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सांस्कृतिक महफ़िलों के सितारे और जाने-माने चिकित्सक डॉ हरीश भल्ला का निधन!

कला-संस्कृति और सामाजिक कार्यों के प्रति सजगता तथा सक्रियता रखने वाले जाने-माने चिकित्सक डॉ. हरीश भल्ला का निधन हो जाने की खबर है. उनका अंतिम संस्कार आज शनिवार (11 जनवरी 25) की दोपहर मुंबई के विले पार्ले मुक्तिधाम पर किया जाएगा…


जयंत सिंह तोमर-

डॉ हरीश भल्ला की तरह महफ़िल सजाने वाले लोग और भी होंगे, पर मेरी जानकारी में नहीं हैं।‌ बीती रात मुम्बई में उन्होंने आखिरी सांस ली।

पत्रकार राजेश बादल के सौजन्य से वे लगभग तीन साल पहले ‘विकास – संवाद ‘ के ओंकारेश्वर शिविर में आये थे तभी उन्हें पहली बार देखने – सुनने का अवसर मिला था।‌ सिर पर हैट और सफ़ारी सूट उनका प्रिय परिधान था। अगले दिन सुबह उन्हें उस वेशभूषा में देखा जिसे ओशो के अनुयायी धारण करते हैं। ओंकारेश्वर शिविर में बोलते हुए वे थोड़ा भावुक हुए थे। दिल्ली में वर्षों से रहते हुए भी उनके अंदर मध्यप्रदेश हमेशा धड़कता था।‌ उनकी भावुकता इसी का प्रमाण थी।

उनसे दूसरी भेंट लोधी रोड श्मशान में हुई, पत्रकार विनोद दुआ के अंतिम संस्कार में। उन्होंने मुझे पहचान लिया तो बहुत देर तक खड़े खड़े बातें करते रहे।

तीसरी भेंट प्रोफ़ेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा सम्पादित श्यामसुंदर दास की ‘कबीर ग्रंथावली’ के विमोचन समारोह में हुई, दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में। शुभा मुद्गल का गायन हुआ था।

डॉ भल्ला मध्यप्रदेश के उसी जावरा से थे जिसे कैलाशनाथ काटजू के कारण याद किया जाता है।‌

दिल्ली में जितनी सांस्कृतिक महफ़िलें डॉ भल्ला ने सजायीं उनकी गिनती करते हुए किसी को भी किरण सेठ की याद आ सकती है।‌

नशा- मुक्ति पर उन्होंने टेलीविजन कार्यक्रम बनाया था।

पिछले लम्बे समय से वे अपने मित्रों को कुछ न कुछ सार्थक पठनीय सामग्री नियमित भेजते थे।‌

डॉ हरीश भल्ला जैसा मिलनसार, आयोजन धर्मी, सदाबहार, हंसमुख और सहज इंसान मध्यप्रदेश को कब मिलेगा कहना कठिन है।

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