
कन्हैया शुक्ला-
अधिकतम 3 से 10 साल की हो सकती है सजा, श्रम न्यायालय के अधिकांश मामले में सिर्फ लगता है 500 रुपए का जुर्माना
भारतीय मूल के अरबपति और ब्रिटेन की सबसे अमीर हिंदुजा फैमिली को नौकरों को छुट्टी दिए बिना 18 घंटे काम कराने के लिए मजबूर करने और कम वेतन देने के दोष में साढ़े चार साल की सजा दी गई। वहीं भारत में कानून देखें तो डायरेक्ट इतनी बड़ी सजा नहीं है, पर कानून में कई ऐसे पेच हैं जिस कारण 10 साल की जेल हो सकती है।
हालांकि मौलिक अधिकार के तहत शोषण के विरूद्ध का अधिकार दिया गया है, इसे सबसे बड़ा अधिकार माना जाता है, लेकिन उल्लंघन करने पर सिर्फ जुर्माने का प्रावधान है। अब श्रमिक के पास न तो इतना पैसा है और न समय कि वह कोर्ट के वर्षों चक्कर लगाए।
आइए बिंदुवार कुछ कानूनों के बारे में जानें-:
1. कंपनी एक्ट 2013 की धारा 447 के तहत कम वेतन देना, समय पर वेतन न देना आदि को धोखाधड़ी माना जाता है इसके तहत कम से कम 6 माह से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है और उस राशि का तीन गुना जुर्माना लग सकता है।
2. आईपीसी की धारा 406 के तहत अगर कोई नियोक्ता आपके द्वारा किये गये कार्य की मजदूरी देने से इंकार करता है तो तीन वर्ष तक की सजा हो सकती है।
3. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 की धारा 22 के तहत श्रम इंस्पेक्टर 6 माह की जेल और अर्थदंड की सिफारिश कर सकता है।
4. मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936 की धारा 15 ( 3 ) के तहत श्रम इंस्पेक्टर कम वेतन की राशि का या वेतन न देने की राशि का 10 गुना जुर्माना लगा सकता है।
पैसों के आगे शिथिल होता कानून
अब कोई अमीर होता है ऐसे मामलों में उसे अधिकतम 10 साल की सजा होती। क्योंकि वह हाईकोर्ट भी जा सकता है। और ऐसे अपराध में अधिकतम सजा का प्रावधान होता है जो जानबूझकर किया गया हो।
लेकिन श्रमिक के मामले में 500 रुपए जुर्माना देकर छोड़ दिया जाता है। और वेतन का 10 गुना जुर्माना कुछ जज मुंह देखकर लगाता है। यदि श्रम अधिकारी से साठगांठ हो गई कि वह उस फैसले के खिलाफ अपील की गुजारिश नहीं करेगा तो भैया एक गुना जुर्माना श्रमिक को दे दो, पांच गुना मुझे दे दो।
हालांकि एक बार श्रम इंस्पेक्टर जो जुर्माना लगा देता है उसे कोर्ट मुश्किल से कम करता है। क्योंकि इंस्पेक्टर/सरकार हाईकोर्ट में जज की शिकायत करते हुए अपील कर देता है।
सबके लिए कोर्ट भी अलग अलग
1. कंपनी लॉ के तहत शिकायत करेंगे तो कंपनी ट्रिब्युनल कोर्ट में शिकायत दर्ज करानी पड़ेगी, जहां कोई भी नियोक्ता हो, जज सख्त सजा देने की कोशिश करता है।
2. आईपीसी के तहत जिला न्यायालय में परिवाद दायर करना पड़ता है, जहां नियोक्ता को सजा हो सकती है।
3. श्रम न्यायालय में यदि शिकायत किए तो अधिकतम 500 रुपए का जुर्माना लगाकर ही नियोक्ता को छोड़ दिया जाता है।


