अभिषेक पाराशर-

इस इंटरव्यू को देखकर मुझे यह लगा… अगर कोई हिंदी का ”वरिष्ठ” पत्रकार यह इंटरव्यू करता तो वह इस इंटरव्यू को बर्बाद कर देता. वह प्वाइंट की बातें कम करता और पूरी बातचीत में वह रेटरिक और उन आम धारणाओं के बारे में सवाल पूछता, जिससे इंटरव्यू देने वाला इरिटेट हो जाता. प्राइम कुमार अगर इस इंटरव्यू में होते तो इसे झाड़ा बना देते. (हिंदी की एक पत्रकार, जो इसी चैनल में हनुमान हैं और वह बजट पर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम का इंटरव्यू कर रही थीं और अपने सवालों से उन्हें इरिटेट कर दिया और कृष्णमूर्ति ने इसे जाहिर भी कर दिया कि जो सवाल वह पूछ रही हैं उसके लिए कोई नेता वाजिब व्यक्ति है, न कि कोई अर्थशास्त्री.)


अपनी बात को रखने और पूछने का तरीका इसे बेहतर नहीं हो सकता, विशेषकर जब आप किसी बिजनेसमैन से बात कर रहे हो.
और यह स्वीकारोक्ति कितना सही है कि मैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ही राज्य से आते हैं, इसलिए मुझ पर आरोप लगाना आसाना हो जाता है लेकिन मेरी तरक्की किसी एक व्यक्ति विशेष के कार्यकाल तक सीमित नहीं, बल्कि राजीव गांधी से लेकर मोदी तक के कार्यकाल में हुआ आर्थिक सुधारों का नतीजा है. और यह सही भी है. (यह बात बहुत हद तक सही भी है कि क्योंकि टाटा पर कभी भी इस तरह के राजनीतिक आरोप नहीं लगे.) कोई मूर्ख ही अडाणी की तरक्की को एक सरकार विशेष के कार्यकाल से जोड़कर देखा सकता है. अडाणी के ईमानदार आचोलक भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके जितने अच्छे संबंध बीजेपी के नेताओं से हैं, उतने ही अच्छे संबंध कांग्रेस के नेताओं से भी रहे हैं.
दूसरा मुझे यह भी लगता है कि बड़े कॉरपोरेट्स को बात करनी चाहिए. बहुत कुछ साफ होता है और धारणाएं बदलती हैं. तीसरा कि एनडीटीवी पहले से बेहतर चलेगा और उसका स्केल भी काफी बड़ा होगा. दुनिया के सभी विकसित देशों में मीडिया हाउस कॉरपोरेट के नियंत्रण में ही होते हैं. बड़े कॉरपोरेट ही ऐसा करते हैं. यह कोई नई और विशेष प्रवृति नहीं है, जो भारत में शुरू हुई है.
हिंदी का पत्रकार रवीश कुमार का इंटरव्यू करेगा और अंग्रेजी का पत्रकार अडाणी का. यह भी एक बड़ा फर्क है कि कौन अपने ऑडिएंस को क्या परोस रहा है!
देखें इंटरव्यू-



