बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं!

Sanjaya Kumar Singh : बदल रहा है पत्रकारों का धंधा… हिन्दी पत्रकारों के बारे में अक्सर यह कहा सुना जाता है कि पत्रकार हैं ये तो ठीक है, गर चलाने के लिए क्या करते हैं? शुरू में यह मजाक लगता था बाद में पता चला कि देश के ज्यादातार हिस्से में बड़े-बड़े अखबारों के प्रतिनिधि असल में पैसे कमाने के लिए ठेकेदारी से लेकर ब्लैकमेल तक के धंधे करते हैं। कहने वाले कह देते हैं कि अंशकालिक संवाददाताओं के धंधे बुलंद होते हैं पर कुछेक अपवाद को नियम नहीं माना जा सकता।

सच ये है कि वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन देने से बचने के लिए इनसे बाकायदा लिखवाकर ले लिया जाता है कि पत्रकारिता उनका शौक है, पेशा नहीं और वे शौकिया खबरें लिखते हैं। लिहाजा जो मिल जाए वही पर्याप्त है और घर चलाने के लिए वे कुछ और धंधा करते हैं। यह सब पुरानी घिसी-पिटी कहानियां हैं। और ऐसे में यह जानना सुखद आश्चर्य है कि अगस्ता मामले में खुलासे न करने के लिए पत्रकारों को पैसे दिए गए थे। पत्रकारिता का जो हाल हैं उनमें इतने पैसे पा लेना वाकई गौरव की बात है। और यह जानने के लिए हर कोई उतावला है कि वो खुशकिस्मत पत्रकार कौन हैं और दरअसल क्या करते हैं। विवेक सक्सेना ने “मन की बात” लिख दी है, जो नीचे है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

पत्रकारः धंधों ‘के’ नहीं, ‘ये’ है!

विवेक सक्सेना

मैंने पहले एक कालम में इस घटना का जिक्र किया था वह फिर अगस्ता कांड के कारण याद हो आई। घटना कुछ इस प्रकार थी कि हम लोग 1982 में असम विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग करने गए थे। राज्य में करीब 8-10 दिन रहे। वहां के एक व्यवसायी गोयनका परिवार ने हमारी काफी मदद की और उनसे हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। जिस दिन हम लोग वापस लौटने वाले थे उसकी पूर्व संध्या पर उन्होंने हमारे सम्मान में रात्रि भोज का आयोजन किया जिसमें शहर की तमाम हस्तियां आयीं। बड़े गर्व से वे लोगों को हमसे मिलवाते हुए बता रहे थे कि देखों दिल्ली के पत्रकार मेरे दोस्त हैं।

खाना खत्म होने पर उन्होंने अपने दादा से हमें मिलवाने की इच्छा जताई। वे हमें लेकर एक कोठरी में गए। जहां उनके बुजुर्ग दादा लेटे हुए थे। उन्होंने कहा, ‘लाला इनसे मिलो ये दिल्ली से आए हुए पत्रकार हैं। बुजुर्ग लालाजी ने हमें ऊपर तक देखा और फिर पूछा पत्रकार है वो तो ठीक है। पर धंधों के है? रोटी पानी कैसे चले हैं?

तब हमें लगा कि जैसे किसी ने हम पर घड़ों पानी डाल दिया हो। उस समय एक आम आदमी के मन में पत्रकारों को लेकर कुछ इस तरह की धारणा रहती थी। पत्रकार का मतलब एक फक्कड़, तंगहाली से गुजरता हुआ इंसान माना जाता था। पर अब जब अगस्ता डील में पत्रकारों को करोड़ों रुपए बांटने की खबर पढ़ी तो मन गर्व से भर गया। सच कहूं तो इस पूरे विवाद में यह खुलासा होने के बाद मेरा और कुछ पढ़ने जानने का मन ही नहीं कर रहा है। मैं उन पत्रकारों के नाम जानने के लिए बेहद उत्सुक हूं। मेरा बस चले तो पत्रकारों को सम्मानित करने वाली किसी दुकान से अनुरोध कर इन सभी को पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके इस उत्कर्ष कार्य के लिए सम्मानित किए जाने का आग्रह करुंगा।

हां, मैं इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी चलाने को तैयार हूं। वजह यह है कि इस खबर ने पत्रकारों की जो हैसियत बढ़ाई हैं उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। आम धारणा यही रहती आयी थी कि पत्रकारों को महज मुरगा खिलाकर, शराब पिलाकर कुछ भी लिखवाया जा सकता है। इसी कालम में मैंने यह भी लिखा था कि जब पत्रकारश्रेष्ठ खुरानाजी को पहली बार ज्ञानी जैल सिंह से किसी बंदूक का लाइसेंस दिलवाने की एवज में डेढ़ लाख रुपए मिले थे तो वे बौखला गए थे। पूरी रात सो नहीं सके थे। यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि यार हम तो खा पीकर ही काम करवा देते थे। कोई बहुत खुश हुआ तो छोटी मोटी गिफ्ट थमा दिया करता था। जब एक बेहद उद्यमी भाजपा के अध्यक्ष बने जो कि केंद्रीय मंत्री भी हैं तो उनसे किसी ने कहा कि आप दिल्ली जा रहे हैं। वहां के पत्रकारों से जरा बचकर रहिएगा। बहुत तेज होते हैं तो उन्होंने छूटते ही कहा था कि तुम उनकी चिंता मत करो। पांच-पांच हजार के कुछ और पैकेट तैयार करवा लूंगा। हालांकि बाद में वे पत्रकारिता का ही शिकार हुए। उन्होंने पैकेट दिए नहीं या इतनी रकम से पत्रकारों को मोह पाने में नाकाम रहे, कह नहीं सकता।

आमतौर पर पत्रकारों को प्रेस कान्फ्रेस में छोटे-मोटे उपहार मिला करते हैं। पहले घड़ी का चलन शुरु हुआ फिर केलकुलेटर मिलने लगे। जब इलेक्ट्रानिक सामान की भरमार हुई तो सैलफोन, पैन ड्राइव, टेबलेट आदि दिए जाने लगे। मेरा मानना है कि उन्हें 50 रुपए के टंबलर से लेकर 10-15 हजार रुपए तक के गिफ्ट दिए जाते हैं। यह देने वाले की हैसियत और उसके उत्पाद पर निर्भर करता है। जैसे कि हाल में जिंगल बैल नामक सैल फोन कंपनी ने पत्रकारों को सेल फोन बांटे। बाबा रामदेव रिपोर्टरों को अपने उत्पाद का हैंपर और चैनल मालिक को विज्ञापन बांटते हैं। पत्रकारों की कितनी कम कीमत लगाई जाती रही इसका भी जिक्र पुनः करना जरुरी हो जाता है। दिल्ली के एक बहुत बड़ी हलवाई श्रृंखला के मालिक की बेटी ने पानी में नृत्य प्रस्तुत किया। इसका आयोजन तालकटोरा स्थित स्विमिंग पुल में किया गया था। जब पत्रकार प्रदर्शन देख रहे थे तभी वहां लालाजी आ गए। उन्होंने जोर से कहा, ‘अबे पम्मों, समय क्यों बरबाद कर रहा है, नाचवाच दिखवाना बंद कर इन्हें अंदर ले जा। दारु पिला। मुरगे खिला वरना खबर कैसे छपेगी।’

तब भी पत्रकारों की बहुत कम कीमत आंकी जाती थी। वैसे मैं पत्रकारों की इज्जत व हैसियत बढ़ाने का पहला श्रेय ‘नीरा राडिया’ टेप्स को देना चाहता हूं। जिनके प्रकाशन से यह खुलासा हुआ कि किस तरह से कुछ पत्रकार इस सरकार की नीतियां तक बदल देने की हैसियत रखते थे। महिला पत्रकारों की तो पहुंच प्रधानमंत्री के किचन कैबिनेट तक थी जहां वे कुछ भी पकवा सकने की ताकत रखती थीं। उनके तार इतने गहरे जुड़े थे कि यह सुनिश्चित करने लगी कि संचार मंत्रालय किसे सौंपा जाए। हालांकि किवदंती तो यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में कुछ पत्रकारों ने उत्तरप्रदेश सरीखे अहम राज्य में भाजपा के टिकट वितरण में बहुत अहम भूमिका अदा की थी। मुझे इस बात पर गर्व है कि कम से कम हिंदी के किसी पत्रकार को यह गौरव हासिल हुआ।

अभी तक अपना अनुभव यही रहा है कि हिंदी व भाषायी पत्रकारों की माल बांटते समय भी अनदेखी की जाती रही है। करीब डेढ़ दशक पहले हिंदी के तीन पत्रकारों द्वारा किसी इनकम टैक्स कमिश्नर का मनचाही जगह तबादला करवा देने के बदले में डेढ़ करोड़ रुपए लेने की खबर आयी थी। तब अनिल बंसल ने कहा था कि हिंदी पत्रकारिता के लिए यह बहुत गर्व की बात है क्योंकि उन पर तो बेल का शरबत या मिठाई, मुरगा, दारु लेकर ही काम करवाने की खबरें सुनने को मिलती रही है। वैसे अगस्ता कांड के खुलासे के मुताबिक हर पत्रकार को 10 लाख रुपए प्रतिमाह दिए जा रहे थे। पत्रकार तो क्या जब हिंदी के संपादक तक महज डेढ़ दो हजार रू के लिए अपना अखबार छोड़कर चैनल पर बहस करने पहुंच जाते हो, उनका इस सूची में नाम आना सचमुच गर्व की बात है। लगता है अगस्ता की सूची में अंग्रेजी के ही पत्रकार है। अगर किसी हिंदी के पत्रकार का नाम आया तो मैं तुरंत गुवाहाटी फोन मिलाकर लाला से जरूर कहूंगा, ‘असली धंधो तो ये हैं।’

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं
  • भड़ास तक कोई भी खबर पहुंचाने के लिए इस मेल का इस्तेमाल करें- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *