प्रकाश के रे-
अमेरिका/यूरोपीय संघ पर भारत का पलटवार… रूसी तेल की ख़रीद को लेकर अमेरिका और यूरोपीय संघ की निरंतर आलोचनाओं का भारतीय विदेश मंत्रालय ने ठोस जवाब दिया है. इस बयान में कुछ दिलचस्प तथ्य भी हैं.
मंत्रालय ने कहा है कि पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं द्वारा तेल को यूरोप भेजने के कारण भारत को रूस से तेल लेना पड़ा. साथ ही, यह भी कहा गया है कि रूसी तेल की ख़रीद को बाइडेन प्रशासन ने प्रोत्साहित किया ताकि बाज़ार में स्थिरता रहे. अब देखना है कि उस समय के किसी अधिकारी का उत्तर आता है या नहीं. ट्रम्प और उनका प्रशासन इस बयान को बाइडेन और डेमोक्रेटिक पार्टी की आलोचना का एक बहाना बना सकता है.

इससे यह भी इंगित होता है कि अमेरिका कितना शातिर है. एक ओर बाइडेन (और अब ट्रम्प) यूक्रेन को रूस से उलझा दिए, पर वे यह भी चाहते थे कि रूस को भी युद्ध जारी रखने में परेशानी न हो. भारत या दूसरे कुछ देशों को रूस से ख़रीद को प्रोत्साहित कर असल में अमेरिका अपने को और यूरोप को बचा रहा था. यूरोपीय बाज़ार में ऊर्जा के दाम तेज़ी से बढ़ रहे थे. मुद्रास्फीति अमेरिका में भी बहुत थी. ऐसे में अगर वैश्विक बाज़ार में भूचाल आता, तो ढहता यूरोप अब तक पस्त हो गया होता. बाइडेन भी हार ही गए, जिसमें महंगाई एक कारक रही.
इस बयान से भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि रूस के साथ कारोबार एक चीज़ का मामला नहीं है, बल्कि कई वस्तुओं की ख़रीद होती है. यह बताकर कि अमेरिका और यूरोप ख़ुद रूस से व्यापक कारोबार कर रहे हैं, भारत ने सच को तो उनके मुँह पर मारा ही है, यह भी संकेत कर दिया है कि रूस उनके लिए भी कितना महत्वपूर्ण है.
भारत के जवाब से ग्लोबल साउथ के अग्रणी देशों का हौसला बढ़ेगा. चीन, ब्राज़ील समेत अनेक देश ट्रम्प के पैंतरों पर हमलावर हैं. अब भारत भी उसमें शामिल होता दिख रहा है. अमेरिका के क़रीबी विभिन्न पश्चिमी देशों की तरह भारत को भी ग़ज़ा और फ़िलिस्तीन पर सही, न्यायपूर्ण और मानवीय रुख़ अपनाना चाहिए. ऐसा करने से भी अमेरिका और यूरोपीय संघ के पैशाचिक नेतृत्व पर दबाव बनेगा.


