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आईपीएस संवर्ग की भद्द पीटती एक रिटायर दरोगा की किताब ‘आईना’

सेवानिवृत्त पुलिस उपनिरीक्षक अशोक कुमार सिंह की पुस्तक ‘आईना’ अगर किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन से छपी होती तो बहुत चर्चित हो जाती क्योंकि इसमें उन्होंने आईपीएस संवर्ग को जिस तरीके से आईना दिखाया है, वह विस्फोटक की हद तक सनसनीखेज है। 

सेवानिवृत्त पुलिस उपनिरीक्षक अशोक कुमार सिंह की पुस्तक ‘आईना’ अगर किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन से छपी होती तो बहुत चर्चित हो जाती क्योंकि इसमें उन्होंने आईपीएस संवर्ग को जिस तरीके से आईना दिखाया है, वह विस्फोटक की हद तक सनसनीखेज है। 

भूमिका में उन्होंने लिखा है कि उन्होंने मुकदमेबाजी से अपने को बचाने के लिये किसी का नाम लेने से किताब में परहेज रखा है लेकिन भूमिका की बात अलग है, सायास संयम रखते हुए भी वे कई जगह नाम लेकर अपने उच्चाधिकारियों पर फट पड़े। उनका कहना है कि आईपीएस अधिकारियों पर सरकार इतना खर्चा करती है जबकि वे किसी काम के नहीं हैं और न कोई काम करते हैं। 

उन्होंने फोर्स में पुलिस के कमांडर यानि आईपीएस संवर्ग के प्रति कितनी नफरत धधकती है, इसका इजहार अपने शब्दों में किया है। आईपीएस अधिकारियों को अपनी ही फोर्स में अपने बारे में इस धारणा को लेकर सचेत हो जाना चाहिये और छवि बदलने की कोशिश करनी चाहिये ताकि पुलिस में कहीं कोई अनहोनी न हो। हालांकि कई आईपीएस अधिकारियों के प्रति अशोक कुमार सिंह ने बेहद श्रद्धा भी दिखाई है। विशेष रूप से डीजीपी रहते हुए देवराज नागर द्वारा सब इंसपेक्टर से इंसपेक्टर के रूप में पदोन्नति के लिये बनायी गयी व्यवस्था पर उनका बार-बार आभार अशोक कुमार सिंह ने जताया है। 

पुलिस की लोगों के बीच खराब छवि के लिये सिर्फ आईपीएस ही जिम्मेदार है। इस बात से सहमत होना बहुत मुश्किल है लेकिन यह बात अवश्य ही सही है कि देश की दूसरी सर्वोच्च सेवा के कई अधिकारी ऐसे हैं जो अपनी गरिमा की परवाह नहीं करते। किसी भी संस्था या समूह में नैतिक उत्थान उन लोगों के आचरण पर निर्भर करता है जो सर्वोच्च स्थिति में होते हैं। फोर्स के साथ इसी कारण आईपीएस अधिकारियों को शोषण और अपमानपूर्ण व्यवहार करने से बचना चाहिये। 

अशोक कुमार सिंह ने साफ साफ कहा कि कई आईपीएस अधिकारी खुलेआम थाना बेचते हैं और निर्लज्जता पूर्वक महीना वसूल करते हैं। अगर किसी कारणवश महीना आने में देर हो जाये तो दरोगा का कैरियर बर्बाद करने में कसर नहीं छोड़ते। उनकी पुस्तक के फ्लैप पर उसका यह अंश छापा गया है कि एक-एक अधिकारी पुलिस अधीक्षक, उपमहानिरीक्षक रेंज, महानिरीक्षक जोन पर सरकार उनकी व्यवस्था हेतु 25 से 30 लाख रुपये प्रति माह खर्च करती है। यदि यह पद अपने स्वयं के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण न कर सके एवं नान गजटेड के भ्रष्टाचार को नियंत्रित न कर सके तो अपराध नियंत्रण में अधिकारियों की बौद्धिक सहभागिता बालू से तेल निकालने की तरह है। ऐसे में इन पदों की उपयोगिता क्या है। क्या केवल नान गजटेड को दंड के लिये ये पद सृजित किये गये हैं। 

पुस्तक में वाक्य विन्यास त्रुटिपूर्ण है और शैली भी गड़बड़ है। संपादन भी चुस्त दुरुस्त न होने से कई बार कुछ चीजों की इतनी ज्यादा पुनरावृत्ति हुई है कि लगता है जैसे व्यक्तिगत तौर पर हुए कड़वे अनुभवों का प्रलाप भर पुस्तक में व्यक्त हुआ हो। इसके बावजूद पुस्तक में कई तथ्य रहस्योद्घाटन के रूप में हैं। जिसकी वजह से पुस्तक को एक बार पढऩा शुरू करें तो आखिरी तक पढऩे की ललक पैदा हो जाती है। पुलिस के ढांचे में कितनी कमियां हैं इसकी एक बानगी पुस्तक में देखने को मिलती है। पुलिस में केवल भ्रष्टाचार की वजह से ही गड़बडिय़ां नहीं हैं। विभाग के पतन के लिये इससे भी ज्यादा कई और कारक जिम्मेदार हैं। 

अशोक कुमार सिंह ने नाम लेकर बताया कि किस तरह पुलिस के अधिकारी जातिवाद की मानसिकता के आधार पर काम करते हैं। वर्तमान राजनीति के स्वरूप की वजह से नये लोगों को गलतफहमी है कि इस तरह का भेदभाव सवर्ण बनाम दलित या सवर्ण बनाम पिछड़ी जातियां अथवा पिछड़ी जातियां बनाम दलित के उभरे द्वंद्व का नतीजा है लेकिन सही बात यह है कि वंचित जातियां तो बहुत बाद में इस स्थिति में आयीं कि वे अपने अस्तित्व का अहसास करा सके लेकिन सवर्ण जातियों के अन्दर ही संकीर्ण मानसिकता से जो दुराग्रह कार्यशील रहते हैं। उनकी मौजूदगी तो सनातन रही है। 

अशोक कुमार सिंह ने दिखाया है कि किस तरह इसका कचोटने वाला अनुभव उनको हुआ और इस अनुभव ने उन्हें किस सीमा तक आहत किया। जातिवादी मानसिकता की वजह से कुछ अधिकारियों ने फोर्स के सबसे कामचोर लोगों को सर्वोच्च पद दिलाकर समूचे फोर्स का किस तरह से मनोबल गिराया। इसका भी उल्लेख सप्रमाण पुस्तक में है। खाकी का रैंक कोई भी हो लेकिन उसकी इमेज यह है कि यह जनता को लूटने और उसका बर्बर दमन करने वाला तंत्र है लेकिन पुस्तक को पढऩे से पता चलता है कि पुलिस खुद किस कदर अपनों से ही लूटी जाती है। पुलिस का दरोगा समाज में तानाशाह की तरह देखा जाता है लेकिन जब वह विभागीय कार्रवाई में फंसता है तो अधिकारी कागजों में प्रथम दृष्टया ही उजागर उसकी निर्दोषिता को जांचने की तकलीफ गवारा नहीं करते और उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कर डालते हैं। इसका अहसास भी यह पुस्तक कराती है। अशोक कुमार सिंह की धारणा यह है कि मुठभेड़ में अपराधी को मार डालना अपराध नियंत्रण का सर्वोच्च तरीका है जो कि सही नहीं है लेकिन इस बारे में उनकी जो ईमानदार बयानी है। उससे यह जरूरत महसूस होने लगती है कि मानवाधिकारों को लेकर परंपरागत पुलिस जनों में ब्रेनवाशिंग की कितनी जरूरत है। 

अशोक कुमार सिंह वर्ण व्यवस्था के पिरामिड में उच्च स्थान पर रहते हुए भी अपने को पीडि़त होने से नहीं बचा सके क्योंकि यह व्यवस्था हर जाति का उत्पीडऩ करती है लेकिन वे यह नहीं जान पाये कि जब सामाजिक परिवर्तन शुरू हुआ और दलितों पिछड़ों ने आपराधिक माध्यम से बगावती इरादे झलकाना शुरू कर दिये तो यह उद्दंडता स्वाभाविक रूप से उच्च जातियों को इस हद तक नागवार गुजरीं कि वे ककड़ी चोरों को फांसी देने पर आमादा हो गये और इसमें पुलिस का इस्तेमाल हुआ। एक दौर रहा जब उत्तरप्रदेश में पुलिस की मुठभेड़ विशेषज्ञता के पीछे इसी तरह की प्रेरणायें काम कर रही थीं और अशोक कुमार सिंह उसी दौर में पुलिस में रहकर अपना यह कर्तव्य निभा रहे थे। जिसे आज का इतिहास नाइंसाफी ठहरा रहा है। 

एक संस्था में तमाम गड़बडिय़ों को सम्पूर्णता में देखने के बाद ही उसमें वांछित परिवर्तन हो सकते हैं लेकिन अशोक कुमार सिंह में इस दृष्टि का अभाव रहा है। उन्होंने उत्तरप्रदेश के वर्तमान अपर महानिदेशक कानून व्यवस्था मुकुल गोयल जैसे आईपीएस अधिकारियों का सानिध्य नहीं मिल पाया। जिनका तबादला जब हुआ तो पूरा फोर्स इस बात पर आमादा था कि अपने साफ सुथरे और फोर्स के लिये सच्चे संरक्षक की भूमिका निभाने वाले अपने कप्तान की सबसे शानदार विदाई वे कैसे कर सकें और उन्हें कैसे एक ऐसा स्मृति चिन्ह दे सकें, जो कि यादगार हो। 

आईपीएस संवर्ग की आलोचना के अतिरेक में उनकी पुस्तक में इसी तरह के कई अफसरों का प्रशंसनीय जिक्र दबकर रह गया है। आईपीएस अफसरों की पुलिस के लिये अपनी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती। पुस्तक की इन कमियों के बावजूद आईना सचमुच पुलिस विभाग के लिये एक आईना है। जिसमें समुद्र मंथन की तरह एके सिंह ने कई अमृत बिन्दुओं को निकाल पाया है। खुद अशोक कुमार सिंह की भी कार्यशैली सेवा में रहते हुए मानवीयता के काफी नजदीक रही। इस कारण उनकी आलोचना उतनी चुभने वाली नहीं लगना चाहिये। उनके गुबार के पीछे जो दर्द है उसे समझते हुए पुलिस के वर्तमान कर्ता धर्ता अगर कोई सुधार का कार्यक्रम बना पाते हैं तो उनकी पुस्तक की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी।

पुस्तक समीक्षक केपी सिंह से ई-मेल संपर्क : [email protected]

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