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सियासत

गुरु घंटाल से कैसे निपटेंगे विश्वगुरू?

राकेश कायस्थ-

गुरु, महागुरु, गुरु घड़ियाल और विश्वगुरु सब चक्करघिन्नी बन चुके हैं क्योंकि सबसे बड़ी ताकत के पास अब गुरु घंटाल है। धन्य हो अमेरिका की जनता। चुना भी तो ऐसा आदमी की अगले चार साल तक पूरी दुनिया को नाच नचाता रहेगा।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, अचार-व्यवहार, शिष्टाचार सबका अचार लगाकर ट्रंपवा पूरी दुनिया को बेचेगा और जब बाकी दुनिया अपना माल बेचने अमेरिका आएगी तो मनमाना टैरिफ लगाएगा। कूटनीति के किसी सिद्धांत या किसी तर्क से ट्रंप को नहीं समझा जा सकता है।

ये वही आदमी है, जिसके लिए अपने वाले विश्वगुरु अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा बुलंद करके वोट मांगने गये थे। अहमदाबाद में राजा-महाराजाओं की तरह स्वागत किया था। मगर नकमहरामी देखो इसकी, ना जाने किस जन्म का बदला निकाल रहा है। कहते हैं कि बाइडेन के कार्यकाल के आखिरी साल में जब साहेब अमेरिका गये थे, उसी समय से रिश्ते बिगड़े हैं। तब हवा डेमोक्रेट के पक्ष में थी और साहब की हमेशा जीतने वालों से रिश्तेदारी होती है। बस यहीं गलती से थोड़ा मिश्टेक हो गया। माई डियर फ्रेंड दोलांड को साहेब ने इग्नोर मार दिया। कुछ देशों के शासन प्रमुख अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रंप से मिले थे लेकिन अपने साहब नहीं गये। ट्रंपवा समझ गया ये कि ये मुझे मामू बना रहे थे और बदला लेने पर उतारू हो गया। अमेरिका की बुद्धिमान जनता ने ट्रंप को फिर से पावर में ला दिया। विदेश मंत्री कई दिन तक अमेरिका में डेरा डाले रहे लेकिन साहब के लिए शपथ ग्रहण समारोह का न्यौता नही जुगाड़ पाये। साहेब किसी तरह बाद में पहुंचे तो बेहद ठंडा स्वागत हुआ। बाद में पता चला कि वो आखिरकारिक यात्रा थी नहीं। साहब अपने निजी प्रयासों से अप्वाइंटमेंट लेकर संबंध सुधारने गये थे। मुझे यहां उनसे हमदर्दी है क्योंकि मामला आखिर देश से जुड़ा हुआ है। साहेब ने कहा लड़ाई-लड़ाई माफ करो, लेकिन लगता गुरुघंटाल का बदला पूरा नहीं हुआ। प्रेस काँफ्रेंस में साहब सामने बैठे रहे और ट्रंपवा खुलेआम कहता रहा कि ये जितना टैक्स लगाएंगे हम भी उतना ही लगाएंगे। कूटनीति के इतिहास में ऐसी बदत्तमीजी पहले किसने देखी है। साहेब वापस लौटे और गुरुघंटाल ने रिटर्न गिफ्ट में बिना वीजा अमेरिका पहुंचे भारतीयों की अगली खेप भिजवा दी। इस बार भी हथकड़ी और बेड़ी लगवाई। आखिर इस तरह की दुष्टता क्या मतलब। दुनिया भर के ना जाने कितने देशों के नागरिक अमेरिका में गैर-कानूनी तौर पर रह रहे हैं लेकिन सिर्फ भारत को नीचा दिखाने का क्या प्रयोजन? साहेब ने अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रंप के रिंग मास्टर एलॉन मस्क से पींगे बढ़ाई और बदले में मन-माफिक खबर भी आई। टेस्ला ने भारत आने की घोषणा कर दी और ये खबर भी तैरने लगी इलेक्ट्रिक कार से जुड़ी ड्यूटी में भारत बदलाव के लिए तैयार है। लेकिन गुरूघंटाल ट्रंप बीच में आ गया। अगले ही दिन खबर छप गई कि ट्रंप खुलेआम कह रहा है कि टेस्ला को भारत नहीं जाना चाहिए। ऐसा लगता है कि कोई कंजूस बूढ़ा अपने घर के दरवाज़े पर बैठ गया है और पड़ोसन को एक कटोरी चीनी देती बहू को आंखे दिखा रहा है या चाय पीने पड़ोसी को बेइज्जत करके भगा रहा है। ट्रंप सिर्फ भारत नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द है। उसे लगता है कि इधर-उधर से सबकुछ छीनकर वो अमेरिका को फिर से महान बना देगा। साथ खड़े अपने साहब ने हां में हां मिलाते हुए कहा था, हम भी भारत को महान बना देंगे। कुछ नमूने और इकट्ठा होंगे सबके देश महान बनेंगे लेकिन पता नहीं दुनिया का क्या होगा? हंसी ठट्ठे से अलग दो-तीन गंभीर बातें। पहली बात ये कि कूटनीतिक मोर्चे पर भारत इस वक्त बेहद मुश्किल स्थिति में है। रूस की मौजूदगी से दुनिया में शक्ति संतुलन था लेकिन रूस अब अमेरिका के नजदीक जाना चाहता है। गाल बजाने वाले देशों से अलग चीन चुपचाप अपना काम कर रहा है और विश्व को प्रभावित करने के मामले में अपनी स्थिति अमेरिका के बराबर बना चुका है। भारत के लिए जिससॉफ्ट पावर’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, उससे बीजेपी-आरएसएस को बहुत चिढ़ थी।

उन्हें लगता था कि अपना स्वतंत्र वजूद रखने की बात कहना एक तरह का ढोंग है और अमेरिका की गोद में जाकर बैठ जाना ही हर समस्या का हल है। मोदी के नेतृत्व में भारत यही किया। नतीजा ये हुआ कि भारत की बारगेनिंग पावर पूरी तरह खत्म हो गई। अमेरिका को पहले की तरह अब इस बात की चिंता नहीं है कि कहीं रूस-चीन और भारत एक साथ आ गये तो क्या होगा?
धारा-370 हटाने का फैसला मोदी ने राजनीतिक फायदे के लिए किया और इसके नतीजे में छह महीने के भीतर गलवान हो गया। चीन ने ताकत दिखाने के लिए अरूणाचल का एक हिस्सा कब्जा लिया और साहब को ये कहना पड़ा कि ना कोई घुसा ना कोई घुसा है।

भारत कोशिश कर रहा है कि किसी भी मान-मनौव्ल के साथ चीन को इस बात के लिए राजी कर लिया जाये वो थोड़ा पीछे हटे और सरकार को अपनी जनता के सामने और शर्मिंदा ना होना पड़े। बॉर्डर पर शांति नज़र आये, चाइनीज़ एप फिर बहाल हों और साहब माई डियर चाइनीज़ फ्रेंड को झूला-झुलाते हुए कह सकें—सब चंगा सी। लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
विश्वगुरू के पत्ते एक के बाद एक करके गलत पड़ते जा रहे हैं। देश की आर्थिक स्थिति बेहद डंवाडोल है और इन सबके बीच अमेरिका की तख्त पर एक ऐसा नमूना फिर से आ बैठा है, जो एक दिन भी दुनिया को शांति से नहीं रहने देगा। भारत ही नहीं बल्कि हर सहयोगी देश को घुटने पर लाने का इरादा लेकर ट्रंप काम कर रहा है। गुरुघंटाल से निपटने की क्या तकरीब विश्वगुरू निकालते हैं, इससे भारत के आनेवाले चार साल तय होंगे।


मनोज अभिज्ञान-

डोनाल्ड ट्रंप का न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का सपना ऐसे यथार्थ की ओर बढ़ रहा है जो न केवल वैश्विक स्थिरता को झकझोर सकता है बल्कि अमेरिका की पारंपरिक भूमिका को भी समाप्त कर सकता है। ट्रंप जिस ‘महान शक्ति सिद्धांत’ की ओर बढ़ते दिख रहे हैं, वह केवल रणनीतिक बदलाव नहीं बल्कि विनाशकारी प्रयोग भी है, जिसमें वैश्विक व्यवस्था को टकराव के नए दौर में धकेलने की पूरी संभावना है। याल्टा सम्मेलन की ऐतिहासिक स्मृतियों को पुनर्जीवित करने की चाह में ट्रंप जिस नए शक्ति संतुलन की कल्पना कर रहे हैं, वह न केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग को कमजोर कर सकता है बल्कि अमेरिका को भी ऐसी स्थिति में डाल सकता है जहां वह खुद अस्थिरता का शिकार बन जाए।

सबसे पहले, क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा बढ़ता दिख रहा है। ट्रंप की पॉवर लेन-देन की सोच, जिसमें वे ग्रीनलैंड से लेकर पनामा तक और ताइवान से लेकर गाजा तक क्षेत्रीय विस्तार की कल्पना करते हैं, सीधे-सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा संधियों के उल्लंघन को वैधता प्रदान करने की कोशिश है। रूस के लिए यूक्रेन की संप्रभुता का कोई मूल्य नहीं, चीन के लिए ताइवान की स्वतंत्रता कोई मायने नहीं और ट्रंप के लिए इन मुद्दों पर नैतिक आक्रोश केवल ‘लिबरल वर्ल्ड ऑर्डर’ का ढकोसला मात्र है। लेकिन इस नए शक्ति-संतुलन के खेल में यह भूलना खतरनाक होगा कि ‘शक्ति’ की भाषा में बात करने वाले राष्ट्रों के बीच टकराव की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। ट्रंप ने जिस तरह यूक्रेन को रूस के हवाले छोड़ने का संकेत दिया है, वैसे ही ताइवान को भी वे अपनी ‘बोझ कम करने’ की रणनीति के तहत अकेला छोड़ सकते हैं। यह न केवल प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को ध्वस्त करेगा बल्कि चीन को ताइवान पर कब्जा करने का न्योता भी दे सकता है।

दूसरा बड़ा खतरा परमाणु प्रसार का है। अगर अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों को त्याग देता है, तो वे अपनी सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करने के लिए परमाणु हथियारों की ओर बढ़ेंगे। यूरोप में जर्मनी और पोलैंड पहले से ही परमाणु विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। जापान और दक्षिण कोरिया, जो पहले ही तकनीकी रूप से परमाणु हथियार बनाने में सक्षम हैं, अब अपने स्वयं के रक्षा उपायों की ओर बढ़ सकते हैं। यदि एक बार यह सिलसिला शुरू हो गया, तो दुनिया जल्द ही परमाणु हथियारों से लैस छोटे-छोटे देशों के जंगल में बदल जाएगी, जहां हर कोई अपने पड़ोसी को धमकाने के लिए परमाणु शक्ति का सहारा लेगा। यह वही विश्व व्यवस्था होगी जिससे एक दिन निपटने में स्वयं अमेरिका भी खुद को असमर्थ पाएगा।

तीसरा गंभीर प्रभाव जियो पोलिटिकल और इकोनॉमिक अलाइनमेंट का होगा। यूरोप अब अमेरिका को भरोसेमंद सहयोगी नहीं मान सकता। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने पहले ही यूरोप को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में धकेल दिया है, लेकिन अब यदि अमेरिका खुले तौर पर अपने वैश्विक दायित्वों से पीछे हटता है, तो यूरोप, रूस और चीन के साथ नए समीकरण बना सकता है। अमेरिका का पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र सिकुड़ सकता है और बहु-ध्रुवीय विश्व में उसकी शक्ति सीमित हो सकती है। ट्रंप भले ही इसे बड़ी जीत मानें, लेकिन यह अमेरिका को वैश्विक शक्ति संतुलन में हाशिये पर डालने की शुरुआत भी हो सकती है।

अमेरिकी राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप की रूस नीति को लेकर जितनी भी हायतौबा मची हो, सच्चाई यह है कि इसमें कोई अनोखी बात नहीं है। ट्रंप के समर्थक इसे क्रांतिकारी बदलाव मानकर उनकी दूरदर्शिता का गुणगान कर रहे हैं, तो उनके विरोधी इसे अमेरिका की परंपरागत विदेश नीति से धोखा बता रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ट्रंप की रूस नीति उतनी ही पुरानी है जितनी पश्चिमी जगत की रूसी सत्ता को संभालने की कोशिशें। चाहे जर्मनी के पूर्व चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर और एंजेला मर्केल हों या अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और जो बाइडेन—सभी ने रूस के साथ वैसा ही रिश्ता चाहा था, जैसा ट्रंप चाहते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि ट्रंप इसे दबी जुबान में कहने के बजाय खुलेआम स्वीकार कर रहे हैं।

ओबामा हों या बाइडेन, सभी रूस के प्रति अमेरिकी विरोध को शीत युद्ध की बची-खुची लकीर मानते रहे हैं। ट्रंप ने बस इसे और साफ कर दिया है। वे भी रूस को कोई बड़ा खतरा नहीं मानते और अमेरिका को ऐसी स्थिति में ले जाना चाहते हैं, जहां रूस के साथ अमेरिका का टकराव न हो। यह वही नीति है, जो अमेरिका ने 2008 में जॉर्जिया के खिलाफ रूसी कार्रवाई और 2014 में यूक्रेन पर हमले के दौरान अपनाई थी।

लेकिन असली फर्क ट्रंप की रणनीति में दिखता है। उनके पूर्ववर्तियों ने रूस पर सख्त बयानबाजी और सांकेतिक प्रतिबंध लगाकर अपनी सख्त(?) छवि बनाए रखी, जबकि ट्रंप ने सीधे-सीधे पुतिन को सम्मान देने की बात की है। यह अलग तरह की व्यावसायिक सौदेबाजी है—ऐसी डील, जिसमें रूस को यह विश्वास दिलाया जाए कि अमेरिका टकराव नहीं चाहता। ट्रंप की सोच में, रूस को अलग-थलग करने की जगह उसके साथ आर्थिक साझेदारी करना ज्यादा व्यावहारिक है। अगर अमेरिका को रूस के साथ व्यापार करना है, तो उसके खिलाफ प्रतिबंध लगाना कितना तर्कसंगत होगा?

यही नहीं, ट्रंप का दृष्टिकोण यूरोप के प्रति भी अलग है। उनके अनुसार, जब जर्मनी और यूरोपीय देश खुद रूस के साथ व्यापार करने के लिए उतावले हैं, तो अमेरिका को क्यों पीछे रहना चाहिए? ट्रंप इसे पलटकर नई नीति बनाना चाहते हैं—अगर रूस जर्मनी के ज्यादा करीब है और उसका खतरा भी जर्मनी को ही ज्यादा है, तो सुरक्षा का बोझ भी वही उठाए। अमेरिका को रूस के साथ व्यावसायिक संबंध विकसित करने से कोई परहेज नहीं होना चाहिए।

अगर इस नीति का ऐतिहासिक विश्लेषण करें, तो यह ट्रंप की खुद की खोज नहीं है। यह वही विचारधारा है, जिसे 1940 के दशक में हेनरी वालेस ने अमेरिका की सोवियत नीति के लिए सुझाया था। वालेस का मानना था कि रूस की पश्चिम विरोधी मानसिकता उसकी ऐतिहासिक असुरक्षा से उपजी है, और उसे सैन्य घेराबंदी से नहीं, बल्कि आर्थिक साझेदारी और विश्वास-निर्माण से संभाला जा सकता है। लेकिन उस समय अमेरिकी कूटनीति के सूत्रधार जॉर्ज केनन ने इसे नकार दिया था। केनन का तर्क था कि रूस के साथ स्थायी शांति तभी संभव होगी, जब वह यह समझ जाए कि पश्चिम उसकी आक्रामकता का सफलतापूर्वक प्रतिरोध कर सकता है।

तीन साल हो गए यूक्रेन युद्ध को, और इसी मौके पर शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन ने दुनिया को एक बार फिर दिखा दिया कि उनकी दोस्ती सिर्फ कूटनीतिक दिखावा नहीं है। यह संबंध किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से प्रभावित नहीं होगा—इशारा साफ था, अमेरिका की ओर। चीन के विदेश मंत्रालय के बयान में शी ने रूस को ‘सच्चा मित्र’ कहा, जो ‘सुख-दुःख में साथ खड़े रहते हैं।’

लेकिन बीजिंग में हलचल है। वॉशिंगटन, मास्को से वार्ता कर रहा है, और अगर अमेरिका ने रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील देकर उसे अपनी ओर खींच लिया, तो चीन की स्थिति कमजोर हो सकती है। अमेरिका, यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के नाम पर मास्को से गुप्त वार्ताएं कर रहा है, तब बीजिंग को लगने लगा है कि कहीं वह इस समीकरण से बाहर न कर दिया जाए। यह वही डर है जिसे ‘रिवर्स निक्सन’ पल कहा जा रहा है। जब शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने चीन को सोवियत संघ के खिलाफ अपने पक्ष में किया था, तो अब चीन को डर है कि कहीं अमेरिका रूस को अपने पक्ष में न कर ले।

फिर भी, रूस पर चीन की आर्थिक पकड़ इतनी मजबूत है कि तुरंत किसी बड़े बदलाव की संभावना कम ही है। लेकिन बीजिंग को आशंका है कि अगर रूस को अमेरिका से आर्थिक राहत मिलने लगी, तो उसकी चीन पर निर्भरता कम हो जाएगी। ट्रंप प्रशासन की चालें इस दिशा में जाती दिख रही हैं।

यही कारण है कि शी और पुतिन इस साल दो बार बात कर चुके हैं—ट्रंप के शपथ ग्रहण के बाद और फिर तब, जब अमेरिका-रूस के अधिकारी सऊदी अरब में यूक्रेन पर बातचीत कर रहे थे। संदेश साफ था: मास्को और बीजिंग के बीच कोई राज़ नहीं है।

शी ने पुतिन को भरोसा दिलाया कि उनका गठबंधन किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और न ही किसी बाहरी दबाव से प्रभावित होगा। पुतिन ने भी इसे ‘रणनीतिक विकल्प’ करार दिया, जो ‘क्षणिक घटनाओं’ से डगमगाने वाला नहीं है।

यह दोस्ती किस दिशा में जाएगी, यह तो भविष्य बताएगा। पर इतना तो तय है कि चाहे भू-राजनीतिक हलचलें कितनी भी तेज़ हों, रूस और चीन का रिश्ता फिलहाल किसी झंझावात में फंसता नहीं दिख रहा।

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