हमारा न्यूजरूम कत्लगाह बनता जा रहा है…

Pushya Mitra न्यूजरूम में एक प्रधान संपादक का कोलेप्स कर जाना… एक बड़े हिंदी अखबार का प्रधान संपादक रात साढ़े दस बजे अपने ही न्यूज रूम में कोलेप्स कर जाता है. महज 55 साल की उम्र में. यह महज सहानुभूति और सांत्वना व्यक्त करने वाली खबर नहीं है. यह खबर कहीं अधिक बड़ी है. यह …

काला कानून वापस लेने तक ‘पत्रिका’ अखबार में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से जुड़ी खबरें नहीं छपेंगी

Pushya Mitra : राजस्थान की रानी के आगे रीढ़ सीधी करके खड़े होने के लिये पत्रिका समूह का शुक्रिया। आजकल यह संपादकीय परंपरा विलुप्त होती जा रही है। मगर एक बात मैं कभी भूल नहीं सकता कोठारी जी, आप अपने ही कर्मियों के तन कर खड़े होने को पसंद नहीं करते। मजीठिया वेतनमान मांगने वाले हमारे पत्रकार साथियों को पिछले दो साल से आप जिस तरह प्रताड़ित कर रहे हैं, किसी को नौकरी से निकाल रहे हैं, किसी का दूरदराज तबादला कर रहे हैं। यह जाहिर करता है कि आपमें भी उसी तानाशाही के लक्षण हैं, जो राजस्थान की महारानी में हैं।

देश के सभी बड़े न्यूज चैनलों में अंबानी का पैसा लगा है!

Pushya Mitra : एनडीटीवी वाले मामले से और कुछ हुआ हो या न हो, मगर यह जरूर पता चल गया कि देश के टॉप टेन चैनलों में से शायद ही कोई बचा हो जिसमें अम्बानी का ठीक ठाक पैसा न लगा हो (NDTV में भी प्रणव-राधिका के तमाम शेयर अंबानी के पास गिरवी हैं)। इस हिसाब से राष्ट्रवादी हो, बहुराष्ट्रवादी हो या साम्यवादी हो। तकरीबन हर न्यूज़ चैनल अंततः अम्बानी न्यूज़ ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई चीख कर बातें करता है तो कोई मृदुल स्वर में। कोई राष्ट्रवादियों को शेयरिंग कंटेंट उपलब्ध कराता है तो कोई उदारवादियों को।

पत्रकारों के लिये आजकल सबसे बड़ी चुनौती है खालिस पत्रकार के रूप में बचे रहना !

Pushya Mitra : आजकल पत्रकारों के लिये सबसे बड़ी चुनौती है, खालिस पत्रकार के रूप में बचे रहना। एक तो सैलरी कम है, दूसरा बुढ़ापे में बेरोजगारी का खतरा रहता है, सबसे इनसिक्योर जॉब है। फिर प्रलोभन भी कई हैं। राजनीतिक दल में जा सकते हैं, प्रवक्ता बन सकते हैं, किसी के जनसंपर्क अधिकारी बन सकते हैं, एक्टिविज्म के फील्ड में भी अब सातवां वेतन आयोग टाइप सैलरी मिलती है, किसी आयोग या संस्थान के सचिव-अध्यक्ष हो सकते हैं, किसी बड़े मंत्री या अधिकारी के लाइजनर बन सकते हैं, सरकारी तंत्र का सहयोग लेकर खुद का ही बड़ा धंधा शुरू कर सकते हैं, पत्रकार रहते हुए भी ट्रांसफर पोस्टिंग और ठेके दिलाने का साइड धंधा शुरू कर सकते हैं।

पत्रकार पुष्य मित्र ने योगी आदित्यनाथ की तुलना शहाबुद्दीन से कर डाली

Pushya Mitra : दिलचस्प है कि कुछ महीने पहले कुछ लोग शहाबुद्दीन की तारीफ जिस अंदाज में करते थे, आज कुछ दूसरे लोग योगी आदित्यनाथ की तारीफ उसी अंदाज में कर रहे हैं। गुंडई से किसी को परहेज नहीं है, बस गुंडा अपना होना चाहिये।

मोदी और नीतीश जैसों ने हर स्तर पर लोकतंत्र का बैंड बजा रखा है…

Pushya Mitra : मनोहर पर्रिकर और राजनाथ सिंह जैसे ताकतवर मंत्रियों का राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी थामने के लिये उतावलापन बता रहा है कि हाल के दिनों में किस तरह बहुत तेजी से सत्ता का केंद्रीकरण हो रहा है। PMO और CMO जैसी संस्थाओं में आजकल पूरी सरकार केंद्रित हो जा रही है। सारा काम वहीँ से निर्देशित हो रहा है। मंत्रियों के पास अब कोई काम नहीं रहा है, फाइलों पर दस्तखवत करने के सिवा। उनके पास अब इतना ही पॉवर रहा है कि अपने कुछ लोगों को लाभ दिला सकें। कुछ टेंडर वगैरह पास करवा सकें।

पुष्य मित्र के उपन्यास ‘रेडियो कोसी’ में रेणु की भाषा की गूंज आपको जरूर सुनाई देगी

Pushya Mitra : लीजिये। नये साल के दूसरे दिन ‘रेडियो कोसी’ सुनिये, लिंक ये https://youtu.be/oQyokiwol7c  है। परिकल्पना है Basu Mitra की। आवाज Shefali Chaturvedi की। वीडियो संयोजन दोस्त Pashupati Sharma के मित्र परवेज ने किया है। फाइनल शेप Shailendra Kumar ने दिया है, जिनका पता Avinash Gautam से मिला। Arun Chandra Roy तो चीफ प्रोड्यूसर हैं ही। पसंद उन लाखों कोसीवासियों की है जो कोसी तटबंध के बीच बसे 300 गांवों में रहते हैं।

जानिए पटना का एक बेबाक पत्रकार क्यों है नीतीश कुमार का मुरीद

Pushya Mitra : नीतीश कुमार की एक बात मुझे पसंद है. वे कल्चर ऑफ डिनायल से काफी हद तक उबर चुके हैं. पहले तो बड़ी घटनाओं के बाद हफ्तों मौन रह जाते थे, (जैसे आजकल मोदी करते हैं) मगर अब वे फेस करते हैं और कार्रवाई करते हैं चाहे दूसरी तरफ अपनी ही साख दाव पर क्यों न लगी हो. गोपालगंज वाले कांड में प्रशासन ने लीपापोती की पूरी तैयारी कर ली थी, फरजी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी बन गये थे. मगर यह नीतीश का ही स्टैंड था कि अधिकारियों को यू-टर्न लेना पड़ा और आज पूरा थाना सस्पेंड हो गया है.

अगले तीन माह : मीडियाकर्मियों से पेपर्स पर साइन कराया जाएगा, श्रम विभाग में पक्ष में रिपोर्ट देने को धमकाया जाएगा!

जिस मजीठिया वेतन आयोग के 28 अप्रैल की सुनवाई के बाद लागू हो जाने का सपना देश के हजारों प्रिंट मीडिया के साथी देख रहे थे, वह उन सात सौ साथियों की वजह से अगले तीन महीने के लिए लटक गया है, जिन्होंने लिखकर दे दिया है कि हमें मजीठिया का लाभ नहीं चाहिये, हम अपनी कंपनी द्वारा दिये जा रहे वेतन सुविधाओं से संतुष्ट हैं. अब तीन महीने के दौरान राज्य के श्रम आयोग में एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति होनी है और उसे इस बात की जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को पेश करनी है, कि अखबारों ने अपने यहां मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू की हैं या नहीं.