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सुख-दुख

वे तीनों टाइम मांस के जरिए प्रोटीन डाइट ले रहे हैं, और हम सिर्फ कार्ब्स!

संजय वर्मा-

विदेश यात्राओं के दौरान मैं अक्सर क्षोभ से भर जाता हूं – मेरे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसा क्यों नहीं है?, मेरे देशवासी ऐसे सभ्य, शिष्ट अनुशासन प्रिय क्यों नहीं है?

इस बार जब वियतनाम से इंदौर एयरपोर्ट पर उतरा तो दुखों की इस फेहरिस्त में एक नया दुख शामिल हुआ। बहुत से ऑटो रिक्शा और कार वाले हमें अपनी गाड़ी में ले जाने की जिद कर रहे थे। वह अव्यवस्था और बदतमीजी और गरीबी अपनी जगह.., लेकिन असल दुख मुझे उनके कमजोर और बीमार शरीर को देखकर हुआ। उनकी आंखें अंदर धंसी हुई थीं। वे बीमार और कुपोषित लग रहे थे।

मुझे यह इसलिए चुभा क्योंकि मैं दस दिन वियतनामी लोगों के साथ था जो बहुत स्वस्थ और फिट थे (यूं ही अमरीकीयों को जोर थोड़े करवाया) मैं वहां तोंद निकले लोगों को देखने के लिए तरस गया!

क्या यह फर्क गरीबी अमीरी का मामला है? घर आ कर गूगल देवता से पूछा! वे कहते हैं उनकी प्रति व्यक्ति आय हमारे लगभग बराबर है (करीब 2500 अमरीकी डालर)

फिर क्या वजह हो सकती है? क्या इसका संबंध खान पान की आदतों से हो सकता है?

वियतनामी ज्यादातर उबला हुआ खाना खाते हैं। उबले पानी के सूप में मछलियां, सीपियां, शंख, झींगे, बीफ, पोर्क, चिकन, सब्जियां और चावल के चपटे नूडल। जहां हमारा खाना तेल घी में तला हुआ होता है वहीं वियतनाम के खानों में न तेल है ना मसाले। मजे की बात यह है कि यहां भारत की तरह ही लौंग दालचीनी और तमाम गरम मसाले पैदा होते हैं जो यहां से एक्सपोर्ट होते हैं, पर इन मसालों को वियतनामी खुद नहीं खाते।

तेल मसालों और उबले खाने के अलावा हमारे उनके बीच असली फर्क प्रोटीन का है। वे तीनों टाइम मांस के जरिए प्रोटीन डाइट ले रहे हैं, और हम सिर्फ कार्ब्स! भारतीयों के खाने में प्रोटीन नहीं के बराबर है जो हमारे दिमाग और शरीर दोनों के विकास के लिए बेहद जरूरी है।

नोबल विजेता अभिजीत बनर्जी के अनुसार भारत चाइल्ड वेस्टिंग के मामले में साउथ अफ्रीकन देशों से भी बुरी स्थिति में है, और इसकी मुख्य वजह भारतीय खाने में प्रोटीन का अभाव है।

भारत ने राशन की दुकानों पर अनाज पहुंचा कर देश को भुखमरी से तो बचा लिया, लेकिन यह काम इस तरह उल्टा काउंटर प्रोडक्टिव हो गया कि अनाज की सहज उपलब्धता ने प्रोटीन खरीदने खाने की आदत छुड़वा दी। ज्यादातर लोगों ने की कुल कैलोरी की आवश्यकता सिर्फ अनाज से ही पूरी होती है, जिससे पेट भरता है पोषण नहीं मिलता। भारत का शाकाहारी होना कोई समस्या नहीं होता यदि हमने अपने खाने में दाल, मूंगफली, पनीर, दूध को शामिल किया होता। खास तौर पर मूंगफली को टाइम पास कहना भारत को बहुत महंगा पड़ा क्योंकि इसी टाइम पास मूंगफली को खा कर साउथ अफ्रीका के बच्चे हमारे यहां से ज्यादा तंदुरुस्त हैं।

दुःख की बात यह कि प्रोटीन की कमी के मामले में भारत के अमीर भी बहुत गरीब हैं। मेरे बहुत से अमीर दोस्तों का खाना आज भी बेसन के गट्टे की सब्जी, सेव की सब्जी और रोटी है। भारत में अमीरी ड्राइंग रूम में अटक कर रह गई, किचन तक नहीं पहुंची। हम हरी सब्जियां भी अचार और चटनी की तरह खाते हैं। पांच छह लोगों का परिवार एक पाव गिलकी में भर पेट खा लेता है। नहीं यह गरीबी नहीं, गरीबी का हैंग- ओवर है, पुरानी आदतें हैं जिनसे हम मुक्त नहीं हो पा रहे।

बगैर प्रोटीन का खाना खाने से होता यह है कि तोंद बाहर निकलती है, लेकिन हाथ पैर में दम नहीं होता। ऐसे स्किनी फैटी अनफिट नागरिकों का देश कैसे आगे बढ़ेगा?

हम हर बात राजनीति और आर्थिक नीतियों पर डाल देते हैं जबकि रहन-सहन, सामाजिक व्यवहार, खान-पान की आदतें भी किसी देश को आगे ले जाने या पिछड़ा बनाए रखने की वजह हो सकती हैं!

और हां एक बात और – सत्तर प्रतिशत वियतनामी किसी धर्म को नहीं मानते.., (और फिर भी वे स्वस्थ और खुशहाल हैं!) अजीब है ना!

ऊपर चित्र- एक रेस्टोरेंट में लेखक कोरोना बीयर की फीस दे कर अपने गुरु रोहन (जो उनके छोटे बेटे हैं) से वियतनामी खाना खाने का सलीका सीखते हुए…

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