सईद मो. इरफान-
प्रख्यात हिंदीविद और प्रोफेसर SOAS, London University फ्रांचेस्का ओरसिनी को आज नई दिल्ली हवाई अड्डे पर रोक दिया गया। उन्हें भारत में प्रवेश करने से मना कर दिया गया। वे लंदन वापस अपने खर्चे पर जाएं, ऐसा द वायर की रिपोर्ट से पता चला।
वीरेंद्र यादव-
‘दि वायर’ की खबर के अनुसार हिंदी की विद्वान और लंदन विश्वविद्यालय के एसओएएस में एमेरिटा प्रोफेसर फ्रांसेस्का ओरसिनी को कल रात बिना कोई कारण बताये भारत में प्रवेश करने से रोक दिया गया, जबकि उनके पास वैध 5 साल का ई-वीजा है। और कहा गया कि उन्हें तुरंत निर्वासित किया जा रहा है।

फ्रांसेस्का ओर्सिनी लंबे समय से भारत आती रही हैं। ‘हिंदी पब्लिक स्फीयर’ जैसी किताब लिखकर उन्होंने हिंदी लोकवृत के बारे में नया विमर्श जोड़ा है। हिंदी समाज को लेकर उनकी नई पुस्तक ‘ईस्ट ऑफ डेल्ही’ अभी दो वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई है।
पिछले वर्ष इन्हीं दिनों जब वे भारत आई थीं तो मैंने उनका लंबा साक्षात्कार लिया था, जो ‘तद्भव’ के अंक पचास में प्रकाशित हुआ था। यह निंदनीय और शर्मनाक घटना है।
Professor Francesca Orsini is a great scholar of Indian literature, whose work has richly illuminated our understanding of our own cultural heritage. To deport her without reason is the mark of a government that is insecure, paranoid, and even stupid. – रामचंद्र गुहा
नवीन कुमार-
हिंदी की मशहूर विद्वान फ्रैंसेस्का ऑर्सिनी को दिल्ली एयरपोर्ट से डिपोर्ट कर दिया गया। जबकि उनके पासपोर्स पर पाँच साल का ई वीजा लगा हुआ है। फ्रेंसेस्का ने हिंदी पब्लिक स्फीयर जैसी गहन शोध आधारित पुस्तक लिखी हैं। वो School of Oriental and African Studies, लंदन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर इमेरिटस हैं। किसी भी भाषा को उनकी तरह की साहित्यिक इतिहासविद अध्येता पर गर्व होना चाहिए। भारत में एक हिंदीवादी सरकार जो तमिलनाडु तक में हिंदी पढ़ाना चाहती है लेकिन इंग्लैंड में हिंदी की प्रचार-प्रसार करने वाली एक विद्वान को धक्के मारकर भगा देती है।
इससे भी हैरतअंगेज़ है इतनी बड़ी घटना पर हिंदी के जड़ समाज और साहित्य में छाई चुप्पी। जैसे इसका कोई अर्थ ही न हो। सरकार ने हिंदी की सामूहिक चेतना और आत्मसम्मान को झापड़ मारा है। बड़े-बड़े इनामधन्य, स्वनामधन्य, पदनामधन्य और बदनामधन्य लेखक धरतीपकड़ हो गए हैं।
इसमें भी नागरी प्रचारिणी सभा की चुप्पी भयावह है। ये सभा बनी ही इसलिए थी कि ग़ैर हिंदी भाषी इलाकों में हिंदी को स्वीकार्य बनाया जाए। लेकिन अब ये बनारस की एक गली की खाओ-पकाओ पीको संस्था बनकर रह गई है। इसके महावीरों में फ्रैंसेस्का को एयरपोर्ट से वापस भेजे जाने पर मुर्दा शांति छाई हुई है। नागरी प्रचारिणी सभा इसलिए घेरे में है कि 1989 में वो जब शोध के सिलसिले में भारत आई थीं तो नागरी प्रचारिणी सभा की मेहमान रही थीं। ऐसा क्या बदल गया है कि एक विश्वविख्यात हिंदी विद्वान के साथ भाजपा सरकार की तानाशाही पर नागरी प्रचारिणी सभा के मौजूदा अधिकारियों की पान से सनी चुभलाती जुबानें तालु से चिपक गई हैं। क्या नागरी प्रचारिणी सभा भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक्सटेंशन काउंटर में तब्दील हो चुका है? भारतेंदु होते तो आज सत्ता के पैरों में रेंगती इस “सभा” के कायर चरित्र पर शर्मिंदा होते।
संदर्भ के लिए इसके पदाधिकारियों की सूची निम्नवत है-
व्योमेश शुक्ल
आलोक शुक्ला
अविनाश तिवारी
जितेन्द्र मोहन तिवारी
प्रशान्त तिवारी
विनय शंकर तिवारी
तन्मय तिवारी
धीरेन्द्र मोहन तिवारी
नरेन्द्र नीरव (तिवारी)
शिवदत्त द्विवेदी
सोमदत्त द्विवेदी
राधेश्याम दुबे
सत्य नारायण पाण्डेय
आनन्द शंकर पांडेय
अनुराग उपाध्याय
रजनीश उपाध्याय
अनुराधा बनर्जी
जे०पी० शर्मा
बीना सिंह



