आलोक शुक्ला-
गोरखपुर प्रेस क्लब पर रिसीवर बिठा दिया गया है। ये निर्णय संस्था की प्रतिष्ठा को धूल धूसरित करने वाला है। रिसीवर की नियुक्ति से जिले की अति प्रतिष्ठित संस्था ‘गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब’ की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लग रहा है। सवाल है कि संस्था की इस अवस्था के लिए कौन जिम्मेवार है?


‘गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेस क्लब’ यहां के पत्रकारों की सबसे ज्यादा सदस्यों वाली और आसपास के जिलों की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित संस्था है। इस संस्था से गोरखपुर से प्रकाशित/प्रसारित होने वाले सभी दैनिक/साप्ताहिक/पाक्षिक/मासिक अखब़ारों/पत्रिकाओं के सम्पादक और वरिष्ठ पत्रकारों समेत लगभग 700 सदस्य पत्रकारों की मान प्रतिष्ठा तो जुड़ी ही है, उससे भी ज्यादा सम्पूर्ण पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठा जुड़ी है। इस संस्था पर रिसीवर नियुक्त करने से इन सभी की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा है।
सदस्यों ने संस्था के निवर्तमान कार्यकारिणी को इसलिये चुना था कि वे अपने कार्यों/आचरणों से इसकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाएंगे, लेकिन यहां तो उल्टा ही हो रहा है। प्रतिष्ठा बढ़ाने को कौन कहे, संस्था को पतन के गर्त में पहुंचा दिया गया।
सिटी मजिस्ट्रेट ने संस्था पर रिसीवर बैठाने के अपने आदेश में निवर्तमान कालातीत कार्यकारिणी पर संस्था की मूल नियमावली के मुताबिक कार्य न करने की बात कही है। आदेश में कहा गया है, ‘संस्था की नियमावली के मुताबिक चुनी गई कार्यकारिणी का कार्यकाल एक वर्ष का होगा। ग्यारहवें महीने में कार्यकारिणी को आम सभा की बैठक कर चुनाव अधिकारी की घोषणा करनी होगी और आय व्यय का लेखा-जोखा देना होगा। 12वें महीने में चुनाव न कराने की स्थिति में 12 महीना पूरा होते ही कार्यकारिणी के कार्यकाल के साथ ही उसके सारे विधिक व वित्तीय अधिकार समाप्त हो जाएंगे। फिर संस्था के कोष का प्रयोग करने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’ जब संस्था के नियमावली में ऐसी व्यवस्था है तो क्या यह निवर्तमान कालातीत कार्यकारिणी को नहीं पता था?
यह बेहद सामान्य बात है कि किसी भी संस्था की कार्यकारिणी संस्था के नियमावली से वाकिफ होती ही है, फिर निवर्तमान कार्यकारिणी पिछले तीन साल से यह गैरसंवैधानिक कार्य क्यों करती रही? और जो सबसे बड़ी चिंता है, वह यह कि कतिपय वरिष्ठ लोग यह सब जानते हुए भी इस कार्यकारिणी को लगातार प्रश्रय देते रहे, उसके हर सही गलत का बचाव करते रहे और कुछ लोग तो प्रकारांतर से अभी भी कर रहे हैं। क्या ऐसा करने वाले लोग संस्था की इस दुर्गति के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?
प्रेस क्लब किसी की निजी जागीर नहीं है। इससे लगभग 700 सदस्य पत्रकारों और उससे भी ज्यादा गैर सदस्य पत्रकारों की मान प्रतिष्ठा जुड़ी है। निवर्तमान कार्यकारिणी में संस्था की जो दुर्गति हुई है और मान प्रतिष्ठा को चोट पहुंची है, उसके लिए निवर्तमान कार्यकारिणी और ‘हुआं हुआं गिरोह’ तो जिम्मेदार है ही, वे पूर्व व मौजूदा पत्रकार भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो इस कार्यकारिणी को प्रश्रय देते रहे हैं।
यह किसी से छुपा नहीं है कि पत्रकारिता से वर्षों पूर्व दूर हो चुके कतिपय पूर्व पत्रकारों व कुछ मौजूदा पत्रकारों ने अपने अहं की तुष्टि के लिए और प्रकारांतर से प्रेस क्लब पर अपनी मठाधीशी चलाने के लिए बीते कुछ सालों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जेबी लोगों को कार्यकारिणी में काबिज कराने का खेल शुरु किया और उसमें सफल भी हुए। मठाधीशी के इस खेल की देर सबेर यही परिणति होनी थी।
इन मठाधीशों ने अपने चारो ओर ‘हुआं हुआं गिरोह’ का एक सुरक्षा घेरा बनाया हुआ है, जो किसी भी सदस्य के कुछ कहते ही घेर कर हुआं हुआं का शोर मचाने लगता है। कुतर्कों से भरा प्रतिप्रश्न करने लगता है और भाषायी हिंसा पर उतर जाता है, जिससे कोई भी सामान्य सदस्य अपनी इज्जत बचाने के लिए चुप रहने में ही भलाई समझता है।
पिछले दिनों प्रेस क्लब के नाम से बने कुछ व्हाट्सएप ग्रुपों में यही हुआ। दो संस्थापक सदस्यों, सर्वश्री जयशंकर मिश्र ‘सव्यसाची’ व कौशल त्रिपाठी तथा मैंने स्वयं, प्रेस क्लब को मौजूदा संकट से उबारने के लिए सकारात्मक विमर्श शुरु करना चाहा तो हुआं हुआं गिरोह ने एकदम से घेर लिया और अमर्यादित भाषा में निजी टिप्पणियों की बारिश शुरु कर दी।
गिरोह के लगातार और अमर्यादित हमले से परेशान होकर वरिष्ठ पत्रकार कौशल त्रिपाठी ने तो एक बार ग्रुप ही छोड़ दिया (हालांकि, बाद में कुछ लोगों के अनुरोध पर ग्रुप में दोबारा शामिल हुए) और जयशंकर जी चुप लगा गए। आखिर करते भी क्या?
आजिज आकर हमने ग्रुप में ही ‘सियार कथा’ के जरिए ‘हुआं हुआं गिरोह’ को बेनकाब करने का निर्णय लिया। फलस्वरुप अपने चेहरे से नकाब हटते देख ‘गिरोह’ भागा। हालांकि, यह गिरोह अभी पूरी तरह से पलायित नहीं हुआ है, किसी रणनीति के तहत चुप्पी लगा गया लगता है! जो मौका ताड़ कर और इकट्ठे होकर कभी भी हमलावर हो सकता है। सियारों की फितरत ही कुछ ऐसी होती है।
रिसीवर तैनात करने का प्रशासन का आदेश कल यानी शुक्रवार की दोपहर आया लेकिन, श्री शेष नारायण पांडेय और श्री कौशल त्रिपाठी जी की प्रतिक्रिया के अलावा अभी तक चुप्पी पसरी हुई है, जो चिंतनीय है। इस संबंध में कल से ही मेरी कई वरिष्ठ पत्रकारों से बात हुई है, सभी की एक ही चिंता है कि इस बेहद प्रतिष्ठित प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा बची रहेगी या अभी और पतन होना बाकी है? लोग इस प्रकरण से और भविष्य में दिख रहे इसके नकारात्मक परिणाम से बहुत ही व्यथित हैं। सभी चाहते हैं कि कुछ भी करके प्रेस क्लब को इस संकट से उबारा जाए और इसकी प्रतिष्ठा फिर से बहाल की जाए।
क्या हो अब?
फ़िलहाल तो संस्था के कथित कर्णधारों और उनके पालित पोषित ‘श्रृगाल समूह’ द्वारा घोषित ‘दमदार, असरदार, लम्बरदार, ईमानदार’ जैसे न जाने कौन से और कितने खिताबों से विभूषित लोगों ने इसकी प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिला ही दी है। कुछ भी शेष नहीं रखा है इन लोगों ने। ऐसे में अब और चुप बैठे रहना संस्था के हित में बिल्कुल भी ठीक नहीं है। ऐसा करना संस्था की अभी और मिट्टी पलीद कराने वाला होगा।
इसलिए, संस्थापक सदस्यों को चाहिए कि वह अपने रोपे हुए पौधे को बचाने के लिए सक्रिय हों, गंभीर पत्रकारों की बैठक बुलाएं या जरुरी समझें तो आम सभा बुलाएं और संस्था को बचाने, पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए सभी आवश्यक निर्णय, चाहे वह जितना भी कठोर हो, लें। ऐसे सभी लोगों को चिन्हित किया जाना और संस्था के सदस्यों के सम्मुख उनके नाम सार्वजनिक किया जाना भी जरूरी है, जो इस निवर्तमान कार्यकारिणी के प्रश्रयदाता हैं। यह इसलिये भी जरूरी है ताकि आगे से कोई सामान्य सदस्य उनके झूठ के प्रभाव में न आए और वे अपनी मठाधीशी न कर सकें। प्रेस क्लब से मठाधीशी खत्म करने से ही उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा फिर से लौटाई जा सकती है।



Deepak
August 20, 2023 at 8:54 pm
एक टाइपिस्ट जो लिख दिया वो चल गया, ये आदमी गलत और फर्जी सूचना लेकर आया है।