
दिनेश श्रीनेत-
आज पत्रकारिता के एक बड़े ही पुराने साथी राजीव ओझा की पोस्ट दिख गई. उन्होंने अपनी नई नौकरी की सूचना साझा की थी. उन्होंने जिस अंदाज में पोस्ट लिखी थी, मुझे उनकी नपी-तुली संतुलित भाषा याद आ गई, और उसके साथ एक-एक करके याद आए वो सभी लोग जिनकी संगत में मैंने लिखना सीखा.
जब पहली बार राष्ट्रीय सहारा में काम करना शुरू किया तब तक मेरा भाषा संस्कार हिंदी की आलोचना पुस्तकों को पढ़कर बना था. लंबे-लंबे आपस में उलझे हुए वाक्य, कथन में बहुत सारे उपकथन और पारिभाषिक शब्दावली व विशेषणों की भरमार. इसके समानांतर साहित्य के अनुराग ने एक चित्रात्मक भाषा का कौशल भी विकसित किया था. दिक्कत यह कि जब हमें सीधे-सीधे किसी घटना का तथ्यात्मक वर्णन करना है तो न तो चित्रात्मक भाषा काम आती है और न विश्लेषणात्मक.
नतीजा यह हुआ कि मैं शुरुआती अखबारी कॉपी बहुत ऊबड़-खाबड़ लिखा करता था. हां, जब रिपोर्ताज की बारी आती थी तो मेरी लेखनी चमक उठती थी, मैंने गोरखपुर के बुनकरों और खत्म होते घड़ीसाजों पर दो रिपोर्ट लिखी. ये सबको पसंद आई और मुझे आज तक अच्छी लगती हैं. लेकिन किसी अखबार में नौकरी करते हुए हर रोज रिपोर्ताज तो नहीं लिखा जाता, आयोजनों, सम्मेलनों, घोटालों, जनसमस्याओं, वक्तव्यों, विवादों, साक्षात्कारों को भी लिखना होता है.
राजीव ओझा की कापी ने भाषा के लिहाज से मेरा ध्यान खींचा. वे हमउम्र ही थे, देहात डेस्क पर हमारे सहयोगी भी थे और विश्वविद्यालय तथा शिक्षा विभाग की रिपोर्टिंग भी करते थे. राजीव के वाक्यों में एक नाटकीय तनाव होता था, कुछ भी अतिरिक्त नहीं होता था. यानी कि एक शब्द भी हटाना कठिन और बहुत ही संतुलित मुहावरेदार हिंदी होती थी. लिहाजा उनकी खबरें सरपट पढ़ी जाती थीं.
हमारे वरिष्ठों में संजय सिंह की भाषा भी काफी परिपक्व थी और उसमें साहित्यिकता और अखबारीपन का बड़ा सही अनुपात होता था. भाषा कुमार हर्ष जी की भी अच्छी थी मगर वे अपने पत्रकारिता के प्रयोगों की वजह से हमारा और पूरे शहर का ध्यान ज्यादा खींचते थे. बहरहाल, मुझे तो अभी ककहरा सीखना था. मुझे राजीव की खूबियां भाती तो थीं मगर उसे अपनी भाषा में खुद नहीं साध पाता था. कभी-कभार राजीव ओझा से इस बारे में बात भी हुआ करती थी.
कुछ ही महीने बाद मैं इलाहाबाद चला गया. वहां प्रताप सोमवंशी जी ने जनसत्ता छोड़कर अमर उजाला ज्वाइन किया था और मैं उनकी जगह जनसत्ता के लिए इलाहाबाद से बतौर स्ट्रिंगर खबरें भेजने लगा. उन्होंने मेरी पहली कॉपी देखी और मेरे वाक्यों को जगह-जगह से तोड़ दिया. सारे योजक काट दिए. उन्होंने अगली सीख दी, “वाक्य छोटा लिखो.” मैंने छोटा लिखा. उन्होंने कहा, “और छोटा लिखो.” मैंने और छोटा लिखा. उन्होंने कहा, “हां ! अब ठीक है.”
यह बात मैंने गांठ बांधकर रखी थी, जब तक मेरा वीरेन डंगवाल से सामना नहीं हुआ…
करीब एक साल बाद मैं इलाहाबाद से बरेली चला आया. वहां पर प्रभात जी थे. पत्रकारिता में प्रयोगधर्मिता के समर्थक. उन्होंने मुझे खुली छूट दी प्रयोग करने की. तब तक मैंने छोटे वाक्यों को साध लिया था. डेस्क पर हमारे वरिष्ठ सहकर्मी चंद्रप्रकाश शुक्ला जी मेरी कॉपी पढ़ते हुए कहा करते थे, “दिनेश का लिखा पढ़कर मुझे बहुत मजा आता है, वह कुछ इस तरह लिखता है, चिड़िया पेड़ पर बैठी थी. चिड़िया उड़ गई.” चंद्रप्रकाश जी खुद भाषाई शुद्धता और परिष्कृत भाषा के बड़े हिमायती थे.
बीच-बीच में मैं गोरखपुर भी जाता रहता था. वहां जगदीश लाल श्रीवास्तव अमर उजाला के ब्यूरो चीफ थे. शाम को उनके साथ एक कमरे के दफ्तर में बैठना होता था. चाय आती जाती रहती थी, कोई खास खबर लिखने के बाद वे मुझे थमा देते, “जरा एक नज़र देखिए…” उनकी एक बात मुझे पहुत पसंद थी, वे कहते थे जैसे भोजन में स्वाद होता है, वैसे ही भाषा में स्वाद आना चाहिए.
बहरहाल सीखने-सिखाने का दौर चलता रहा और साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कवि वीरेन डंगवाल हमारे सलाहकार संपादक बन गए. वे मुझे और मेरी अभिरुचियों को पहले से जानते थे, लिहाजा उन्होंने मुझसे ‘बोल बरेली’ और ‘आखर’ नाम से दो सप्लीमेंट शुरू कराए. तब तक मैं डेस्क पर आ चुका था. अक्सर मेरी लिखी किसी खास खबर की कॉपी का प्रिंटआउट लेकर वे बैठ जाते थे. वे छोटे वाक्यों को कॉमा और योजक शब्दों के जरिए आपस में जोड़ दिया करते थे.
एक दिन उन्होंने कहा, इतने छोटे वाक्य मत लिखो. वे हवा में झूलने लगते हैं. यह बात भी समझ में आई.
अब एक व्यक्ति और जिनका जिक्र किए बिना अखबारी लेखन की इस पाठशाला का जिक्र अधूरा रह जाएगा…
वह थे जेके सिंह…
उनका एक अलग ही अंदाज था. उम्र करीब 54-55, लंबा कद, नीली जींस, शर्ट के ऊपरी तीन बटन खुले हुए. हाथों में सिगरेट, आंखों पर चश्मा जिसे वे टाइप करते वक्त सिर पर चढ़ा लेते थे. होंडा स्लीक से चलते थे और ‘वन लाइनर’ बोला करते थे. जेके सिंह दिन की एक खबर देते, जो उनके हिसाब से हमेशा सिटी पेज या पहले पेज का एंकर होती थी. इसके अलावा वे खुद कहते कि अब मैं खानापूर्ति के लिए तीन-चार खबरें लिख देता हूँ.
वे शाम को ऑफिस आने के बाद कैंटीन में बैठते थे और चाय ऑर्डर करते थे. इसके बाद एक कागज़ पर अपनी रिपोर्ट का स्ट्रक्चर तैयार करते थे. यानी पहले क्या होगा, उसके बाद क्या बात आएगी. उनकी राइटिंग को पढ़ना मुश्किल था तो जब तक टाइप करना उन्होंने नहीं सीखा केवल एक कंपोजिटर उनका लिखा समझ पाता था. मेरी उनसे अच्छी पटरी बैठ गई.
एक दिन उन्होंने किसी राज की तरह मुझे बताया कि दूसरों की खबरें काटकर छोटी कर दी जाती हैं मगर मेरी किसी खबर की एक भी लाइन संपादक नहीं काट सकता. इसकी वजह यह कि वे हर वाक्य को अगले वाक्य से किसी कड़ी की तरह ऐसे जोड़कर रखते थे कि अगर कोई वाक्य कटा तो उसके आगे-पीछे वाले दोनों अर्थहीन हो जाएंगे.
यही नहीं उनके पैराग्राफ भी जहां खत्म होते, अगला उससे लिंक होता था. प्रयोग करने में वे माहिर थे. वे किसी बंगाली उपन्यासकार के उपन्यास से निकलने ब्योमकेश बख्शी टाइप के चलते-फिरते किरदार थे. मैंने गाहे-बगाहे उनके बारे में लिखा है, कभी तफ़सील से लिखूंगा.
ख़ैर, एक बात से कितनी यादों की परतें खुलती गईं. इसीलिए मेरा गहरा यकीन है कि हम खुद में कुछ नहीं होते, हमें बनाने-गढ़ने में जाने कितने लोगों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष योगदान होता है.
(तस्वीर अखबारनवीसी के शुरुआती दिनों की. मैहर के संगीत समारोह की कवरेज के दौरान कथक नृत्यांगना सुष्मिता बनर्जी का इंटरव्यू के लेते हुए)


राजीव ओझा-
अब एक नए सफर पर…
‘हिन्दुस्तान’ के साथ मेरे 12 साल के सफर का आज आखिरी दिन है। यह सफर 2012 में तब शुरू हुआ था जब ‘दैनिक जागरण’ में काम करते हुए मेरे जीवन में एक कठिन समय आया था और ‘हिन्दुस्तान’ में मिली नियुक्ति मेरे लिए तपती धूप में एक बड़ी राहत देने वाली वाली छांव लेकर आई थी।
आदरणीय श्री शशि शेखर जी तब भी ‘हिन्दुस्तान’ के प्रधान संपादक थे और उन्होंने ही लखनऊ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक आदरणीय श्री नवीन जोशी जी की संस्तुति पर चीफ रिपोर्टर के पद पर मेरी नियुक्ति की थी। आज जब कुछ नया करने और सीखने के इरादे से अपनी स्वेच्छा और समझ के अनुसार नेशनल न्यूज चैनल ‘लाइव टाइम्स’ के साथ नई पारी शुरू करने जा रहा हूं तो उन बीते दिनों के लिए मन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हिलोरें ले रहा है। ‘हिन्दुस्तान’ के साथ मेरी पारी इसलिए भी खास है क्योंकि इसने मुझे ‘लखनऊवा’ बना दिया। गोरखपुर के बाद सबसे ज्यादा 10 साल मैंने यहीं बिताए।
‘हिन्दुस्तान’ में दो साल अयोध्या (तब फैजाबाद) में बिताने के बाद लखनऊ आया तो 2014 से स्टेट ब्यूरो में काम करते हुए 2024 तक का सफर तय किया। बीते मई के महीने में विशेष संवाददाता पद पर प्रोन्नति भी मिली, जिसके लिए मैं अपने सभी वरिष्ठों का हृदय से आभारी हूं।
इसी साल जनवरी में ईश्वर की विशेष कृपा से मुझे अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की विशेष कवरेज का दायित्व भी मिला। लगभग 20 दिनों तक अयोध्या में रहकर इस आयोजन की कवरेज का अवसर देने के लिए भी मैं अपने वरिष्ठों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहूंगा। ‘हिन्दुस्तान’ में काम करना हमेशा से सपना था। गोरखपुर में ‘राष्ट्रीय सहारा’ में काम करते हुए बिड़ला घराने की विरासत से जुड़े इस समाचार पत्र के प्रति एक खास तरह का आकर्षण था। इस समूह की कार्य संस्कृति आज भी अलग और अलहदा है।
आज जब इस संस्थान से विदा लेने का समय आ गया तो इससे जुड़ी यादें मेरे मन में अपने लिए स्थाई कोना तलाशने लगी हैं। उन साथियों की बातें, जो वर्षों तक मेरे साथ बैठकर काम करते रहे, जिनके साथ परिवार के सदस्यों से ज्यादा बार शाम की चाय पी है, मेरी यादों का हिस्सा रहेंगी। कार्यालय में अपने सभी वरिष्ठों, सहकर्मियों व अनुज समान साथियों का भरपूर स्नेह व सहयोग मिला। खबरों की दुनिया से अलग धर्म-अध्यात्म और ज्योतिष पर मार्गदर्शन देने वाले वरिष्ठ भी मिले।
मैं हर किसी के प्रति प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करना चाहता हूं। …और जानबूझकर किसी का नाम लेकर कृतज्ञता ज्ञापित करने से बच रहा हूं, क्योंकि यदि किसी साथी का नाम छूट गया तो मुझे बहुत आत्मिक कष्ट होगा।
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हिंदुस्तान के विशेष संवाददाता राजीव ओझा अब इस न्यूज़ चैनल से जुड़ेंगे!


