काला कानून वापस लेने तक ‘पत्रिका’ अखबार में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जुड़ी खबरें नहीं छपेंगी

Pushya Mitra : राजस्थान की रानी के आगे रीढ़ सीधी करके खड़े होने के लिये पत्रिका समूह का शुक्रिया। आजकल यह संपादकीय परंपरा विलुप्त होती जा रही है। मगर एक बात मैं कभी भूल नहीं सकता कोठारी जी, आप अपने ही कर्मियों के तन कर खड़े होने को पसंद नहीं करते। मजीठिया वेतनमान मांगने वाले हमारे पत्रकार साथियों को पिछले दो साल से आप जिस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं, किसी को नौकरी से निकाल रहे हैं, किसी का दूरदराज तबादला कर रहे हैं। यह जाहिर करता है कि आपमें भी उसी तानाशाही के लक्षण हैं, जो राजस्थान की महारानी में हैं।

आज आप भले ही मोदी विरोधियों की महफ़िल में शेर का खिताब हासिल कर लें, मगर हम पत्रकार यह जानते हैं कि मामला सच्चाई, न्याय या सिद्धांतों का नहीं है। क्योंकि इन बातों में आपकी आस्था सिर्फ किताबी है। यह मामला सरकारी विज्ञापन से वंचित किये जाने का है। हां, यह बात जरूर है कि दूसरों की तरह आप सरकार के आगे गिड़गिड़ाते नजर नहीं आ रहे। आंखों में आंखें डाल कर हिसाब मांग रहे हैं। इसका पूरे अदब के साथ इस्तकबाल करता हूँ। पढें संपादकीय..

पत्रकार पुष्य मित्र की एफबी वॉल से.

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‘पत्रिका’ अखबार ने जिंदा मंत्री को ‘मार’ कर श्रद्धांजलि तक दिलवा दिया!

राजस्थान पत्रिका के जालोर एडिशन में 10 अगस्त को ‘पूर्व केन्द्रीय मंत्री को श्रद्धांजलि दी’’ शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई. इसमें राजस्थान के जीते-जागते विधायक व मंत्री को भाजपा पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं द्वारा श्रद्धांजलि दी जाने संबंधी खबर प्रकाशित कर दी गई. गौरतलब है कि बुधवार को दिल्ली में अजमेर सांसद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री सांवर लाल जाट का निधन हो गया. इसकी खबरें सभी टीवी न्यूज चैनल्स पर पूरे दिन चलीं और सभी अखबारों में फ्रंट पेज पर भी छपीं.

पत्रिका में भी यह खबर सभी एडिशन में फ्रंट पेज पर छापी गई. मगर जालोर एडिशन में पेज नंबर आठ पर छपी खबर में सांवर लाल जाट की जगह राजस्थान के कृषि मंत्री प्रभूलाल सैनी का निधन होना बता दिया गया. साथ ही कार्यकर्ताओं द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि दी जाना छाप दिया गया. यह गलती संवाददाता ने की या डेस्क पर बैठे कर्मियों ने, यह पत्रिका की आंतरिक जांच का विषय है लेकिन यह गलती बहुत बड़ी है.

राजस्थान पत्रिका एक प्रतिष्ठित अखबार है और जन-जन में इसकी एक अलग पहचान व विश्वसनीयता है. इस विश्वसनीयता पर इस गलती ने बड़ा बट्टा लगाया है. हिन्दी साहित्य क्षेत्र में खुद को श्रेष्ठ कहलाने वाले गुलाब कोठारी के पत्रिका अखबार की इस कारगुजारी से कई लोग मजे भी ले रहे हैं. लोग कह रहे हैं कि क्या यही ज्ञान है कि मौत हुई सांसद सांवरलाल जाट की, और मार दिया कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी को.

पत्रकार पीयूष राठी की रिपोर्ट.

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मोदी सरकार पर राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक गुलाब कोठारी का हमला- ”झूठ बोलने के लिए मीडिया को खरीदने का काम चल रहा है”

राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक गुलाब कोठारी ने मोदी सरकार पर हमला बोल दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि झूठ बोलने के लिए मीडिया और लोगों को खरीदने का काम चल रहा हैं. गुलाब कोठारी ने ये बात मुंबई में 14वें अंतरराष्ट्रीय कंसर्न्ड कम्यूनिकेटर अवॉर्ड (सीसीए) समारोह में कही. पत्रिका समूह को सामाजिक सरोकार के श्रेष्ठ रचनात्मक विज्ञापनों के लिए इस समारोह में पुरस्कृत किया गया. कोठारी ने कहा कि आजादी को 70 साल हो गए हैं लेकिन हम आज भी सच को सुनना ही नहीं चाहते हैं. सरकार मीडिया हाउस को शॉर्टलिस्ट कर जनता तक झूठी बातें पहुंचा रही है. झूठ को सच बताकर रखने की कोशिश में लोगों को दिग्भ्रमित किया जा रहा है. क्योंकि यदि झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह सच मान लिया जाता है और आज यही हो रहा है.

सरकार व मीडिया को आईना दिखाते हुए कोठारी ने कहा कि आज अभिव्यक्ति की आजादी पर अतिक्रमण हो रहा है. आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है. जिसे हमने लोकतंत्र व जनता के बीच सेतु माना था, वही मीडिया आज कहां है? कुछ मीडिया समूहों ने आज जनता का पाला छोड़ दिया है और सरकार के साथ जाकर बैठ गए हैं. यह सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में हो रहा है. सोशल मीडिया का अवतार ही झूठ बोलने के लिए हुआ है, क्योंकि कौन आधिकारिक तौर पर कह रहा है और क्या सही है, इसका पता ही नहीं चल पाता. पत्रिका के साथ ऐसा करने की कोशिश की गई, लेकिन हमने ऐसा नहीं होने दिया. हम सुप्रीम कोर्ट तक भी गए. मीडिया लोकतंत्र का वॉचडॉग नहीं दिखाई दे रहा है. जनता की सोचने वाला कौन बचा है?

देश में किसान आंदोलनों पर पीड़ा जताते हुए कोठारी ने कहा कि आज इन आंदोलनों को ताकत के साथ ढहाया जा रहा है, जो देशहित में नहीं है. सभी को नोटबंदी को लेकर समस्या हुई, लेकिन हम नोटबंदी के बाद के हालात पर चर्चा नहीं करना चाहते हैं. सरकार की नई भर्तियां बंद हो गई हैं, वहीं कई लघु उद्योगों के उजड़ जाने से बड़ी संख्या में बेरोजगारी भी बढ़ी है. न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख का हवाला देते हुए कोठारी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर तानाशाह सरकारों का दौर है. ऐसे में सिर्फ अपना प्रोपेगंडा मीडिया के माध्यम से चलाया जा रहा है. ऐसे में विपक्ष को कुछ जिंदा रखने की कोशिश की जाती है, जिससे लोकतंत्र का भ्रम बना रहे. ऐसे हालात में नई पीढ़ी को कफन बांधकर आगे आना चाहिए कि जो आजादी हमें संविधान ने दी है वह बची रहे.

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गुलाब कोठारी जी, इमरजेंसी तो आपने अपने आफिस में लगा रखी है

‘जर्नलिस्ट जयपुर’ नामक एफबी एकाउंट की वॉल पर पोस्ट किया गया पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के नाम खुला पत्र….

माननीय गुलाब कोठारी जी,

आपका विशेष संपादकीय ‘ये भी इमरजेंसी’ पढ़ा। आपने जिस तरह आपके अखबार ‘राजस्थान पत्रिका’ को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने को लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर हमला बोलते हुए इसे “जनता की सुध ना लेने” से जोड़कर आगामी चुनाव में सत्ता ना मिलने का चेताया है, यह मुझे प्रभावित कर गया!! किसी मुद्दे पर आपकी और मुख्यमंत्री की लड़ाई में सरकारी विज्ञापनों पर अघोषित रोक को आपने जिस तरह इमरजेंसी करार दिया है, यह पढ़कर तो जनता भी भौंचक रह गई होगी!! जनता में भी डर समा गया होगा कि कहीं सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ कुछ लिखने से उनकी कॉलोनी में अघोषित बिजली कटौती शुरू ना हो जाए!! वगैरह-वगैरह!!

आपने इमरजेंसी शब्द का शानदार उपयोग किया है. मुख्यमंत्री की दिवंगत माता विजयराजे सिंधिया की भी स्वर्ग से भावनाएं भांप ली. बहुत ही बढिय़ा! आपके इस विशेष संपादकीय का पूरे दिन सोशल मीडिया, वाट्सएप पर चलाए जाने का अभियान भी रोचक रहा क्योंकि बीच-बीच में कोई ना कोई आपको आईना दिखा ही रहा था। आपके ही अखबार के कर्मी कहते दिखे कि इमरजेंसी तो आपने अपने ऑफिस में लगा रखी है। केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित मजीठिया वेज बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी लागू नहीं करके कर्मचारियों को प्रताडि़त कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं मानने पर कर्मचारियों द्वारा आपके खिलाफ 7 अवमानना याचिकाएं लगाई गई हैं। इस पर आप कई कर्मचारियों को बर्खास्त, निलंबित और दूरदराज तबादले कर चुके हैं। केस नहीं करने वाले बाकी कमजोर कर्मचारियों पर काम का दबाव बढ़ा रहे हैं, जिससे वे आगे भी नतमस्तक रहें। इमरजेंसी तो यह होती है!! हाल ही आपके एक वरिष्ठ अधिकारी ने भरी मीटिंग में पत्रकारों की तुलना कुत्ते से कर दी!! क्या यह इमरजेंसी के हालात नहीं? आपने अपने विशेष संपादकीय में मुख्यमंत्री की दिवंगत माता विजयराजे सिंधिया के बारे में लिखा कि ‘वे भी स्वर्ग से देख रही होंगी कि किस-किस के दबाव में सीएम क्या-क्या गलत निर्णय कर रही हैं।’ क्या आपके पिता कर्पूर चंद्र कुलिश स्वर्ग से नहीं देख रहे होंगे कि बिना किसी दबाव के मेरे उत्तराधिकारी क्या-क्या गलत निर्णय कर रहे हैं?

जर्नलिस्ट जयपुर नामक एफबी एकाउंट की वॉल से.

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देश को गुलाब कोठारी जैसे मनुवादियों से आज़ाद होना पड़ेगा

एक लेख दैनिक पत्रिका दिनांक 30 अगस्‍त 2015 को प्रकाशित लेख ‘’आरक्षण से अब आज़ाद हो देश’’ जिसके लेखक है श्री गुलाब कोठारी की प्रतिक्रिया में लिखी गई है। ग़ौरतलब है की यह लेख पत्रिका की जैकेट स्‍टोरी (मुख्‍य पेपर के मुख्‍य पत्र पर) के रूप में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को प्रारंभ करने के पहले बता दू की श्री गुलाब कोठारी एक व्‍यवसायी है वे पत्रिका (पूर्व में इसका नाम राजस्‍थान पत्रिका था) के मालिक एवं प्रधान संपादक है। वे जैन धर्म से ताल्‍लुख रखते है इस लिहाज से वे अल्‍पसंख्‍यक की श्रेणी में आते है।

विवादित लेख का मुख्‍य शीर्षक है ‘जातियों के आंदोलन की नई रणनीति हमें भी जोड़ों या खत्‍म करो जातिगत आरक्षण व्‍यवस्‍था’ श्री गुलाब कोठारी को  आरक्षण से आपत्‍ती है वे कहते है ‘अच्‍छी योग्‍यता वाले युवा सरकारी नौकरी से परहेज क्‍यो करने लग गये? उनका पलायन  भी होने लगेगा तो सरकार और देश के पास सिवाए ‘’ब्रेन ड्रेन’’ का रोना रोने के क्‍या रह जायेगा? फिर आरक्षित वर्ग में भी सभी को इसका लाभ भी नही मिल पा रहा है।’

श्री कोठारी जी यहां एक औसत दर्जे के ब्राम्‍हण वादियों की भाषा बोल रहे है। शायद उन्‍न्‍हे नही मालूम की आई ए एस की परीक्षा में अधिक अंक पाने वाले आरक्षित प्रत्‍यासी को नौकरी नही मिल पाती क्‍योकि ओरल में सामान्‍य वर्ग को ज्‍यादा अंक दे दिये जाते है। वो सिर्फ इसलिए की आरक्षित वर्ग को कमतर आंका जा सके। यदि सवर्ण ब्रेन ड्रेन नही है तो बताएं सर्वणों ने आज तक कौन सा अविष्‍कार किया है सिवाए ऊँच नीच छुआ छूत के। आरक्षित वर्ग में किसको लाभ मिल रहा है किसे नही। इसकी चिन्‍ता आपको क्‍यो हाने लगी कोठारी जी ? आपकी छाती में सौंप इसलिए लोट रहा है न कि एक पिछड़ा दलित तरक्‍की कर रहा है।

गुलाब कोठारी का दुख है की आरक्षण विरोध में कौन साथ देगा आरक्षण वाले तो आधे है। कोठारी जी मनु का आरक्षण पाकर प्रधान संपादक तो आप बन गये लेकिन सिर्फ लिखते रहे पढ़ने की जहमत आपने नही उठाई मै यहां बतादू की SC ST OBC &  MINORITY मिलाकर आरक्षित वर्ग 85% होते है वर्तमान जनगणना के आधार पर। भले ही इन्‍हे आज 50% आरक्षण मिल रहा हो। लेकिन आप तो आरक्षित वर्ग को ही 50% बता रहे हो। कोठारी जी लिखते है कि ‘जो काम 700 सालों से मुगल नही कर पाये, 200 सालों से अंग्रेज नही कर पाये वही उजाड़ मात्र पांच मिनट में पूर्व प्रधान मंत्री वी.पी.सिंह कर गये। यह कांटा कोई बौध्दिक तर्क से निकलने वाला कांटा नही है। देश बांटने का इतना सहज उपक्रम शायद इतिहास में अन्‍यत्र नही होगा।

कोठारी जी मनु ने 6,500 जातियों में बाँटा उनके धंधे भी आरक्षित किये तो आपको देश बटने का खतरा नही हुआ। लेकिन वर्तमान आरक्षण से देश बटने का खतरा दिख रहा है आपको। आपका दर्ज ये ही कि अंगरेज़ों के पूर्व किसी 1700 वर्ष तक किसी आंक्रांताओं ने जाति प्रथा को नही छेड़ा इसलिए आप उन आंक्रांताओं के ग़ुलाम बनने के लिए तैयार थे, उनसे खुश थे। क्‍योकि आपके ग़ुलाम आपकी पकड़ में थे। लेकिन अँग्रेज़ काल में ही आपकी पकड़ ढीली पड़ने लगी जब साइमन कमीशन का कम्‍युनल एवार्ड आया जो अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण का आधार बना बाद में मण्‍डल कमीशन आया जो पिछड़ा वर्ग आरक्षण का आधार बना। इसे आप देश को बांटने का आधार बता रहे है। मुझे तरस आता है आपकी बुध्‍दी पर और साथ-साथ आप ये धमकी भी देते है की ये कांटा बौध्दिक तर्क से नही निकलने वाला। याद रखिये कोठारी साहब आज भी अनारक्षित वर्ग भारत में सिर्फ 14.5% ही है तो क्‍या आप 85% आरक्षित वर्ग पर तलवार चलाऐंगे ?

हॉं ये बात सही कि अब ये बाते आप बौध्दिक तर्क से नही जीत सकते क्‍योकि आरक्षित वर्ग पढ़ लिख कर तर्क करना सीख गया है। आपके बेतुके तर्क का माकूल जबाब दे सकता है। गुलाब कोठारी आरक्षण के विरोध में कुछ आंकड़े पेश करते है वे लिखते है देश को नुकसान हो रहा है ‘अध्‍ययन के अनुसार नौकरी में आरक्षण का लाभ उठाने वाले पिछड़े छात्रों को फायदा तो हुआ पर यही निवेश अगर सामान्‍य छात्रों पर किया जाता तो देश को अधिक लाभ होता।’

कोठारी जी ये अध्‍ययन कहां ओर किस ऐजेन्‍सी नने कराए है यदि ये बताने की जहमत उठाते तो अच्‍छा रहता।  आप ये बताई ये- वर्षो से मरीज़ के पेट में कैची तौलिया छोड़ने वाले डाक्‍टर किस वर्ग के है। जितने आई ए एस घोटाले में फसे है किस वर्ग के है?  आज 15% सामान्‍य वर्ग के लिए 50% आरक्षण लागू है। जबकि संख्‍या के मुताबिक 15% सामान्‍य वर्ग के लिए सिर्फ 15% ही भागीदारी होनी चाहिए लेकिन कोठारी जी क्‍ज्ञै 50% से मन नही भरता वे तो पूरा 100% चाहिए वो भी 15% के लिए।

वे एक गुमनाम तथाकथित दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के हवाले से लिखते है कि सम्‍पन्‍न तबके को ही आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। पता नही ये कौन व्‍यक्ति है उन्‍हे ये तक नही मालूम पूरे आरक्षण का आज भी आधा प्रतिशत पद खाली रह जाता है। जिसे बैकलाग से भरने की कोशिश की जाती है। जो बाद में उपयुक्‍त उम्‍मीदवार नही है बता कर सामान्‍य वर्ग से भर्ती की जा‍ती है। गुलाब कोठारी के लिए राह, अब आसान नही है  कई दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, अल्‍पसंख्‍यक वर्ग एवं पूरा आरक्षित वर्ग उनके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही का मन बना रहा है। साथ ही उनके समाचार पत्र ‘पत्रिका’ को पूरे देश में बहिस्‍कार की योजना बना रहा है। ताकि कोई ऐसा दुस्‍साहस न कर सके।

दर असल पूरे विश्व में वंचित समुदाय को आरक्षण देकर आगे बढाना कोई नई बात नही है। विकसित देश इसी सहारे आज विकसित हो पाये है। हमारे देश की तरह विदेशों में भी राज तंत्र, सामंती तंत्र और पादरी पूरोहित तंत्र का खात्मा करने के लिए तथा वंचित वर्ग के अधिकार हड़पने का सिलसिला खत्म  करने के लिए आरक्षण जैसी सुविधाऐं दी गई हे। अमेरिका में इसे लिंडन जान्सवन के समय ‘एफर्मेटिव एक्स न’ के नाम से प्रक्रिया शुरू की गई। तब जाकर अमेरिका महाशक्ति बन सका। इसी प्रकार फ्रांस में डिप्रेस्ड क्लास के नाम से तो कनाडा और यूरोप में अलग अलग नाम से यह आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। लेकिन इसके पीछे वही सिद्धांत है जो हमारे यहां आरक्षण व्यवस्था  के लि‍ए है। कुछ देशों में ‘’ तरजीही नि‍युक्तियां ’’ नाम से तो कहीं ‘’रिवर्स डिस्क्रमनेशन ’’ के नाम पर आरक्षण लागू कर देश को तरक्की  पर लाने की कोशिश हो रही है। बात यही तक नही रूकती बडी बडी मल्टी नेशनल कम्पनियां प्रतिवर्ष अपने कर्मचारियों का एक कम्यु।नल रिर्पोट भी  प्रकाशित करती है कि किस जाति या समुदाय का व्यक्ति कितनी संख्या में किस पद पर कार्यरत है। फेसबुक सहित कई कम्पनियाँ ऐसी रिर्पोट पेश करती रही है। ताकि भाई भतिजा वाद, बैक डोर एन्ट्रीि‍ पर रोक लगे तथा जिसकी जितनी संख्या , उसकी उतनी भागी दारी के सिद्धांत पर संतुलन बनाया जा सके। ये विदेशी कम्पनियाँ ऐसा करने में गर्वाविंत महसूस करती है।

इस लेख मे संविधान का मज़ाक उड़ाया गया

वे लिखते है की ‘स्‍वतंत्रता के बाद हमारे ही प्रतिनिधियों ने हमारे ज्ञान की जमकर धज्जियाँ उड़ाई। संविधान को धर्म निरपेक्ष कहकर हमारी संस्‍कृति के साथ भौड़ा मज़ाक ही किया । शासन में धर्म का प्रवेश वर्जित हो गया। हमारी संस्‍कृति का आधार आश्रम व्‍यवस्‍था तथा इसी के साथ वर्ण व्‍यवस्‍था रही है।’

आश्‍चर्य है कि आखिर किस बाल पर कोठारी जी संविधान के विरूद्ध ऐसी बाते लिखते है। उनके विरूद्ध देश द्रोह का मुकदमा दायर हो सकता है। उनकी न्‍यूज पेपर पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। दरअसल उनका असली  दर्द यही है की संविधान को धर्म निरपेक्ष नही रखा जाना था। इसे हिन्‍दू धर्म से जोड़ा जानना था। ताकि पिछड़ा को पिछड़ा दलित को दलित और अल्‍पसंख्‍यक को और अल्‍पसंख्‍यक रखा जा सके। उन्‍हे वर्णाश्रम जाति व्‍यवस्‍था  जिन्‍हे वे अपनी महान संस्‍कृति मान रहे है, टूटने का भय सता रहा है।

वे आगे लिखते है ‘संविधान में आरक्षण का जो विष बीज बोया गया था वह अब वट वृक्ष बनकर पनपने लगा है।’

ये वाक्‍य संविधान के विरूद्ध घोर अपमान जनक है। आरक्षण के विरोध में अपना एक तर्क हो सकता है लेकिन सीधे सीधे संविधान को नीचा दिखाने का प्रयास आजद भारत में पहली बार इस तरह पढ़ने मिला। यह एक प्रकार से देश द्रेाह का मामला है।

कोठारी जी सीधे-सीधे ये क्‍यो नही कहते मै संविधान को नही मानता। आप कहते है संविधान में आरक्षण का विष बोया गया। आपको मालूम भी है आरक्षण क्‍यो मिला। कोठारी जी लिखने के साथ थोड़ा पढ़ने की जहमत उठाते तो बेहतर होता। मै आपको बता दू की आरक्षित वर्ग को आरक्षण किसी एहसान के तले नही मिला है। आज़ादी के पहले सायमन कमीशन ने अंबेडकर के सिफारिश पर दलित आदिवासी के लिए कम्‍युनल एर्वाड की घोषणा की थी। यानि दलितों को निर्वाचन/ प्रतिनीधी समेत विशेष सुविधाएं। लेकिन गांधी ने इसका विरोध किया वे अनशन में बैठ गये, उनका तर्क था की ये सुविधाएँ इन्‍हे नही मिलनी चाहिए इससे हिन्‍दू धर्म हिस्‍सो में बट जायेगा। ये हिन्‍दू धर्म का अंदरूनी मामला हे मिलकर सुलझायेगे। अंबेडकर पर गांधी के अंनशन तुड़वाने का चौतरफा दबाव बढने लगा। दबाव में आकर दलित समुदाय ने जो समझौता गांधी के साथ किया वह पूना पैक्‍ट कहलाया। आज भी  दलित  इस समझौते को आज भी अपनी हार के रूप में याद करते, वे कहते है यदि समझौता नही होता तो हम आपने मालिक खुद होते, आरक्षण जैसे भीख की हमे जरूरत ही नही पड़ती। आज़ादी बाद में यही समझौता आरक्षण, स्‍कालरशिप जैसी सुविधाओं के रूप में संविधान में शामिल हुआ। तो अब बताई ये आरक्षण लेकर आरक्षित वर्ग एहसान कर रहे है या देकर आप?

और हॉं यह भी बताना जरूरी है की कुछ अशिक्षित लोग ये तर्क देते है की आरक्षण केवल 10 वर्षो के लिए लागू हे ये बढाया जाना गलत है तो मै यह जानकारी दे दू की राजनीति में लागू आरक्षण के बारे में से कानून है न की सरकारी नौकरी में।

और हॉं वास्‍तविक आरक्षण के जनक ‘मनु’ की मूर्ति जो रास्‍थान हाईकोर्ट के परिसर में लगाई गई है उससे तो आपको कोई आपत्‍ती नही है न। वह आरक्षण जो 2200 साल से लागू है उसमें तो आपको कोई संशोधन की जरूरत नही महसूस नही होती है न?

बेहतर होता श्री गुलाब कोठारी राजस्‍थान की जरूरी समस्‍या जैसे खाप पंचायत, कन्‍या वध प्रथा पर लिखते। वे इस पर भी लिखते की राजस्‍थान में महिला पुरूष के अनुपात का अंतर क्‍यो‍ है? क्‍यो राजस्थान की गिनती पिछड़े राज्‍यो में होती है? लेकिन दुर्भाग्‍य है कि उन्‍हे ये कोई समस्‍या नही दिखती। लेकिन सौभाग्‍य उनका है जिन्‍होने उनके इस लेख से एक जुट होने और संघर्ष करने की प्रेरणा मिल रही है।

दलित लेखक संजीव खुदशाह बिलासपुर छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं. एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद थिएटर से लेकर पत्रकारिता तक में सक्रिय रहे. वे प्रगतिशील विचारक, कवि, कथाकार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं. “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”  इनकी चर्चित कृतियां हैं. इनकी किताबें मराठी, पंजाबी एवं ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं. संजीव की पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है. इन्हें कई पुरस्‍कार एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुका है. संपर्क: 09977082331

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पत्रिका वाले कोठारी बाप-बेटा का कारनामा : हक के लिए कोर्ट जाने पर रामकुमार सिंह और राकेश वर्मा को निकाला

राजस्थान पत्रिका समूह से खबर है कि इस अखबार के मालिक पिता पुत्र इन दिनों पूरी तरह क्रूर हो चुके हैं. मजीठिया वेज बोर्ड के पैमाने पर सेलरी देने की मांग को लेकर जो-जो भी पत्रकार या गैर-पत्रकार सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य कोर्ट / उपक्रम में गए हैं, उन्हें बिना किसी नियम कानून की परवाह किए हुए संस्थान से बाहर निकाले जाने की कार्रवाई हो रही है.

ताजी सूचना के अनुसार जेड प्लस फिल्म के कहानीकार और पत्रिका समूह से संबद्ध रामकुमार सिंह को पत्रिका प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है. इनके अलावा पत्रिका समूह में वरिष्ठ पद पर कार्यरत राकेश वर्मा को भी हटाए जाने की सूचना है. इसके पहले विनोद पाठक को कोठारी पिता-पुत्र कोर्ट जाने के कारण बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं.  ज्ञात हो कि बुजुर्ग गुलाब कोठारी बड़े बड़े नैतिकतावादी आलेख अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर छापने के लिए कुख्यात हैं वहीं इनके बेटे निहार कोठारी पत्रकारों को दलाल बनाकर अपना हित साधने के लिए कुचर्चित हैं.

अब इन बाप बेटा की जोड़ी मिलकर उन सबको ठिकाने लगाने में जुटी है जो कोर्ट जाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुशंसित व आदेशित मजीठिया वेज बोर्ड के पैमाने के हिसाब से सेलरी मांगने को लेकर न्यायालय की शरण ले रहे हैं. इसे ही कहते हैं चिराग तले अंधेरा. जो मीडिया कंपनियां चीख चीख कर सरकार नैतिकता घपला घोटाला शोषण अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का ड्रामा करते हैं, अब वही अपने इंप्लाइज के न्याय मांगने पर उन्हें अनैतिक तरीके से ठिकाने लगा रहे हैं.

इसे भी पढ़ें…

पत्रिका में 12 का टर्मिनेशन और 40 का आउट ऑफ स्टेट ट्रांसफर

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राजस्थान पत्रिका, जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर, गुलाब और नीहार कोठारी को भेजा गया गोपनीय पत्र

यशवंत जी, यह पत्र दो सप्ताह पहले राजस्थान पत्रिका के प्रमुख गुलाब कोठारी और नीहार कोठोरी को भेजा गया था… इस आशा के साथ कि यह पत्र मिलने के बाद कोई ठोस कार्यवाही होगी… लेकिन जैसे खबरें दबाई जाती हैं, वैसे ही इस पत्र को दबा दिया गया… आखिर में यह पत्र आपको भेजा जा रहा है… व्हिसल ब्लोअर का नाम उजागर नहीं करना पत्रकारिता का धर्म है और बात रही सत्यता की एक भी बात असत्य नहीं है… हर कर्मचारी पीड़ित है…

7 नवम्बर को भेजा गया पत्र
व्यक्तिगत एवं गोपनीय        
सेवा में
गुलाब कोठारी
प्रधान संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

व्यक्तिगत एवं गोपनीय
सेवा में
नीहार कोठारी
संपादक, राजस्थान पत्रिका
केसरगढ़, जेएलएन मार्ग, जयपुर

विषय : राजस्थान पत्रिका जोधपुर में भ्रष्टाचार और जातिवाद चरम पर

श्रीमान गुलाब जी कोठारी और श्री निहारी जी कोठारी

यह पत्र आपका ध्यान राजस्थान पत्रिका के जोधपुर संस्करण के सूरत-ए-हाल बताने के लिए लिखा जा रहा है। आपसे उम्मीद है कि आप इन मामलों पर संज्ञान लेते हुए उचित कार्यवाही करेंगे। जोधपुर संस्करण में गत कई माह से हालत बद से बदत्तर हो गए हैं। संपादकीय विभाग में जातिवाद पूरी तरह हावी हो गया है और अपने लोगों को हर तरह से सपोर्ट किया जा रहा है, इतना ही नहीं पत्रिका की साख पर दाग लग रहा है और वह भी भ्रष्टाचार का। शहर में पत्रिका पर पैसे लेकर खबर लगाने और रोकने के कई आरोप लग रहे हैं।  भास्कर के कर्मचारियों से लेकर शहर प्रतिष्ठित लोगों में इन दिनों चर्चा का विषय है। इससे पत्रिका की 50 वर्षों की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है।

केस -1

संपादक ने की लाखों की डील

जोधपुर संस्करण के संपादकीय प्रभारी पर पैसे लेकर एक राजनेता को फेवर करने के गंभीर आरोप हैं। इसकी जानकारी कई लोगों ने मौखिक और लिखित रूप से जयपुर मुख्यालय को दी है। संपादकीय प्रभारी राजेश नैन पर भाजपा के स्थानीय नेता राजेन्द्र गहलोत से दो से पांच लाख रूपए लेने का आरोप है। यह चर्चा शहर भर में है। राजेन्द्र गहलोत की विधानसभा चुनाव के दौरान मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग की खबर लोकसभा चुनाव में पत्रिका में प्रमुखता से प्रकाशित की गई  थी और भास्कर में यह समाचार नहीं था। इस मुद्दे को लेकर कई खबरें प्रकाशित करने की कार्ययोजना बनीं थी, लेकिन उसके बाद एक भी खबर प्रकाशित नहीं हुई ।

पत्रिका ने राजेन्द्र गहलोत को जमकर फेवर किया, इसका प्रमाण प्रकाशित खबरें हैं । इतना ही नहीं कई रिपोर्टर्स के माध्यम से गहलोत को ऑबलाइज किया गया। इसकी पुष्टि संबंधित रिपोर्टर और चीफ रिपोर्टर से की जाती है। इस डील में दलाली का काम पत्रिका के रिपोर्टर रामेश्वर बेड़ा ने किया। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय शिक्षक भर्ती सुपर घोटाले के बारे में पत्रिका ने प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी। बताया जा रहा है कि विवि पीआरओ रामनिवास चौधरी (जाट भाई) अपने जाट भाई राजेश नैन से मिला और कुलपति आवास पर मिटिंग करवाई। इसमें चैनल 24 के इंचार्ज अजय अस्थाना भी शामिल है और संपादक के साथ डील कर ली। जिसके बाद पत्रिका में खबरों का प्रकाशन कम हो गया।

केस- 2

रिपोर्टर ने खुलेआम लिया एप्पल का फोन

राजेश नैन ने जातिवाद को इतना हावी कर रखा है कि सजातीय भाई रामेश्वर बेड़ा की हर गलती को नजरअंदाज करते हैं और कई गंभीर गलतियों के बारे में जयुपर को अवगत तक नहीं कराया। रामेश्वर बेड़ा के पास एक एप्पल का आई-फोन आया। सभी रिपोर्टर्स को पूर्ण रूप से मालूम है कि बेड़ा की इतनी हैसियत नहीं है कि वह एप्पल का नया या पुराना फोन ले सके। इन दिनों ऑफिस में चर्चा है कि एप्पल का फोन खरीदा नहीं गया है, बल्कि यह किसी से लिया गया है। पुष्ट सूत्रों के अनुसार  रामेश्वर ने यह फोन शिक्षक नेता शंभूसिंह मेड़तिया से लिया है। इसकी तस्दीक भी हो चुकी है। इतना ही नहीं स्कूली शिक्षा की बीट आने के बाद रामेश्वर बेड़ा ने  मेड़तिया को खबरों के माध्यम से इतना ऑब्लाइज किया है कि दूसरे शिक्षक संगठन पत्रिका से नाराज हैं । इसकी शिकायत कई संगठनों ने स्थानीय संपादक से लेकर जयपुर तक की है।

केस -3

धर्मेन्द्र बनाम संपादक

वर्तमान में न्यूज टुडे में कार्यरत धर्मेन्द्र सिंह ने जोधपुर नियुक्ति के दौरान संपादक राजेश नैन पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि इसकी लिखित शिकायत भी जयपुर तक पहुंची, जिसके बाद धर्मेंद का स्थानांतरण जोधपुर से न्यूज टुडे में कर दिया गया।

 
केस -4

पत्रिका बना जाटिस्तान

राजेश नैन के आने के बाद पत्रिका में जातिवाद इतना हावी हो गया है कि लोग इसे पत्रिका कार्यालय कम और जाटिस्तान ज्यादा कहते है।  जोधपुर कार्यालय में जितने भी जाट भाई कार्यरत हैं, उनका एक ग्रुप बन गया है। इनमें विकास चौधरी, रामेश्वर बेड़ा, श्यामवीर सिंह, रामलाल जैसे अन्य साथी शामिल है। इसका प्रमाण यह भी है कि राजेश नैन ने पदभार ग्रहण करने के बाद सभी साथियों से उनके सरनेम पूछे थे। इतना ही नहीं पत्रिका ने जिस खींवसर विधायक हनुमान बैनीवाल का बहिष्कार कर रखा है, उसे कार्यालय में बुलाकर चाय-नाश्ता कराया गया। कई जाट नेताओं को संपादक से मिलाया जाता है, जाट समाज के नेताओं का आना आम है। संपादक ने विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जाट उम्मीदवार को पर्दे के पीछे से फेवर किया था। जाट संपादक को जाट नेताओं से मिलाने का जिम्मा विकास चौधरी का है। विकास चौधरी बड़े जाट नेता के जोधपुर आने पर लाइनअप कर संपादक से मिलाता है। विकास चौधरी क्राइम रिपोर्टर है और अधिकारियों, नेताओं और पुलिसवालों से इसकी सेटिंग है। जाट पुलिसवालों को विकास जमकर फेवर करता है।

केस -5

चरित्रहीनों की ढाल बना संपादक

पत्रिका की परम्पराओं के अनुसार महिला साथी के साथ दुर्व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाता है। लेकिन पत्रिका जोधपुर कार्यालय में संपादक ऐसे चरित्रहीनों की ढाल बने हुए हैं । गत दिनों एक महिला साथी ने रामेश्वर बेड़ा की शिकायत राजेश नैन से की थी, जिसमें कहा गया था कि बेड़ा रात में उसे फोन कर अश्लील बातें करता है। ऑफिस के बाहर अकेले में मिलने के लिए कहता है । इसके अलावा ऐसी ही कई अन्य बातें हैं, जिनका जिक्र भी नहीं किया जा सकता है। जब राजेश नैन से महिला साथी ने बेड़ा की शिकायत की तो उनसे मिले जवाब से वह बहुत आहत हुई और नौकरी छोड़ने का मानस बना रही है। इससे पहले एक महिला साथी के जन्मदिन पर बेड़ा उसके घर पर मिठाई और गिफ्ट लेकर पहुंच गया था। एक ट्रेनी महिला साथी को भी बेड़ा ने इतना परेशान किया कि वह संस्था छोड़कर चली गई। बेड़ा के खिलाफ महिला कांस्टेबल से लेकर जिला परिषद की महिला सदस्यों को कॉल करने तक की शिकयतें है। राजेश नैन को जब इसके बारे में बताया गया तो उन्होंने कुछ शिकायतों को अपने कार्यकाल का न बता कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

केस -6

मानसिक प्रताड़ना झेल रहे कर्मचारी

राजेश नैन की हिटलरशाही, जातिवाद, गुस्सा, कुतर्क से (जाट भाई छोड़कर) संपादकीय  साथी परेशान हैं। कई साथियों को राजेश नैन ने दुर्भावनावश इतना परेशान किया कि उनका मनोबल गिर गया है और वे अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पा रहे हैं । कई कर्मचारी नौकरी छोड़ने का मानस बना रहे हैं। ताजा उदाहरण धर्मेंद सिंह का है, जिसने मानसिक प्रताड़ना का लिखित में आरोप लगाया था।

केस -7

भ्रष्टाचारियों की हो रही भर्ती

राजेश नैन ने  संपादकीय विभाग जोधपुर में अपने जैसे भ्रष्टाचारियों की सेना खड़ी करनी तैयार कर दी है । जिन रिपोर्टर्स पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन्हें पत्रिका में लिया जा रहा है । उदाहरण के तौर पर गजेन्द्र सिंह दहिया जिस पर अपने पूर्व कार्यकाल में लैपटॉप लेने का आरोप है, जिसकी वजह से पहले पत्रिका ने उसका स्थानान्तरण जोधपुर से अलवर कर दिया था। इसके बाद उसने नौकरी छोड़ दी । तीन साल बाद हाल ही में उसे वापस ले लिया गया है। दूसरा उदाहरण सौरभ पुरोहित का।  पत्रिका जोधपुर से स्थानान्तरण के बाद सौरभ ने भास्कर जॉइन किया और एक लाख से ज्यादा रुपए के गबन के आरोप में उसे भास्कर से निकाल दिया गया। पत्रिका में सौरभ की वापसी की कवायद तेजी से चल रही है। तीसरा उदाहरण प्रॉपर्टी डीलर चैनराज भाटी का है।  पाली से बिना बताए छोड़कर गए चैनराज को पत्रिका ने वापस ले लिया। जोधपुर में पत्रिका के नाम पर प्रॉपर्टी का काम देख रहा है। चैनराज का शानो-शौकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चैनराज के पास कार से आता है और रिपोर्टिंग करता है। जबकि उसकी सैलरी मात्र 18 हजार है । इतना ही नहीं रामेश्वर बेड़ा संपादक को मंडी से सब्जी, घी, तेल सहित अन्य सामानों की सप्लाई सीधे घर तक करता है।

धन्यवाद

कर्मचारी

राजस्थान पत्रिका, जोधपुर

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