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हिंदी भाषा के साथ छेड़छाड़ : क्या मीडिया ने बदल डाला स्वरूप?

बिट्टू वर्मा-

हिंदी, जो अपनी जड़ों में संस्कृत से पोषित हुई भाषा है, समय के साथ सिर्फ बोलचाल में नहीं, बल्कि लेखन में भी कई बदलावों से गुज़री है। इनमें से एक बड़ा बदलाव है हिंदी की लिपि और व्याकरणिक चिह्नों के साथ हुआ छेड़छाड़—जिसे न केवल तकनीकी प्रगति ने, बल्कि मीडिया जगत ने भी अनजाने में बढ़ावा दिया।

चँद्रबिंदु की गुमशुदगी: एक अक्षरी हानि
हिंदी भाषा में प्रयुक्त ‘चँद्रबिंदु’ (ँ) का प्रयोग नासिक्य ध्वनि के लिए होता है, जो उच्चारण में सूक्ष्म परंतु अत्यंत आवश्यक है। उदाहरणस्वरूप “हँस” और “हंस” में स्पष्ट भेद है—एक पक्षी है, दूसरा क्रिया। लेकिन जब कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग का चलन शुरू हुआ, तो ‘कुर्ती देव’ जैसे शुरुआती फॉन्ट्स ने इस चिह्न के साथ न्याय नहीं किया। चँद्रबिंदु ठीक से अक्षरों के ऊपर न बैठ पाने के कारण, लोगों ने विकल्प स्वरूप ‘बिंदी’ का उपयोग शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप, ‘माँ’ बन गई ‘मां’, ‘चाँद’ बन गया ‘चांद’, और ‘हूँ’ बन गया ‘हूं’। धीरे-धीरे यह ‘सुविधाजनक अशुद्धि’ आम हो गई। चिह्न का नाम भी ‘चँद्रबिंदु’ से ‘चंद्रबिंदु’ कर दिया गया, यानी स्वरूप के साथ-साथ उसकी आत्मा भी बदल गई।

मीडिया की भूमिका: सुविधा या लापरवाही?
इस परिवर्तन में मीडिया का योगदान भी कम नहीं रहा। समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में कुर्ती देव फॉन्ट के प्रयोग ने इन अशुद्धियों को आम जनता तक पहुँचाया। जब अख़बारों में ही चँद्रबिंदु, नुक़्ता या पूर्ण विराम का प्रयोग बंद हो गया, तो पाठकों ने भी उन्हें ग़ैरज़रूरी मान लिया। फॉन्ट की असुविधा और टाइपिंग की जल्दबाज़ी ने शुद्धता को बलि चढ़ा दिया।

नुक़्ता भी हुआ उपेक्षित
‘राज़’ और ‘राज’, ‘ज़हर’ और ‘जहर’ जैसे शब्दों में उच्चारण और अर्थ का अंतर स्पष्ट है। परंतु ‘ज़’ (नुक़्ते के साथ) टाइप करने में जब कठिनाई हुई, तो उसे भी त्याग दिया गया। इस पर बहस हुई कि ये अरबी-फारसी मूल के शब्द हैं और हिंदी से बाहर हैं, मगर जब ये शब्द हिंदी में बोले और समझे जाते हैं, तो उन्हें सही रूप में लिखना ही ईमानदारी है। देवनागरी लिपि की विशेषता ही है कि वह नए ध्वनियों को आत्मसात कर सकती है—फिर यह संकीर्णता क्यों?

पूर्ण विराम की जगह Full Stop और अन्य प्रतीक
एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन है पूर्ण विराम (।) का लुप्त हो जाना। डिजिटल मीडिया ने इसे अंग्रेज़ी के Full Stop (.) से बदल दिया है। साथ ही प्रश्नवाचक चिह्न (?) और अन्य प्रतीकों का बढ़ता प्रयोग भी भाषा की मूल संरचना को प्रभावित कर रहा है। भले ही ये बदलाव व्यावहारिक लगें, परंतु ये भाषा की मौलिकता को खंडित करते हैं।

तकनीकी दोष या सामाजिक सहूलियत?
जहाँ एक ओर फॉन्ट्स और तकनीक को दोष दिया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि हमने ‘सुविधा’ को ‘शुद्धता’ पर तरजीह दी। नई पीढ़ी को न तो चँद्रबिंदु का सही उपयोग सिखाया गया, न नुक़्ते का महत्व समझाया गया। ऐसे में यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सामाजिक चूक भी है।

अब क्या किया जाए?
आज हमारे पास मंगल, यूनिकोड और अन्य आधुनिक फॉन्ट्स उपलब्ध हैं जो सही टंकण की सुविधा देते हैं। ऐसे में अब ज़रूरत है जागरूकता की। सबसे बड़ी भूमिका मीडिया की हो सकती है—जो जैसा लिखेगा, समाज वैसा ही सीखेगा। हमें भाषा के मूल स्वरूप को न केवल संरक्षित करना होगा, बल्कि अपनी नई पीढ़ी को इसके प्रयोग की शिक्षा भी देनी होगी।

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