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टीवी अख़बारों में वाहियात चरस बोते ‘एग्जिट पोल्स’ पर रोक लगा देनी चाहिए!

खुशदीप सहगल-

भी अंतिम परिणाम आने शेष हैं, लेकिन तमाम एग्जिट पोल को देखा जाए तो कांग्रेस को न्यूनतम 44 और बीजेपी को अधिकतम 29 सीटें दी गई थीं.

बार-बार मुंह की खाने वाले इन एग्जिट पोल्स का आखिर औचित्य ही क्या है? मतदान ख़त्म होते ही टीवी न्यूज़ चैनल्स, अख़बारों के पोर्टल्स पर एग्जिट पोल दिखाने शुरू हो जाते हैं. फिर असल मतगणना के दिन तक इन्हीं एग्जिट पोल के नाम पर चरस बोई जाती है.

नतीजा ढाक के तीन पात, पहले इस साल लोकसभा चुनाव में दिखा और अब हरियाणा विधानसभा चुनाव में.

जिस एग्जिट पोल का तुक्का लग जाता है वो एजेंसी और उसे दिखाने वाला मीडिया हाउस ऐसे अपनी पीठ ठोकता है कि उनसे बढ़िया अनुमान लगाने वाला और वोटर्स की नब्ज़ भांपने वाला कोई और हो ही नहीं सकता.

जो एग्जिट पोल फेल हो जाता है तो सबसे पहले तो मीडिया हाउस अपना पल्ला झाड़ता है, जैसे कि सारा दोष एग्जिट पोल करने वाली एजेंसी का ही हो उसका तो कोई लेना देना ही नहीं. क्यों नहीं लेना देना भाई? अपने स्क्रीन से हुक्के आप तारते हो तो आपकी जवाबदेही क्यों नहीं?

बार-बार नाकाम हो रहे इन एग्जिट पोल पर सिरे से रोक लगा देनी चाहिए. इससे किसी का कोई फायदा नहीं होता सिवाय तथाकथित चुनाव विशेषज्ञों के जो पैसे लेकर बहस के नाम पर दो-तीन दिन स्क्रीन पर अपने चेहरे चमकाते रहते हैं.

मेनस्ट्रीम मीडिया की विश्वसनीयता घटाने में इन हवा हवाई एग्जिट पोल का भी बहुत बड़ा योगदान है.

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