Pushya Mitra : राजस्थान की रानी के आगे रीढ़ सीधी करके खड़े होने के लिये पत्रिका समूह का शुक्रिया। आजकल यह संपादकीय परंपरा विलुप्त होती जा रही है। मगर एक बात मैं कभी भूल नहीं सकता कोठारी जी, आप अपने ही कर्मियों के तन कर खड़े होने को पसंद नहीं करते। मजीठिया वेतनमान मांगने वाले हमारे पत्रकार साथियों को पिछले दो साल से आप जिस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं, किसी को नौकरी से निकाल रहे हैं, किसी का दूरदराज तबादला कर रहे हैं। यह जाहिर करता है कि आपमें भी उसी तानाशाही के लक्षण हैं, जो राजस्थान की महारानी में हैं।
आज आप भले ही मोदी विरोधियों की महफ़िल में शेर का खिताब हासिल कर लें, मगर हम पत्रकार यह जानते हैं कि मामला सच्चाई, न्याय या सिद्धांतों का नहीं है। क्योंकि इन बातों में आपकी आस्था सिर्फ किताबी है। यह मामला सरकारी विज्ञापन से वंचित किये जाने का है। हां, यह बात जरूर है कि दूसरों की तरह आप सरकार के आगे गिड़गिड़ाते नजर नहीं आ रहे। आंखों में आंखें डाल कर हिसाब मांग रहे हैं। इसका पूरे अदब के साथ इस्तकबाल करता हूँ। पढें संपादकीय..

पत्रकार पुष्य मित्र की एफबी वॉल से.
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rakesh
November 2, 2017 at 10:26 am
*गुलाब कोठारी जी, पहले खुद की गिरेबान में झांक लें……*
जयपुर। राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी आजकल राजस्थान सरकार को कोसते हुए खूब संपादकीय लिख रहे हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को टारगेट करते हुए उनके लेख में भ्रष्ट लोकसेवकों के बचाने के संबंध में लाए गए विधेयक, मास्टर प्लान में छेड़छाड़, भ्रष्टाचार को लेकर खूब टीका-टिप्पणी होती है। इन लेखों में वे सुप्रीम कोर्ट, राजस्थान हाईकोर्ट के फैसलों का खूब हवाला देते हैं। आज के लेख में भी गुलाब कोठारी ने भ्रष्ट लोकसेवकों के बचाने वाले काले कानून में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है। साथ ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लपेटते हुए यह फैसला किया है कि जब तक काले कानून को सरकार वापस नहीं लेती है, तब तक पत्रिका सीएम राजे व उनसे संबंधित समाचार को प्रकाशित नहीं करेंगी।
गुलाब कोठारी के दोगलेपन के साथ हम नहीं है। आज उनके मन-मुताबिक काम नहीं हो रहे हैं तो वे सरकार और सीएम राजे के खिलाफ है। कल उनकी पटरी बैठ जाएगी तो गुणगान करने से नहीं चूकेंगे। वे बार-बार सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड में राजस्थान पत्रिका व अन्य मीडिया संस्थानों को अपने पत्रकारों व गैर पत्रकारों के वेजबोर्ड, एरियर देने के आदेश दे रखे हैं। कोर्ट में मुंह की खाने के बाद भी वे कोर्ट के आदेश की पालना नहीं कर रहे हैं। बेजवोर्ड के लिए संघर्षरत तीन सौ से अधिक पत्रिका कर्मियों को गुलाब कोठारी और उनके संस नीहार कोठारी व सिद्धार्थ कोठारी ने नौकरी से बर्खास्त करके, दूसरे राज्यों में तबादले और निलंबित करके प्रताड़ित किया। प्रताड़ना का यह दौर आज चल रहा है। खैर यह प्रताड़ना ज्यादा नहीं चलेगी। जल्द ही गुलाब कोठारी एण्ड संस को मुंह की खानी पड़ेगी इस मामले। मास्टर प्लान और भ्रष्टाचार पर खूब जोशीले संपादकीय लिखते हैं, लेकिन खुद के कारनामे उन्हें नहीं दिखते। हां राजस्थान के बिल्डर, नेता, अफसर और जागरुक लोग इनके जमीनी और विज्ञापन प्रेम के बारे में खूब जानते हैं और भुगतभोगी भी। इनके भी जमीनी कारनामों कम नहीं है। चाहे दिल्ली रोड का हो या सेज का, किसी से छुपा नहीं। पत्रिका में रहते हुए मेरी कितनी ही खबरें इनकी सौदेबाजी की भेंट चढ़ी। दूसरे पत्रकार साथियों की खबरों के साथ भी ऐसा होता रहा है। हां, जलमहल झील मामले में इनकी चलने नहीं दी। वो कल भी मेरे व मेरी टीम के हाथ में था और आज भी…यह जरुर है इसकी कीमत नौकरी देकर चुकानी पड़ी।
गुलाब कोठारी जी, दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाते समय, पहले खुद के गिरेबां में झांक लेना चाहिए। पहले अपने कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन-भत्ते दे, जिसे बारे में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है। श्रम कानूनों की पालना पहले खुद करें। कर्मचारियों के लिए आठ घंटे तय हैं, लेकिन बारह से पन्द्रह घंटे तक काम लिया जा रहा है। कुछ महीनों से तो पत्रिकाकर्मियों को प्रिंट के साथ टीवी चैनल, वेबसाइट में भी झोंक रखा है। पत्रिका ने एक कारनामा किया है। 50 से 70 रुपए रोज के हिसाब से पत्रकार तैयार कर रही है। बेकारी के इस युग में युवा इस कीमत में पत्रकारिता करने को मजबूर हो रहे हैं। ऐसी बहुत सी बातें है, जो पत्रिका और पत्रिका के मालिकों के थोथे आदर्शों को उजागर कर करती है। वो समय-समय पर की जाएगी और सामने भी लाई जाएगी।
सीएम वसुंधरा राजे, गाहे-बगाहे गुलाब कोठारी और उनके संपादकीय मण्डल के भुवनेश जैन, राजीव तिवाडी, गोविन्द चतुर्वेदी आपको और आपकी सरकार के बारे में अपने लेखों में सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट का हवाला देकर कानून का पाठ पढ़ाते रहते हैं। पत्रिका प्रबंधन कितना कानून की पालना करते हैं, किसी से छुपा नहीं है। हम पत्रकारों ने आपके श्रम विभाग और मुख्य सचिव को मजीठिया बेजबोर्ड मामले में सैकड़ों परिवाद दे रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश रखे हैं। सरकार की एक इच्छा शक्ति इन्हें घुटने टिका सकती है। इनके जमीनी कारनामें कम नहीं है। आप भी इनके कारनामों की जांच करवाकर उनकी पोल जनता के सामने ला सकते हैं। ताकि जनता के बीच इनकी हकीकत व सच्चाई सामने आ सके।
आपका अपना
राकेश कुमार शर्मा
एक्स चीफ रिपोर्टर, राजस्थान पत्रिका जयपुर
patrika karmi
November 2, 2017 at 10:36 am
पत्रिका के इस पूर्व जोनल एडिटर से नहीं छूट रहा अफसरगिरी का भूत
अपने बेतुके और तुगलकी निर्णयों के लिए हमेशा चर्चाओं में रहने वाले राजस्थान पत्रिका के एक पूर्व जोनल एडिटर के सिर से अफसरगिरी का भूत नहीं उतर रहा है। मप्र में पदस्थ इस अधिकारी को जोनल एडिटर पद से हटाए ही तीन माह से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन यह अभी तक उस पद के अधिकार क्षेत्र में आने वाले संस्करणों के वाट्सएप और टेलीग्राम गु्रप में बने हुए हैं। और अधिकार न होते हुए भी कर्मचारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं। कोई इनके निर्देशों को गंभीरता से नहीं ले तो उसको फोन लगाकर डांट भी पिला रहे हैं। दूसरे के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण करने की इनकी आदत के कारण हर कोई परेशान हो चुका है। कर्मचारियों का कहना है कि जब ये संस्करण के इंजार्च ही नहीं है तो क्यों दूसरे के काम में दखल दे रहे हैं। नैतिकता के नाते टेलीग्राम और वाट्सएप ग्रुप से लेफ्ट क्यों नहीं होते। इनकी समस्या यह है कि ये हर कर्मचारी को कामचोर और मक्कार समझते हैंं। जब ये पावर में थे, तब इनके कारण कई अच्छे कर्मचाारी संस्थान को छोड़कर जा चुके थे। पीक अवर्स में ये किसी को भी फोन लगाकर घंटों तक बेवजह का ज्ञान दिया करते थे। अपने दौरों के दौरान पूरे स्टाफ के सामने संपादक तक को डांटने से नहीं चूकते थे। अब लकीर के फकीर इस अधिकारी को इतनी समझ भी नहीं है कि जब आप पावर में ही नहीं हो तो क्यों टेलीग्राम गु्रप में रहकर दूसरे के काम में अतिक्रमण करते हुए अपनी इमेज खराब कर रहे हो। कोई इन्हें ग्रुप से रिमूव कर इनकी इज्जत और खराब करे। इन्हें स्वयं ही लेफ्ट होकर ‘साईंÓ के भजन गाने चाहिए।
sahara karmi
November 2, 2017 at 10:39 am
सहारा इंडिया.. सभी कर्तव्ययोगी साथियों से अपील… क्या आप सभी ने कभी जानने की कोशिश है कि जो मैनेजर / अधिकारी आपको कन्वर्जन करने के लिए बोल रहे है उनका पैसा सहारा में कितना जमा है? बिल्कुल नही क्योंकि उनको सहारा पर भरोसा नही है थोड़ा बहुत पैसा जो जमा किये थे वो सब निकाल लिए।जबकि फील्ड के साथियों का ज्यादातर पैसा संस्था में ही जमा है कृपया ध्यान दे।
आप सभी ने कभी समझने की कोशिश की है कि जिस स्किम में कन्वर्जन करा रहे है वह कंपनी किसके नाम से है और वह कितना सुरक्षित है? बिल्कुल सुरक्षित नही है?
आपने कभी ये समझने की कोशिश की है कि को ऑपरेटिव सोसायटी का काम क्या होता है और उसमें पैसा लेने का तरीका क्या होता है ? शायद नही क्योंकि जानते तो ऐसी गलती नही करते ,बहुत छोटी बात किसी भी सोसाइटी को कोई देनदारी नही थोपा जा सकता फिर क्यू शॉप को नई सोसाइटी में क्यो थोप रहे हो। क्यों नही वर्तमान में सहारा क्रेडिट को ऑपरेटिव सोसाइटी में कन्वर्जन करा रहे है?
क्यू शॉप का कन्वर्जन कराकर आप बहुत बड़ी मुशीबत मोल रहे है जो आपके लिए बहुत बड़ा परेशानी का कारण बनने वाला है।
आप सभी को बहुत अछे से पता है कि जो लोग आपको कन्वर्जन के लिए समझा रहे है वे लोग मेच्योरिटी के समय नही होंगे और पैसा नही मिलने पर सम्मानित जमाकर्ता आपको नही छोड़ेगा क्योंकि आप कहने पर सम्मानित जमाकर्ता कन्वर्जन कर रहा है इसलिए ध्यान दीजिए जैसा विश्वामित्र कंपनी में आज हो रहा है कि सभी एजेंटों को पुलिस जेल में डाल रही है कहि आने वाले समय मे आपके साथ ना हो, क्योंकि आपका कही ट्रांसफर नही होना और कंपनी छोड़ने के बाद भी आप बच नही सकते पैसा नही मिलने पर सम्मानित जमाकर्ता आपको नही छोड़ेगा। यही वजह है कि संस्था भारी कमीशन का लालच और भारी ब्याज का लालच देकर कमीशन का भी एफ डी बनवाकर भुगतान से बचना चाहती है हर हाल में फील्ड के साथियों को फंसा कर खुद को बचाने में लगे है फील्ड के साथियों को लालच देकर आपस मे लड़ाकर कभी संगठित नही होने देना चाहते क्योंकि फील्ड के साथी इनके ताकत है और फील्ड के साथी इनके बहकावे में आ रहे है और जो साथी इनकी बात नही मान रहे उनको संस्था से बाहर कर दे रहे है। इसलिए आप सभी से निवेदन है कि वर्तमान परिस्थिति को समझते हुए कन्वर्जन से बचे ।।
धन्यवाद।
pc rath
November 2, 2017 at 10:40 am
कर्मचारियों के संघर्षों को लगातार मिल रही है जीत
देश में नंबर वन कहे जाने वाले जागरण समूह ने जब से मध्यभारत के प्रतिष्ठित समाचारपत्र समूह नईदुनिया का अधिग्रहण किया था अपनी कर्मचारी विरोधी नीतियों के कारण न केवल कर्मचारियों की बड़े पैमाने में किसी न किसी बहाने से छटनी तबादले और तनावपूर्ण माहौल व वातावरण काम के दौरान बना दिया था । इन सबमें नए सी ई ओ शुक्ला की भाई भतीजावाद की कार्यशैली ने और भी घी डाला जिससे नईदुनिया जो इस क्षेत्र में दूसरे तीसरे स्थान पर सफलता पूर्वक व्यवसाय और पाठक संख्या बनाये हुए था 5वे 6वे स्थान पर छत्तीसगढ़ के नईदुनिया कर्मचारियों ने ऐसी स्थिति को देख संगठित होने का फैसला किया और समाचारपत्र कर्मचारी संघ रायपुर के साथियों के साथ जुड़ कर माननीय सुप्रीमकोर्ट के 9 फरवरी 2014 के फैसले के बाद मजीठिया वेतन के लिए लगातार प्रयास शुरू कर दिया
इस संगठित प्रयास को बाधित करने प्रबंधन ने तमाम हतकंडे अपनाए किन्तु कर्मचारी हार नही माने और लड़ाई जारी रही।
24 अक्टूबर 2017 के फैसले में राज्य के श्रमायुक्त ने कर्मचारियों के क्लेम दावे को सुप्रीमकोर्ट के फैसले और श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 के अंतर्गत पूरी तरह से सही पाया है और श्रम न्यायालय रायपुर में क्लेम की राशि के निर्धारण हेतू भेजने की अनुशंसा छत्तीसगढ़ शासन से की है।
सारे देश के मीडिया कर्मियों के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण है जिसमें एकसाथ 54 कर्मचारियों के दावे को सारी विधिसंगत प्रक्रिया के तहत उचित ठहराया गया है एवं बिना किसी दबाव में आये मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने तथा क्लेम राशि का भुगतान करने कहा गया है। अब यह प्रबंधन के ऊपर है कि कथित चौथे स्तंभ होने के तमाम लाभ लेते आये जागरण प्रबंधन अपने लिए खून पसीना एक करने वाले कर्मचारियो पत्रकारों को यह लाभ फैसले के आधार पर स्वयं देता है या कुर्की वारंट आने तक मामले को टालता रहता है।
पी सी रथ
समाचार पत्र कर्मचारी संघ रायपुर
Prakash
November 3, 2017 at 10:59 am
इस भड़वे गुलाब कोठारी के विज्ञापन बंद है। इस लिए इस चोर को यह करना पड़ा। इसको और सुधीर अग्रवाल भास्कर वाले मजीठिया देने पर मर जाते हैं।