इसे कहते हैं ‘मृत्युंजय’ होना!

Yashwant Singh : जिला जौनपुर के एक गांव की बेहद गरीब लड़की, दलित परिवार की बेटी, भूमिहीन की बेटी… रोते बिलखते उसका कल फोन आया था… उसके प्रेमी ने शादी के लिए अपनी दीदी को उसे दिखाने के वास्ते बुलाया… पर उसने महापाप कर दिया… उसने धोखा दिया… उसने जबरदस्ती कर दी.. उसने लड़की से बलात्कार किया…

लड़की की इतनी हिम्मत-हैसियत नहीं कि वह थाने जाकर मुकदमा दर्ज करा सके… उसने इंटरनेट पर नंबर ढूंढा… पता नहीं कैसे मेरा नंबर उसके हाथ लग गया… उसे टालना चाहा…. पर उसकी सिसकन, रुदन, आर्तनाद ने अलग न होने दिया… उसके लिए कुछ करना चाहा… उसने सुसाइड की बात कही… उसे ज़िंदा रहने देने के लिए उसके साथ खड़े होने का दिल चाहा..

ये सब बातें कल लिख चुका हूं… फिर इसलिए संक्षेप में लिख रहा कि जो न पढ़े हों, वो थोड़ा बैकग्राउंड जान लें ताकि आगे की स्थिति को अच्छे से समझ सकें…

अमर उजाला, जौनपुर के ब्यूरो चीफ विनोद तिवारी को फोन किया.. पूरा माजरा बताया…. उनने फौरन खबर बनाकर बनारस मुख्यालय भेजा…

एक सुनार के यहां करोड़ों की डकैती के खुलासे के लिए जौनपुर कैंप किए बनारस रेंज के आईजी से विनोद तिवारी ने इस प्रकरण पर बात कर पीड़ित लड़की को न्याय दिलाने और रेपिस्ट को अरेस्ट कराने का अनुरोध किया. आईजी साहब ने लड़की से कंप्लेन लिखवाने को कहा.

विनोद जी ने मुझे बताया. आईजी साहब ने कंप्लेन लिखवाने के लिए कहा है. लड़की कंप्लेन लिख कर दे तो पुलिस एक्टिव हो जाएगी..

मैं सोचने लगा… यह पूरा सिस्टम इतना संवेदनहीन, इतना औपचारिक, इतना ठस, इतना एकतरफा, इतना कागजी, इतना बासी, इतना पुराना, इतना जनविरोधी क्यों है…

मैंने लड़की से बातचीत के दो आडियो भेज रखे थे… दलित लड़की और उसके भूमिहीन मां पिता की इतनी हिम्मत नहीं कि वे थाने जाकर कंप्लेन लिखा सकें… ऐसे में क्या सिस्टम खुद संज्ञान लेकर एक्टिव नहीं हो सकता? मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म का वो सवाल-सीन दिमाग में घूम गया जिसमें मुन्ना भाई मेडिकल की पढ़ाई के वक्त अपने प्रिंसिपल से पूछता है कि जब कोई घायल व्यक्ति अस्पताल में आएगा तो पहले उसका इलाज शुरू होगा या उसका नाम पता लिखकर पुलिस केस की प्रक्रिया शुरू होने के बाद ही उस पर डाक्टर हाथ लगाएगा..

कुछ इसी टाइप सवाल था…

आशय ये कि अस्पताल के द्वार घायल आया है तो फौरन इलाज करो.. पर्चा लिखाने और पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का इंतजार कर उसे मरने के लिए न छोड़ो…

अगर सबसे हाशिए के किसी व्यक्ति पर अत्याचार की सूचना मिल गई है तो फौरन उसे न्याय दिलाने के लिए सक्रिय हो जाओ, न कि उसके द्वारा कंप्लेन लिखे जाने और थाने में सबमिट किए जाने का इंतजार करो….

मुझे कोफ्त होने लगी…

आखिर ये पूरा फौज फाटा लाव लश्कर सत्ता सिस्टम पुलिस प्रशासन मीडिया न्यायपालिका थाना कचहरी डीएम एसएसपी मंत्री संतरी है क्यों? किसके लिए निर्मित है… इसका मकसद क्या है… क्या यह सब कुछ सबसे कमजोर आदमी की रक्षा के लिए, सबसे हाशिए के आदमी को न्याय दिलाने के लिए, दबे कुचलों को मुख्यधारा में लाने के लिए नहीं है? अगर है तो फिर सब इतने आत्मकेंद्रित क्यों हैं… सब अपने अपने खोल में बैठे आत्ममुग्ध से क्यों हैं…

मुझे गुस्सा आने लगा… खुद के पत्रकार होने पर, खुद के एक संवेदनशील इंसान होने पर शर्म आने लगी.. कुछ न कर पाने की पीड़ा परेशान करने लगी…

ऐसे में याद आए Mrityunjay जी. यूपी के सीएम के मीडिया एडवाइजर. दशक भर से ज्यादा वक्त तक ये अमर उजाला जैसे अखबारों में संपादक रहे. तबसे परिचय है. उन्हें कल रात में फोन लगाया और सीधा सा सवाल पूछा कि क्या ये सत्ता सिस्टम समाज के सबसे हाशिए के व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए किसी लिखित कंप्लेन का इंतजार करता हुआ सोता रहेगा या स्वत:संज्ञान लेकर खुद सत्ता के साहेब लोग पीड़ित के दरवाजे पहुंचेंगे और न्याय दिलाने की पहल करेंगे?

मृत्युंजय कुमार

जब भी फोन करता हूं, मृत्युंजय भाई फौरन फोन उठाते हैं. उन्हें पता होता है कि अपन उनसे कभी दलाली बट्टा की बात नहीं करते. उनसे किसी की ट्रांसफर पोस्टिंग की सिफारिश नहीं करते. जब भी फोन किया, किसी मजबूर, किसी पीड़ित, किसी परेशान को न्याय दिलाने के लिए ही किया.

मृत्युंजय जी ईमानदार आदमी हैं. जब संपादक रहे तो मीडिया का अहंकार न चढ़ा. अब जब सत्ता में हैं तो सत्ता का रौब-दाब आसपास फटकने न दिया. वह एकदम खरे हैं… वह सहज और बेबाक हैं… सुनेंगे सबकी… पर ऐसा कुछ न करेंगे जो उनके स्वभाव के प्रतिकूल हो… नियम कानून के हिसाब से जो कुछ सही होगा, वही करेंगे…. और, ऐसा ही सबको करने की सलाह भी देते हैं…

मुझे ऐसे आदमी सही लगते हैं… ऐसा आदमी संवेदनशील होता है.. ऐसा आदमी दलालों-चोट्टों से घिरा नहीं रहता… ऐसा आदमी वक्त निकाल लेता है उन पीड़ितों के लिए जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं…

मृत्युंजय भाई ने कल रात मेरा उपरोक्त सीधा और सपाट सवाल सुनकर एकदम स्पष्ट जवाब दिया, एक लाइन में- यशवंत जी, बताइए मामला क्या है. सत्ता सिस्टम बिलकुल पीड़ित के दरवाजे पर पहुंचेगा…

मैंने उनसे अनुरोध किया कि कलम उठाएं और नोट करें…

उनने कहा कि एक मिनट दीजिए… भोजन पर बैठा हूं… अब आगे एक कौर न खाउंगा… हाथ धोने भर का वक्त दीजिए… आपको कालबैक करता हूं…

एक मिनट भी न बीता होगा, मृत्युंजय भाई का फोन आया… उनने नोट करना शुरू किया… जिला जौनपुर थाना सराख्वाजा… गांव, लड़की का नाम, उसके साथ हुआ घटनाक्रम…

उनने कहा- अब आप फोन रखिए… आपका काम खत्म. अब मेरा काम शुरू…. उनका ‘मेरा काम शुरू’ से आशय था कि “राज्य सरकार के संज्ञान में आपने प्रकरण ला दिया… राज्य सरकार का एक हिस्सा होने के नाते अब आश्वस्त करता हूं कि राज्य सरकार के द्वारा अब अपना काम शुरू किया जाता है, शासन-प्रशासन पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए उसके द्वार पहुंचेगा!”

पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे… खुद डीजीपी से लेकर आईजी बनारस, एसएसपी जौनपुर, थानेदार सरायख्वाजा एक के बाद एक धड़ाधड़ एक्टिव होने लगे… लखनऊ से लगातार आ रहे फोन काल्स और निर्देशों से जौनपुर का अलसाया पुलिस महकमा एलर्ट मोड में आ गया…

रात ग्यारह बजे आईजी का फोन मेरे पास आया… उनके साथ दूसरी तरफ कॉल पर सराख्वाजा के थानेदार थे… पूरा प्रकरण उनने मुझसे दुबारा जाना समझा और पुलिस फोर्स को पीड़िता के दरवाजे पहुंचने का निर्दश जारी किया.. रात बारह बजे लड़की के घर थानेदार समेत पुलिस फोर्स पहुंच चुकी थी.

दरवाजे पर पुलिस वालों के आने की आहट पाकर लड़की ने तुरंत मुझे फोन किया… थैंक्यू भइया… पुलिस के लोग आ गए हैं… लेकिन मुझे मुकदमा नहीं लिखाना है… मुझे उस लड़के से शादी करनी है… वह शादी कर लेगा तो मुझे मुकदमा नहीं लिखाना है…

मैंने दस मिनट उसे समझाया… बेटा, भय बिन होई न प्रीत… पहले मुकदमा लिखाओ… लड़का अरेस्ट होगा… फिर तुम उससे शादी के लिए कहना.. न करे तो उसे जेल भिजवाओ…

उसे समझ में आ गया…. गेट पर इंतजार कर रहे थानेदार के आगे जाकर भूमिहीन दलित मां पिता और बेटी ने पूरा वाकया बयान किया… पुलिस महकमा विनम्र भाव से सिर झुकाकर सब कुछ नोट करता रहा. इसके बाद बिटिया को आश्वस्त किया कि हम सब आपके साथ हैं, आपको न्याय मिलेगा. फोन नंबर दिया. समझाया भी- जब भी कुछ कहना बताना हो, फोन करिएगा.

लड़की का अभी कुछ देर पहले फोन आया. कहने लगी, भइया थाने जा रही हूं, थानाध्यक्ष ने रात कहा था कि आप कल कभी भी थाने आ जाइएगा.

मैंने कहा- थाने जाने में डर तो नहीं लग रहा अब?

उसने हंसते हुए जवाब दिया था- अब नहीं डर लग रहा भइया. रात में उन लोगों ने बहुत अच्छे से बात किया. मुझे पहले डर लगता था पुलिस से. लेकिन कल उनसे बात कर, उनका व्यवहार देखकर लगा कि ये अच्छे लोग हैं. मुझे थाने जाने में कोई डर नहीं अब.

देखिए, कैसे परसेप्शन बदल जाता है. बस, थोड़ी सी पाजिटिव पुलिसिंग से!

मैंने कहा- आप भले ही गांव की सबसे गरीब घर की हो, आप भले ही एक भूमिहीन दलित परिवार से हो… आपके पिताजी भले ही एक लेबर का काम करके आप सबका बेहद मुश्किल तरीके से भरण पोषण कर पाते हैं… आपका भले ही इस सत्ता सिस्टम समाज में कोई पैरोकार नहीं… बावजूद इसके, पूरी राज्य सरकार आपके साथ खड़ी है… इसलिए क्योंकि लखनऊ में स्थित राज्य सरकार के लंबे चौड़े हेडक्वार्टर के एक छोटे से हिस्से में एक ऐसा शख्स भी बैठा है जिसके लिए किसी पीड़ित को न्याय दिलाना उसकी निजी संवेदना और सरोकार का हिस्सा है.

ऐसे दौर में जब खाए अघाए धूर्त नौकरशाहों, मदमस्त सत्ताओं, करप्ट पुलिस वालों के आगे पीड़ित अपनी बात कहते कहते थक कर चुप हो जाते हैं, हार कर घर बैठ जाते हैं, एक अकेले ‘मृत्युंजय’ का होना ये आश्वस्त करता है कि चंद अच्छे लोग हर कहीं होते हैं जिनके दम पर पूरा सिस्टम ये भरोसा देता रहता है कि सब कुछ बिगड़ा नहीं. कुछ लोग हैं जो लोकतंत्र को, न्याय को, सरोकार को जिंदा रखना चाहते हैं और डेमोक्रेटिक थाट प्रासेस को अपने रुटीन जीवन का हिस्सा बनाकर जीते हैं…

बहुत से चपल चालाक किस्म के धूर्तों को ये लगेगा कि यशवंत ने मृत्युंजय की कुछ ज्यादा ही तारीफ कर दी… पर कल रात में अपन और मृत्युंजय भाई ने एक भूमिहीन दलित लड़की की पीड़ा का स्वत: संज्ञान लेकर जिस किस्म का ‘आपरेशन’ चलाया, जिस तरह से सत्ता सिस्टम फौज फाटे को समाज के सबसे आखिरी पायदान के आदमी के दरवाजे पर ला खड़ा किया, वह अभूतपूर्व था. इसलिए, इस सब कुछ को डाक्यूमेंटाइज करना जरूरी लगा, ताकि दूसरे भी इससे सीख सकें, इंस्पायर्ड हो सकें.

कल अवसाद में आत्महत्या के लिए खुद को तैयार कर चुकी वह लड़की आज मुस्कराई.

वो लड़की गर्व से भर गई.

उस बेहद गरीब दलित लड़की को भरोसा जगा कि न्याय मिलेगा.

उस लड़की ने कहा- अब बच कर कहां जाएगा धोखेबाज रेपिस्ट!

वो लड़की अपने तरीके से उस धूर्त प्रेमी को हैंडल करना चाहती है.

उस लड़की को अपने तरीके से क्रोध प्रकट करने, न्याय पाने का मौका/स्पेस दिया इस सिस्टम ने.

लड़की सीना तानकर थाने गई है!

ये सच में लोकतंत्र की ताकत है, आम आदमी की जीत है.

यूपी में एक मृत्युंजय कुमार के चलते ‘सरकार आपके द्वार’ पहुंची.

ये छोटा सा एक कदम हम आप जैसों को आश्वस्त करता है कि बहुत ढेर सारे अंधेरों के होने से डरने उदास होने अवसाद में जाने की बजाय हम बस एक छोटा सा दिया जलाने का काम करें, रोशनी खुद ब खुद ज़िंदाबाद आबाद हो जाएगी!
जैजै
यशवंत


अपडेट-

मेरी अभी (पौने तीन बजे) जिला जौनपुर के सरायख्वाजा थाना के एसओ योगेंद्र यादव जी से बात हुई. उन्होंने विस्तार से पूरे मामले की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि थाने में मुकदमा संख्या 431/19 दर्ज कर लिया गया है. आरोपी का नाम चंद्रभान पुत्र पतिराज है. आरोपी ग्राम मखमेल पुर का निवासी है.

थानेदार योगेंद्र यादव ने बताया कि रात बारह बजे पुलिस पीड़िता लड़की के गांव गई पर उसके पिता का नाम न मालूम होने से उसका घर खोजने में काफी वक्त लगा. ग्राम प्रधान समेत कई लोग रात में ही गांव में सक्रिय किए गए और दलित बस्ती के कई लोगों से जानकारी की गई तो पीड़िता के घर का पता चल सका. लड़की ने रात में जो कुछ बताया उसे नोट किया गया. लड़की का कहना था कि उसके साथ विश्वासघात किया गया है और धोखे से सूनसान जगह बुलाकर बलात्कार किया गया. लड़की का रात में कहना था कि वह लड़का अगर शादी कर लेगा तो वह मुकदमा नहीं लिखाएगी. अगर शादी नहीं करता है तो वह कानूनी कार्रवाई करेगी.

थानेदार योगेंद्र यादव ने जानकारी दी कि उनकी पुलिस टीम रात में ही आरोपी के गांव जाकर छापा मार दिया और आरोपी चंद्रभान को गिरफ्तार कर लिया. लड़की को इसकी सूचना देकर उनसे अनुरोध किया गया कि वे अगले रोज किसी भी वक्त थाने आ जाएं ताकि आमने सामने उनकी बात आरोपी लड़के से करा दी जाए. लड़की और उसके मां पिता आज थाने गए. लड़के ने शादी से इनकार कर दिया. पता चला कि लड़का इस बात को छिपाए था कि वह पहले से ही विवाहित है. ऐसे में लड़की ने लड़के के खिलाफ रेप का मुकदमा लिखा दिया. पुलिस ने आरोपी को जेल भेज दिया है. लड़की का मेडिकल कराने के लिए महिला पुलिस टीम के साथ जिला अस्पताल भेजा गया है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.


उपरोक्त प्रकरण से संबंधित यशवंत की शुरुआती फेसबुक पोस्ट ये है…

Yashwant Singh : मेरा फोन नंबर जाने कैसे हर कोई सर्च कर लेता है. शायद भड़ास4मीडिया पर होने की वजह से. ज्यादातर लोग आनलाइन खोजते किसी अन्य का नंबर है, दिख जाता है उन्हें मेरा नंबर. इस तरह मेरे पास तरह तरह के अननोन फोन आते रहते हैं और सबसे अलग अलग तरह से डील करता रहता हूं. किसी पर चिल्ला पड़ता हूं. किसी को गरिया देता हूं. किसी की सुन लेता हूं. किसी से आवाज बदल कर मजा लेते हुए बात कर लेता हूं. काम में बिजी होता हूं तो अननोन नंबर के फोन उठाता ही नहीं हूं.

ज्यादातर अननोन नंबर से फोन करने वाले फोन करके सीधे यही पूछते हैं- आप कौन? तब मेरा सीधा जवाब होता है- ”तेरा बाप! तूने कहां फोन मिला बे… फोन तूने मिलाया तो मुझसे पूछता है कि कौन… अरे तू बता चिरकुट.. तू कौन बोल रहा है… ” जाहिर है, इसके बाद फोन करने वाला पलटकर या तो मुझे गरियाता है यो फिर फोन काट कर भाग जाता है. कुछ बेहद सीधे लोग भी होते हैं जो बताते हैं कि उन्होंने लेबर आफिस नेट पर ढूंढा तो ये नंबर मिला है तो फोन मिलाया है या कोई ये कहता है कि उसने आनलाइन नेट पर ढूंढा पीएफ विभाग का नंबर तो ये नंबर दिखा… कोई कोई तो कहता है कि ये नंबर नेट पर दिख गया तो टेस्ट करने के लिए मिला दिया कि इस नंबर पर क्या काम होता है… 🙂

आज एक अजीब सा फोन आया. फोन करने वाली लड़की लगातार रो रही थी. उसने बताया कि उसके साथ रेप किया गया है. वह बहुत गरीब है. मां पिता सबको बता दिया है. उसे धोखे से बुलाकर रेप किया गया. मैं थोड़ा परेशान हुआ पर क्या कर सकता था. थाने जाकर मुकदमा दर्ज कराने की सलाह देकर पल्ला छुड़ाने का प्रयास किया तो उस लड़की ने सिसकते हुए कहा… तो फिर आप मेरी मदद नहीं करेंगे न?

मैंने समझाया, मैं कोई थाना पुलिस नहीं हूं. दिल्ली में हूं. मीडिया में हूं. पहले तुम्हें थाने में जाकर रपट लिखानी होगी.

लड़की बोली मेरे पास पैसे नहीं हैं. हम लोग बहुत गरीब हैं. प्लीज मदद करिए आप.

मैंने एसएसपी के पास जाने की सलाह दे दी. थाने में पैसे नहीं लगते मुकदमा लिखाने के, ये भी बताया.

उससे पिंड छुड़ाना चाहा.

पर वह रोती बिलखती रही और बेहद गरीब घर की होने और कहीं पर न जा पाने की मजबूरी बताते हुए मदद करने की अपील करती रही.

मैंने फोन काट दिया.

भड़ास कंटेंट एडिटर पद के लिए कुछ लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया था आफिस में. आखिरी बचे एक पत्रकार के साथ चाय पीने चला गया. लड़की से सारी बातचीत उनके सामने ही हो रही थी. चाय पीते बतियाते अचानक कुछ अजीब सा लग रहा था. उस लड़की की रोती सिसकती आवाज दिल के गहरे कुछ हूक सी उठा रहा थी. अनइजी फील कर रहा था खुद को.

यूं ही ह्वाट्सअप चेक कर रहा था तो देखा कि दोपहर में किसी ने मदद की अपील की थी और उसके जवाब में मैंने लिखा था- ‘जी कहिए’, उसका भी जवाब आ गया है. ये वही लड़की थी जिसका रेप हुआ है, जिसने मुझे फोन किया है, उसने जल्दी मदद करने की अपील की है, वरना खुद मर जाने की पीड़ा व्यक्त की है.

मैंने एक दो नंबर खंगाले और जिला जौनपुर (लड़की जौनपुर के एक गांव में रहती है) के अखबार वालों का नाम पता अपडेट किया. एक मेरे बहुत पुराने परिचित, जब अमर उजाला बनारस में मैं फर्स्ट पेज पर काम करता था, तबके परिचित, वहां जौनपुर में इन दिनों ब्यूरो चीफ के रूप में पदस्थ मिले. उन्हें पूरा माजरा समझाया. हर हाल में रेपिस्ट को अरेस्ट कराने और जेल भिजवाने हेतु प्रयास करने के लिए कहा. करीब दशक भर बाद उनसे बातचीत हुई. उस पत्रकार साथी ने पूरे सम्मान के साथ इस न्याय की जंग में जुट पड़ने के लिए मुझे आश्वस्त किया.

फिलहाल तो सुकून है कि लड़की के दुख को कम करने के लिए कुछ सार्थक प्रयास कर पाया.

इस केस का फालोअप करना है. लड़की से दुबारा बात की. उसे समझाया. सुसाइड वगैरह जैसे फालतू खयाल न लाने को लेकर काउंसलिंग की. साथ ही उसके बैकग्राउंड वगैरह के बारे में बता किया. लड़की दलित है. ग्रेजुएट है. भूमिहीन परिवार से है. रेपिस्ट भी दलित है और लड़की के परिवार से दूर का कोई रिश्ता है. लड़के ने शादी के लिए दीदी से मिलवाने के नाम पर लड़की को बुलाया था. लड़की अपनी मां को सूचित कर जब बताई गई जगह पहुंची तो वहां सूनसान था. वहां लड़के ने उसके साथ जबरदस्ती की.

उम्मीद करते हैं कि लड़की को न्याय मिलेगा.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.


फेसबुक पर यशवंत से कनेक्ट होने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

Yashwant Singh on FB


उपरोक्त पोस्ट्स पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं-

Deepankar Patel : एक पुरानी कहावत है. “whoever saves a Life saves the world”. लड़की आत्महत्या की बात कर रही थी. Yashwant Singh भाई की कोशिश रंग लाई.. पूरी ताकत लगा दी सिस्टम को दरवाजे तक पहुंचाने में. मृत्युंजय भाई को भी सलाम पहुंचे… जानकर अच्छा लगा कि UP CM का मीडिया एडवाइजर एक संवेदनशील व्यक्ति है. लेकिन ये भी क्या विडम्बना है कि लड़की बलात्कारी के साथ शादी करने का मन बना चुकी है. अपराध का यही समाजशास्त्र है. बलात्कारी का पीड़िता का विवाह करवा दो और सारा वहशीपन सारा पाप धुल जाता है. भला अपने ही बलात्कारी से लड़की विवाह क्यों करे? सामाजिक दबाव में?

प्रमोद असैया : जय भीम, जय भारत, जय भड़ास। और जय जय Yashwant Singh जी.

Ashwini Kumar Srivastava : यह जुगल जोड़ी, Mrityunjay Kumar और Yashwant Singh की, इस सरकार में शायद बहुतों के लिए जहांगीरी घंटा यानी न्याय के लिए भटकते आम आदमी की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक सीधी पहुंच साबित हो रही है … फेसबुक पर यशवंत जी की पोस्ट पढ़कर नहीं कह रहा हूं बल्कि खुद भी इसी जहांगीरी घंटे को बजाकर राज्य के मुखिया तक अपनी बात पहुंचाकर और न्याय पाने के बाद के निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूं …

Manoj Raghuvanshi : It is a matter of great satisfaction that we have people like you and Mrityunjay ji. Thanks for being there.

Anil Singh : सिस्टम ऐसे काम करे तो कितनी अपनी लगती है सरकार. यशवंत भइया आपको और मृत्युंजय भइया को भी साधुवाद कि समाज के आखिरी पायदान पर मौजूद पीड़िता के लिए न्याय को उसके दरवाजे पर पहुंचने को मजबूर किया. थोड़ी संवेदनशील पुलिस और प्रशासनिक महकमा हो जाये तो राम राज खुद-ब-खुद आ जायेगा. आपने सही लिखा कि एक अकेले ‘मृत्युंजय’ का होना ये आश्वस्त करता है कि चंद अच्छे लोग हर कहीं होते हैं जिनके दम पर पूरा सिस्टम ये भरोसा देता रहता है कि सब कुछ बिगड़ा नहीं. कुछ लोग हैं जो लोकतंत्र को, न्याय को, सरोकार को जिंदा रखना चाहते हैं और डेमोक्रेटिक थाट प्रासेस को अपने रुटीन जीवन का हिस्सा बनाकर जीते हैं.

Mahendra Singh : आपकी तरह सरल और नेकदिल इंसान है Mrityunjay भईया। आप लोगो की वजह से भरोसा जिंदा है। हाशिये पर खड़े आम आदमी के टूट चुके भरोसे को जोड़ने की सराहनीय पहल के लिए बड़े भैया Yashwant Singh और Mrityunjay Kumar का दिल की गहराइयों से आभार। निजी स्वार्थ से ऊपर उठ कर संवेदनशील होने के सुख को महसूस किया इसे पढ़कर।

Sanjaya Kumar Singh : अच्छे लोग रहें और अच्छे बनें रहें इसके लिए जरूरी है कि वह लड़की रेपिस्ट से शादी न करे। रेपिस्ट को रेप की सजा होनी ही चाहिए और भावी रेपिस्टों के लिए यह जरूरी है। अगर अच्छे लोग हैं तो इसका फायदा तभी है जब अपराधियों को डर लगने लगे। अपराधी गोली मारने से नहीं, कार्रवाई से ही डरेंगे। अगर इतनी कमजोर लड़की अपने बलात्कारी को सिर्फ फोन करके सजा दिल सकती है तो यह व्यवस्था बनी रहनी चाहिए इसे जबरन शादी करने का जरिया नहीं बनना चाहिए।

Bhoopendra Singh : यशवंत जी, सबसे पहले आप और मृत्यंजय भाई को हृदय से आभार। इस आत्मकेंद्रित समय में किसी नितांत अपरिचित बालिका के प्रति इस स्तर के समर्पण को नमन करता हूँ। यह पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई कि आज भी इस तरह की त्वरित कार्यवाही कोई प्रशासन करता है और योगी सरकार ऐसा कर भी रही है। सभी पक्षकारों को पुनः साधुवाद।

मुकुन्द हरि : ये तो बधाई और हौसला अफ़ज़ाई की बात है। अच्छी बातों की तारीफ़ न की जाएगी तो लोगों का उत्साह मर जायेगा। आप और मृत्युंजय जी, दोनों बधाई के अधिकारी हैं।

Basuki Nath Shukla ओफ्फ..ऐसे ही चंद जुझारू इंसानों के वजह से, हमारा समाज आज भी जिंदा है..इस नेक कार्य के लिये..अनेकानेक साधुवाद

Samar Anarya : यूँ ही नहीं कोई Yashwant Singh हो जाता कि मुझ जैसा शख़्स भी जय जय करे! मृत्युंजय भाई को भी सलाम पहुँचे

Kanwal Jeet Singh : भड़ास अब पत्रकारिता धर्म का एक ब्रांड बन चुका है । अमूमन पत्रकारिता धर्म कहता है कि हमें सिर्फ रिपोर्टिंग करनी होती है, समाज में रोज भयानक त्रासदी होती रहती हैं और एक पत्रकार का काम सिर्फ उसकी सूचना जनमानस तक पहुंचाना है। इस बात पर काफी विवाद भी होता है और पत्रकार को भला बुरा भी कहा जाता है कि आपके सामने हो रहा था तो आपने रोका क्यों नहीं? इस घटना के माध्यम से आप समझे की पुलिसिंग और न्याय पत्रकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती और ना ही यह उसका प्रथम कर्तव्य होता है। लेकिन आजकल के बिगड़े हालात में पत्रकार को यदि कलम छोड़कर पुलिसिंग भी करनी पड़े तो उसमें भी वह पुलिस से ज्यादा दक्ष निकलेगा। आपको बहुत-बहुत प्रणाम।

Sushil Dubey : ग़जब साधुवाद आपकी दीवानगी ओर मृत्युंजय जी के व्यवहार को….

Prashant Dubey बस दुष्यंत याद आ गये यशवंत भाई। कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।

Ashok Dhawan ऐसे ही नहीं कोई यशवंत व रवीश बन जाता है, सर झुका कर प्रणाम। देश में पत्रकार व पत्रकारिता को जीवित रखने वाले कुछ दुर्लभ लोग ही बचें हैं।

Umesh Pathak : यशवंत भाई आपको व मृतुंजय जी को दिल से सलाम। इंसान होने का एहसास होता है इस तरह के कार्य से।आपकी बेबाकी के तो हम सब कायल हैं ही आपका सम्मान आैर बड़ा हो गया। महादेव ।

Dileep Kumar Sinha : भाई यशवंत जी ये मृत्युंजय जी आपके पुराने परिचित और सहयोगी रहे सो आपने काम बनवा लिया आप जन क्या करे।

Rajesh Singh Sonu : यशवंत जी की जितनी प्रशंशा की जय कम है वो हमेशा अपनी खबर से भ्रस्टाचार पे प्रहार करते रहते है आप को मेरा प्रणाम

सुमित कुमार मिश्रा : आप जैसा बहुत कम लोग कर पाते हैं.

Pramod Srivastava : मृत्युंजय जी जैसे लोग आज भी मिसाल है। उनकी कार्य प्रणाली स्वच्छ और बेबाब है। मृत्युंजय जी द्वारा किया गया यह महान कार्य सदैव याद रहेगा। उस बच्ची को न्याय दिलाने मे यशवन्त जी ने जो भगीरथी प्रयास किये वह भी काबिले तारीफ है। दोनो लोगो को बधाई और धन्यवाद भी।

Anuraag Yadav : हाशिए के समाज की बेटी के लिए आप और मृत्युंजय जी की संवेदनशीलता और किए गए प्रयास सराहनीय व हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं।

Rajeev Ojha : आपने मृत्युंजय जी के व्यक्तित्व का सही आकलन किया है

Manoj Saamna : समाधान का तरीका अनुकरणीय है।प्रभु आप लोगों को और समर्थवान बनावें।

S.K. Misra : असहाय लोगों की सहायता कर आप लगातार अपनी मानवता का परिचय देते रहते हैं, शक्ति का यह सदुपयोग जारी रहना चाहिए ।

Dinesh Singh Rawat : God bless you and I really respect the person who act as per his conscience

Rakesh Pandey : सैकड़ों हजारों तालियां ……. काश सरकार का हर नुमाइंदा मृत्युंजय हो। हर संवेदनशील आदमी यशवंत हो जो कतार के आख़िरी व्यक्ति को न्याय दिलाने की हर कोशिश करे।

Raj Mohan Mishra : आप दोनों को साधुवाद धन्यवाद। इसका मतलब ये की ऊपर तो सब सही किन्तु अभी नीचे….

B KM Tripathi : क्विक एक्शन‌और मृत्युंजय कुमार सर का पुराना तेवर दिखा, बेहद खुशी हुई। यही पत्रकारिता है यशवंत जी

Kumar Atul : सही शख्स की सही तारीफ की आपने

Mohd Iqbal : Bahut bahut Shukhriya sir aap dono loggo ka jo is ashai majboor ka sahara bany

Rajesh Singh : आपने वो किया जिसकी उम्मीद अब इस समाज में दूर-दूर तक नहीं की जा सकती ।

Deepak Srivastava : Great sir ! आप भीड़ का हिस्सा नहीं हैं ! जितनी बार आपको प्रणाम किया जाए कम होगा

Ziaur Rahman : जै जै यशवंत। रुला दिया आपने और हकीकत बयां कर दी

Radhey Krishna : Yashwant ji & Mrityunjay ji, you both have done a great job. Thanx.

सुधीर दीक्षित : सराहनीय उत्तम सर्वोतत्म… जैसे शब्दावली के आप पात्र है.

Prashant K Mishra : मृत्युंजय सर बधाई के पात्र है… जब संपादक थे तब भी लोगों की मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करते थे… लेकिन सबसे पहले इस काम के लिए आपको बधाई …

Sudhir Kumar Singh : Bhaiya, ye sab padhte hue , kai baar Gala Bhar aaya. Agar kabhi koi Sahayata ke liye awaj de jaroor help karna chahiye

Rajendra K. Gautam : भाई यशवंत जी और मृत्युंजय जी आपकी मानवता वादी सोच के लिए बहुत बहुत साधुवाद। आप महानुभाव रियल लाइफ के हीरो हैं।

Arun Kumar Verma : मैं सर के स्वभाव से वाज़िब हूँ आपके स्नेह व प्यार में अमर उजाला का छोटा सा कलम का सिपाही हूँ।

Sanjay Gupta : बहुत सुंदर — परन्तु मूल प्रश्न है कि हर आदमी मृतुन्जय कहां से लाए

Saurabh Gupta : बधाई आप को और आपके सहयोगियों को

DrDigvijay Singh Rathore : यशवंत सिंह का कोई विकल्प नहीं।

Shivkumar Kaushikey : इस संवेदना के लिये सैल्यूट है ।

Sharad Srivastv : मृत्युंजय जी जैसे लोग आज भी मिसाल हैं… मैं उनको एक ही संस्थान में कार्य करने के कारण उनकी कार्य प्रणाली से परिचित और प्रभावित भी हूं, ऐसे कार्य के लिए मैं उन्हें प्रणाम करता हूं व धन्यवाद भी।

Chandan Sharma : निःशब्द! एक गरीब पीड़िता की आवाज़ बनने के लिए धन्यबाद!

इसे कहते हैं 'मृत्युंजय' होना! जिला जौनपुर के एक गांव की बेहद गरीब लड़की, दलित परिवार की बेटी, भूमिहीन की बेटी… रोते…

Posted by Yashwant Singh on Sunday, November 3, 2019

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Comments on “इसे कहते हैं ‘मृत्युंजय’ होना!

  • Rahul kumaar patel says:

    मन को छू जाने वाला वाकया है सर, आपको सादर धन्यवाद उस पीड़िता की तरफ से उसको जिंदगी और इंसानियत पर विश्वास दिलाने के लिए।उस धूर्त ने प्रेम जाल में छल किया निश्चित ही उसका भरोसा नाम से विश्वास उठ गया होगा। लेकिन आपके तत्काल प्रयास ने उसके ऐतबार को कायम रखा ।

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  • विवेक कुमार says:

    आप ने एक पीड़ित की मदद की इसके लिए बहुत साधुवाद..ये सुनिश्चित होना चाहिए कि निचले स्तर के केस नीचे ही सुलट जाये और किसी नीचे के अधिकारी की शिकायत ऊपर जाए तो वह सीधा सस्पेंड हो … धन्यवाद

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  • प्रवीण ठाकुर says:

    आपका कार्य यशवंत सर सराहनीय है।ऐसी पत्रकारिता को सेल्यूट करते हैं।मीडिया का असली चेहरा ऐसा ही होना चाहिए।

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