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सुख-दुख

आईआईएमसी के बैचमेट्स : एक मिलन समारोह ये भी!

अनिल भास्कर-

कालजयी स्मृतियों का साक्षात्कार वाकई सुप्त संवेदनाओं को कितना स्पंदित कर जाता है न! कल ऐसे ही वैशिष्ट्य से ऊर्जित क्षणों को जीने का अवसर एक बार फिर मिला। उन यारों से मुलाकात हुई जो जब भी मिलते हैं, हाथ पकड़कर तीन दशक पीछे लिये जाते हैं।

उस कालखंड में जहां सपने बादलों से ऊंचे उड़ा करते थे और उम्मीदों की दौड़ क्षितिज के पार तक। जी, वही आईआईएमसी के बैचमेट्स। अब सब के सब करियर के उत्तुंग शिखर पर। अवसान की अपरिहार्यता से संघर्षरत। मगर कालसरिता की तेज धारा में बहते हुए इस नवसंगम पर कुछ घंटे के ठहराव ने रवानी को जैसे नया त्वरण दे दिया।

इस त्वरण में रोजमर्रा की दुश्वारियां, भौतिक जीवन की आपाधापी, भविष्य को लेकर अकारण चिंता, सब विलीन। सिर्फ उन्मुक्त हास-विलास, पीछे छोड़ आए वक्त के टुकड़ों को जोड़कर साबुत तस्वीर बनाने की कोशिश, स्मृतिमंजूषा के पन्नों से संस्मरणों का पुनरोद्धरण और आनंदसिंधु में तरण-उत्प्लावन।

अक्सर सुना है, खुशी और गम दोनों बांटने के लिए दोस्त जरूरी हैं। पर मैं तजुर्बे से कहता हूं कि दोस्त जरूरी हैं जिंदा रहने के लिए। इसलिए इक यही अरदास, बार बार ये दिन आए।

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