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सियासत

गांधी और मांसाहार!

सुशोभित-

महात्मा गांधी का एक बहुत केंद्रीय महत्व का योगदान यह था कि उन्होंने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया कि मनुष्य अपनी वृत्तियों का दास बना रहेगा। उन्होंने इस विचार के आगे घुटने नहीं टेके, इससे समझौता नहीं किया। यह बड़े साहस की बात थी। क्योंकि जनता ऐसी बातें सुनना पसंद नहीं करती है, इसलिए नेतागण जनता के लोभ, मोह, तृष्णा को बढ़ाने वाली बातें उनसे करते हैं।

महात्मा गांधी एक बुनियादी महत्व का प्रश्न हर परिप्रेक्ष्य में पूछते थे कि क्या यह नैतिक कृत्य होगा? अगर नहीं तो वह अधर्म है। आज यह प्रश्न कोई नहीं पूछता। आज जनता को नैतिकता से कोई सरोकार नहीं रह गया है, इसलिए सरकारें भी उस दिशा में संवाद नहीं करतीं। बाज़ार अनैतिकता के आधार पर ही फल-फूल सकता है। बाज़ार के मूल में यह है कि लोगों की इच्छाओं को उभारो और उन्हें क्रेता-वर्ग के रूप में सीमित कर दो। फिर भले इससे संसाधनों और पर्यावरण को चाहे जितनी क्षति हो और चाहे जितना बड़ा नैतिक-संकट खड़ा हो। बाज़ार केंद्र में आया और उसने लोगों को लुभाया तो सरकारें बाज़ार और जनता के बीच एजेंट की भूमिका में आ गईं। अब पाप-कर्म को कौन रोक सकता था?

जब देश आज़ाद हुआ, तब सन् सैंतालीस में हुकूमत ने कुछ ज़रूरी चीज़ों पर से कंट्रोल हटाने का निर्णय लिया था। इसमें शकर भी थी। लोग डरे कि अब तो शकर के भाव बढ़ेंगे, क्योंकि चीनी-व्यापारी उस पर मुनाफ़ा कमाएंगे। वो अपनी समस्या लेकर गांधीजी के पास पहुंचे। गांधीजी तब दिल्ली के बिड़ला भवन में थे। समस्याओं के समाधान खोजने की उनकी अपनी विशिष्ट शैली थी। उन्होंने कहा, शकर के दाम बढ़ेंगे तो आप गुड़ खाइये। वह सेहत के लिए अच्छा होता है, गाँवों में बनता है। इससे किसानों को भी लाभ होगा। यानी अगर कोई वस्तु बाज़ार में महँगी होती है तो आप यह क्यों मान बैठते हैं कि हम उसके बिना जी नहीं सकेंगे? साथ ही उन्होंने शकर-कारख़ाना चलाने वाले व्यापारियों से अनुरोध किया कि वो ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने का लालच ना करें। सरकार ने भले कंट्रोल हटा लिया हो, लेकिन एक तरह का आत्मनियंत्रण, स्वयं पर कंट्रोल बनाए रखें।

‘प्रार्थना प्रवचन’ पुस्तक में 29 नवम्बर 1947 की यह गांधीजी की उक्ति है, जिसे उद्धृत कर रहा हूं-

“चीनी के जितने कारख़ानेदार हैं, उनका यह परमधर्म हो जाता है कि वे आपस में मिलकर कुछ ऐसी व्यवस्था करें, जिससे सारा हिंदुस्तान यह देखे कि आज हमको आज़ादी मिल गई है तो इस आज़ादी में हम केवल शुद्ध कौड़ी ही कमाएँगे। लोगों को दग़ा नहीं देंगे। चीनी के व्यापारी अगर अपने मुनाफ़े के टके बढ़ा लेते हैं तो फिर चीनी का दाम बढ़ता ही है। अगर सौ में से पाँच लेते हैं तब तो वह शुद्ध कमाई ही मानी जाएगी और अगर दस या बीस फ़ीसदी अपनी जेब में डालते हैं, तो वह शुद्ध कौड़ी नहीं कही जा सकती। सौ में से पाँच बहुत हैं, उससे अधिक तो लेना नहीं चाहिए। जो कारख़ाने वाले पड़े हैं, उनको स्वच्छ बनना है। आपस में मिलकर एक मण्डल बना लें और एक भाव बाँध दें। उससे ज़्यादा कोई भी ना ले।” [ प्रार्थना प्रवचन, खण्ड 2, पृष्ठ 139 ]

इस तरह की बात आज के ज़माने में भला कौन राजनेता बोल सकता है? कारख़ानेदारों से यह अनुरोध करना कि वे मुनाफ़ा न कमाएँ? और जनता से यह आग्रह करना कि किसी वस्तु को आदत न बना लें, उसके ग़ुलाम न बन जावें? यह तो पूँजीवादी बाज़ार-व्यवस्था के मूल पर ही चोट हो गई। पूँजीवादी बाज़ार-व्यवस्था तो कहती है कि व्यक्ति को उपभोक्ता बना दो, उसको ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें ख़रीदने को उकसाओ, बाज़ार को चीज़ों से पाट दो, इकोनॉमी में करेंसी को तेज़ी से घुमाओ। पर इसका निष्कर्ष क्या है? गांधीजी पूछते, इससे मनुष्य की नैतिक ऊँचाई कितनी बढ़ी? उसके जीवन में शांति कितनी आई, संकल्प कितना आया? इन प्रश्नों का बाज़ार के लिए कोई मोल नहीं है, पर मनुष्य के लिए ये केंद्रीय महत्व के प्रश्न हैं। क्योंकि मनुष्य एक डाटा नहीं है, फ़िगर नहीं है, जनसाँख्यिकी का आँकड़ा नहीं है जिसको देखकर विद्वान अर्थशास्त्री निष्कर्ष निकालें कि आबादी बढ़ गई तो प्रोडक्शन के उपकरण भी बढ़ेंगे। लेकिन वे यह नहीं बता सकेंगे कि जब मास प्रोडक्शन होगा, तो किस हवा-पानी-धरती के दोहन से होगा?

नैतिकता के बिना व्यवसाय, त्याग के बिना धर्म और सिद्धांत के बिना राजनीति महापाप है- यह भी महात्मा गांधी ने ही कहा था। आप लाख इन बातों का उपहास करो और उनकी उपेक्षा करो, यही सत्य है। यही मानक है।

माँसभक्षण के घोर-विरोध के पीछे भी मेरे मन में यही गांधीवादी आग्रह है कि इस पाप से कितनी वेल्थ क्रिएट हो रही है और इससे लोगों को कितना जिह्वासुख मिल रहा है, यह मूल-प्रश्न नहीं है। क्या यह नैतिक-कृत्य है, यह मूल-प्रश्न है। कारोबारियों से कहा जा सकता है कि अगर साधन अनैतिक है- जो कि वह है ही क्योंकि निर्दोष की हत्या से बड़ा पाप क्या?- तो मुनाफ़े को त्याग दो और उपभोक्ताओं से कहा जा सकता है कि अगर साधन अनैतिक है तो सुख को त्याग दो, लेकिन नैतिक-मानदण्डों को नहीं त्यागा जा सकता। अगर उन्हें भी त्याग दिया तो मनुष्य का पतन अवश्यम्भावी है।

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