उमेश चतुर्वेदी-

साल 2002 में दैनिक भास्कर में एक सज्जन राजनीतिक संपादक बनकर आए..उसके पहले देश के एक जाने-माने पत्रकार दिल्ली के संपादक रह चुके थे..उनके बाद जो सज्जन आए..उन्होंने ब्यूरो में गुटबाजी को बहुत बढ़ावा दिया..उसमें मैं सबसे कमजोर था..ना गुटबाजी कर सकता था..ना ही मेरा कोई दैनिक भास्कर में गॉड फादर था..अपने पास पूंजी थी..मेरा लिखना और पढ़ना..अपनी राजनीतिक बीट पर नियमित घूमना और खबरें जुटाना..
उस नए राजनीतिक संपादक को लेकर कहा जाता है कि वे पत्रकारिता तो करते ही हैं और उसके अलावा और भी बहुत कुछ करते हैं….बहुत कुछ का आप मायने लगाते रहिए..
मैं पत्रकारिता के लिए फिट तो था, लेकिन बहुत कुछ के लिए नहीं..आज भी नहीं हूं..तो उन्होंने मुझे हटाने के लिए षडयंत्र रचा…पत्रकारिता में हटाने के लिए सबसे बढ़िया तरीका होता है किसी को कम महत्व की जगह और पोस्ट पर भेज देना…चूंकि मैं दैनिक भास्कर में बहुत सालों से था..मेरे काम पर कोई सवाल नहीं था..लिहाजा उन्होंने मुझे दैनिक भास्कर से हटवाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाए..शायद दैनिक भास्कर प्रबंधन नहीं चाहता था तो मेरा तबादला करा दिया दिल्ली में ही चल रहे फीचर विभाग में…राजनीतिक ब्यूरो से हटवाने में वे जरूर सफल रहे.
उन दिनों दैनिक भास्कर का फीचर विभाग दिल्ली के कर्मपुरा इलाके में था..वहां भी अद्भुत सज्जन इंचार्ज थे..जिन्हें पत्रकारिता के अलावा दफ्तर में उठापटक करने में ही बहुत दिलचस्पी रहती थी.. खैर..
दैनिक भास्कर हर रविवार को उस हफ्ते के किसी ज्वलंत मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के विचार छापता था…फीचर इंचार्ज महोदय ने भारी मन से मुझे यही काम दिया…
साल दो हजार दो के मानसून सत्र के दौरान राजस्थान में भूख से मरने की खबरें आईं..इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में कुछ दिनों तक बहुत गर्मागर्मी रही..एक दिन तो राज्यसभा में तत्कालीन सभापति और देश के उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत ने सदन में रोस्टर ड्यूटी निभा रहे तत्कालीन खाद्य और आपूर्ति मंत्री शरद यादव को जोरदार डांट पिला दी थी..वजह यह कि शरद यादव सदन में उंघ रहे थे..शरद यादव को जो लोग जानते हैं..उन्हें पता है कि उन्हें दोपहर बाद हलकी झपकी लेने की आदत थी..इसलिए संसद में मंत्रियों के लिए लगने वाली रोस्टर ड्यूटी में दोपहर बाद के समय में ड्यूटी से बचते थे..आपसी बातचीत में वे तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन को लेकर कहा करते थे कि महाजन उनकी दोपहर की झपकी को जानते हैं..इसीलिए जानबूझकर उनकी रोस्टर ड्यूटी दोपहर बाद लगाते हैं..
खैर..दैनिक भास्कर चूंकि राजस्थान में उन्हीं दिनों स्थापित हुआ था..लिहाजा उसके लिए राजस्थान की भूख से हो रही मौतें बड़ा मुद्दा थी..तो तय हुआ कि उस रविवार इसी मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष जाए..
फीचर विभाग में मेरे तबादले से पहले इस स्तंभ के लिए फ्रीलांसरों का सहयोग लिया जाता था..बहरहाल उस बार मुझे जिम्मा मिला..
इस स्तंभ के लिए तय प्रक्रिया यह थी कि चुने हुए मुद्दे पर जिससे सवाल उठने की उम्मीद होती थी, पहले उसका साक्षात्कार लिया जाता और एक तरह से बाद में उस साक्षात्कार आधारित सवालों के आधार पर उसके विपक्षी से जवाब लिया जाता..
तब गिरिजा व्यास राजस्थान कांग्रेस की अध्यक्ष और लोकसभा की सदस्य भी थीं..लिहाजा सबसे पहले मैंने उन्हें ही फोन लगाया और उस विषय पर उनसे बात करने के लिए उनका वक्त मांगा..तब दिल्ली में भयानक गर्मी पड़ रही थी..उन्होंने तब कहा था कि इस गर्मी में आने की जरूरत नहीं…अभी वे व्यस्त हैं…उन्होंने मुझसे मेरा नंबर मांगा और कहा कि वे खुद दो-तीन घंटे में फोन करेंगी और फोन पर ही इंटरव्यू दे देंगी..
गर्मी से पत्रकार को बचाने और उसका फोन का खर्च भी न लगे, इसका उन्होंने ध्यान रखा..तब फोन करना महंगा होता था और आज की तरह सबके हाथ मोबाइल का बटेर नहीं लगा था..गिरिजा व्यास ने खुद बताए वक्त पर मेरे दिए नंबर पर फोन किया था..मेरा हालचाल पूछने के बाद मेरे सवालों की झड़ी का धैर्य पूर्वक जवाब दिया था..मेरी ओर से साक्षात्कार पूरा होने के बाद उन्होंने आश्वस्त करते हुए कहा था कि अगर कुछ छूट जाए या जोड़ना हो तो फिर पूछ लीजिएगा…
यहां यह बताना जरूरी है कि गिरिजा जी खुद भी कभी-कभी कुछ लिखती थीं..उनकी लिखी एकाध रचनाएं उन दिनों कादंबिनी पत्रिका में छपी भी थीं, जिन्हें मैंने पढ़ा था..
गिरिजा जी के उठाए मुद्दों पर जवाब के लिए मैंने जब शरद यादव को फोन किया था तो उनका भी कुछ वैसा ही जवाब था कि इतनी धूप में कहां आओगे..परेशान होने की जरूरत नहीं…वैसे वे मुझे जानते थे..उन्होंने तो मुझे सुझाव देते हुए यहां तक कह दिया कि तुम तो मेरा स्टैंड जानते हो..अपने मन से ही मेरा इंटरव्यू लिख लो….तुम पर भरोसा है कि मेरा पक्ष संतुलित ढंग से तुम लिखोगे..हालांकि इसके बावजूद उनका भी मैंने साक्षात्कार लिया था..
जब सुबह अखबार से पता चला कि गिरिजा व्यास नहीं रहीं..तो 23 साल पुराना यह वाकया मेरे जेहन में कौंध गया..मृदुभाषी गिरिजा जी से बहुत कम मुलाकातें हुईं..राजनीति अपने रूखे व्यवहार के लिए मशहूर है..लेकिन गिरिजा जी का यह व्यवहार बताता है कि रूखे रेगिस्तान में ऐसे भी कुछ जोहड़ रहे हैं….
विनम्र श्रद्धांजलि



शैलेश श्रीवास्तव
May 2, 2025 at 11:10 pm
उमेश जी ने भरपूर प्रयास किया कि गिरिजा व्यास के लिए लिखा जाए लेकिन उमेश जी स्वयं के ऊपर व्याख्यान से निकल ही नहीं पाए, दैनिक भास्कर में चोट खाएं लगते हैं