राघवेंद्र दुबे-

‘पत्रकारिता से रोमांस’ या जरूरी आवारगी अब कहां? तब भी, मेरे दौर में भी उससे पीछे भी, कुछ ही इसे ‘अफोर्ड’ कर पा रहे थे। ज्यादातर लोग जीवन की गति और दिशा को ‘कैलकुलेशन’ में यानि गणितीय हिसाब- किताब में उतार चुके थे। यही जीने का स्वीकृत सलीका होता गया। इसमें दक्ष लोग, कामयाबी की सीढ़ी भी चढ़ते गये। गणित के इस सूत्र से अगर कुछ तर्क संगत और व्यवहारिक सिद्ध हो सकता था तो वह थी मक्कारी और अवसरपरस्ती।
यह 1991-92 के बीच का संक्रमण काल ही था। वित्तीय पूंजी और कठमुल्ला हिंदुत्व के धमाकेदार प्राकट्य का जिसने खासकर पत्रकारीय मूल्य अंधेरे में खिसका दिये। इसी दौर में मेरी मुलाक़ात गिरीश मिश्र जी से हुई। तब मैं लखनऊ वाले दैनिक जागरण में था। एक अंतर हमेशा बना रहा, उनमें और मेरे बीच। मैं कुछ अराजक, वह मूल्यनिष्ठ, अनुशासित गांधीवादी। उन्हें बाहर के नशे की जरूरत भी कभी नहीं पड़ी, उनके अभियान और किरण जी की आंखें ही उनके दिल में ही खिंचते रहने वाला मय था। पति – पत्नी के बीच ऐसी समझदारी, सहकार और मोहब्बत भी मैंने कहीं और नहीं देखी।
खूब याद है लखनऊ में विधानसभा के पास वाले सहकारिता भवन के सभागार में यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी जी का भाषण जारी था। इस सेमीनार का आयोजन शायद राहुल देव ने किया था। समारोह की महक से जाहिर था इसमें संघ शक्ति शामिल थी। रामकृपाल सिंह डायस पर थे।
अयोध्या में बाबरी ध्वंस के दौरान शायद ‘हिंदी अख़बारों का हिंदू हो जाना’ जायज ठहराने की नीयत से जोशी जी ने कहा ही था- ‘मंदिर मुद्दे पर अगर हिंदी अख़बार पगलाये तो मंडल मुद्दे पर अंग्रेजी अख़बार भी कम नही पगलाये थे।’ गिरीश जी अपने बाएं हाथ की हथेली में दाहिने हाथ की तर्जनी धंसाए उठे और कहा- आपकी चोरी केवल इसलिए न्यायसंगत नहीं हो जाती कि कोई और भी चोर है। मैंने और डॉ बृजबिहारी ने प्रभाष जी के खिलाफ नारा लगाते इस सेमिनार का बहिष्कार किया और कराया।
गिरीश जी के नेतृत्व में ही कुछ खास नेताओं के लठैत पत्रकारों और प्रेस क्लब के शराबनोशी का अड्डा होते जाने के खिलाफ यूपी प्रेस क्लब का ऐतिहासिक घेराव हुआ। क्या हुआ अगर आग उगलते अपने-अपने भाषण के दौरान गिरीश जी के एक सहयोगी के पाकेट से हड़बड़ी में शराब का क्वार्टर गिर गया।
गिरीश जी पटना ‘हिंदुस्तान’, ‘नवभारत (मध्य प्रदेश), लोकमत (महाराष्ट्र) के संपादक रहे। मेरी जानकारी में वह एकमात्र पत्रकार रहे हैं जिन्होंने अपनी शर्तें जीं। समझौते नहीं किया।
खूबसूरत जिद पालते रहने वाले, औघड गांधीवादी इस विद्रोही शख्सियत को सलाम। तुम जियो हजारों साल …। एक बात और कि गिरीश जी कहीं निशस्र होते हैं, बिछ जाते हैं तो केवल किरण मिश्रा के आगे, जैसे शिव, काली के आगे। शेर, शेरनी के आगे।
सुविज्ञ दुबे ‘जनेवि’ की भी मधुलिमा शेखर ‘जेएनयूआइट’ के सामने घिघ्घी बंधी रहती है और मेरी स्व. मन्नू दुबे के आगे बंधी रहती थी। गिरीश मिश्रा जी को जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं।


