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सियासत

हिंदुओं में शत्रुभाव जगाता एक खास वर्ग राष्ट्रसेवा नहीं राष्ट्रद्रोह कर रहा है!

राहुल देव-

एक वर्ग आजकल हिन्दुओं को पढ़ा-सिखा रहा है कि उन्हें ‘शत्रु भाव’ जगाने की ज़रूरत है। वे यह भी कहते हैं अब तक के संतों-धर्माचायों-विचारकों ने हिन्दुओं को कायर, कमज़ोर और शांतिवादी बना दिया है। हिन्दू धर्म के इन विकृत व्याख्याकारों और नक़ली योद्धाओं को भारत/धर्म का दूरगामी हित नहीं दिखता उनका सीमित लक्ष्य केवल एक विचारधारा-दल-संगठनों को सत्ता में पहुँचाना और बनाए रखना है।

इसके लिए उन्हें सत्ता का संरक्षण-प्रोत्साहन-संसाधन तो मिलते ही हैं देश-विदेश के भ्रमित, मुसलमानों के प्रति शत्रुभाव से भरे जा चुके हिन्दुओं से भी धन मिलता है।

आप इन खोखली दहाड़ वाले भाड़े के काग़ज़ी सैनिकों को कभी हिन्दू धर्म शास्त्रों को उद्धृत करता नहीं पाएँगे। वे जानते हैं कि शास्त्रों में वह मिलेगा ही नहीं जो वे कह रहे हैं। हमारे शास्त्र जो ज्ञान, दृष्टि और भाव देते हैं वह अनिवार्यत: समन्वय-सामन्जस्य-प्राणिमात्र के प्रति मैत्री और एकात्म भाव जागृत करने, आंतरिक साधना और स्वाध्याय से जीवन के दो चरम लक्ष्यों-नि:श्रेयस-और सबके लिए अभ्युदय प्राप्त करने वाला है। उसमें किसी से भी शत्रुता की गुंजाइश ही नहीं है।

कुछ बड़े धर्माचार्य भीतर से इसी शत्रुभाव से भरे हैं लेकिन प्रवचनों-संवादों में ‘क्षात्रत्व-क्षात्र भाव’ की बात करते हैं।

इन सबकी बात मानी जाए तो यह मानना होगा कि भगवत्पाद आदि शंकराचार्य से लेकर जितने हमारे महानतम धर्माचार्य-संत-महात्मा-गुरु-शास्त्रकार हुए हैं वे न धर्म जानते थे न अपने समय के ख़तरे और परिस्थितियाँ। किसी ने उस समय तक भारत में आ चुके, जम चुके मुसलमानों के विरूद्ध कुछ नहीं बोला-लिखा। समाज को जो भी संदेश दिया ईश्वर-परायणता, ज्ञान, भक्ति, योग, जपतप और साधना का ही दिया।

तत्कालीन ख़तरों-शत्रुओं से लड़ने की प्रेरणा दी तो राजाओं-क्षत्रियों को ही दी। वर्णाश्रम व्यवस्था हर वर्ण को अलग-अलग कर्तव्य और ज़िम्मेदारियाँ देती है।

आज हमारे पास बाहरी आक्रमणों से रक्षा के लिए सेना है। आन्तरिक ख़तरों-अपराधियों के लिए पुलिस और ढेरों एजेंसियाँ हैं। हर नागरिक इस आत्मघाती शत्रुभाव से भर जाएगा तो शहर-शहर गली-गली हिंसा का तांडव ही होगा। ये लोग उसी की ज़मीन तैयार कर रहे हैं।

इस प्रक्रिया और उसके परिणामों को समझिए। यही बुद्धिमानी है। जहाँ दिलों में शत्रुता है वहाँ अधर्म है। धर्म के नाम पर अधर्म का यह व्यापार हमारे ही नहीं इसे मानने-फैलाने वाले हर धर्म और समाज को अंततः नष्ट करेगा।

हिन्दुओं को ही नहीं मुसलमानों को भी यह समझना होगा। उनके कुछ उग्रवादी वर्ग और धर्मगुरु अगर हर जगह ग़ैर-इस्लामी समुदायों के लिए शत्रुभाव फैलाएँगे तो अंततः अपना और इस्लाम का ही नुक़सान करेंगे। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की ज़रूरत उनको भी उतनी ही है जितनी दूसरे समुदायों को।

अभी तुरंत क्रुद्ध प्रतिक्रियाएँ आने लगेंगी इस्लाम-मुसलमानों-ईसाइयों के ख़तरे की, धर्मांतरण की, तमाम ‘जिहादों’ की जिन्हें लोगों के दिलोदिमाग़ में बैठाया गया है। उन्हें ऊपर उत्तर देने का संक्षिप्त प्रयास किया है।

सर्वोपरि सूत्र यह है कि भारत के सुरक्षित-सुदृढ़-समृद्ध भविष्य की एकमात्र गारंटी है भीतर से एक-एकात्म-परस्पर आत्मीय भाव से जुड़ा हुआ शांत समाज। इस आत्मीयता, बंधुता और एकता को जगाना ही राष्ट्र प्रेम है, राष्ट्र सेवा है। इसका उल्टा राष्ट्र द्रोह है।

इन शास्त्रद्रोही नक़ली और मूर्ख ‘हिन्दुत्व-वीरों’ की कमज़ोर नस है शास्त्र। शास्त्र की बात कीजिए, उनके उद्धरण सामने रख दीजिए ये अनर्गल प्रलाप, गाली-गलौज करने लगेंगे लेकिन शास्त्र पर नहीं आएँगे।

जिनको इन्होंने पढ़ा नहीं, समझा नहीं उन शास्त्रों का नाम लेकर ये शस्त्रों और हिंसा, मरने-मारने की बात करते हैं। शास्त्र को शस्त्र बनाते हैं। असली शास्त्रों को ही शस्त्र बना कर इन्हें हराया जा सकता है।

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