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यौन उत्पीड़न की एकतरफा जांच पर इन हॉउस सवाल से मचा हड़कंप!

जेपी सिंह

न्याय होना ही नहीं चाहिए बल्कि होते हुये दिखना भी चाहिए “मी लार्ड”… चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के विरुद्ध यौन उत्पीडन के मामले में एक अंग्रेजी अख़बार में रविवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट से विधिक क्षेत्रों में हड़कम्प मच गया है। खबर में कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने मामले की जांच कर रही आंतरिक समिति से कहा है कि वो आरोप लगाने वाली महिला की अनुपस्थिति में जांच न करें, क्योंकि इससे उच्चतम न्यायालय की बदनामी होगी। यह भी कहा गया है कि जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन मामले की जांच कर रही समिति से मिले और जांच को लेकर अपनी चिंताएं जतायी।

इस खबर का संज्ञान लेते हुये उच्चतम न्यायालय ने जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन द्वारा जस्टिस एसए बोबडे से शिकायतकर्ता की गैरमौजूदगी में जांच नहीं करने के संबंध में मुलाकात करने की ख़बर का तत्काल खंडन किया और इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. हालांकि, अदालत ने जांच समिति को पत्र लिखने की बात को खारिज नहीं किया। न्याय होना ही नहीं चाहिए बल्कि होते हुये दिखना भी चाहिए “मी लार्ड”। आंतरिक समिति के एकतरफा सुनवाई से क्या प्रक्रितक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हो रहा और क्या इसे ही यही निष्पक्ष न्याय कहते हैं “मी लार्ड”।

उच्चतम न्यायालय की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गयाहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक समाचार पत्र ने अपनी खबर के हवाले से कहा कि जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने तीन मई 2019 शुक्रवार शाम को जस्टिस एसए बोबडे से मुलाकात की।यह पूरी तरह से गलत है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई मामले पर विचार-विमर्श कर रही आंतरिक समिति इस अदालत के और किसी भी जज की सलाह के बिना खुद से ही इस पर विमर्श कर रही है।

इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जस्टिस नरीमन के साथ जस्टिस चंद्रचूड़ ने बीते सप्ताह शुक्रवार को आंतरिक समिति से मुलाकात की थी और कहा था कि शिकायतकर्ता महिला की गैरमौजूदगी में जांच जारी नहीं रखी जाए। एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि इससे पहले जस्टिस चंद्रचूड़ ने 2 मई को जांच समिति को एक पत्र भी लिखा था कि अगर आरोप लगाने वाली महिला की गैर मौजूदगी में जांच चलती रही तो इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुक़सान पहुंचेगा।हालांकि उच्चतम न्यायालय के महासचिव द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण में पत्र लिखने की बात को खारिज नहीं किया गया है।रिपोर्ट के मुताबिक जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना था कि शिकायतकर्ता महिला की गैरमौजूदगी में जांच करने से सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचेगा।

रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी सुझाव दिया था कि समिति या तो शिकायतकर्ता महिला की आग्रह के अनुरूप उसे वकील मुहैया कराएं या फिर जांच के लिए न्यायमित्र (एमाईकस क्यूरी) नियुक्त करें। उच्चतम न्यायालय में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ उच्चतम न्यायालय की वरिष्ठता सूची में दसवें नंबर पर हैं।वह 2022 से 2024 तक चीफ जस्टिस का पद संभाल सकते हैं।

गौरतलब है कि यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने वाली पूर्व महिला कर्मचारी ने मामले की जांच कर रही आंतरिक समिति के माहौल को डरावना बताते हुए समिति के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया था। शिकायतकर्ता महिला ने अदालत में अपने वकील की मौजूदगी की अनुमति नहीं दिए जाने समेत अनेक आपत्तियां जताते हुए आगे समिति के समक्ष नहीं पेश होने का फैसला किया था।

जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी कीआन्तरिक समिति चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन शोषण के आरोपों की जांच कर रही है।जस्टिस गोगोई ने इन आरोपों से इनकार करते हुए इसे स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए एक खतरा बताया था।

गौरतलब है कि जस्टिस बोबडे ने 23 अप्रैल को ही स्पष्ट कर दिया था कि यह आंतरिक जांच है और इसमें पक्षों का प्रतिनिधित्व करने के लिए वकील की व्यवस्था नहीं है। यह औपचारिक न्यायिक कार्यवाही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि जांच को पूरा करने के लिए कोई समय सीमा नहीं है और भविष्य की कार्रवाई ‘जांच के बाद सामने आने वाले तथ्यों’ पर निर्भर करेगी जो गोपनीय होंगे।

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1 Comment

1 Comment

  1. madan kumar tiwary

    May 6, 2019 at 10:33 pm

    वकील साहब कितना पढ़े है नेचुरल जस्टिस के बारे में ? कभी विभागीय जांच की प्रक्रिया के बारे में भी पढ़ा है ? पढ़ लीजिये पहले, महिला ने आंतरिक जांच समिति के माहौल को भय पैदा करने वाला बताया ,वकील की मांग की ? यह जांच है ,जांच का मतलब समझते हैं ? न्यायिक कार्रवाई नही है जहां मुकदमा चल रहा हो, आप जैसा वकील तो कल पुलिस अनुसंधान में पूछताछ के समय वकील की उपस्थिति अनिवार्य करवा देगा ? पढा है न क्या क्या इजाजत है वकील को पुलिस अनुसंधान के समय ? दूर रहकर सिर्फ यह देख सकता है कि मुजरिम या गवाह के साथ मारपीट तो नही हो रही , और इतनी दूर रहना की पूछताछ की आवाज वकील के कान तक न पहुचे । कुछ अध्ययन कीजिये

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