
Yashwant Singh : शौचालय जाने पर जीएसटी वसूलने वाले आज़ादी के बाद के पहले प्रधानमंत्री बने मोदी। पंजाब में रोडवेज बस स्टैंड पर सुलभ शौचालय की रसीद है ये। 5 रुपये शौच करने का चार्ज और एक रुपया जीएसटी। कुल 6 रुपये। महंगाई इतनी, गरीब खा न पाए, और, अगर हगने जाए तो टैक्स लिया जाए।
उधर बिहार में हगने गए कई सारे गांव वालों को गिरफ्तार कर लिया गया, क्या तो कि खेत में, खुले में, क्यों हग के गन्दगी फैला रहे हो। बेचारे सोच रहे होंगे कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों और मुगलों का राज था। कम से कम चैन से, बिना टैक्स के, हग तो पाते थे।
हमारे बड़े भाई और चिंतक राजीव नयन बहुगुणा जी सही लिखते हैं–
”यह धरती मनुष्य अथवा मवेशियों के मल से नहीं, अपितु पोइलथिन, पेट्रोल, डीज़ल, कारखानों के धुएं अथवा वातानुकूलित संयंत्रों की गैस से दूषित होती है। और भी कई कारक हैं, मैने कुछ गिनाए। इन प्रदूषक तत्वों के लिए अमेरिका, चीन जैसे देश और भारत मे अम्बानी, अडानी जैसे उत्तरदायी हैं। खुले में शौच जाने वालों से पहले इन पर रोक लगाओ। बात बाहर या भीतर शौच जाने की नहीं , अपितु टट्टी के सदुपयोग की है हंसिये मत। गांधी जी यही करते थे। वह मैले से खाद बनाते थे। पुरानी कहावत भी है :-
गोबर, टट्टी और खली
इससे खेती दुगनी फली
गोबर और मल से गैस, ऊर्जा बनाने की तकनीक कब की आ चुकी। लेकिन ध्यान कौन दे। भारत के साथ एक पड़ोसी देश के युद्ध के समय एक नेता ने बयान दिया था- ”हमारी पूरी आबादी अगर एक साथ हग दे, तो वह लघु राष्ट्र उसी में दब जाएगा।” मैं संशोधन कर कहना चाहता हूं कि 120 करोड़ आबादी के मल मूत्र का अगर उपयोग हो जाये टिहरी जैसे 6 बांधों से अधिक ऊर्जा पैदा हो सकती है। किसी बस्ती, शहर अथवा गांव के शौचालयों का मल एक टैंक में इकट्ठा कर गैस निकाल ली जाए, और शेष उच्चिष्ट से खाद बने। लेकिन यह काम पैसा लेकर शौचालय चलाने वाले किसी गू माफिया के सुपुर्द न हो, बल्कि ग्राम एवम नागर समाज को दीक्षित किया जाए। मनुष्य, मवेशी, पशु तथा पखेरू की टट्टी इस धरती की धरोहर है।
आदरणीय शीश राम कंसवाल जी बताते हैं कि रेतीले इस्राइल को उपजाऊ बनाने के लिए विश्व भर से टट्टी खरीद कर खेतों में डाली गई , और आज इस्राइल खेती का सिरमौर है। इस पृथ्वी नामक उपग्रह के लिए विष है धन पशु की टट्टी। यह धन पशु कौन है? यह वही है जो खरबों की सार्वजनिक सम्पदा का गोलमाल कर विदेश में जा छुपता है, अथवा अपने पाप की कमाई से एक एक कर सारे चैनल खरीद डालने में जुटता है। और धन पशु की टट्टी क्या है? कारखानों से निकला रासायनिक कचरा एवं धुंआ, पॉलीथिन की पन्नी, पेट्रो केमिकल का कबाड़, शराब और कपड़े की मिल से निकला खलदर, खेतों को शनैः बांझ बनाने वाली रसायनिक खाद इत्यादि। धनपशु खुले में शौच करता है। इसकी टट्टी से जल, थल नभ अधमरे हो रहे हैं। इसे खुले में शौच से रोको। मनुष्य और मवेशी की मल सम्पदा का सदुपयोग करो। इससे धरती की सेहत सुधारो और ऊर्जा बनाओ।”
भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.



अमित कुमार
July 27, 2017 at 7:05 pm
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