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सुख-दुख

पत्रकार का जीवन उस ‘अदृश्य परदे’ के पीछे की लंबी साधना है, जिसे न समाज देख पाता है, न सरकार महसूस कर पाती है!

पत्रकारों को केवल प्रेस कार्ड देने से बात नहीं बनेगी, उन्हें संरक्षण देना होगा- सामाजिक, क़ानूनी और मानवीय

कुछेक पत्रकार जब अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते, जब संस्थागत समर्थन नहीं मिलता, जब सरकारी संरक्षण नहीं होता—तो कभी-कभी वह विकल्पों की उस गली में प्रवेश कर जाते हैं जो पत्रकारिता के आदर्शों से समझौता कराता है….

विनोद भारद्वाज-

त्रकार का जीवन बहुधा उस चमक-दमक से जोड़कर देखा जाता है, जो समाचार चैनलों की स्क्रीन या अख़बारों की शीर्ष पंक्तियों में दिखाई देती है। आम धारणाएँ बन चुकी हैं कि पत्रकार एक प्रभावशाली वर्ग है, जिसकी पहुँच सत्ता के गलियारों, प्रशासनिक केबिनों और सामाजिक आयोजनों तक है। उसे देखकर यह भ्रम पाल लेना सहज हो गया है कि उसके पास सब कुछ है—प्रतिष्ठा, सुविधा, पहचान, और एक हाई प्रोफाइल जीवनशैली। लेकिन यह छवि उतनी ही कृत्रिम है जितनी किसी रंगमंच की—जहाँ मंच पर सब कुछ भव्य दिखाई देता है, मगर परदे के पीछे अंधेरे, थकान, अव्यवस्था और जद्दोजहद की धड़कनें हैं। पत्रकार का जीवन वास्तव में उस ‘अदृश्य परदे’ के पीछे की लंबी साधना है, जिसे न समाज देख पाता है, न सरकार महसूस कर पाती है।

एक पत्रकार का दिन किसी तय समय की परिधि में नहीं चलता। सुबह की चाय ठंडी हो जाए या रात की नींद अधूरी रह जाए, यह उसके पेशे की मांग का हिस्सा है। खबरें इंतज़ार नहीं करतीं—न सुबह का, न रात का, न त्योहारों का और न ही पारिवारिक जिम्मेदारियों का। जब समाज घरों में त्योहार मना रहा होता है, तब एक पत्रकार किसी विस्फोट, सड़क हादसे, दंगे या प्राकृतिक आपदा की रिपोर्टिंग में खड़ा होता है। उसकी पत्नी और बच्चे, उसके माँ-बाप, उसका परिवार—सभी उसके समय से वंचित रहते हैं। वे केवल उसकी अनुपस्थिति की आदत पालते हैं, क्योंकि पत्रकारिता में ‘समय देना’ एक विलासिता है जो उसके पास नहीं होती।

यह पेशा जितना जिम्मेदारीपूर्ण है, उतना ही असुरक्षित भी। एक पत्रकार को कई बार ऐसी खबरों का पीछा करना पड़ता है, जिनसे उसे खतरे होते हैं—सामाजिक, राजनीतिक, यहाँ तक कि शारीरिक भी। कई पत्रकारों ने अपनी जान सिर्फ इसलिए गंवाई क्योंकि उन्होंने किसी सच्चाई को उजागर करने का दुस्साहस किया। कईयों ने शोषण झेला क्योंकि उन्होंने सवाल पूछने की हिम्मत की…ऐसे सवाल जिन्होंने उन्हें विद्रोहियों के तमगा दिलवा दिया! ये जो पत्रकार हैं वे न किसी यूनियन के सहारे टिके होते हैं, न किसी अनुबंध के। ज़्यादातर पत्रकार ‘प्रोबेशन’ की एक अंतहीन अवधि में कार्य करते हैं, जहाँ संस्थानों की नीतियाँ और मालिकों की मर्ज़ी उनका भविष्य तय करती है। अधिकाँश की नौकरी स्थायी नहीं होती, वेतन का कोई भरोसा नहीं होता, और सामाजिक सुरक्षा तो जैसे एक सपना मात्र है।

पत्रकारों के जीवन में सबसे त्रासद पक्ष यह है कि वे दूसरों की समस्याओं को तो आवाज़ देते हैं, लेकिन अपनी पीड़ा के लिए उनके पास कोई मंच नहीं होता। वे शोषण के खिलाफ दूसरों की लड़ाई लड़ते हैं, मगर अपने हक के लिए चुप रहने को विवश होते हैं। संस्थान उन्हें केवल ‘कंटेंट क्रिएटर या प्रोड्यूसर’ समझते हैं—एक ऐसा संसाधन, जिसे काम निकल जाने के बाद दूध में से मक्खी की तरह बाहर कर दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर कोविड काल ने इस अमानवीयता की पराकाष्ठा कर दी, जब ‘कॉस्ट कटिंग’ के नाम पर तमाम पत्रकार बेरोज़गार कर दिए गए। यह किसी एक संस्थान की कहानी नहीं, पूरी इंडस्ट्री का चरित्र बन चुका है।

यहाँ एक और पक्ष पर बात करना जरूरी है कि जब एक पेशा निरंतर अभावों, असुरक्षा और असम्मान की भूमि पर खड़ा किया जाता है, तो उसकी नैतिकता भी डगमगाने सी लगती है। कुछेक पत्रकार जब अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर पाते, जब संस्थागत समर्थन नहीं मिलता, जब सरकारी संरक्षण नहीं होता—तो कभी-कभी वह विकल्पों की उस गली में प्रवेश कर जाते हैं जो पत्रकारिता के आदर्शों से समझौता कराता है। यह समझौता कभी किसी सत्ताधारी दल के साथ गठजोड़ के रूप में होता है, कभी किसी व्यवसायिक घराने के हित में रिपोर्टिंग के रूप में।

समाज इसे ‘बिकाऊ मीडिया’ कहता है, लेकिन शायद यह सोचने की भी आवश्यकता है कि बिकने के हालात क्यों बनते हैं। हर बिकने वाला पत्रकार दोषी नहीं, बल्कि तमाम कहीं न कहीं उस व्यवस्था के पीड़ित होते हैं, जिसने उन्हें विकल्पहीन कर दिया। यह किसी का पक्ष नहीं है और ना ही गलत को सही साबित करने की कोशिश…बस एक पक्ष है जिसपर ध्यान देकर कुछ ठीक की कोशिश संभव है।

हालाँकि इन तमाम विडंबनाओं और कठिनाइयों के बीच भी पत्रकारिता में तमाम ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ, डर या प्रलोभन के, अपने जीवन को राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित किए हुए हैं। ऐसे पत्रकार, जिनकी कलम सत्ता की चापलूसी नहीं, सच्चाई की शपथ लेती है। वे जानते हैं कि उनकी राह कठिन है, लेकिन उन्हें यह भी पता है कि लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत रखने की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है। और यह कर्तव्य किसी सुविधा, वेतन या मान्यता से प्रेरित नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन से उत्पन्न होता है।

आज जब पाठक डिजिटल माध्यमों की ओर बढ़ रहे हैं, जब सूचना की गति रॉकेट जैसी हो गई है, सत्य और झूठ के बीच की दूरी मात्र एक क्लिक रह गई है—तब पत्रकार के लिए चुनौती और बढ़ गई है। अब वह केवल खबर लिखने वाला नहीं, बल्कि एक डिजिटल योद्धा है, जिसे ट्रोलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न और मानसिक दबाव के बीच भी संयम, विवेक और सत्यनिष्ठा के साथ खड़ा रहना है। यह केवल पेशे की बात नहीं, बल्कि आस्था की बात है—एक ऐसी आस्था जो पत्रकार को केवल जीविकोपार्जन से नहीं, समाज की आत्मा से जोड़ती है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव नहीं, आत्म-संवाद का क्षण होना चाहिए—जहाँ हम इस बात का संकल्प लें कि पत्रकार अब केवल दूसरों के संघर्ष की कहानी नहीं लिखेगा, वह अपनी लड़ाई भी लिखेगा, उसे जियेगा और जीतकर दिखाएगा। सरकारों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा महज़ भाषणों से नहीं, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा से होती है। उन्हें केवल प्रेस कार्ड देने से बात नहीं बनेगी, उन्हें संरक्षण देना होगा—क़ानूनी, सामाजिक और मानवीय।

और पत्रकार साथियों को भी अब यह दुर्दशा अपनी नियति नहीं, चुनौती माननी होगी। उन्हें अपने भीतर वह सामूहिक चेतना जगानी होगी, जो हर अन्याय के खिलाफ खड़ी होती है—चाहे वह सत्ता से हो या अपने ही संस्थानों से।

हिंदी पत्रकारिता दिवस की पूर्वसंध्या पर हमें उन असंख्य कलमों को भी याद करना चाहिए जो शायद छप नहीं पातीं, लेकिन गहराई से लिखती हैं। उन चेहरों को – उन जज़्बों को प्रणाम करना चाहिए जो तमाम संकटों के बावजूद पत्रकारिता को मात्र एक पेशा नहीं, एक नैतिक धर्म मानते हैं।

यदि हम इस दिन को महज़ औपचारिकता की बजाय एक नई शुरुआत का क्षण बना सकें—तो यही पत्रकारिता के सम्मान की पुनर्स्थापना होगी। और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत। पत्रकारिता: संघर्ष की वह साधना जिसे ग्लैमर समझ लिया गया है!!!

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