मानी और उन्हें गाड़ी से घर भिजवाया। यह है आत्मविश्वास।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि दिलीप जी कई साल तक दिल्ली में “दैनिक भास्कर” के संपादक रहे। अपनी शर्त पर काम किया और जब मूड नहीं बना, नमस्कार कर वापस कानपुर आ गए। एक बार बरेली में उन्हें एक बड़े अख़बार का संपादक बना कर भेजा गया, वह वहां के दफ्तर में न जाकर शहर सीमा पर बने एक ढाबे में जम गए, वहीं संपादकीय विभाग की बैठक बुलाई और निर्देश दिए। अक्सर दफ्तर नहीं जाते और कहीं भी बैठक बुला लेते, किसी साथी पर दबाव नहीं बनाया। मस्ती में काम करते और करवाते।
आखिरकार मालिकों ने उन्हें फिर वापस लखनऊ वापस बुला लिया। उनकी दोस्ती पांच हज़ार कमाने वाले मजदूर से है तो अरबपतियों से भी, लेकिन व्यवहार सबसे एक जैसा।
रामजन्मभूमि आंदोलन, बीहड़ों में डकैतों का खौफ सहित कई ऐसी खबरें हैं, जिससे उनकी बड़ी पहचान बनी थी। जिससे दोस्ती की हर परिस्थिति में निभाई, अभाव में भी स्वभाव नहीं बदला, जो किया, भरपूर दिल से किया, दौलत नहीं, दिलों पर राज किया। उन्हें नापसंद करने वाले भी हो सकते हैं, पर पसंद करने वालों के सामने यह संख्या नगण्य होगी। उनके सैंकड़ों किस्से हैं, जिन्हें यहां बखान करना संभव नहीं। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनका सानिध्य पिछले 42 साल से प्राप्त है। उनके छोटे भाई राजीव शुक्ला राजनीत और पत्रकारिता का देश में एक बड़ा नाम है।
दिलीप अब अध्यात्म और किताबों की दुनियां में रमे हैं। एक खुशहाल ज़िन्दगी बिता रहे हैं। आज उनके जन्मदिन पर मुझे लगा कि यह मौका है उनके बारे में कुछ बताने का….दिलीपजी ने जिस पत्रकारिता को जिया और फक्कड़ जीवन बिता रहे हैं, वह कम लोगों को ही नसीब होती है।
कवि नीरज की पंक्तियां उनके लिए मुकम्मल लगती हैं….”कहानी बन के जिये हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में…इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में”……। आज दिलीप शुक्ला जी का जन्मदिन है… उन्हें बहुत शुभकामनाएं


