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आज के अखबार : ईडी और चुनाव आयोग की मनमानी से बेपरवाह, सिडनी के अपराधी की पहचान बता रहे हैं

संजय कुमार सिंह

यमुना एक्सप्रेस-वे पर दर्दनाक दुर्घटना की खबर के अलावा आज दो बड़ी खबरें हैं। नेशनल हेरल्ड मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ ईडी की चार्जशीट को अदालत द्वारा स्वीकार नहीं किए जाने से ईडी और सरकार की कार्यशैली का पता चलता है। इसलिए यह बड़ी खबर है लेकिन इसे प्रमुखता नहीं मिली है। दूसरी ओर, सिडनी में समुद्रतट पर अंधाधुंध फायरिंग कर 15 लोगों को मौत की नीन्द सुलाने वाले पिता-पुत्र के भारतीय मूल का होना भारत और भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय बदनामी का मुद्दा है लेकिन उसे पूरा प्रचार मिला है। इसमें महत्वपूर्ण यह है कि आरोपी ने 27 साल पहले भारत छोड़ दिया था फिर भी वह भारतीय है। सोनियां गांधी अभी भी भारतीय नहीं मानी जाती हैं। एक हत्यारे (हत्या आरोपी कहना चाहिए) के भारतीय होने की सूचना बोफर्स घोटाले की खबर छापने वाले इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू में लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में आज अधपन्ना नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर सेकेंड लीड है। अमर उजाला ने सड़क दुर्घटना की खबर को भयंकर और डरावनी प्रमुखता दी है लेकिन मुस्लिम हत्यारे पिता-पुत्र के भारतीय होने की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। सोनिया – राहुल गांधी को राहत मिलने की खबर पहले पन्ने पर है और शीर्षक में कहा गया है कि कोर्ट ने ईडी के आरोप पत्र पर संज्ञान लेने से मना कर दिया है। खबर यह भी है कि विपक्ष के नेता या विपक्षी दल के खिलाफ यह मामला चलाया जाए या नहीं ईडी सॉलिसिटर जनरल से राय लेगा।

कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे मामलों में ईडी ही सरकार है। यहां मुझे याद आता है कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के हिन्दू नाम वाले चार मुख्य आरोपियों को अदालत से बरी किए जाने के बाद उस समय के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पहले ही कह दिया था कि सरकार अपील नहीं करेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि यह उनका “व्यक्तिगत रुख” है कि ऐसे आतंकवादी हमलों के लिए “पाकिस्तान हमेशा ज़िम्मेदार रहता है”। इससे पहले, भारतीय एजेंसियों ने ही उन्हें अपनी जांच में आरोपी बनाया था। अदालत ने कहा कि जांच ठीक से नहीं की गई है और सरकार ने आतंकवाद के मामले में व्यक्तिगत राय पर फैसला कर लिया। दूसरी ओर, आर्थिक घोटाले और पीएमएलए जैसे मामले में भारतीय जांच एजेंसी का बनाया मामला अदालत में नहीं टिका, जांच एजेंसी सरकार से पूछकर अपील करेगी। वह भी तब जब आरोपी विपक्ष के नेता और देश के मुख्य विपक्षी दल के कई लोग हैं। मामला 2008 से चल रहा है और बदनाम करने के हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है। ब स्पष्ट हो चला है कि यह इस सरकार की कार्यशैली है। मालेगांव ब्लास्ट मामले में भी लगभग ऐसा ही हुआ था। उसमें तो एक मुख्य आरोपी – प्रज्ञा ठाकुर को सांसद बनाकर जांच एजेंसियों और अदालत को संकेत भी दिया गया या भोपाल की जनता ने दिया। मुझे लगता है कि मुस्लिम आरोपियों का भारतीय होना भारत में प्रचारित करने के मकसद से बड़ी खबर है वरना यह खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर प्रमुखता से होती। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। इसमें बताया गया है कि तेलंगाना पुलिस के अनुसार, 52 साल का साजिद अकरम 27 साल पहले ऑस्ट्रेलया चला गया था और हैदराबाद में परिवार से उसका सीमित संपर्क था। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार उसके बेटा 24 साल के नवीद के पास ऑस्ट्रेलिया का पासपोर्ट है। साजिद मारा जा चुका है और नवीद का इलाज चल रहा है। अगर 15 लोगों की हत्या का यह मामला इतना बड़ा है तो गोवा के क्लब में आग लगने से मौत के मामले में फरार गौरव और सौरव लूथरा थाईलैंड से डिपोर्ट कर दिए गए हैं और गोवा पुलिस ने दो दिन के लिए उनका ट्रांजिट रिमांड पा लिया है। आज यह खबर भी है।

आप जानते हैं कि भिन्न कारणों से जब इंडिगो की उड़ानें रद्द हो रही थीं तब भी ये लोग भाग पाए थे और इंडिगो ने सेवा फेल होने के जो कारण बताये उनमें कोहरा और पायलट के आराम की चिन्ता करने वाला कानून भी था। आज अमर उजाला में खबर है कि कोहरे के कारण आगरा एक्सप्रेस वे पर 12 बसों और तीन कारों की टक्कर में 13 लोग जिन्दा जल गए, 100 घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री का विमान देर से उड़ा था लेकिन 12 बसों की टक्कर हो गई। बस दुर्घटना और इसमें मौत के कई मामले हाल में हुए हैं। इसे रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है पता नहीं है लेकिन विमान दुर्घटना रोकने के लिए सरकार ने ऐसे उपाय किए जिससे पूरी विमानन सेवा ही लड़खड़ा गई। कंपनी और देश बदनाम हुआ सो अलग। अब जब हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है और खबरों को महत्व देने का मकसद होता है तो जो हो रहा है उसे समझना मुश्किल है क्योंकि इसमें पत्रकारिता के नियमों का कहीं अता पता नहीं है। दूसरी ओर, वर्षों से चल रही शिकायत और कथित जांच का मामला अगर इतने वर्षों पर सुनवाई लायक भी नहीं है तो जाहिर है कि विपक्ष के नेता और विपक्षी दल के लोगों को परेशान व बदनाम किया गया। देश के कानून के तहत ऐसे लोगों को राहत या मुआवजा मिलना मुश्किल है दूसरी ओर तथ्य है कि शिकायतकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी को सरकार ने ईनाम दिया है और वे राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। अगर उनकी शिकायत पर ही कार्रवाई और जांच होनी है तो वे प्रधानमंत्री पर भी आरोप लगाते रहे हैं। उनकी जांच की कोई खबर नहीं है। ठीक है कि कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें दोबारा कोई ईनाम नहीं मिला है। अभी यह पता नहीं चला है कि वे मार्ग दर्शक मंडल में जाने की उम्र के कारण वंचित हैं या वंचित रहने के कारण आरोप लगा रहे हैं। जो भी हो, इस सरकार के पर्दों और प्राथमिकताओं की कहानी काफी दिलचस्प हो सकती है। इसमें लाल कृष्ण आडवाणी और 1988 में स्वर्ग सिधार चुके कर्पूरी ठाकुर को 2024 चुनाव से पहले भारत रत्न देना, एक साल में अधिकतम तीन की जगह पांच को देना और फिर सरकार बनने के बाद से 2025 खत्म होने को आया, किसी को नहीं देना भी मुद्दा है। 

मेरे नौ अखबारों में एक, देशबन्धु की आज की लीड का शीर्षक है, प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार को नाम बदलने की सनक है। कल मैं यहीं बता चुका हूं कि कैसे यह नाम नया, अनूठा और बिल्कुल अलग है। यही नहीं, मूल योजना मनरेगा के नाम में से महत्मा गांधी को निकाल कर पूरी योजना को ‘जी राम जी’ बना दिया जाना असल में गरीबों के लिए इस योजना का राम नाम सत्य होना है पर वह भी मुद्दा नहीं है। प्रधानमंत्री ऐसे नाम गढ़ते रहे हैं। इसके लिए उनकी प्रशंसा की जा सकती है लेकिन आज के अखबारों में यह प्रशंसा भी पहले पन्ने पर नहीं है। चुनाव आयोग की मनमानी, एसआईआर में गड़बड़ी और बिहार चुनाव में नियमों के अनुपालन से संबंधित एक खुलासे का फॉलोअप भी आज होना चाहिए था। मेरे नौ अखबारों में एक, देशबन्धु ने आज यह काम किया है। खबर है कि बंगाल में 58 लाख और राजस्थान में 2 लाख वोट कटे। इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने का मतलब यह नहीं है कि सब घुसपैठिये होंगे। जाहिर है, ऐसा मतदाता सूची को समय-समय पर अद्यतन नहीं किए जाने से लेकर तमाम दूसरी गड़बड़ियों के कारण हो सकता है। इसकी जांच और इसके लिए दोषी लोगों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा। चुनाव आयोग की स्वायतत्ता का यही मतलब है। जाहिर है, इसकी जांच और कार्रवाई एसआईआर से जरूरी है लेकिन एसआईआर चल रहा है, आज तीन राज्यों व दो केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदता सूची जारी कर दिए जाने की खबर (हिन्दुस्तान टाइम्स) में है। अखबार ने कई दूसरी खबरों को छोड़कर प्रदूषण पर सरकारी नीति और कार्रवाई की खबर को लीड बनाया है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को चुनाव हराकर सत्ता में आई भाजपा सरकार के पर्यावरण मंत्री, मनजिन्दर सिंह सिरसा ने कहा है और यह नवोदय टाइम्स में भी लीड के साथ छपा है कि, …. बढ़ते वायु प्रदूषण के लिए दिल्ली के लोगों से माफी मांगता हूं। हम इसे हर रोज कम करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी सरकार 9 से दस महीनों के भीतर प्रदूषण के स्तर को पूरी तरह से नियंत्रित नहीं कर सकती। उन्होंने दावा किया कि यह पूर्ववर्ती आप सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों का परिणाम है। कहने की जरूरत नहीं है कि पर्यावरण, प्रदूषण और कोहरा सिर्फ दिल्ली का मामला नहीं है। गाजियाबाग, नोएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव के लोग भी समान रूप से प्रभावित हैं। खास कर तब जब दिल्ली हवाई अड्डे से 130 उड़ान रद्द हो जाएं और 500 से ज्यादा उड़ान में देरी हो। वैसे भी समस्या देश के कई शहरों में है। चिन्ता सिर्फ दिल्ली की जताई जा रही है और जहां पहले से डबल इंजन की सरकार है वहां भी कोई लाभ नहीं हुआ है। ना तो पर्यावरण के मामले में और न ही प्रदूषण कम करने के लिए कुछ ठोस किया गया है। निजी गाड़ियों पर प्रतिबंध से नुकसान आम जनता को है और पुरानी सरकारी गाड़ियां चल ही रही हैं। ठीक है कि यह सब काम आसान नहीं है और समय लगता है लेकिन सरकार सिर्फ पायलट की चिन्ता करे, ब्रज भूषणों को सुरक्षा दे और अनिल मसीहों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो तो देशहित में अखबारों से कुछ संतुलित रहने की अपेक्षा है और इसका लाभ उन्हें भी होगा भले विज्ञापन कुछ कम हो जाए। सरकारी व्यवस्था का यह आलम है कि डबल इंजन वाले मध्य प्रदेश के अस्पताल में संक्रमित ट्रांसफ्यूजन के बाद छह बच्चे एचआईवी पॉजिटिव पाए गए। यही नहीं, 2014 से पहले नरेन्द्र मोदी डॉलर के मुकाबले रुपए के गिरते मूल्य पर खूब बोलते थे और क्या नहीं बोलते थे। ऐसे बोलते थे जैसे वही अर्थशास्त्री हैं और मनमोहन सिंह तो अपनी कमाई के चक्कर में इस ओर ध्यान नहीं देते थे। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर दिखी कि एक डॉलर 91 रुपए के बराबर हो गया है। अब नरेन्द्र मोदी के प्रशंसकों को इससे दिक्कत नहीं है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – भारत, ईथोपिया ने संबंध बेहतर करके रणनीतिक साझेदारी की।      

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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