ब्रिटेन का मशहूर FT Weekend अखबार करीब 5.10 पाउंड यानी लगभग 600 रुपये में बिकता है और अपने कंटेंट से दो दिन का वीकेंड बांध लेता है। इसके उलट भारत में अब भी लोग महीने भर के अखबार पर 100 रुपये खर्च करने से कतराते हैं और इसे फिजूलखर्ची मानते हैं…
वरिष्ठ पत्रकार और आजतक के प्रबंध संपादक संजीव पालीवाल जी लिखते हैं-
जब भी यूरोप या ब्रिटेन की यात्रा करता हूं तो FT Weekend लेना नहीं भूलता। ढाई सौ ग्राम के आसपास वज़न होता है।
तरह तरह के सेक्शन होते हैं। पढ़ते-पढ़ते पूरे दो दिन यानी शनिवार और रविवार आप के कट सकते हैं। हां, कीमत भी अच्छी खासी है 5.10 पाउंड यानी करीब 600 रुपये।
अंग्रेज़ी में कहावत है Pay peanuts, get monkeys. या जितना गुड़ डालोगे उतना ही मीठा होगा।
हम आज भी अपने महीने के अखबार के लिये सौ रुपये नहीं देना चाहते। तो जो मिल रहा है उससे खुश रहना चाहिये। मुश्किल से एक अख़बार लेते हैं। अख़बार पर खर्च फ़िज़ूलख़र्ची लगता है। इसलिये मस्त रहिये।

संजीव पालिवाल की पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़िए….
प्रदीप राय-
भारत सूचना की क़ीमत नहीं जान पाया।
सौरभ आर्य-
अख़बार घोट कर पी जाने वाली चाय का नशा है। लोग आजकल एक चुस्की भी ठीक से नहीं लेते।
प्रभात गोपाल झा-
सर आप भी कहां खो गए। जिस देश में किसी हिंदी लेखक को आज के जमाने में कुछ लाख की रॉयल्टी मिलने पर बवाल मचता है. जहां लोग अय्याशी पर लाखों खर्च करेंगे, लेकिन सूचना, जानकारी और शोध पर शून्य। वहां कौन सी क्रांति और कैसा बेहतर अखबार।
देवेंद्र भारद्वाज-
आदरणीय प्रिय पालीवाल जी, जो भी वाकई में पढ़ने लिखने वाले होते हैं एवं ईश्वर ने भी वक्त जरूरत के हिसाब से सम्पदा और रुपया पैसा दिया होता है, वह जहां कही भी जाते हैं अखबार, मैगज़ीन खरीद कर अपने समय का सदुपयोग करते हैं!
ज़िंदगी में सृजन एवं लिखने पढ़ने का शौक और हुनर सभी किसी को ईश्वर मुहैया नहीं करता! आप बहुत शानदार काम करते हैं और ईश्वर ने आपको जज्बा और मौका भी दिया है, आपको दिल से धन्यवाद एवं बहुत बहुत साधुवाद!!!
आदरणीय प्रिय संजीव जी, मैंने 35 साल दो से तीन सरकारी विभागों में भारतीय रेल में नौकरी की और पूरी जिंदगी घूम-घूम कर यात्रा एवं नौकरी का निर्वहन किया। जहां कहीं भी बाहर जाता उस शहर के सारे हिंदी के अखबार और मैगज़ीन खरीद लेता एवं बचे हुए समय का भरपूर अध्ययन करता!
आज आपकी पोस्ट पढ़कर याद आ गई चाहें घर परिवार वाले आपके अखबार मैगज़ीन को रद्दी एवं फिजूल खर्चा समझे, अपना शौक और मन का ख्याल रखिए!


