रवींद्र श्रीवास्तव-
बधाई हो! भाई साहब.. जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो भाई साहब।
भाई साहब यानी श्री एलएन शीतल। बेहतरीन संपादक। अद्भुत मित्र। हिंदी व्याकरण के परम ज्ञाता। भाषाविद्। बेमिसाल प्रेमी। और इन्सान? किसी के लिए बहुत अच्छे। किसी के लिए बेहद खराब। कुछ के लिए, पता नहीं। किसी के लिए कुछ करते हैं तो गाते नहीं, लेकिन गरियाने में आपत्तिजनक होने की हद तक लती। अपनी बात करूं, तो मेरे संपादक भी रहे, भाई साहब तो हैं ही, अग्रज हैं, राजदार हैं, मददगार हैं, यदा-कदा उन्हें मित्र मानने की धृष्टता भी कर लेता हूं।

उनके बहुत से ऐसे राज हैं जो शायद केवल मुझे पता हैं। इन दिनों मुकेश भाया जी उनके परम मित्र और राजदार हैं। हमारे परिवार का हर सदस्य उनका मुरीद है। मैं तो कृतज्ञ हूं ही।
शीतल जी ऐसी शख्सियत हैं जिन पर उपन्यास लिखने की मेरी प्रबल इच्छा है। अलग-अलग दौर में अलग-अलग भावनाओं के लिए उनकी गहरी छटपटाहट का मैं भी साक्षी हूं। अपने उरूज पर वे तब थे जब ग्वालियर में दैनिक भास्कर के संपादक बनकर आए। इस शहर की तब की पीढ़ी ने (पुरानी पीढ़ी की बात नहीं कर रहा, जिसमें सर्वश्री झम्मन लाल शर्मा, मामा माणिक चंद वाजपेयी, दामोदर दास नागोरी, राजेंद्र शर्मा, शंभूनाथ सक्सेना, राम विद्रोही, काशीनाथ चतुवेर्दी जैसे धुरंधरों ने पत्रकारिता को गोरवान्वित किया) पहली बार जाना कि ठसकदार अखबार कैसे निकाला जाता है। पूरा दम, पूरी प्रतिभा और पूरा जोश अखबार को निखारने में लगा दिया। अपेक्षित नतीजे भी आए। यह विशद विषय है, यहां इसका विवरण अभीष्ट नहीं है। स्थानीय लोगों ने पत्रकारिता का ग्लैमर जाना, लेकिन इसी का दुष्परिणाम यह हुआ कि वे चापलूसों और सौंदर्यजीवी लेखिकाओं के चक्रव्यूह में घिरते चले गए।
दूसरी छटपटाहट प्रेम की थी। यहां स्पष्ट कर दूं कि प्रेम से आशय स्त्रियों मात्र से कतई नहीं है। वे अपने मित्रों, शिष्यों, मुलाकातियों का भला करने में ईमानदारी से जुट गए। वे इन सबसे प्रेम करते थे, लेकिन इनमें से अधिकांश उनका केवल दोहन कर रहे थे। इनका भला करने की छटपटाहट ने उन्हें कमजोर किया। ये वह दौर था जब उनके पास कोई आता और वे बिना कुछ सोचे, बिना एक पल गंवाए उसकी सिफारिश के लिए फोन घुमाने लग जाते थे।
इसके भी नतीजे आए। ग्वालियर छूटा। भोपाल पहले प्रवास में रास नहीं आया। कोटा, हैदराबाद, देहरादून आदि शहरों से होते हुए फिर भोपाल आए तो यहीं के होकर रह गए। दिलचस्प यह है कि उनके ज्यादातर ऐसे शिष्य जो उन्हें भगवान से भी ऊपर मानने का दावा करते थे, अब उन्हें सलाहें, समझाइशें और नसीहतें देते नजर आते हैं। उनके मिजाज में यह उलटबांसी भी शामिल हो गई है कि कभी तो बहुत सख्त हो जाते हैं और कभी इतने लचीले कि उनके गिनती के सच्चे अपने भी असहज हो उठते हैं।
ये सब बातें अपनी जगह। मुद्दे की बात यह है कि उन जैसा हो पाना हर किसी के बूते की बात नहीं। वे अच्छे भी हैं, बुरे भी हैं, कमजोर भी हैं और मजबूत भी। मगर लाख टके की बात ये कि वे 24 कैरेट सच्चे हैं। उन्हें पता भर चल जाए कि उनका कोई अपना मुसीबत में हैं, इसके बाद वे किस हद तक उसकी मदद के लिए पागल हो उठते हैं, इसे मैंने बार-बार बहुत करीब से देखा है।
वे हिंदी के लिए और हिंदी पत्रकारिता के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। करें, यही कामना है। आमीन।



Arun Srivastava
August 7, 2025 at 8:21 pm
ज़रा स्पष्ट करें कि किस मामले में बेहतर थे? कभी कुछ लिखा ही नहीं। न किसी घटना पर त्वरित टिप्पणी और न लेख। संपादकीय भी नहीं लिखा। राजधानी देहरादून में रहते हुए विधानसभा की रिपोर्टिंग तक नहीं की।
Pradeep Prakash
August 7, 2025 at 9:24 pm
Possibly It was 1997-98, I was doing BE from Bhopal.College asked for 750 rupees from students for calling guest faculty.Students were not agree for it. I went to Dainik Nhaskar , L N Sheetal was executive Editor/I narrated our issue ,he called immediately Anil Sharma to publish my issue . Next day it published ,college management took its step back.I dony know, now where is he ,but it is true he helps.