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साहित्य

दिव्य प्रकाश दुबे और नीलोत्पल मृणाल : हिंदी के नए स्टार लेखक!

राकेश कायस्थ-

हिंदी के लेखक के सेलिब्रिटी बनने की कथा दिव्य प्रकाश दुबे जैसे लोगों के साथ शुरू होती है। हिंद युग्म ने विनोद कुमार शुक्ल की कुल 95 हज़ार किताबें बेची हैं और उनसे मिली रॉयल्टी को लेकर हिंदी जगत में विस्मय, अविश्वास और बहस का सिलसिला जारी है। लेकिन दिव्य प्रकाश वो लेखक हैं, जिनकी किताबों की बिक्री की संख्या 2 लाख पार कर चुकी है। ऐसा तब है, जब पायरेटेड किताबें भी बाज़ार में हैं, जिनकी रॉयल्टी लेखकों को नहीं मिलती।

बिना किसी इवेंट में गये इस चमत्कार को नहीं समझा जा सकता है। नये जमाने के सेलिब्रिटी लेखक अपने प्रशंसकों से उसी तरह घिरे रहते हैं, जिस तरह कोई फिल्म स्टार। बिना अतिश्योक्ति के बता रहा हूं कि कई बार तो किताब पर हस्ताक्षर लेने वालों की कतार लगी होती है।

ऐसे मौकों पर दिव्य प्रकाश या नीलोत्पल मृणाल के आजू-बाजू खड़े होने का मतलब ये मान लिया जाना है कि आप भी उन्हीं की तरह कोई सिद्ध पुरुष या माइल्ड वर्जन सेलिब्रिटी होंगे। पुस्तक मेलों में इसी चक्कर में कई बार मेरी किताबें भी बिकी हैं।

दिव्य प्रकाश भारतीय और विश्व साहित्य की किताबें खूब पढ़ते हैं लेकिन जो पढ़ते हैं, उनका लेखन उससे अलग है। एक आम युवा के संघर्ष, सपने और संबंधों की कथाएं उसी की भाषा में लिखते हैं। उन्हें लगता है कि धीरे-धीरे उनका पाठक इतना इवॉल्व हो जाएगा कि वो अपने लेखन के साथ बड़े प्रयोग करने के जोखिम भी उठा पाएंगे।

दिव्य प्रकाश का लेखन लगभग अराजनीतिक है। लेकिन नीलोत्पल मृणाल के साथ ऐसा नहीं है। उनकी किताबों की भी 2 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। नीलोत्पल के लेखन में युवाओं के सवालों के साथ राजनीतिक ध्वनियां साफ तौर पर सुनी जा सकती हैं और जाहिर वो ध्वनियां दक्षिणपंथी नहीं हैं। रायपुर के जिस कार्यक्रम में विनोद कुमार शुक्ल को रॉयल्टी चेक दिया गया, वहां महफिल लूटने वाले अपने सत्र में नीलोत्पल ने हायपर नेशलिज्म और वीररस में हाँफ रहे मंचीय कवियों का भरपूर मजाक उड़ाया।

यह सच है कि `हिंदी की बुक’ ढूंढ रहे नौजवानों में बहुत बड़ी संख्या फर्स्ट टाइम रीडर्स की होती है। इस भीड़ से बात करना बदलते ट्रेंड को समझने में काफी मददगार होता है। नौजवानों की भीड़ में दो-चार ऐसे भी मिलते हैं, जिनकी बौद्धिकता हैरान करती है और इस बात पर विवश करती है कि अत्याधिक सरलीकृत निष्कर्ष निकालने से पहले हम थोड़ा ठहरकर सोचें।

इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी के जो नये लेखक व्यवसायिक तौर कामयाबी हासिल कर रहे हैं, उसमें उनकी शख्सियत और युवाओं से सहज रूप से कनेक्ट करने की क्षमता का भी बहुत बड़ा योगदान है। दिव्य प्रकाश दुबे लगातार अलग-अलग कैंपस में अपने इवेंट करते रहे हैं।

आजकल किस्सागोई का उनका इवेंट भरपूर शोहरत बटोर रहा है। गपशप वाले अंदाज़ में कहानी सुनाते हुए दो-ढाई घंटे तक दर्शकों को बांधे रखने का उनका कौशल वाकई हैरान करता है। प्रिंट से लेकर ऑडियो और मंचीय प्रस्तुति तक हिंदी लेखक अपने आप में एक कंप्लीट पैकेज बनना नये समय की एक बड़ी परिघटना है।

दिव्य प्रकाश की स्टोरीबाजी का अगला शो मुंबई में है। अगर अलग तरह से बढ़ती हिंदी का नया रूप देखना हो और सक्सेस स्टोरी को समझना हो तो शो देख आइये।

डिस्क्लेमर—इस विज्ञापन नुमा पोस्ट के लिए मैंने दिव्य प्रकाश दुबे से पैसे नहीं लिये हैं। वैसे मैं स्वभाव से संकोची हूं। दुबेजी अगर लाख-दो लाख रुपये दे भी दें तो संकोच के मारे मैं मना नहीं कर पाउंगा।

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