मीडिया में आदिवासियों की भागीदारी पर सवाल उठना चाहिए: आनंद प्रधान

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धीरे-धीरे जल-जंगल और जमीन विकास की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। आदिवासियों को विकास के नाम पर जंगलों से बेदख़ल किया जा रहा है। ऐसे में पूरी तरह से जंगलों पर निर्भर आदिवासियों को शहरों/कस्बों का रुख करना पड़ रहा है। अपनी ज़मीन और पर्यावरण से मजबूरन बिछड़ रहे इन आदिवासियों को न केवल तथाकथित पढ़े-लिखे लोग ही हिकारत की नज़र से देख रहे हैं, अपितु कॉर्पोरेट जगत के इशारे पर मीडिया भी उनके प्रति भेदभाव वाला रुख किए हुए है। इसके फलस्वरूप उनकी जीवनशैली, संस्कृति, रीति-रिवाज़ आदि दरक-दरक कर टूटते-बिखरते जा रहे हैं।

आदिवासियों से जुड़े ऐसे ही तमाम मुद्दों पर विकास संवाद ने हाल ही में 8वां राष्ट्रीय मीडिया संवाद आयोजित किया। मालवा की देहरी पर बसे ऐतिहासिक शहर चंदेरी में हुए इस तीन दिवसीय आयोजन का विषय ‘आदिवासी और मीडिया’ पर केंद्रित था। समागम में देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक व अन्य बुद्धिजीवी वर्ग शामिल हुआ।

हम में मनुष्यत्व कम हो रहा है: पहले दिन मुख्य वक्तव्य आदिवासी लोक कला अकादमी के सेवानिवृत्त निदेशक कपिल तिवारी ने दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के साथ काम करते हुए मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय गुज़रा है। विकास यक़ीनन आवश्यक है, लेकिन विकास के एवज में यदि आपका मनुष्यत्व कम हो रहा हो, तो यह बहुत ख़तरनाक है। विकास की इसी अंधी दौड़ के चलते पिछले 50 वर्षों में भारत विचार शून्यता की ओर गया है। हमें उन आदिवासियों के बारे में विचार करना चाहिए, जिन्हें राजनेताओं और नौकरशाहों ने सिर्फ अपनी-अपनी गरज़ से इस्तेमाल किया है।

हे योद्धाओं! ज़रा युद्ध विराम की घोषणा करो…: तिवारी ने कहा कि इन तथाकथित ज़िम्मेदारों ने आदिवासियों को इंसानों की तरह देखने की दृष्टि ही ख़त्म कर दी है। इस वर्ग को प्रारंभ से ही पिछड़ा व दयनीय मान लिया गया। इनकी इतनी दया ज़रूर रही कि इन्होंने आदिवासियों को पशु न मानते हुए, पशुओं से थोड़ा ऊपर माना। दरअसल, देखा जाए तो आदिवासियों में अथाह रचनाशीलता है। मगर हमने रचना का सम्मान करना छोड़ दिया है और काल का गुणगान करने लग गए। हम निरंतर युद्धरत् हैं, जबकि वे शांतिप्रिय और मर्यादाओं के बीच रहने वाले। हमने इस युद्ध में सारी मर्यादाएं पददलित कर दी हैं। अत: निवेदन है कि ‘हे योद्धाओं! ज़रा युद्ध विराम की घोषणा करो, इतना न जीतो’। आदिवासी धर्मों को नहीं जानते, लेकिन धार्मिकता से जीते हैं। लोक को ध्यान में रखकर देखने से भारत ज़्यादा समझ में आता है। या तो इन्हें शास्त्र के रूप में जानें, या फिर लोक परंपरा के रूप में।

हम आदिवासियों के पक्ष में ईमानदारी से नहीं हैं: आउटलुक की एसोसिएट एडिटर, भाषा सिंह ने कहा कि आदिवासियों का बड़ा हिस्सा शहरों में मजदूरी कर रहा है। जिस तरह से मीडिया का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट की गिरफ़्त में है, हम आदिवासियों के पक्ष में उतनी ईमानदारी से नहीं लिख पाते। उनकी अस्मिता ख़तरे में है। आदिवासियों की परंपराओं का गुणगान तो हम करते हैं, लेकिन उन्हें बचाने के लिए हम अपनी आवाज़ बुलंद नहीं करते। इसी के चलते आज आदिवासी अस्मिता ख़तरे में है, और हमें आदिवासी अस्मिता व पहचान को बचाना होगा।

सोची-समझी साजिश है आदिवासियों के खिलाफ़: पत्रिका, डाउन टू अर्थ की अपर्णा पल्लवी ने राज़ फाश किया कि सोची-समझी साजिश के तहत पहले तो आदिवासियों को कर्ज़े में डुबाया जाता है, फिर उन्हें गुलाम बना लिया जाता है। वैसे तो आदिवासी बड़े आत्मीय होते हैं, उन्हें समझने के लिए सच्ची आत्मा की ही ज़रूरत होती है। इसके उलट जब हम उनसे आधिकारिक (ऑफीशियल) तौर पर बात करते हैं, तो वो सख़्त (रिजिड) हो जाते हैं। इसमें उनकी मासूमियत ही तो छुपी होती है।

हम स्वयं असभ्य, उन्हें सभ्य बनाने चले: दैनिक समाचार पत्र ‘कल्पतरु’ आगरा के संपादक अरुण त्रिपाठी ने इज़हार किया कि आदिवासियों में भय पैदा किया गया है। हमने उनमें हीनता बोध पैदा किया है, जबकि यह बोध तो हममें होना चाहिए। उनके संसाधनों को बड़े ही व्यवस्थित तरीके से लूट रहे हैं हम। वास्तव में हमने उन्हें समझा ही नहीं और जब तक हम उन्हें समझेंगे ही नहीं, उनके लिए लिखेंगे क्या? अचरज वाली बात यह है कि हम तथाकथित लोग ख़ुद असभ्य होकर आदिवासियों को सभ्य बनाने में लगे हैं। उन्हें समझना है, तो लोकतांत्रिक तरीके से ही समझना होगा।

विकास की अवधारणा समाज को स्वीकार्य हो: स्वतंत्र मिश्र ने दहला देने वाली जानकारी दी कि उड़ीसा में क़रीब 40 हज़ार ऐसी मांएं हैं, जिनकी शादी नहीं हुईं। ऐसे में अब 98 प्रतिशत लड़के ऐसी लड़कियों से शादी करने को तैयार नहीं हैं। सच तो यह है कि विकास की अवधारणा ऐसी होना चाहिए, जो सर्व समाज को स्वीकार्य हो।

कॉर्पोरेट सबसे बड़ा खलनायक: वहीं दैनिक जागरण मुजफ़्फ़रपुर के अख़्लाक ने सवाल उठाया कि हम उन्हें अपनी तरह से क्यूं नहीं देखते। उनकी परंपराओं को देखते हुए ही सरकारी योजनाओं का निर्माण होना चाहिए। उनके उत्थान में कॉर्पोरेट सबसे बड़ा खलनायक है। इस खलनायक का उद्देश्य आदिवासी समाज से जल-जंगल-ज़मीन छीनना है।

राजनीतिक मुद्दा बनाने की ज़रूरत: दूसरी दिन चिन्मय मिश्र की पुस्तक ‘प्रलय से टकराते समाज और संस्कृति’ का विमोचन किया गया। आयोजन के मूल विषय पर मुख्य वक्तव्य, पत्रकारिता प्राध्यापक आनंद प्रधान ने दिया। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में लोकतांत्रिक घाटा (डेमोक्रेटिक डेफिसिट) दिखाई देता है। आज यदि मीडिया में आपकी चर्चा नहीं है, तो आप दुनिया के लिए अनदेखे हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि आपको कवरेज मिलता भी है, तो किस दृष्टिकोण से व कितना। मीडिया में आदिवासियों की भागीदारी पर सवाल उठना चाहिए। इसे लोकतांत्रिक दायरे में रखते हुए राजनीतिक मुद्दा बनाने की ज़रूरत है।

संपादक नाम की संस्था तिरोहित हो रही है: अयोध्या से आए वरिष्ठ पत्रकार, शीतलाजी ने भी सवाल उठाया कि यह महत्वपूर्ण है कि हम निर्णायक स्थिति किसके हाथ में देना चाहते हैं। दु:खद है कि संपादक नाम की संस्था तिरोहित होकर मीडिया होती जा रही है। जब तक मीडिया की आर्थिक स्वतंत्रता नहीं होगी, मीडिया का वर्तमान स्वरूप बदलना मुश्किल होगा।

मीडिया की दुनिया को एक रॉबिनहुड चाहिए: न्यूज़ पोर्टल, वेबदुनिया के संपादक जयदीप कर्णिक ने स्पष्ट किया कि हम भी मीडिया के आदिवासी हैं। कॉर्पोरेट ने हमें भी मीडिया में आदिवासी बनाकर रखा है। आज बुरी व ख़राब चीज़ें ज़्यादा हाईलाइट हो रही हैं, जबकि अच्छी चीज़ें कम। दरअसल, पत्रकारिता में नदियों की तरह कैचमेंट एरिया ख़त्म हो गया है। आजकल शॉपिंग मॉल में ख़रीदारी और ऑडी कारें ही विकास की परिभाषा कहलाती हैं। हमें विचार की ताकत को मज़बूत करना होगा। अब मीडिया की दुनिया को एक रॉबिनहुड चाहिए।

स्टोरी करते समय सजग रहें पत्रकार: अंग्रेजी पत्रकारिता के प्रतिनिधि के रूप में जयदीप हार्डिकर ने भी कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने, कहा कि ‘ह्यूमन इज़ ए हिपोक्रेट एनिमल’। तथाकथित सभ्य समाज को घेरते हुए उन्होंने कहा कि आज परिवार में ही कोई किसी का कहना नहीं मानता, लेकिन मेंढ़ा लेखा गांव का आदिवासी समाज, तब तक कोई फैसला नहीं लेता, जब तक कि सब मिलकर कोई निर्णय न ले लें। उन पर स्टोरी करते समय एक पत्रकार को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि मैं ख़ुद उस स्टोरी का हिस्सा हूं, या कोई बाहरी व्यक्ति। पत्रकारिता में 5 डब्ल्यू और 1 एच का सिद्धांत पढ़ाया जाता है। इसमें हमें डब्ल्यू वाले ‘हूम’ पर अधिक ध्यान देने की ज़रूरत है। हम कभी न भूलें कि ‘जर्नलिज़्म फॉर हूम एंड जर्नलिज़्म फॉर वट’।

ख़ास मौकों पर हिन्दी पत्रकारिता हिन्दू हो जाती है: राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी संपादक उर्मिलेश ने कहा कि राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी का समय पत्रकारिता का स्वर्णिम काल था। हालांकि सवाल उस समय भी थे। उन्होंने इस बात को सिरे से खारिज किया कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है।’ पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए जाते हैं, तो अलग होते हैं और ख़बर बनाते वक़्त अलग। हम प्रक्रिया का हिस्सा ज़रूर बने रहें लेकिन ख़बर हमेशा उद्देश्यपूर्ण व डिटेच (अलग) होकर ही लिखें। एक और सवाल उन्होंने उठाया कि हिन्दी पत्रकारिता ख़ास मौकों पर हिन्दू पत्रकारिता बन जाती है। हमारे शब्द व कर्म बिल्कुल अलग-अलग हैं। शब्द और कर्म की एकता चाहिए।

जयराम शुक्ला, अनु आनंद, अजीत सिंह आदि ने भी संबंधित विषय पर अपने विचार रखे। अनेक पत्रकार साथियों ने हस्तक्षेप के रूप में अपने सवाल रखे। तीन दिवसीय कार्यशाला समाप्त होते-होते कई सवालों के जवाब दे गई और कई प्रश्न अनुत्तरित भी रह गए। जिन सवालों के जवाब नहीं मिले, वो सवाल सुलगते हुए अपने पीछे एक चिंगारी ज़रूर छोड़ गए। देखना होगा कि सवालों से उठी ये चिंगारी समाज के लिए उजाला साबित होती है या कर डालती है उम्मीदों को ख़ाक।

 

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Comments on “मीडिया में आदिवासियों की भागीदारी पर सवाल उठना चाहिए: आनंद प्रधान

  • AMARENDRA KISHORE says:

    भागीदारी की बात करने से पहले समझदारी इसी में है कि उन्हें उनके अधिकार मुहैय्या किये जाने की बात हो। जहाँ रोटी सपना हो, एक चायवाला बन जाना पूरे समाज की उपलब्धि कहलाता हो, वहां का कोई नौनिहाल मीडिया में भागीदारी करे या मीडिया उनकी बदहाली पर सवाल उठाये–कितना व्यवहारिक है यह सब।

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