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सुख-दुख

IIMCAA Awards के प्रायोजक हैं अदाणी!

अभिषेक श्रीवास्तव-

IIMCAA और अदाणी : नया नापाक गठजोड़

पूत के पांव हमें तो बरसों पहले पालने में ही दिख गए थे, लेकिन अफसोस ये है कि आज जब उसके दांत और नाखून निकल आए हैं तब भी वे तमाम शिक्षक और पत्रकार चुप हैं जिन्होंने आईआईएमसी के एलुमनी एसोसिएशन (IIMCAA) को जाने किस सदिच्छा में पाला-पोसा था। नीचे दी हुई तस्वीर देखिए, प्रायोजक देखिए, और देश के राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक सिरा पकड़ के पतन के कारण समझिए।

जब इस एसोसिएशन का संस्था के रूप में पंजीकरण हुआ, तब अभिषेक रंजन सिंह और मैंने मूल पूर्व छात्र संघ (IIMCOSA) के वरिष्ठ साथियों को जोड़ के प्रतिरोध किया था। फिर IIMCAA ने जब कोका कोला से कार्यक्रम प्रायोजित करवाया या तिहाड़ से तुरंत लौटे सुधीर चौधरी को अध्यक्ष बनाया, तब भी हमने बयान जारी किया, विरोध किया। छात्रों के हॉस्टल के मुद्दे पर अभिषेक रंजन ने सवाल उठाया कि एलुमनी एसोसिएशन क्या सिर्फ पार्टी करने के लिए होता है!

फिर एक दिन इस एसोसिएशन के कर्ताधर्ता, एक पूर्व छात्र और पत्रकार मेरे घर आए। उन्होंने बड़ी विनम्रता और ईमानदारी से इस एसोसिएशन का उद्देश्य बताया और तकरीबन कातर लहजे में इसे बख्श देने को कहा। फिर आईआईएमसी के कपल्स के नाम पर कुछ तस्वीरें भी मंगवा कर छाप दी गई हमारी। हम भी सोचे, जाने दिया जाए। लड़के हैं, कुछ खाने कमाने का जुगाड़ किए होंगे।

कुछ साल हो चुके थे, हम भी विरोध कर-कर के थक गए थे क्योंकि आईआईएमसी के पुराने छात्रों की पूर्व छात्रों के मूल संघ को जिंदा करने में कोई रुचि नहीं थी। अकेले डॉक्टर गोपाल कृष्ण चिंतित रहते थे इस बारे में, हालांकि इस वक्त तक मूल IIMCOSA के 1200 सदस्य हुआ करते थे। वही असली एलुमनी संघ था, IIMCAA की तरह नहीं जहां लाइफटाइम मेंबर से लेकर सामान्य मेंबर बनने के पैसे लिए जाते हों और मुद्दों पर चुप्पी लगाकर संस्थान के प्रशासन के साथ पार्टी मनाई जाती हो।

बहरहाल, ये दिन अपेक्षित था। आज अदाणी पत्रकारिता के लिए यहां ईनाम प्रायोजित कर रहा है। सब खुला खेल है। इनकी भी क्या गलती। इनके पूर्वजों ने जब रामनाथ गोयनका को अदाणी से प्रायोजित करवा लिया तो… ऐसे के पीछे ऐसा ही होता है! पत्रकारों का कॉरपोरेट नौकरी के दबाव में अदाणी या अंबानी के अपराधों पर चुप रह जाना एक बात है, लेकिन स्वेच्छा से पूंजीपतियों द्वारा अपनी पार्टी प्रायोजित करवाना जघन्य अपराध है।

इस तस्वीर को मैं जमा कर रहा हूं। पचास साल बाद जब पत्रकारिता का समकालीन इतिहास लिखा जाएगा, तो वे सारे लोग उसके पतन के भागी गिनाए जायेंगे जो IIMCAA के सदस्य रहे, समर्थक रहे और पोषक रहे। खासकर वे शिक्षक, जिन्हें उनके कुछ पत्रकार चेलों ने ऐसा पाला कि उन्हें अपने नैतिक पतन की आहट तक नहीं हुई। नाम नहीं लूंगा, सब जानते हैं।

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