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सुख-दुख

सबसे गरीब आदमी की मौत, जानिये क्या हुआ आख़िरी वक्त!

अनिल कुमार-

सच में हमने कैसा समाज बना लिया है? क्या हम प्रगति करते करते इतनी दूर आ चुके हैं, जहां संवेदना एवं इंसानियत की मौत हो चुकी है?

सचमुच हमने इतनी तरक्की कर ली है कि हमारे पड़ोस में क्या हो रहा है, कौन मर रहा है, कौन बीमार है, कौन भूखा है इसकी जानकारी नहीं हो पाती है! शायद हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि किसी पड़ोसी, किसी अपने की मौत भी हमें विचलित नहीं करती!

इस खबर ने मुझे झकझोर कर रख दिया है! परिवार और समाज के रूप में हम पतन के अंतिम छोर पर पहुंच चुके हैं! पचास वर्षीय लव कुमार पटवा की बीमारी के चलते शुक्रवार को मौत हो गई! उनकी तीन संतान हैं, जिनमें लड़की अपनी दादी के साथ दूसरे वार्ड में रहती है! 14 एवं 10 वर्षीय दो नाबालिग बच्चे लव के साथ रहते थे! पत्नी की साल भर पहले मौत हो चुकी है! लव चूड़ी बेचकर अपना और बच्चों का पेट पालते थे!

बच्चों के पास अंतिम संस्कार करने के पैसे नहीं थे! बच्चों ने बाप के मरने की सूचना दादी को दी! दादी आईं और दुख जताकर चलती बनीं! आस पड़ोस को भी सूचना हुई, लेकिन अंतिम संस्कार कराने और पैसे देने कोई आगे नहीं आया!

तीन दिन तक बच्चे लाश के साथ रहे! जब शव से दुर्गंध निकलने लगी तो नाबालिग बच्चे एक ठेले पर शव लादकर जल में प्रवाहित करने निकल पड़े! जब स्थानीय सभासद राशिद कुरैशी को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने अपने पैसे से अंतिम संस्कार कराया!

सुबह-सुबह इस खबर को पढ़ने के बाद लगा कि हम कितने पतित हो चुके हैं? हम में जानवरों जितनी संवेदनायें भी नहीं बची हुई हैं!

हम राजनीतिक कारणों से जाति, धर्म, संप्रदाय में इस कदर बंट चुके हैं और सेल्स सेंट्रिक हो चुके हैं कि पास पड़ोस में क्या हो रहा है हमें जानकारी नहीं या फिर हम जानना ही नहीं चाहते! मैं राशिद कुरैशी एवं उनके प्रतिनिधि वारिस कुरैशी को इंसानियत दिखाने के लिये बारंबार धन्यवाद देता हूँ!

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