चंद्रभूषण-
भारत सरकार की ओर से इतालवी विदुषी फ्रेंचेस्का ओरसिनी को ब्लैकलिस्ट करके हवाई अड्डे से ही वापस लौटा देने का फैसला दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। कहीं न कहीं लगभग रोज ही होने वाले इसी तरह के कामों से संसार भर में मोदीराज का ‘डंका बज रहा है’ सो इस बारे में कहने को कोई अलग बात मेरे पास नहीं है। इसके कानूनी और नैतिक पहलुओं पर भी कहने को मेरे पास कुछ नहीं है लेकिन फ्रेंचेस्का के बौद्धिक काम के कुछ पहलू मुझे आंदोलित करते रहे हैं।

उनका जिक्र यहां करते हुए मैं समझना चाहता हूं कि एक दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक, वर्चस्ववादी सरकार इस लेखिका को अपने लिए एक दूरगामी खतरे की तरह क्यों देख रही है। एक बात यह कि एक अर्से से अपना ही चेहरा देख-देखकर मुग्ध हुए जा रहे हिंदी के साहित्यिक दायरे में फ्रेंचेस्का ने भाषिक कृतियों के सांस्कृतिक पहलू को खंगालने की कोशिश की है। आक्रामक हिंदुत्व के इस दौर में हिंदी के ‘लोकवृत्त’ को लेकर उनकी सतत खोजबीन इस धारणा को एक बड़े दायरे में ले गई है।
फ्रेंचेस्का ने बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में रामलीलाओं और राजनीतिक मुहावरों के जरिये रामचरितमानस का प्रभाव अचानक बढ़ जाने की बात पर उंगली रखी। उनके खोले हुए इस रास्ते पर अभी हिंदी के कुछ और महत्वपूर्ण शोधार्थियों ने कदम बढ़ाने शुरू किए हैं और इस भाषा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं को भी ‘पब्लिक स्फेयर’ के नजरिये से देखा जाने लगा है। क्या पता, यह प्रक्रिया कभी इस सवाल का भी दरवाजा खटखटाए कि हिंदी साहित्य अपनी तमाम जगर-मगर के बावजूद हिंदी समाज के हाशिये पर ही क्यों है।
फ्रेंचेस्का के दो और काम जो मुझे बहुत महत्व के लगे, उनमें एक है ‘पूरब’ की पुरानी अवधारणा, और दूसरी ‘हिंदी क्षेत्र की बहुभाषिकता’। इनमें बहुभाषिकता को लेकर कुछ बातें आगे कही गई हैं, जो दिल्ली में उनका एक लेक्चर सुनकर लिखी गई रिपोर्ट का हिस्सा हैं। पूरब के बारे में संक्षेप में कहूं तो अभी जिस पूरब (या पुरबियों) को हम जानते हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, फ्रेंचेस्का अपनी खोजबीन से बताती हैं कि मध्यकाल में वह अपेक्षाकृत पश्चिम से, मोटे तौर पर कहें तो हरदोई में पड़ने वाले कस्बे बिलग्राम से ही शुरू हो जाता था।
अभी नाम को ही बचा रह गया छोटा सा कस्बा बिलग्राम उनके शोधों में बहुत खास जगह की तरह, बहुभाषिकता के एक महत्वपूर्ण मध्यकालीन केंद्र की तरह उभरता है। (मेरी राय में पूरब का संदर्भ चौदहवीं सदी के अंत में जौनपुर से उभरी शर्की सल्तनत से जुड़ता है, लेकिन उसपर फिर कभी।) आगे इस धारणा पर थोड़ी चर्चा करने के बाद अपनी सबसे जरूरी बात मुझे आखिर में कहनी है, बशर्ते वहां पहुंचने तक आपका धैर्य न छूट जाए।
यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय भाषाओं को आधार बनाकर हुआ था। इस प्रक्रिया में उभरे ताकतवर राष्ट्रों ने भारत और इंडोचाइना जैसे जिन उपनिवेशों पर कब्जा किया, वहां अपनी भाषाएं थोपने से पहले उनका भाषाई नक्शा तैयार किया। ग्रियर्सन जैसे बौद्धिकों को हम उनके कई जरूरी कामों के लिए जानते हैं, लेकिन उनकी नौकरी भारत की बोलियों और भाषाओं का नक्शा बनाने की ही थी। बाद में, स्वतंत्र भारत में राज्यों का पहला पुनर्गठन भी भाषाओं के आधार पर ही हुआ। लेकिन इसके कुछ बड़े नुकसान हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं है।
खासकर अवध क्षेत्र के उन्नीसवीं सदी के साहित्यिकों के बारे में फ्रेंचेस्का का निष्कर्ष यह है कि उनकी भाषा दरबार और कोर्ट-कचहरी में अलग, मंदिर में अलग, घर में अलग और महफिलों में अलग हुआ करती थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र और प्रताप नारायण मिश्र की उर्दू-फारसी और ब्रजभाषा से लेकर भोजपुरी-अवधी और संस्कृतनिष्ठ हिंदी तक सहज गति थी। इसके लिए अपने काम में कुछ उदाहरण भी फ्रेंचेस्का पेश करती हैं। निष्कर्ष यह कि एक भाषा का दूसरी भाषा की कीमत पर ही आगे बढ़ना इस इलाके के लिए जरूरी नहीं था। इस बहुभाषिक मिजाज के लिए ऊपर से थोपे गए किसी भी भाषाई नक्शे में कोई इज्जत की जगह कैसे बन सकती थी?
फ्रेंचेस्का की जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित किया, वह थी अवधी प्रेमकाव्यों के रचयिताओं को लेकर उनकी यह स्पष्ट दृष्टि कि ऐसी भाषा सीखकर नहीं लिखी जा सकती, पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोग यहीं के रहने वाले थे। फ्रेंचेस्का की दिखाई स्लाइड में कुतुबन की ‘मिरगावती’ मेरे लिए एक अचंभे जैसी थी। हिंदी के मध्यकालीन दौर का एक बड़ा हिस्सा दसवीं क्लास में दाऊद, जायसी, कुतुबन, मंझन के जिक्र भर से निपटा दिया जाता है। कुछ इस तरह कि बाहर से आए ये लोग निर्गुण प्रेमकाव्य लिखते थे और उसी के बहाने सूफी मत का प्रचार-प्रसार करते थे।
मध्यकाल में धर्मांतरण को एक हद तक तटस्थ होकर देखना, लोगों को, खासकर कवियों को दो धर्म मानने वाले एक ही जाति-गोत्र के लोगों की तरह देखना साहित्य ही नहीं, समाज को भी निरंतरता में समझने के लिए कितना जरूरी है, फ्रेंचेस्का ओरसिनी का काम हमें इस बारे में गौर से सोचने को मजबूर करता है। वे इतिहास के उत्तर-औपनिवेशिक, पोस्ट-कोलोनियल अध्ययन को आगे बढ़ा रही हैं। हिंदी के अलावा उर्दू-फारसी में भी सहज गति और जमी-जमाई संकीर्णताओं, पूर्वाग्रहों में न फंसना उन्हें कुछ अद्भुत नतीजों तक ले जा रहा है। एक कट्टरपंथी, रूढ़िवादी सरकार इन नतीजों से पैदा होने वाले खतरों की अनदेखी कभी नहीं कर सकती।
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