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उत्तर प्रदेश

मृत्यु पर बोलते-बोलते मंच पर ही मृत्यु के आगोश में समा गए पूर्व मुख्य सचिव शंभुनाथ, देखें वीडियो

राजू मिश्रा-

जिंदगी औ मौत का कोई भरोसा नहीं। श्रीमती मनोरमा श्रीवास्तव कृत उपन्यास “व्यथा कौंतेय की” का लोकार्पण समारोह शाम 4 बजे से हिंदी संस्थान, लखनऊ के निराला सभागार में चल रहा था।

वरिष्ठ साहित्यकार, पूर्व सांसद उदय प्रताप कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि थे डा.बुद्धिनाथ मिश्र। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे पूर्व मुख्य सचिव एवं सुपरिचित साहित्यकार डा. शंभुनाथ ने दोनों हाथ में पुस्तक लेकर लहराई, सबको दिखाई।

जब वह वक्तव्य दे रहे थे, यकायक उन्हें ह्रदयाघात हुआ और प्राण पखेरू उड़ गए। हर कोई हक्का-बक्का रह गया। आयोजक दयानंद जी के बुलावे पर हम भी वहां हाजिर थे। मन बहुत विचलित है। परमात्मा दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे।


मुकुल महान-

ज़िंदगी और मौत की जंग, अंततः जीत ही गई…..मौत !

आज उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में ,इसी संस्थान के एक समय कार्यकारी अध्यक्ष रहे तथा उत्तर प्रदेश सरकार के कभी मुख्य सचिव रहे डॉ. शंभू नाथ जी आज एक पुस्तक लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे, 4.45 बजे शाम को प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम में लगभग 6.00बजे अपने उद्बोधन में महाभारत के पात्र कर्ण पर बोलते हुए कर्ण और अर्जुन वार्तालाप पर मृत्यु के अवश्यंभावी होने की दो छोटी कहानियां सुनाई और मृत्यु का एक तीसरा किस्सा सुनाते हुए ही अचानक मृत्यु उन्हें उद्बोधन के दौरान ही अपने मजबूत पंजों में जकड़ के ले गई।

आज हिन्दी संस्थान परिसर के मुख्य द्वार पर मैंने ही उनके आगमन का जीवंत स्वागत किया और उसी मुख्य द्वार पर प्रस्थानित आत्मा को अश्रुपूर्ण अंतिम नमन भी। सिर्फ़ एक घंटे तीस मिनट में ही एक मुस्कुराती हुई जिंदगी, मौत की उंगली थाम कर ईश्वर के श्रीचरणों में देखते ही देखते चली गई। मन अति व्यथित है …।।

मेरे विनम्र नमन व अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि


पंकज प्रसून-

मृत्यु का दिन और समय निश्चित है, उसे कोई नहीं बदल सकता। जैसी हो भवतव्यता वैसी मिले सहाय, ताहि न जाए तहां पर ताहि तहां ले जाए। बस, यही बोलते बोलते अचानक प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और साहित्यकार डॉ. शंभुनाथ मौत के आगोश में समा गए। शनिवार शाम उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में लेखिका मनोरमा श्रीवास्तव के कर्ण पर आधारित उपन्यास के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद डॉ. शंभुनाथ का वक्तव्य देते समय निधन हो गया। मंच पर मृत्यु के विषय में बोलते बोलते अचानक उनका सिर मेज पर झुकता चला गया और वे अचेत हो गए।

अगले ही पल मृत्यु ने आगोश में ले लिया। जिस वक्त यह अप्रत्याशित वाकया हुआ उस समय डॉ. शंभुनाथ की पत्नी चंदा जी भी सभागार में मौजूद थीं। वहां मौजूद सभी लोग उन्हें लेकर तुरंत सिविल अस्पताल भागे। जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। जिस समय यह घटना हुई तब मंच का संचालन कवि सर्वेश अस्थाना कर रहे थे। मंच पर मनोरमा श्रीवास्तव, दूरदर्शन के सहायक निदेशक आत्मप्रकाश मिश्र, वरिष्ठ कवि बुद्धिनाथ मिश्र, हिंदी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह, हिंदी संस्थान की प्रधान संपादक अमिता दुबे और वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ समेत शहर के जाने माने साहित्यकार मौजूद थे।

डॉ. शंभुनाथ की अचानक इस तरह से मृत्यु होने पर वहां अफरातफरी मच गई। डॉ. शंभुनाथ 1970 बैच के आईएएस थे और 2007 में प्रदेश के मुख्य सचिव बने थे।


राजीव तिवारी बाबा-

मृत्यु पर बोलते हुए मृत्यु के आगोश में समा गये पूर्व मुख्य सचिव शंभूनाथ……

लखनऊ। हिंदी संस्थान के निराला सभागार में बीती शाम कथाकार मनोरमा श्रीवास्तव के उपन्यास ‘कौंतेय’ का विमोचन था। मुख्य अतिथि थे, उ.प्र. हिंदी संस्थान के कभी अध्यक्ष रहे यूपी के पूर्व मुख्य सचिव शंभूनाथ जी। आईएएस के रूप में अपने कार्यकाल में अफसरशाही से कोसों दूर सरल स्वभाव के शंभूनाथ जी मन से साहित्यकार रहे। रिटायर होने के बाद भी एक साहित्यिकार के रूप में उनकी पहचान बनी रही और साहित्यिक गतिविधियों में उनका आना-जाना भी बना रहा।

इसी क्रम में शंभूनाथ जी शनिवार को मनोरमा जी की पुस्तक के विमोचन में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। मंच पर दिग्गज साहित्यिकारों और सामने दर्शक/श्रोता के रूप में बैठे साहित्यप्रेमियों के बीच शंभूनाथ जी ने अपना उद्बोधन शुरू किया। हमेशा की तरह सब मंत्रमुग्ध से उन्हें सुन रहे थे। किताब में कृष्ण-कौंतेय के बीच मृत्यु पर संवाद का वह ज़िक्र कर रहे थे। अपनी बात सरल शब्दों में श्रोताओं तक पहुंचाने के क्रम में उन्होंने ‘काल’ की एक कहानी सुनानी शुरू की। जिसमें एक राजा, काल के पंजे से बचने के सारे जतन करने करते हुए अंततः काल के पास ही पहुंच जाता है…..

बस यही क्षण शंभूनाथ जी के लिए आखिरी पल साबित हुआ। अचानक उनका सिर नीचे टेबल पर झुक गया, आंखें खुली की खुली रह गयीं थीं मगर प्राण पखेरू उड़ चुके थे। मौके पर मौजूद एक डॉक्टर साब ने उन्हें सीपीआर भी दिया। किसी ने हार्ट अटैक के समय वाली कोई गोली भी उनके खुले मुंह में रखी। मगर सारे प्रयास निष्फल साबित हुए। आनन फानन में उन्हें सिविल अस्पताल ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके दोस्त मित्र परिवार आदि के लिए ये घोर कष्टकारी दुखद घटना थी। मगर

मेरे हिसाब से ये एक शानदार मौत थी। जिसमें बगैर किसी को और बगैर स्वयं को भी कोई कष्ट देते हुए किसी भी अस्पताल की प्रताड़ना से बाहर अपने हाथ पैर चलते हुए अपना पसंदीदा कार्य करते हुए शरीर छोड़ जाना होता है। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब की ऐसी ही शानदार मौत सुनी थी।

शंभूनाथ जी ने एक राजा की तरह जीवन जीया और एक संत की तरह मौत को प्राप्त हुए… मुझे उम्मीद है कि जैसा सरल सहज उनका जीवन था और जैसे सरलता से वह मृत्यु को प्राप्त हुए, निश्चित रूप से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होनी चाहिए।

किसी किंतु परंतु की स्थिति में बाबा से प्रार्थना है उन्हें अपने श्रीचरणों में परमपद प्रदान करें और शोक संतप्त परिजनों को धैर्य प्रदान करें… ॐ शांति

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