केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार नया कानून लाने जा रही है। नाम होगा डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम। इसके तहत उल्लंघन करने पर 250 करोड़ रुपये से 500 करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान है। यह प्रावधान मुख्य रूप से डेटा फिड्यूशरी (Data Fiduciary) और डेटा प्रोसेसर जैसी संस्थाओं के लिए होना बताया जा रहा है, जो बड़े पैमाने पर व्यक्तिगत डेटा को प्रोसेस करती हैं।
हालांकि, पत्रकारों, यूट्यूबर्स और आरटीआई कार्यकर्ताओं पर इसका क्या और कैसे असर पड़ेगा? नीचे पढ़कर विस्तृत Video भी देखिए…
पत्रकारों और यूट्यूबर्स की चुनौतियां
- स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर असर: अगर कोई पत्रकार या यूट्यूबर किसी विषय पर रिपोर्टिंग कर रहा है और उसमें किसी व्यक्ति के निजी डेटा का अनाधिकृत रूप से उपयोग होता है, तो यह डेटा प्रोटेक्शन कानून के दायरे में आ सकता है।
- कंसेंट (Consent) की बाध्यता: डेटा का उपयोग करने से पहले व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य हो सकता है। हालांकि, पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए कुछ मामलों में छूट दी जा सकती है।
- डेटा मिसयूज के आरोप: यदि किसी वीडियो या लेख में गलत तरीके से व्यक्तिगत जानकारी को उजागर किया जाता है, तो प्रभावित व्यक्ति कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
- डेटा प्राइवेसी और पब्लिक इंटरेस्ट: कई बार पत्रकारिता में पब्लिक इंटरेस्ट में संवेदनशील डेटा प्रकाशित किया जाता है। ऐसे मामलों में कानूनी लड़ाई जटिल हो सकती है और पत्रकार को अपने इरादे और रिपोर्टिंग की वैधता को साबित करना पड़ सकता है।
क्या राहत मिल सकती है?
सरकार ने संकेत दिया है कि जनहित में रिपोर्टिंग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए कुछ अपवाद और सुरक्षा उपाय प्रदान किए जा सकते हैं। मीडिया संगठनों और स्वतंत्र पत्रकारों को इस अधिनियम के तहत संभावित छूट दी जा सकती है, बशर्ते कि वे पत्रकारिता आचार संहिता का पालन करें।
यूट्यूबर्स के लिए विशेष ध्यान
यूट्यूबर्स जो व्यक्तिगत डेटा या गोपनीय जानकारी का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें भी इस कानून के तहत सावधानी बरतनी होगी।
फैक्ट-चेकिंग और रिव्यू कंटेंट बनाने वाले यूट्यूबर्स को सुनिश्चित करना होगा कि वे किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को बिना सहमति के उजागर न करें।
यदि कोई कंटेंट निर्माता व्यक्तिगत डेटा को गलत तरीके से इस्तेमाल करता है, तो उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की जा सकती है और भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
रवीश कुमार-
सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून बनाया है। अब इस कानून के नियमों का ड्राफ्ट तैयार हुआ है। 30 से अधिक संगठनों का कहना है कि अगर इन नियमों के कुछ प्रावधान लागू हो गए तो पत्रकारिता करना मुश्किल हो जाएगा।
डिजिटल जानकारी के आधार पर लिखना या रिसर्च करना खतरनाक हो जाएगा। सरकार को भी इस बारे में अपनी राय साफ करनी चाहिए। बताना चाहिए कि ये नियम किस-किस पर लागू नहीं होंगे, पत्रकारों पर नहीं होंगे तो साफ़-साफ़ लिखा होना चाहिए।
इसी मसले पर हमारा यह वीडियो पूरा देखिए और समझने का प्रयास कीजिए।



