सत्येंद्र पी एस-
एलोपैथी चिकित्सा में सर्जरी पैसे कमाने का सबसे बड़ा साधन होता था/है। ये खबर पढ़ी कि आधे से ज्यादा टॉपर मेडिसिन स्पेशलिटी में जा रहे हैं तो मैं चौंका।

अब चिकित्सा का खेल बदल चुका है। फाइव स्टार हॉस्पिटल्स बन रहे हैं। लोग बीमा करा रहे हैं। यह दोनों मिलकर पब्लिक को लूटते हैं। अगर आपने किसी सरकारी अस्पताल में या परिचित सस्ते अस्पताल में सर्जरी करा ली तो बीमा कम्पनियां आपको रुला मारेंगी, जबकि आप फाइव स्टार्स हॉस्पिटल में सर्जरी कराते हैं तो वह कैशलेश हो जाता है।
मेरे जैसे व्यक्ति प्राइवेट 5 स्टार हॉस्पिटल इसलिए नहीं चुनते कि वह 20 हजार रुपये में हो जाने वाले इलाज को 2 लाख रुपये तक का बिल पहुँचाने के लिए आपको ढेरों दवाइयां खिलाकर बीमार डालते हैं, उसके बाद वह आपको ठीक करने की कोशिश शुरू करते हैं। इस प्रक्रिया में आप अगर जिंदा बच गए तो आप फील कर पाएंगे कि मैं वास्तव में बहुत बीमार था, ये तो हॉस्पिटल और डॉक्टर भगवान की कृपा से बच गया। सस्ते में इलाज होने पर वह फीलिंग ही नहीं आ पाती कि डॉक्टर और अस्पताल में आपकी आस्था बन पाए।
ऐसे में डॉक्टर का रोल एक पेड कर्मचारी तक रह गया है। 5 स्टार हॉस्पिटलों में ऑपरेशन थियेटर में 30 मरीज एक साथ उलट दिए जाते हैं। टीम का एक हेड होता है, वह निगरानी करता है, चीड़फाड़ कौन डॉक्टर किया, आपको पता नहीं होता। वहीं छोटे अस्पतालों में यह कन्फर्म होता है कि आप जिससे फड़वाने गए हैं वही डॉक्टर आपको फाड़ेगा।
लेकिन अब 5 स्टार हॉस्पिटल के अंदर में ऑपरेशन जा चुके हैं। उनके पास रोबोटिक्स है, होटल की तरह कमरे हैं। अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर हैं। इसलिए लोग डॉक्टर के बजाय ब्रांड हॉस्पिटल में ऑपरेशन कराना चाहते हैं। डॉक्टर्स की अभी थोड़ी बहुत वैल्यू है, लेकिन कुछ साल बाद उनका रोल खत्म होने वाला है।
खबर से यह लगता है कि प्रतिभाशाली बच्चे समझ चुके हैं कि सर्जरी में वह 5 स्टार हॉस्पिटलों के गुलाम के सिवा कुछ नहीँ बनने वाले हैं और गुलामी वो स्टूडेंट्स ज्यादा बेहतर कर पाएंगे जिन्होंने 1 करोड़ रुपये देकर mbbs और 2 करोड़ रुपये देकर md की है और भारत सरकार हर साल 50,000 ऐसे एमबीबीएस निकाल रही है जिन्हें मरीजों की किडनी बेचकर पढ़ाई की क़िस्त चुकानी होगी, वरना बैंक उन्हें सुसाइड करने पर मजबूर करेंगे।
ऐसे ही उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन में सलेक्ट होने वाले बच्चे sdm और डिप्टी एसपी को प्राथमिकता नहीं देते। उसकी वजह यह है कि उन्हें डीएम और एसएसपी के अंडर वसूली एजेंट का काम करना पड़ता है।
sdm, dy sp की जगह वो sto और arto को प्राथमिकता देते हैं जहां बंधा बंधाया पैसा आता रहता है और उन्हें केवल सम्बंधित मंत्री और अधिकारी को कमीशन पहुँचाना होता है। 1990 के पहले यूपी के खांग्रेसी शासन में sdm और dysp प्राथमिकता पर रहते थे कि उससे जनता का काम कराने करने का मौका मिलता था, जिससे जलवा रहता था। उस समय के नेता और मंत्री दलिद्दर होते थे, अमूमन कमीशन नहीं लेते थे। अधिकारी वसूली, धमकी, हत्या करने के लिए नहीं बिठाए जाते थे।


