Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

आजकल भूखे मरने की गारंटी हो गई है स्वतंत्र पत्रकारिता!

मनोज वार्ष्णेय

त्रकारिता में स्वतंत्र पत्रकार होना एक समय बड़ी बात थी। आप लिखते थे, छपता था, लेट सबेरा कुछ ना कुछ पारिश्रमिक भी मिल जाता था। आजकल वह दौर चला गया। देश के 90 प्रतिशत अखबारों के अपने लेखक हैं, और आप कपड़े फड़वाकर कर भी खबर लिख दो, छपेगा नहीं। गर छप गया तो मान लिजिए आपने कद्दू से तीर को तोड़ दिया है।

जो पत्रकार कहानी लिखता है, व्यंग्य लिखता है, उसके लिए तो मुसीबत ही है। अधिकतर अखबारों में इनकी जरूरत नहीं है और जो छाप रहे हैं वह या तो इंटरनेट जिंदाबाद करते हैं या मुफ्त में छाप रहे हैं।

कविता लिखने वाले तो इतने हैं कि रोज नए नाम। ग़ज़ल का कालम कहां छपता है, कोई नहीं जानता। यात्रा वृत्तांत के लिए ब्लॉगर इतने हैं कि मन ही नहीं करता। और घूमने तो आप तभी जाएंगे जब जेब बज रही होगी।

फ्री में लेख छपवाने के लिए अफसर, नेता, डाक्टर और व्यापारी आदि हमेशा तैयार रहते हैं। तेल लगवाकर चमकने की आदत तो वैसे भी सबको चंगी लगती है। लेकिन जब विज्ञापन के लिए हाथ बढ़ाओ तो…. तेल का कहीं से मेल नहीं बैठता।

जोड़ तोड़, जान-पहचान, दोस्ती तथा दूसरी किसी भी तरह आप पूरे महीने में अगर पन्द्रह दिन छप भी गए तो मेहनताना इतना होगा, जितने में कुत्ते के एक किलो पेडीगिरी बिस्किट आ सकें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन