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सुख-दुख

गर्दिश के दिनों की रिपोर्टिंग : दिल्ली की पत्रकारिता से निराश मैं वापस बनारस आ गया!

सुरेश प्रताप सिंह-

साल 1979-80..! बीएचयू से पत्रकारिता की पढ़ाई करके मैं निकला था. जोश था और कुछ करने का जज्बा लेकिन करने के लिए कुछ नहीं था. हां, कुछ पत्र-पत्रिकाओं में लिखता रहता था. जीविका का वही साधन था.

कोई नियमित आमदनी नहीं. कहीं कुछ छ्प गया तो पारिश्रमिक मिल गया, जबकि खर्च नियमित था. सबसे बड़ा खर्च तो बनारस में रहने और कमरे के किराये का था.

उससे पहले काम की तलाश में मैंने दिल्ली तक धावा बोला था लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. वही फ्रीलांसर का काम..! वहां किसी से मिलने के लिए 20-30 किलोमीटर की दूरी नजदीक थी. लेकिन मैं बनारस से गया था और मेरे लिए यह सफर लम्बा था.

भागदौड़ से परेशान था. मौका मिलने पर लाइब्रेरी में जाता. दोपहर का भोजन संसद भवन की कैफेटेरिया में करता. सस्ता और स्वादिष्ट.

मैं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पीछे कश्मीरी गंज में अंतरराष्ट्रीय बौद्धिष्ट छात्रावास के एक कमरे में रहता था. वहां कमरा मिलने की भी रोचक कहानी है. दरअसल बीएचयू में पढ़ाई के दौरान मैं राज राममोहन राय छात्रावास में रहता था. मेरा पड़ोसी छात्र दर्शन विभाग का विद्यार्थी और बौद्धिष्ट था.

तब मैं एमए राजनीति विज्ञान से कर रहा था. प्रोफेसर मनोरंजन झा विभागाध्यक्ष थे. वह कम्युनिस्ट थे. बाद में मैं पत्रकारिता विभाग में आ गया. बीजे किया और दिल्ली से पत्रकारिता करने का मन बना लिया. लेकिन सवाल यह था कि दिल्ली में रहेंगे कहां?

इसका समाधान कश्मीर के मेरे बौद्धिष्ट मित्र ने किया. उनके ससुर कुशक बकुला कश्मीर के लेह से कांग्रेस के प्रभावशाली सांसद थे जो अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध छात्रावास के संयोजक थे. उनसे कहकर एक कमरा छात्रावास में मेरे नाम से एलाट हो गया. इसकी जानकारी होते ही काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस ट्रेन से मैं दिल्ली रवाना हो गया.

उससे पहले दिल्ली का 3-4 चक्कर लगाए थे तो दिल्ली मेरे लिए नई नहीं थी. सुबह मैं छात्रावास से पैदल ही रेलवे ओवरब्रिज से दिल्ली स्टेशन के सामने आ जाता था. स्टेशन परिसर में एक सरदार जी सब्जी रोटी का ढाबा लगाते थे. 25 पैसे की एक मोटी रोटी और साथ में सब्जी फ्री. मैं एक रोटी का वहीं नास्ता करता. एक दिन सरदार जी ने कहा- पुत्तर तुम एक रोटी खाकर दिल्ली में क्या करोगे? दो रोटी खाओ..! एक और रोटी और सब्जी मेरी प्लेट में रख दिए और पैसे मेरे देने के बावजूद नहीं लिए.

और एक दिन दिल्ली की पत्रकारिता से निराश होकर मैं वापस बनारस आ गया. सोचा कि जब फ्रीलांसिंग ही करना है तो अपनी काशी ठीक है.

बनारस में ब्रजेश राय “जनमुख” साप्ताहिक निकालने की योजना बना रहे थे. यह अखबार पहले डॉक्टर राममनोहर लोहिया निकालते थे. उसके बाद जब जनता पार्टी में बिखराव आया तो लोकबंधु राजनारायण ने जनता पार्टी (एस) बनाया और जनमुख अखबार निकालने लगे. बाद में उनके दामाद ब्रजेश राय के हाथ में कमान आ गई और बनारस में कमच्छा से साप्ताहिक अखबार निकलने लगा.

वह राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था. आपातकाल के बाद केंद्र में बनी मोरारजी देसाई की सरकार बिखराव की तरफ अग्रसर थी. “दोहरी सदस्यता” को लेकर राजनीतिक मतभेद चरम पर था. डॉक्टर लोहिया का सिद्धांत “टूटो, नहीं तो सुधरो” का बोलबाला था. सुधरे तो नहीं, लिहाजा दो साल पहले बनी जनता पार्टी टूट गई.

मैं “जनमुख” के लिए रिपोर्टिंग करने लगा. मैंने भिनगा अनाथालय (कमच्छा) पर रिपोर्ट बनाई. इसकी स्थापना राजर्षि उदय प्रताप ने की थी जो यूपी कालेज के संस्थापक हैं. छात्रावास में गरीब बच्चों के रहने, खाने-पीने और किताब की नि:शुल्क व्यवस्था थी.

बाद के दिनों में अनाथालय का स्कूल बंद हो गया. वहां नर्सरी स्कूल खुल गया. छात्रावास में रहने वाले बच्चे इस स्कूल में नहीं पढ़ते थे. नर्सरी स्कूल की अधिक फीस थी. अनाथालय पर मेरा फीचर तैयार था. “जनमुख” में छपा. पत्रकारिता के मेरे गुरु प्रोफेसर अंजन कुमार बनर्जी ने कहा था कि तुम्हारी खबर का यदि फीडबैक नहीं हुआ तो तुमने कुछ नहीं किया.

मुझे दूसरे दिन का इंतजार था. अनाथालय में चलने वाले नर्सरी स्कूल के व्यवस्थापक ने खबर का प्रतिवाद किया. अखबार के लठैत कमच्छा पर पथराव करने लगे. जनता भी सड़क पर उतर गई. खूब पत्थरबाजी हुई. पुलिस आ गई और नर्सरी स्कूल हमेशा के लिए बंद हो गया. मेरी रिपोर्टिंग असरदार रही.

कमच्छा पर अनाथालय आज भी है. उसका रखरखाव पहले से भी खस्ता हो गया है. वहां छात्रावास और स्कूल बंद है. अनाथालय की जमीन पर कई बार कब्जा करने की कोशिश की गई. अभी वर्तमान में वहां क्या स्थिति है, यह महत्वपूर्ण है.

सोचिए कि आज से एक सौ साल पहले राजर्षि उदय प्रताप ने अनाथ बच्चों के रहने के लिए छात्रावास व स्कूल बनाया. वह भी फ्री में लेकिन आज उनकी विरासत को सहेज कर रखने का दम हमारे अंदर नहीं है. राजर्षि की क्या सोच थी और हम कहां खड़े हैं, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

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