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साहित्य

बुकर के बहाने अनुवादकों की बात

पूजा सिंह-

गीतांजलि श्री को बुकर पुरस्कार मिलने पर हिंदी की दुनिया में जश्न का माहौल है और यह उचित ही है। गीतांजलि श्री को उनके उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘टूम ऑफ सैंड’ के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। गीतांजलि श्री को कम से कम हिंदी की दुनिया के लोग अच्छी तरह जानते हैं लेकिन क्या उनकी अनुवादक डेजी रॉकवेल के बारे में भी यह कहा का सकता है? मैंने कहीं पढ़ा कि रॉकवेल ने गीतांजलि श्री के उपन्यास के कुछ हिस्सों का अनुवाद करके उन्हें मेल किया जो उन्हें पसंद आये और इस तरह बात आगे बढ़ी।

यहां तक कि अनुवाद पूरा होने और प्रकाशित होने तक दोनों की कभी भौतिक मुलाकात तक नहीं हुई। इस पूरे प्रकरण से मैंने जो संदेश ग्रहण किया वह यही है कि भाषा कोई बाधा नहीं है। आपके कंटेंट में दम है तो वह अपने पाठक, बाजार और सम्मानित करने वाले सब खोज लेगा। अंतत: काम आयेगा आपका कौशल। लैटिन अमेरिकी साहित्य इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे अच्छा साहित्य अपना बाजार तलाश लेता है।

इस मौके पर हिंदी की बात कर लेना उचित रहेगा। अपने 16 साल के पत्रकारिता के अनुभव में मैंने पाया कि हिंदी को लेकर स्वयं हिंदी के लोगों में हीन ग्रंथि है। यदि आप थोड़ी परिष्कृत हिंदी का इस्तेमाल करते हैं तो आपसे कहा जाता है कि साधारण हिंदी में अपनी बात कहिये। इसके ठीक उलट अंग्रेजी अगर टूटी-फूटी भी है तो अच्छी बात है और अगर बहुत अच्छी है तो फिर तो कहना ही क्या? औपनिवेशिक मानसिकता ने उसे संप्रेषण के माध्यम की जगह ज्ञान और प्रबुद्धता का पर्याय बना दिया है। गोया कि कोई भाषा नहीं बोली जा रही बल्कि साक्षात ‘ज्ञान का झरना’ बह रहा हो और जनता नतमस्तक।

हिंदी मास की भाषा है और अंग्रेजी क्लास की। इसे आप अपने ही अंग्रेजीदां साथियों के बीच बेगाने से बैठे हुए कभी भी महसूस कर सकते हैं। हमें यह स्वीकार करने में अभी वक्त लगेगा कि केवल अंग्रेजी आना मानसिक परिपक्वता और ज्ञान का प्रमाणपत्र तथा हिंदी भाषियों को हिकारत से देखने की वजह नहीं हो सकता। यही कारण है कि सामने वाले में प्रतिभा हो न हो, अंग्रेजी प्रतिष्ठा और पैसे तो दिला ही देती है।

बहरहाल, गीतांजलि श्री को बुकर मिलने की बात होगी तो अनुवाद और अनुवादकों का जिक्र तो आयेगा ही। बुकर पुरस्कार की 50 लाख रुपये की धनराशि में आधी राशि अनुवादक डेजी रॉकवेल को जायेगी। यह अनुवादक का उचित सम्मान है। हिंदी के जो प्रकाशक गीतांजलि श्री को बधाइयों की फुलझड़ी छोड़ रहे हैं उनमें से एक-दो के अलावा सभी अपने अनुवादकों का शोषण ही करते हैं। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद की दर आज भी 40-50 पैसे प्रति शब्द है और इसके साथ भी आपको काम देने का अहसान अदृश्य रूप से लटकता ही रहता है।हालांकि इसमें बड़ा योगदान ऐसे अनुवादकों का भी है जो आर्थिक रूप से सुदृढ़ स्थिति में हैं या कहीं अच्छी नौकरी करते हुए स्वांत: सुखाय अनुवाद कर रहे हैं। इसका खमियाजा पेशेवर अनुवादकों को उठाना पड़ता है। बीते 10 वर्ष से अधिक समय से मैं लगातार अनुवाद का काम कर रही हूं। प्रकाशक कहते हैं कि मेरे अनुवाद में उन्हें ज्यादा ‘रीवर्क’ नहीं करना पड़ता। लेकिन उनकी यह तारीफ पारिश्रमिक में नहीं तब्दील होती।

गीतांजलि श्री और उनकी अनुवादक डेजी रॉकवेल को बधाई के साथ हिंदी के अनुवादकों की समस्याओं पर नये सिरे से बात करने का भी वक्त आ गया है।

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