
संजय कुमार सिंह
अखबारों की खबरों के जरिए सरकार के समर्थन और पक्ष में कहानी गढ़ने की कोशिशों के तहत बताया गया है, विधानसभा भंग, ममता सीएम नहीं, रुखसत आदि। इस चक्कर में अखबारों ने कई प्रमुख खबरों को कम महत्व दिया है। उदाहरण के लिए, द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – तमिलनाडु की त्रिशंकु विधानसभा में द्रमुक प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक का समर्थन करने की संभावना तलाश रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने ‘निजी कारणों से’ एसआईआर के बंगाल ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दिया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कांग्रेस के मोताब शेख की अपील सुनने के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया था। मोताब बाद में फरक्का से जीत गए और कांग्रेस के दो में से एक विधायक हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – काश जिस तेजी से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति हुई उसी तेजी से जजों की नियुक्ति होती। पटना में भाजपा मंत्रिमंडल का विस्तार, उसमें प्रधानमंत्री का मौजूद रहना और नीतिश कुमार के बेटे को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाना भी आज की बड़ी खबरों में है लेकिन अमर उजाला के पहले पन्ने की खबरों में 1) भाजपा कार्यकर्ताओं पर बम हमला, पांच घायल 2) सीएम मान के ओएसडी के यहां ईडी का छापा 3) नोएडा हवाई अड्डे से उड़ान 15 जून से शुरू होगी जैसी सरकारी प्रचार की खबरें हैं। यही नहीं, सेना ने कहा है – आतंकियों की कोई पनाहगाह सुरक्षित नहीं, ऑपरेशन सिन्दूर में जो किया था वह भी पहले पन्ने पर पांच कॉलम की खबर है। देशबन्धु की दो खबरें 1) चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया बहुमत की तानाशाही 2) दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध निश्चित रूप से सरकार के खिलाफ है और ये अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं हैं।
ममता बनर्जी ने चुनाव हारने के बाद कहा था, वे हारी नहीं हैं उन्हें हराया गया है – इस्तीफा नहीं देंगी और ‘हराने वाले’ परेशान हो गए। यह परेशानी खबरों में दिखी, सोशल मीडिया पर खुलकर दिखी। आज अखबारों की लीड के रूप में दिख रही है। मुद्दा यह है कि विधायक पांच साल के लिए चुना जाता है विधानसभा का कार्यकाल पांच साल ही होता है। विशेष कारण से पहले गठन नहीं किया जाए या कार्यकाल खत्म नहीं किया जाए तो तय समय पर कार्यकाल खत्म हो जाएगा विधानसभा भंग हो जाएगी। इसीलिए निश्चित समय पर चुनाव कराए जाते हैं ताकि विधानसभा का कार्यकाल पूरा होते ही नई विधानसभा का गठन हो जाए और पुराने मुख्यमंत्री के इस्तीफा देते या कार्यकाल खत्म होते ही नए मुख्यमंत्री का शपथग्रहण हो जाए। ऐसे में ममता बनर्जी के इस्तीफा नहीं दूंगी कहने का बहुत मतलब नहीं था जो था या है वह तकनीकी ही है। लेकिन चिन्ता चुनाव में की गई गड़बड़ी को सुरक्षा देने का था और ममता बनर्जी के इस्तीफे के बहाने चुनाव की गड़बड़ी पर चर्चा न होने लगे इसलिए प्रचारक यह बताने में लग गए कि ममता बनर्जी गलत कर रही हैं, उनके इस्तीफा नहीं देने का कोई मतलब नहीं है आदि आदि। इन्हीं बातों को साबित करने तथा आम आदमी को यकीन दिलाने के लिए आज अमर उजाला का शीर्षक है, ममता अब सीएम नहीं, विधानसभा भंग नए मुख्यमंत्री के चयन के लिए बैठक आज। लेकिन यह नहीं बताया गया है कि कार्यवाहक मुख्यमंत्री कौन है, राज्यपाल सरकार के मुखिया हैं या राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। जाहिर है, बंगाल की चिन्ता और बंगाल की खबर को प्रमुखता देने का कारण सबको मालूम है। भाजपा का राज्य चुनाव जीतना या पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनाने का प्रधानमंत्री का सपना पूरा होने जैसा है। वरना, चुनाव और भी चार राज्यों में हुए हैं। विधानसभाएं वहां की भी भंग होनी हैं, इस्तीफा वहां भी मुख्यमंत्रियों को देना है, नए मुख्यमंत्री वहां भी चुने जाने हैं और वहां भी शपथग्रहण होना है लेकिन बंगाल की खबर सबसे बड़ी या महत्वपूर्ण है। बंगाल में मुख्यमंत्री कौन होगा तय नहीं है, चयन के लिए बैठक आज है लेकिन शपथग्रहण कल होगा यह खबर है। दूसरी ओर, तमिलनाडु में सबसे बड़े दल को कांग्रेस के पांच विधायकों का समर्थन मिलने के बाद बहुमत से पांच ही सीट कम है। दूसरी पार्टियां काफी पीछे हैं, सबसे बड़े दल के नेता तय हैं और वे सरकार बनाने का दावा कर चुके हैं लेकिन राज्यपाल कह रहे हैं कि पूर्ण बहुमत का सबूत चाहिए और परंपरा होने के बावजूद सरकार नहीं बन रही, शपथग्रहण का पता नहीं है लेकिन यह खबर छोटी है, कम महत्वपूर्ण है।
एक तरफ अगर पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने का मामला सबसे महत्वपूर्ण लग रहा है तो तमिलनाडु में खेल होने की संभावना है। द हिन्दू के अलावा टाइम्स ऑफ इंडिया में भी इससे संबंधित खबर है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड विजय को मौका नहीं देने और संकट गहराने की खबर है। नवोदय टाइम्स में ज्यादातर भर्ती की खबरें हैं और ऑपरेशन सिन्दूर से संबंधित सेना का दावा टॉप पर, पूरी प्रमुखता से है। आम आदमी पार्टी से हिसाब बराबर करने के लिए ईडी के छापे की खबर भी है। दि एशियन एज की लीड भी तमिलनाडु में विजय के शपथग्रहण के लिए राज्यपाल की शर्त है तो यहां ऑपरेशन सिन्दूर की तारीफ प्रधानमंत्री ने की है और यह भी बताया है कि उन्होंने भारत के आतंकवादी रुख का समर्थन किया। मणिपुर में तीन साल से चल रही हिन्सा और उसपर सरकारी रुख आप जानते हैं। अब यह पुरानी बात हो गई और यह भी सबको पता है कि इन्हीं कारणों से मणिपुर की खबर दिल्ली में पहले पन्ने पर नहीं के बराबर होती है। दि एशियन एज की खबर के अनुसार, म्यामार के कुकी आतंकियों ने मणिपुर के सीमाई गांवों पर हमला किया, घर जला दिया। इससे जाहिर है कि मणिपुर के गांव में म्यामार के आतंकी हमला कर रहे हैं तो दिल्ली के अखबार पाकिस्तान से होने वाले आतंकी हमले नहीं होने या पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर देने की बात कर रहे हैं।
आज मेरे अखबारों में द टेलीग्राफ सबसे अलग है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद से बंगाल में चल रही हिंसा महत्वपूर्ण और चिन्ता की बात है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तमाम दावे किए थे। तृणमूल के गुंडों को उल्टा लटकाकर सीधा करने की बात की थी लेकिन हिंसा है कि रुक नहीं रही है। मुख्यमंत्री पद के दावेदार सुवेन्दु अधिकारी के सहायक की हत्या कर दिए जाने के बाद उन्होंने इसे “पूर्व-नियोजित हत्या” और अपने लिए “व्यक्तिगत क्षति” बताया था। यह घटना कोलकाता के पास मध्यमग्राम में हुई थी, जहां अज्ञात हमलावरों ने चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी थी। चुनाव के दौरान की गई विशेष सुरक्षा व्यवस्था और उसके बाद नतीजे पलटने पर हिंसा की आशंका तो थी ही। चुनाव के बाद राज्य में पहले भी हिंसा होती रही है। सुरक्षा के उपाय सरकार को करने थे और हिंसा में भाजपा व तृणमूल दोनों के लोग मारे गए हैं। इसलिए, इस हिंसा के लिए सिर्फ तृणमूल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है और यह तो दिख ही रहा है कि केंद्र सरकार के दावों का कोई असर नहीं है या वे हाथी के दांत से ज्यादा कुछ नहीं हैं। ऐसे में चुनावी हिंसा से संबंधित खबर ज्यादा जरूरी थी। टेलीग्राफ के पहले पन्ने का बड़ा हिस्सा इसी पर केंद्रित है। अखबार ने लिखा है कि 50 सेकेंड के इस ऑपरेशन का कोई औऱ सुराग नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



