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मोटा कमाने वाले बड़े न्यूज़ चैनल जिलों में तैनात रिपोर्टरों का खून पीना क्यों नहीं छोड़ रहे हैं!

देश का एक बड़ा मीडिया हाउस प्रदेश के जिलों की खबर प्रमुखता से दिखाए जाने पर जनता की विश्वसनीयता सालों तक बरकार रखे था क्योंकि देश की जनता को भरोसा था कि एक मीडिया है जो उनके जिले की हर छोटी-बड़ी खबरों को प्रमुखत: से दिखाकर जिम्मेदारानों से सवाल पूछता था। उन्हीं छोटी खबरों को प्रमुखता से प्रसारित करने के बाद अपना वजूद बना चुका देश का सबसे बड़ा न्यूज चैनल अब उन्हीं मुद्दों से अलग हटकर काम कर रहा है जिसकी खामी हाल के कुछ महीनों की टीआरपी में दिख रही है।

ऑफिस में बैठकर एजेंडा सेट करने वालों को सोचना चाहिए की उनकी पहचान जिले की खबरों से पहले हैं। एजेंडाधारी मोटी-मोटी सैलरी लेने वालों ने ऑफिस के खर्चे बचाने के लिए जिलों के रिपोर्टरों पर चाबुक चला दी है, क्योंकि ऑफिस का खर्चा सैलरी कम करवा के नहीं बल्कि जिलों में कड़ी मेहनत और संस्थान का नाम ऊंचा रखने वाले जिलों के रिपोर्टरों की खबरों द्वारा दी जा रही सैलरी को कम कर दिया है। यहां तक की उनसे अब खबरें भी इसलिए नहीं ली जा रही कि उन्हें कहीं पैसा न देना पड़े।

इक्का-दुक्का खबर लेकर वह सिर्फ काम मात्र चला रहे हैं।

वहीं, दूसरी तरफ अन्य संस्थान हैं जो अपने जिलों के रिपोर्टरों का मान सम्मान बरकरार रखे हैं क्योंकि जिलों के रिपोर्टरों की पहचान उनकी खबरों से है न कि संस्थान की आईडी लेकर घूमने में। जब उनकी खबर ही नहीं लगेगी तो क्या संस्थान और क्या रिपोर्टर, किसी की कोई पहचान नहीं होगी।

इस समय बड़े-बड़े चैनल NEWS18 INDIA, INDIA टीवी, ABP न्यूज, Republic भारत व अन्य अपना वजूद जिलों की हर छोटी-छोटी खबरों को प्रसारित कर बनाए हुए हैं।

यह दर्द किसी और का नहीं बल्कि बड़े संस्थान में काम करने वाले एक छोटे से जिले में तैनात रिपोर्टरों का है जो संस्थान में सालों से अपनी सेवा बिना किसी भेदभाव और पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं।

इस स्थिति में उन्हें अब अपना घर भी ईमानदारी से चलाने में हर एक दिन सोचना पड़ रहा है कि कैसे क्या होगा क्योंकि मीडिया के अलावा उन्होंने अपने जीवन में कोई और काम ही नहीं किया, अब आजकल के संस्थान खुद तो बड़ी-बड़ी डील कर आदान प्रदान कर रहे हैं पर जिलों में रिपोर्टर उन्हें ईमानदार चाहिए.

अगर रिपोर्टर ईमानदार चाहिए तो उन्हें पैसा भी पूरा दिया जाए जिससे वह अपना मान सम्मान और संस्थान का नाम कहीं न डुबाएं। मोटी-मोटी सैलरी लेने वालों से नहीं संस्थान चलता है जिलों के रिपोर्टर्स से जो संस्थान को सोचना चाहिए।

एक रिपोर्टर द्वारा भड़ास को भेजे गए मेल पर आधारित

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