काला कानून वापस लेने तक ‘पत्रिका’ अखबार में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जुड़ी खबरें नहीं छपेंगी

Pushya Mitra : राजस्थान की रानी के आगे रीढ़ सीधी करके खड़े होने के लिये पत्रिका समूह का शुक्रिया। आजकल यह संपादकीय परंपरा विलुप्त होती जा रही है। मगर एक बात मैं कभी भूल नहीं सकता कोठारी जी, आप अपने ही कर्मियों के तन कर खड़े होने को पसंद नहीं करते। मजीठिया वेतनमान मांगने वाले हमारे पत्रकार साथियों को पिछले दो साल से आप जिस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं, किसी को नौकरी से निकाल रहे हैं, किसी का दूरदराज तबादला कर रहे हैं। यह जाहिर करता है कि आपमें भी उसी तानाशाही के लक्षण हैं, जो राजस्थान की महारानी में हैं।

आज आप भले ही मोदी विरोधियों की महफ़िल में शेर का खिताब हासिल कर लें, मगर हम पत्रकार यह जानते हैं कि मामला सच्चाई, न्याय या सिद्धांतों का नहीं है। क्योंकि इन बातों में आपकी आस्था सिर्फ किताबी है। यह मामला सरकारी विज्ञापन से वंचित किये जाने का है। हां, यह बात जरूर है कि दूसरों की तरह आप सरकार के आगे गिड़गिड़ाते नजर नहीं आ रहे। आंखों में आंखें डाल कर हिसाब मांग रहे हैं। इसका पूरे अदब के साथ इस्तकबाल करता हूँ। पढें संपादकीय..

पत्रकार पुष्य मित्र की एफबी वॉल से.

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राजस्थान सरकार के विवादित बिल के खिलाफ इस अखबार ने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ा

दैनिक कंचन केसरी नामक अखबार ने राजस्थान सरकार के विवादित बिल के खिलाफ संपादकीय कॉलम में क्वेश्चन मार्क का चिन्ह लगाकर खाली छोड़ दिया. इस अखबार के संपादकीय प्रभारी उमेंद्र दाधीच हैं. उमेंद्र का कहना है कि उन्होंने मीडिया पर अंकुश लगाने वाले राजस्थान सरकार के विवादित अध्यादेश के खिलाफ मंगलवार को अपना संपादकीय कालम खाली छोड़ दिया. इस काल में केवल एक बड़ा सा प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया गया है.

उमेंद्र के मुताबिक उन्होंने अपनी कलम न चलाकर अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट करने की कोशिश की है. उधर, जाने-माने पत्रकार करन थापर ने भी राजस्थान सरकार के मीडिया को प्रतिबंधित करने वाले विधेयक का जमकर विरोध किया है.

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आईएएस ओपी यादव पर राजस्थान सरकार इतनी मेहरबान क्यो?

भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को निरंकुश बनाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाले बिल को विधानसभा में रखने के प्रकरण के दौरान ही आईएएस ओपी यादव के परिवार से जुड़ा सौ करोड़ का मामला सामने आया है.. ओपी यादव राज्य सरकार का सबसे चहेता अफसर है. राजस्थान में भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को निरंकुश बनाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला बिल मंजूर करवाने में जो तत्परता सीएम राजे और भाजपा के अन्य मंत्री दिखा रहे हैं, उन्हें प्रदेश के आबकारी आयुक्त ओपी यादव के ताजा प्रकरण से सबक लेना चाहिए.

आयकर विभाग ने 22 अक्टूबर को ही जयपुर में सिरसी रोड पर 21 बीघा जमीन को बेनामी मानते हुए अटैच किया है. 100 करोड़ रुपए वाली इस जमीन की खरीद-फरोख्त में यादव की पत्नी लक्ष्मी यादव और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम सामने आए हैं. सब जानते हैं कि ओपी यादव पर राज्य सरकार कितनी मेहरबान है. लम्बे समय से यादव आबकारी आयुक्त बने हुए हैं. इससे पहले वे ट्रांसपोर्ट कमिश्नर भी रहे हैं. सवाल उठता है कि यादव को कमाई वाले महकमों में ही क्यों नियुक्त किया जाता है. अफसरों और नेताओं के ऐसे गठजोड़ पर कोई आपत्ति नहीं कर सके, इसलिए विधानसभा में ऐसा बिल रखा गया.

इस बिल के पास होने के बाद कोर्ट के आदेश से भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं हो सकेगा. राज्य सरकार मंजूरी देगी तभी प्रकरण दर्ज हो सकेगा. अब सरकार मंजूरी कैसे देती है, यह किसी से छिपा नहीं है. सरकार की मंजूरी से पहले यदि सोशल मीडिया से लेकर अखबार और चैनलों पर खबर आ गई तो संबंधित पत्रकार और उसके संस्थान के मालिक को तीन वर्ष तक की सजा दी जा सकेगी. यानि इस बिल से प्रेस की स्वतंत्रता भी प्रभावित होगी. अब जब ओपी यादव के परिवार से जुड़ा सौ करोड़ का मामला सामने आया है तब यह सवाल उठता है कि क्या राज्य सरकार यादव को प्रदेश के आबकारी आयुक्त के पद से हटाएगी? यह बात अलग है कि सरकार नेताओं और अफसरों को बचाने के लिए ही विधानसभा में बिल ले आई.

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मीडिया पर पाबंदी को तत्पर वसुंधरा सरकार के होश ठिकाने आए, विवादित बिल ठंडे बस्ते पहुंचा

आखिरकार भारी विरोध के बाद वसुंधरा सरकार बैकफुट पर आ गई… विवादित विधेयक सेलेक्ट कमेटी को भेज दिया गया…  पिछले पांच दिनों से राजस्थान सरकार की किरकिरी हो रही थी… वसुंधरा सरकार ने लोकसेवकों के करप्शन पर मीडिया में लिखने पर पाबंदी लगाने और लोकसेवकों पर बिना इजाजत मुकदमा नहीं दर्ज करने वाले विवादित बिल को अब प्रवर समिति में भेजने के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया है. इस विवादित अध्यादेश को बिल के रुप में सोमवार को वसुंधरा सरकार के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने विधानसभा में रखा था. उसके बाद देश भर में हंगामा मचा हुआ था.

सोमवार को इस विवादित अध्यादेश की लड़ाई राजस्थान हाईकोर्ट भी पहुंच गई. इस अध्यादेश को एक वकील ने चुनौती दी है. जानकारी के मुताबिक वकील ए. के. जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट में वसुंधरा राजे सरकार के अध्यादेश को चुनौती दी है. उधर आज जयपुर के पत्रकारों ने भी इस बिल का विरोध किया और काली पट्टी बांध कर प्रेस क्लब से विधानसभा तक मार्च किया और गिरफ्तारियां दीं. सेशन कोर्ट में वकीलों ने भी इस बिल के खिलाफ प्रदर्शन किया.

द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने राजस्थान सरकार से उस हानिकारक अध्यादेश को वापस लेने की मांग की जो लोकसेवकों, न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों के खिलाफ आरोपों पर उसकी मंजूरी के बिना रिपोर्टिंग करने से मीडिया को रोकता है. गिल्ड ने एक बयान में कहा कि यह अध्यादेश मीडिया को परेशान करने वाला एक खतरनाक यंत्र है. बयान में कहा गया है, “ऐसा दिख रहा है कि राज्य सरकार का पिछले महीने जारी अध्यादेश बजाहिर फर्जी प्राथमिकी से न्यायपालिका और नौकरशाही की रक्षा करने के लिए लाया गया है.”

सोमवार देर शाम वसुंधरा राजे ने अपने मंत्रियों की बैठक बुलाकर इस विधेयक में परिवर्तन की बात कही थी. मंगलवार को जैसे ही विधानसभा कार्यवाही शुरू हुई, विपक्ष ने इस बिल के विरोध में बेल में आकर विरोध करना शुरू कर दिया. हंगामे के बीच गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने घोषणा की और सदन के सदस्यों की मांग पर इस बिल को प्रवर समीति को भेजने का एलान किया. कटारिया ने घोषणा की कि दो महीने के अंदर 15 सदस्यों की प्रवर समिति बनेगी जिसके अध्यक्ष गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया रहेंगे और इसमें सभी दलों के सदस्य रहेंगे. प्रवर समिति के सुझाव के बाद अगले सत्र में संसोधित बिल पेश किया जाएगा. लेकिन कटारिया ने साफ किया कि अगले 42 दिनों तक ये विवादित अध्यादेश जारी रहेगा जब तक प्रवर समीति में ये विधेयक नहीं जाता है.

इससे पहले संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि सरकार के बारे में ऐसा भ्रम फैला था कि वो मीडिया और ज्यूडिश्यरी को काबू में करना चाहती है जबकि ऐसा नहीं था. इसीलिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसमें बदलाव के लिए कहा है. कांग्रेस ने इस बिल को ही वापस लेने के लिए सदन के बेल में हंगामा किया जिसके बाद सदन को एक बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा. बिल को पारित नहीं होने को कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने कांग्रेस पार्टी और जनता की जीत बताया और कहा कि जब तक ये बिल वापस नहीं होता कांग्रेस इसका विरोध करती रहेगी.

राजस्थान विधानसभा में आज गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने विपक्ष के भारी हंगामे के बाद दंड विधियां राजस्थान संशोधन विधेयक को विधानसभा की प्रवर समिति के पास भेजने का प्रस्ताव रखा जिसे ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई. बैठक शुरू होते ही विपक्ष ने किसानों की पूर्ण कर्ज माफी का मुद्दा उठाया और हंगामा शुरू कर दिया। इसी बीच गृहमंत्री कटारिया ने दंड विधियां राजस्थान संशोधन विधेयक को प्रवर समिति (सिलेक्ट कमेटी) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा जिसे सदन ने ध्वनिमत से मंजूरी दे दी.

कटारिया ने कहा कि प्रवर समिति अपनी रिपोर्ट विधानसभा के अगले सत्र में पेश करेगी. इससे पहले, संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने विधेयक पर कल रात मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई एक बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि गृहमंत्री इस संबंध में सदन में वक्तव्य देना चाहते हैं. कटारिया ने कहा कि सरकार ने दंड विधियां संशोधन अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही जारी किया है. गृहमंत्री की अपनी पार्टी के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाडी से नोंकझोंक भी हुई.

क्या हैं बिल के प्रावधान

इस बिल के पास हो जाने के बाद मौजूदा और पूर्व जजों, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराना आसान नहीं होगा. एफआईआर करने से पहले सरकार की मंजूरी लेनी होगी. पुलिस अपनी तरफ से लोकसेवकों के खिलाफ न एफआईआर कर पाएगी और न ही इनके खिलाफ मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जा सकेंगे.  7 सितम्बर को जारी अध्यादेश के अनुसार, सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत अदालत किसी की शिकायत पर सीधे जांच का आदेश नहीं दे पाएगी. राज्य सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही अदालत जांच के आदेश दे सकेगी. इसके तहत आरोपी लोकसेवकों की तस्वीर, नाम-पता सार्वजनिक करना भी अपराध होगा और इसमें 2 साल तक की कैद का प्रावधान है. सरकार की मंजूरी मिलने तक इनसे जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करना भी गैरकानूनी होगा और इसके लिए भी सजा का प्रावधान है.

उधर, डीयूजे ने भी बिल को ठंडे बस्ते में डालने का स्वागत किया है. ये है डीयूजे की प्रेस रिलीज… RAJASTHAN GAG BILL DEFERRED : DUJ, NAJ, LAWYERS UNION HAIL VICTORY OF DEMOCRATIC FORCES… The Delhi Union of Journalists(DUJ) , the National Alliance of Journalists and All India Lawyer’s Union have congratulated the democratic opinion that demanded that the Criminal Laws(Rajasthan Amendment) Ordinance 2017 placed by Smt. Raje Government in Rajasthan assembly for converting it in to a statute should be withdrawn lock-stock and barrel .

A small beginning has been made by its deferment they said. Continued vigilance is the need of the hour as other cases of brow beating the media remain, they added. The bill in our opinion was tantamount to gagging the media and saving corrupt elected representatives who are held to be the public servants. A key purpose of the law seemed to be to save corrupt politicians and corrupt bureaucrats connected with the ruling party in the state. The legislation following curbs on ‘The Wire’ for their reportage of shady business dealings made  it all the more sinister and a dangerous portent, the statement added.

The joint statement points out that it is a psychological victory of the democratic forces against forces that sought to stifle democracy and dissent and muzzle the media.  An extended executive meeting of the Delhi Union of Journalists already slated to decide future course of action will however be held as per schedule.

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भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी! (देखें वीडियो)

राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक काला कानून बनाने की तैयारी कर ली है. इसक कानून के बन जाने के बाद भ्रष्टों के खिलाफ कोई खबर मीडिया वाले न लिख सकते हैं और न दिखा सकते हैं. महारानी वसुंधरा राजे फिलहाल लोकतंत्र को मध्ययुगीन राजशाही में तब्दील करने पर आमादा हैं. जितना विरोध कर सकते हैं कर लीजिए वरना कल को विरोध करने लायक हम सब बचेंगे ही नहीं क्योंकि देश बहुत तेजी से आपातकाल और तानाशाही की तरफ बढ़ रहा है. ज्यादातर बड़े मीडिया हाउसेज बिक चुके हैं. जो बचे हैं उनको धमका कर और पाबंदी लगाकर चुप कराया जा रहा है. राजस्थान सरकार का काला कानून पाबंदी लगाकर मीडिया को चुप कराने की साजिश का एक हिस्सा है.

भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत एक वीडियो संदेश के जरिए समाज के सभी वर्गों से अपील कर रहे हैं कि इस काले कानून का जमकर विरोध किया जाना चाहिए ताकि राजस्थान सरकार इस अध्यादेश को वापस लेने पर मजबूर हो सके. अगर राजस्थान में यह कानून पास हो गया तो जल्द ही इसे केंद्र सरकार भी बनाने की तैयारी कर सकती है. राजस्थान की भाजपा सरकार के जरिए एक राज्य में इस कानून को बनवा कर एक तरह से टेस्ट किया जा रहा है कि इसका कितना और किस लेवल तक विरोध होता है. देखें वीडियो:

यशवंत ने इस बारे में फेसबुक पर जो कुछ लिखा है, वह यूं है :

Yashwant Singh : भाजपा वाले बहुते पतित हैं, कांग्रेसियों से भी ज्यादा. राजस्थान की भाजपा सरकार मुर्दाबाद. वसुंधरा राजे होश में आओ. मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला कानून तुरंत वापस कराओ. आज से भाजपा का असली अर्थ जान जाइए. भाजपा यानि भ्रष्टाचारियों को बचाने और मीडिया पर अंकुश लगाने वाली पार्टी. आगे की कहानी मेरी जुबानी सुनिए। नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=Wl0cAPpLPNw

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राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार में कई साल से ठनी है, पढ़ें गुलाब कोठारी को जोरदार संपादकीय

Dilip Khan : राजस्थान पत्रिका और राजस्थान सरकार के बीच बीते कई साल से ठनी हुई है। पहले सबकुछ ठीक चल रहा था, फिर किसी बात से चिढ़कर सरकार ने विज्ञापन देना बंद कर दिया। गुलाब कोठारी ने उस वक़्त भी तीखा संपादकीय लिखा था। फिर सरकारी अनुदान से चल रहे गोशालों में दर्जनों गायों के मरने वाली ख़बर ने सरकार को और परेशान कर दिया। राजस्थान पत्रिका ने इस पर कई दिनों तक सीरीज चला दी।

गुलाब कोठारी दक्षिण दिशा के हैं, लेकिन विज्ञापन ही जब इस दिशा से नहीं आएगा तो परेड दाएं मुड़ क्यों करेगा कोई? भास्कर वाले उनसे ज़्यादा दक्षिणावृत्त हैं। और सब जानते हैं कि राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में गलाकाट प्रतियोगिता है। गुलाब कोठारी का आज का संपादकीय ज़रूरी हस्तक्षेप है, लेकिन मुनाफ़े और धंधे की गलियों में किस इरादे से कोई आवाज़ दे रहा है, ये जानना ज़रूरी है। संपादकीय नीचे है :

राज्यसभा टीवी में कार्यरत पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

भाजपा की राजस्थान सरकार का काला कारनामा… मीडिया पर पाबंदी वाला बिल विधानसभा में पेश.. सुनिए यशवंत को…

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पत्रकारों पर लगाम लगाने का एक और असफल प्रयास, मति मारी गई राजस्थान सरकार की!

राज की मंशा में खोट… दोस्तों, नमस्कार, लगता है अब राजस्थान सरकार की भी मति मारी गई है। उसके मंत्रियों का भी दिमाग खराब हो गया है।तभी तो पत्रकारों की लेखनी पर लगाम लगाने और भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने का असफल प्रयास किया जा रहा है। इससे लगता है कि राज की मंशा में खोट है। लेकिन यह सब सरकार का वहम है कि कथित कानून बना कर पत्रकारों को डरा दिया जाए।

शायद कानून का प्रारूप तैयार करने वाले अफसरों और उसे पारित करने जा रहे विधायकों को यह कतई आभास नही है कि अभी भी बेधड़क प्रहार करने वाले पत्रकारों की कमी नहीं है। वे अपनी बात को सोशल मीडिया के जरिये भी आम अवाम तक पहुंचाने में कोई चूक नही करेंगे, चाहे नतीजा कुछ भी हो। पत्रकार भ्र्ष्टाचार के खिलाफ पहले भी लिखते थे, आज भी लिख रहे है और आगे भी लिखते रहेंगे। दो साल की सजा के डर से कोई डरने वाला नहीं है। मैं यह इसलिये लिख रहा हूँ कि मुझे जानकारी मिली है कि राजस्थान सरकार ने 7 सितम्बर 2017 को अध्यादेश जारी कर 156(3)CrPC में संशोधन किया है।

इसके तहत किसी भी जज, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के विरुद्ध उसके पदीय कार्य के दौरान हुए अपराध के लिए बिना सरकार की स्वीकृति के कोई भी मजिस्ट्रेट मुकदमा दर्ज करने का आदेश नही दे पाएगा। 6 माह बाद में स्वीकृति नही मिलने पर भी अभियोग दर्ज हो सकेगा। इस दौरान मीडिया में सम्बंधित आरोपी की पहचान का फोटो, नाम व रिश्तेदार का नाम उजागर नहीं किया जायेगा।

इसका उल्लंघन करने वाले के विरुद्ध 228 (ब) IPC के तहत कानूनी कार्यवाही की जावेगी। जिसमे 2 वर्ष सजा का प्रावधान रखा गया है। इस कानून से सरकार ने भ्रष्ट लोगो को कानूनी रक्षा कवच पहनाने का प्रयास कर रही है। राजस्थान सरकार इस तरह के काले कानून को पारित कराने से पहले एक बार फिर सोचे। पत्रकारों की आजादी पर अंकुश लगाना, बर्दाश्त नही किया जाएगा।

एल एल शर्मा
अध्यक्ष
पिंकसिटी प्रेस क्लब
जयपुर


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भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा और मीडिया पर शिकंजा कसने वाला नया कानून महारानी के निजी अहंकार की पराकाष्ठा : कुमार विश्वास

राजस्थान में नया कानून : जजों-अधिकारियों पर आरोप लगने के 6 महीने बाद ही मीडिया पूछ सकेगी

आम आदमी पार्टी के नेता और राजस्थान राज्य के प्रभारी कुमार विश्वास ने एक बार फिर मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे पर तीखा निशाना साधा है। राजस्थान सरकार के किसी भी नेता या कर्मचारी को कानूनी प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने वाले अध्यादेश पर बोलते हुए विश्वास ने कहा कि यह महारानी वसुन्धरा के निजी अहंकार की पराकाष्ठा है। इस कानून की तुलना अंग्रेजों के निर्मम कानूनों और उत्तर कोरिया के सुप्रीमो किम जोंग उन के बनाए कानूनों से करते हुए विश्वास ने कहा कि वसुन्धरा शायद भूल गई हैं कि अब राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है।

वसुन्धरा को लोकतंत्र की मशीन का पुर्ज़ा बताते हुए विश्वास ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री जी जल्द से जल्द इस अधिसूचना को वापस नहीं लेतीं, तो आम आदमी पार्टी राज्य भर में आंदोलन करेगी और चुनावों के समय से पहले ही वर्तमान सरकार गिरा देगी। विश्वास ने इस अध्यादेश के विरोध में बोलने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी का नाम भी लिया।
उन्होंने कहा कि वसुन्धरा अपने अहंकार के आगे किसी की नहीं सुनती जिसकी वजह से उनकी अपनी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नाराज़ हैं।

विश्वास ने यह भी कहा कि राज्य का किसान गड्ढों में करवा चौथ और दीपावली मनाने के लिए मजबूर है और सरकार चुप बैठी है। इस कानून को लोकतंत्र के ख़िलाफ़ बताते हुए विश्वास ने कहा कि इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। राजस्थान चुनाव आते आते क्या तस्वीर बनती है यह तो समय बताएगा लेकिन विश्वास के लगातार हमलों में राजस्थान भाजपा के शिविर में बेचैनी बढ़ती साफ नज़र आ रही है।

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राजस्थान में नया कानून : जजों-अधिकारियों पर आरोप लगने के 6 महीने बाद ही मीडिया पूछ सकेगी सवाल

राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार सोमवार (23 अक्टूबर) से शुरू होने जा रहे विधान सभा सत्र में जजों, मजिस्ट्रेटों और अन्य सरकारी अधिकारियों, सेवकों को सुरक्षा कवच प्रदान करने वाला बिल पेश करेगी। यह बिल हाल ही में लाए गए अध्यादेश का स्थान लेगी। प्रस्तावित बिल के मुताबिक ड्यूटी के दौरान राज्य के किसी भी कार्यरत जज, मजिस्ट्रेट या सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कोई भी शिकायत सरकार की इजाजत के बगैर दर्ज नहीं की जा सकेगी। यानी इनके खिलाफ कोर्ट में या पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं की जा सकेगी। अगर कोई व्यक्ति प्राथमिकी दर्ज कराता है तो पहले सरकार से उसकी मंजूरी लेनी होगी। अध्यादेश में प्रावधान है कि सरकार 180 दिनों के अंदर मामले की छानबीन करने के बाद मंजूरी देगी या उसे खारिज करेगी। अगर 180 दिनों में ऐसा नहीं करती है तो माना जाएगा कि सरकार ने जांच की मंजूरी दे दी है।

अध्यादेश का स्थान लेने जा रहे नए कानून के मुताबिक मीडिया भी 6 महीने तक किसी भी आरोपी के खिलाफ न तो कुछ दिखाएगी और न ही छापेगी, जब तक कि सरकारी एजेंसी उन आरोपों के मामले में जांच की मंजूरी न दे दे। इसका उल्लंघन करने पर दो साल की सजा हो सकती है। 6 सितंबर को जारी अध्यादेश आपराधिक कानून (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017 को बदलने के लिए  सरकार राजस्थान विधान सभा में आपराधिक प्रक्रिया (राजस्थान संशोधन) विधेयक लाएगी। इस अध्यादेश के जरिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में धारा 156 (3) और 190 (1) को जोड़ा गया है जो एक मजिस्ट्रेट को अपराध का संज्ञान लेने और एक जांच का आदेश देने के लिए सशक्त बनाता है।

मीडिया ने जब इस कानून के बारे में राज्य के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। हालांकि, वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री राजेंद्र राठौर ने कहा, “कुछ लोगों ने एक ‘गिरोह’ का गठन किया है और सार्वजनिक अधिकारियों के खिलाफ ठोस 156 (सीआरपीसी) का इस्तेमाल किया है। इसलिए हमने यह कदम उठाया है।” मीडिया रिपोर्टिंग को प्रतिबंधित करने वाले सवाल पर  राठौर ने कहा कि मीडिया द्वारा अधिकारियों पर लगे आरोपों के बारे में लिखना शुरू होने पर अफसर की छवि को झटका लगता है।  उधर, कांग्रेस ने इसका विरोध किया है। कांग्रेस नेता गोविंद सिंह दोस्तारा ने कहा कि सरकार मीडिया के अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं कर सकती है।

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राजस्थान में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बिना सरकारी एप्रूवल के कुछ नहीं लिख सकते!

बीजपी की वसुंधरा सरकार ने अध्यादेश लाकर एक खतरनाक नियम बना दिया है…

राजस्थान में अगर किसी सरकारी अफ़सर, जज या मजिस्ट्रेट ने कोई ग़लत काम या भ्रष्टाचार किया हो तो सरकार के अप्रूवल के बिना आप कुछ नहीं कर सकते। बीजपी की वसुंधरा सरकार ने अध्यादेश लाकर एक खतरनाक नियम बना दिया है। मान लीजिए उदयपुर के जिलाधिकारी ने घोटाला किया और ख़ूब पैसे बनाये। ऊपर मंत्री, मुख्यमंत्री और पार्टी के नेताओं तक भी पैसा पहुँचाया। लेकिन किसी नागरिक या संस्थान ने सरकार के घपले को पकड़ लिया। अगले ही दिन सबूतों के साथ शिकायत की जाती है।

उसके बाद मीडिया इस भ्रष्टाचार की कहानी को जनता तक पहुंचाने का काम करती है। भ्रष्टाचारियों पर जाँच मुकदमा चलता है। अन्य पार्टियां सड़क पर उतर जाती हैं और सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनता है। सरकार में बैठे चोरों और घोटालेबाजों को समझ नहीं आता कि सब कुछ तो ठीक ठाक चल रहा था, एकाएक बात बाहर कैसे आ गयी! अब क्या करें! बाकी के भ्रष्टाचारी जो अब तक पकड़ में नहीं आये हैं, वो भी घबरा जाते हैं। उन्हें भी देश का पैसा डकारने में थोड़ा डर लगता है। जनता, मीडिया और देश ख़ुद को ताकतवर महसूस करता है। लेकिन राजस्थान में अब ऐसा नहीं होगा।

बीजपी की वसुंधरा सरकार ने अध्यादेश लाकर एक खतरनाक नियम बना दिया है। अगर किसी सरकारी अफ़सर, जज या मजिस्ट्रेट ने कोई ग़लत काम या भ्रष्टाचार किया हो तो सरकार के अप्रूवल के बिना आप कुछ नहीं कर सकते। यानी भ्रष्टाचारी अधिकारी के ख़िलाफ़ जाँच तभी होगी जब सरकार अनुमति दे। सरकार ने आवेदनों पर अनुमति देने के लिए 6 महीने का लंबा समय अपने पास रखा है। इतना ही नहीं, जब तक सरकार इजाज़त ना दे तब तक कोई भी टीवी, अख़बार, मीडिया वाले ख़बर की रिपोर्टिंग नहीं कर सकते। अफ़सर नेताओं के नाम और उनके भ्रष्टाचार का ज़िक्र नहीं कर सकते।

यानी किसी भी घोटाले की जाँच सरकार के इजाज़त के बाद होगी। और चोरों के पास 6 महीने का टाईम होगा फ़ाइल, कागज़ात इधर उधर करके मामला सेट करने में। तब तक मीडिया भी आप तक कुछ नहीं पहुंचा सकेगी। अब बताइये…

• क्या किसी सरकार को ये तय करने का अधिकार होना चाहिए कि अदालतों में किस मामले की जाँच हो और किसकी नहीं?

• ऐसी कोई सरकार होगी क्या जो अपने ही ख़िलाफ़ किसी घोटाले की जाँच होने देगी? नहीं ना?!

• और अगर सरकार जाँच करने की इजाज़त दे भी दे तो 6 महीनों में चोर और घोटालेबाज़ लोग सेटिंग और फ़ाइल कागज़ात की तैयारी नहीं कर लेंगे?

• क्या किसी सरकार को ये अधिकार होना चाहिए कि वो मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगाए?

• तो क्या ऐसे चलेगा अब हमारा देश? राजस्थान की ये महारानी कोरिया वाले किम जोंग की महिला अवतार से कम है क्या?

बाकी आप ढोल पीटते रहिये कि इस सरकार में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। बीजेपी की मर्ज़ी इसी तरह चलती रही तो आगे भी आपको किसी भ्रष्टाचार का पता नहीं चलने वाला।  अब इसको नहीं तो और किसे कहते हैं ‘अच्छे दिन’?

लेखक अनुपम ‘स्वराज अभियान’ के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.

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IFWJ to launch agitation against the gag ordinance of Rajasthan government

New Delhi : Indian Federation of Working Journalists (IFWJ) has asked the government of Rajasthan to immediately withdraw the draconian Criminal Laws (Rajasthan Amendment) Ordinance, 2017, which is an unbearable onslaught on the freedom of speech and expression. This ordinance has reportedly already got the gubernatorial assent to be promogulated throughout the state and soon to be passed into law. The ordinance will not only seriously curb and control the freedom of media but will also help the corrupt and irresponsible officers and judges in screening and shielding their corrupt activities.

The ordinance is contrary to the spirit of the constitution and therefore violative of the fundamental rights of the citizens of the country.

In a statement the IFWJ Secretary General Parmanand Pandey and the Senior Vice- President Vashistha Kumar Sharma have expressed shock over this thoughtless ordinance introduced by Government of Rajasthan.

It is strange that when the country is clamouring for transparency in the functioning of the government officials, the government of Rajasthan has introduced this obnoxious ordinance in favour of opaqueness. Under the new law, the media cannot even report on the accusations against officials and judges until the prosecution gets a go-ahead from the sanctioning authority, which can take up to six months.

भाजपा यानि भ्रष्टों को बचाने और मीडिया पर बैन लगाने वाली पार्टी… सुनिए भड़ास संपादक यशवंत सिंह का ये आंख खोलने वाला वक्तव्य… पूरा सुनिए… पूरा देखिए… क्लिक करिए… 

This step of the government of Rajasthan speaks of its medieval and antediluvian mentality which will ultimately help the peddlers and practitioners of corruption in the governance. The ordinance is in the stark contrast to the Right to Information Act, which has been achieved after a long struggle of the people.

The IFWJ has warned the Government that if this gag order against the media is not withdrawn forthwith, it will launch an agitation against this unconstitutional, arbitrary and authoritarian ordinance.

Rinku Yadav
Treasurer, IFWJ

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