योगी राज में कप्तान साहब जयकारा लगवा रहे- ‘बोलबम’! देखें वीडियो

यूपी के जिला अंबेडकर नगर के कस्बा टांडा में कावड़ यात्रा के दौरान फील्ड में उतरे पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार मिश्रा ने तेज आवाज में कहा- ”थोड़ा जयकारा लगवाओ बोलबम…”. Continue reading

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IPS Ajay Pal Sharma का ये वीडियो भड़ास के यूट्यूब चैनल पर बना नंबर वन, 32 लाख बार देखा गया

Yashwant Singh : जैसे आदमी को कुछ पता नहीं होता कि उसकी तकदीर, भाग्य, नियति में क्या लिखा-छिपा है… वैसे ही यूट्यूब पर चैनल चलाने वालों को पता नहीं होता कि व्यूवर किस वीडियो को सिर माथे पर लेकर उसे सरताज बना देगा और किन अच्छे खासे वीडियोज को ठुकरा कर किनारे लगा देगा…भड़ास के यूट्यूब चैनल पर एक बड़ा उलटफेर हुआ है. Continue reading

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SSP नोएडा ने थ्रीव्हीलर और प्राइवेट कार पर बैठ यूं किया अपनी पुलिस का टेस्ट, देखें वीडियो

कुछ को सजा तो कुछ को दिया इनाम…

गौतबुद्धगर उर्फ नोएडा के SSP डॉ. अजय पाल शर्मा ने सुरक्षा का रिएलिटी चेक किया. वे देर रात सादे ड्रेस में आम आदमी की तरह सड़क पर निकले. इसके लिए उन्होंने आटो से यात्राएं की. परी चौक से एक थ्रीव्हीलर में बैठकर जायजा लिया. बाद में वे एक कोतवाली पहुंचे. वहां उन्होंने चुपचाप हर तरफ राउंड लिया. कुछ पुलिस वालों को हड़काया और उनकी टोपी दुरुस्त की. Continue reading

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तो ओपी सिंह को डीजीपी बनाने में योगी सरकार को ये दिक्कत महसूस हो रही है….

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनहित के तमाम फैसले तो धड़ाधड़ ले रहे हैं, लेकिन जमीन पर यह फैसले उम्मीद के अनुसार फलीभूत होते नहीं दिख रहे हैं, जिसका गलत मैसेज जनता के बीच जा रहा है, तो विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका मिल रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि चूक कहां हो रही है?  क्या सरकारी मशीनरी योगी सरकार के मंसूबों पर पानी नहीं फेर रही है ? योगी की बार-बार की डांट-डपट के बाद भी नौकरशाही के कानों पर जूं क्यों नहीं रेंग रही है ? चर्चा यह भी है कि ब्यूरोक्रेसी के दिलो-दिमाग में यह बात घर कर गई है कि यूपी की सरकार पीएमओ से चल रही है ? सरकार के गठन के समय प्रमुख और मुख्य सचिव से लेकर अब पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति तक में जिस तरह की फजीहत योगी सरकार की हो रही है, उससे ब्यूरोक्रेसी के बीच यही मैसेज गया है कि यूपी में सभी प्रमुख पदों पर नौकरशाही की नियुक्ति में योगी नहीं, केन्द्र की मोदी सरकार की चल रही है. वह महत्वपूर्ण पदों पर अपने हिसाब से अपने पसंद के अधिकारियों का बैठा रहा है, ताकि केन्द्रीय योजनाओं को पीएम की इच्छा के अनुरूप लागू किया जा सके. 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा आवश्यक भी बताया जा रहा है.

सीएम योगी ने कुर्सी संभालते ही अपनी पसंद का प्रमुख सचिव बनाने के लिये आईएएस अधिकारी अवनीश अवस्थी को दिल्ली से बुलाया था, लेकिन उनकी चली नहीं और एस0पी गोयल को दिल्ली ने प्रमुख सचिव के रूप में नामित कर दिया, आज भी गोयल प्रमुख सचिव हैं, जबकि अवनीश को प्रमुख सचिव सूचना के पद पर संतोष करना पड़ा। इसी तरह से मुख्य सचिव के रूप में भी यूपी के वरिष्ठ स्वच्छ छवि वाले आईएएस प्रवीण कुमार जैसे तमाम काबिल अफसरों को अनदेखा करके सीएम योगी को केन्द्र की इच्छा का सम्मान करते हुए दिल्ली से भेजे गये आईएएस राजीव कुमार को मुख्य सचिव बनाना पड़ा था.बात यही नहीं रूकी है. देर-सबेर  ब्यूरोक्रेसी में एक और बड़ा फेरबदल देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस चर्चा को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दलजीत सिंह के दिल्ली से लखनऊ आने के बाद ज्यादा बल मिला है। दलजीत सिंह हैं तो ब्यूरोक्रेट्स, लेकिन दलित परिवार से आने के कारण इनके माध्यम से बीजेपी दलित वोटरों के बीच पैठ बढ़ाना चाहती है। हो सकता है अभी इन्हें कृषि उत्पादन आयुक्त जैसा कोई महत्वपूर्ण पद दे दिया जाये और चुनावी बेला में यह मुख्य सचिव की कुर्सी तक पहुंच जायें।

अब 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी ओ0पी0सिंह की डीजीपी पद पर नियुक्ति और उनके कार्यभार नहीं ग्रहण करने के कारण योगी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। कहा यह जा रहा है कि पीएमओ ने ओ0पी0 को रिलीव ही नहीं किया जिससे उनकी नियुक्ति पर सवाल खड़े हो गये. विपक्ष ने भी इससे मुद्दा बना दिया. असल में ओ0पी0 सिंह का बैक ग्रांउड उनके लिये परेशानी का सबब बन गया है। बात जून 1995 की है. तब प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की संयुक्त सरकार थी. मुलायम सिंह सीएम थे. मुलायम सरकार को सत्ता संभाले डेढ़ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका था. इस दौरान सपा-बसपा के बीच तमाम मुद्दों पर दूरियां काफी बढ़ गई थीं. बसपा बार-बार समर्थन वापसी की धमकी दे रही थी. इसी बीच जब बसपा सुप्रीमों मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो सपा के दबंगों ने बसपा सुप्रीमों मायावती को लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में बंधक बना लिया. कहा यह गया कि सपा नेताओं ने मायावती के साथ काफी अभद्रता की.वह उन्हें जान तक से मार देना चाहते थे.तब केन्द्र में अटल सरकार थी.उसके हस्तक्षेप से मामला ठंडा पड़ा। बीजेपी ने मायावती को पूरा समर्थन दिया. वह सीएम बन गईं. उस समय ओ0पी0 सिंह लखनऊ के एसएसपी थे. माया के सीएम बनने के बाद ओपी सिंह को  निलंबन का समाना करना पड़ा. यह घटना तो छोटी सी थी, लेकिन 22 वर्ष बाद भी बीजेपी को डर सता रहा है कि अगर ओपी सिंह को सूबे का हाकिम बना दिया गया तो मायावती इसे दलित स्वाभिमान से जोड़ कर सियासी रोटियां सेंकने का मौका छोड़ेंगी नहीं. दलित वोटों के लिये चिंतित बीजेपी कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं है. वैसे भी सहारनपुर में दलितों के साथ घटी घटना के बाद बीजेपी दलितों के मामले में बैकफुट पर है।

वैसे, कुछ सूत्रों का यह भी दावा है कि ओ0पी0 सिंह डीजीपी के लिये सीएम योगी की पहली पसंद नहीं थे, मगर पार्टी के एक कद्दावर नेता और केन्द्र में मंत्री के चलते योगी ने ओ0पी0 सिंह के नाम पर सहमति तो दे दी, परंतु जब उन्हें लगा कि ओ0पी0सिंह की छवि निर्विवाद नहीं रही है.उन्हें डीजीपी बनाने से दलितों में गलत संदेश जायेगा, तो योगी ने पीएम मोदी से मुलाकात करके उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया. इसके बाद ही ओ0पी0 को पीएमओ से रिलीव नहीं किया गया. हो सकता है भावेश कुमार को डीजीपी के पद की जिम्मेदारी सौंप दी जाये। वह योगी की पहली पंसद तो हैं ही अभी उनका रिटायर्डमेंट भी करीब नहीं है।    

खैर, बात इससे आगे बढ़ाई जाये तो सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सीएम योगी स्वयं नौकरशाही का कैसे बखूबी इस्तेमाल किया जाये इसको लेकर भी तमाम मौकों पर दुविधा में नजर आते हैं। यह दुविधा सरकार के गठन के समय से शुरू हुई थी और अब तक जारी है। बात पिछले वर्ष हुए विधान सभा चुनाव प्रचार के समय की है। तब तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद के खिलाफ बीजेपी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग तक से शिकायत की थी कि दोनों अधिकारी सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के एजेंट के रूप में काम कर कर रहे हैं। बीजेपी के पक्ष में नतीजे आते ही इस संभावना को बल मिलना शुरू हो गया कि सीएम योगी सबसे पहले मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद की छुट्टी करेेगी, लेकिन ऐसा करने की बजाये योगी ने घोषणा कर दी कि नौकरशाही गलत नहीं होती है.इसको चलाने वाले गलत होते हैं. हम  इसी नौकरशाही से काम लेकर दिखायेंगे. इसके साथ ही योगी ने यह फरमान भी सुना दिया कि अधिकारी बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव में न आयें। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी वालों की इन सहित तमाम अधिकारियों ने सुनना बंद कर दिया। योगी के इस एक फरमान से बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया। यह मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के समाने भी पहुंचा था। इस पर शाह ने  सभी मंत्रियों को आदेश दिया था कि वह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलने का समय निकाले, ताकि जनता की समस्याओं का निराकरण हो सके।

मुद्दे पर आते हुए बात सीएम योगी के ब्यूरोक्रेसी में बदलाव नहीं करने वाले फैसले की कि जाये तो इससे संगठन में यह संदेश गया कि सरकार को कार्यकार्ताओं की भावनाओं की कद्र नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर योगी सरकार सख्त नहीं है। दरअसल, यह धारणा मुख्य सचिव राहुल भटनागर को नहीं हटाये जाने के कारण बनी थी। तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर कभी अपनों के बीच ‘शूगर डैडी’ के नाम से मशहूर हुआ करते थे, उनके चीनी मिल मालिकों से बहुत अच्छे संबंध थे,इस लिये उनकी छवि पर भी उंगली उठती थीं. राहुल भटनागर को करीब तीन माह के बाद काफी फजीहत उठाने के बाद योगी ने चलता किया गया और  भटनागर की जगह पीएमओ की पंसद के राजीव कुमार को मुख्य सचिव की कुर्सी सौंपी गई।

योगी सरकार के दस माह के शासनकाल में नौकशाहों की लापरवाही के कारण उनकी सरकार की किरकिरी की लम्बी चौड़ी लिस्ट तैयार की जा सकती हैं। विधान सभा में मिले सफेद पाउडर को खतरनाक पीटीईएन पाउडर बताना, किसानों का लोन माफ करने में की गई लापरवाही का प्रकरण अथवा सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत के मामलों, गोरखपुर महोत्सव सहित अन्य कुछ घटनाओं के कारण योगी सरकार की फजीहत को भुलाया नहीं जा सकता है। बात विधान सभा में मिले सफेद पाउडर की कि जाये तो यह एक ऐसा मौका था, जब सीएम योगी ब्यूरोक्रेसी को कड़ा संदेश दे सकते थे। ब्यूरोक्रेसी की लापरवाही के कारण ही सीएम योगी ने सदन में बयान दे दिया था कि यह एक आतंकी घटना हो सकती है. जितना पीटीईएन पाउडर मिला है,उससे पूरी विधान सभा उड़ाई जा सकती थी। इसके बाद आनन-फानन में पूर्व विधान सभा सदस्यों सहित तमाम लोगों के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिये गये.बाद में पता चला कि विधान सभा हाल में मिला पाउडर पीटीईएन नहीं, लकड़ी के फर्नीचर और खिड़की-दरवाजों पर पॉलिश करने के काम आने वाला साधारण पाउडर था. इतनी बड़ी चूक हो गई, मगर किसी बड़े अधिकारी के ऊपर आंच नहीं आई,जबकि इसमें कई अधिकारियों के निलंबन की प्रबल संभावना जताई जा रही थी. इसके बजाये एक छोटे से अधिकारी को ‘शूली’ पर लटका कर सरकार ने अपने कृतव्यों की इतिरी कर दी.

नौकरशाही मनमानी ही नहीं करती है, मुख्यमंत्री को गुमराह करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। इसका एक उदाहरण कुछ माह पूर्व वाणिज्य विभाग बना था। मुख्यमंत्री योगी के अधीन आने वाले वाणिज्य कर विभाग में एक हजार वैट अधिकारियों के स्थानान्तरण व तैनाती को लेकर खींचतान चल रही थी, लम्बे मंथन के बाद विभाग के 84 ज्वाइंट कमिश्नरों की सूची गोपनीय ढंग से जारी की गयी, कई अधिकारियों के लिए पद भी खाली छोड़े गए, लेकिन शासन में बैठे अधिकारियों ने सीएम को जो जानकारी दी वह हकीकत से कोसों दूर थी। सीएम को बताया गया कि अगर विभाग में अधिकारियों की तैनाती में फेरबदल किये गए तो इसका प्रभाव जीएसटी के अनुपालन पर पड़ेगा और ये फेल हो सकती है।

योगी सरकार में पंचम तल और जिलों में तैनात नौकरशाह/अधिकारियों की लापरवाही के चलते सरकारीं फाइलों की रफ्तार सुस्त है तो मोदी की महत्वाकांक्षी किसानों का ऋण माफी योजना में भी नौकरशाही के कारण सरकार को फजीहत उठानी पड़ी. योगी का गौ-माता प्रेम जगजाहिर है।योगी जी जानते हैं कि पॉलिथीन के बैग्स सबसे अधिक गौ-माता को नुकसान पहुंचाते हैं, इसको लेकर निचली से ऊपरी कोर्ट तक के तमाम आदेश आ चुके हैं, मगर पॉलिथीन आज तक बंद नहीं हो पाई है। इससे बाजार पटा पड़ा है तो नालियां और नाले चोक हो रहे हैं। योगी ने पदभार ग्रहण करते ही प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का बीड़ा उठाया था। अधिकारियों के समाने समय सीमा रखी गई थी, परंतु यूपी तो दूर आज तक राजधानी लखनऊ तक गड्ढा मुक्त नहीं हो पाई है। इसी प्रकार अतिक्रमण और जाम से भी जनता को छुटकारा नहीं मिल पाया है। अवैध निर्माण और नजूल की जमीन पर कब्जा दिन पर दिन पैर पसारता जा रहा है.

शेयर बाजार की तरह ‘चढ़ते-उतरते’ नौकरशाह

कहा जाता है कि शेयर, बाजार की चाल और नौकरशाही राजनीति की नब्ज बहुत जल्दी पकड लेते हैं. लम्बे अंतराल के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में भगवा का परचम फहराते ही नौकरशाही ने अपने आप को इसी रंग में रंगने में देर नहीं की. कोई ब्यूरोक्रेटस भगवा साड़ी में नजर आती तो किसी की कमीज का रंग बदल गया है। सीएम सचिवालय का रंग बदल कर भगवा किया गया तो अस्पतालों में हरे रंग की जगह भगवा ने ले ली. इसमें से काफी कुछ सरकारी आदेश पर किया गया तो नौकरशाही द्वारा सीएम योगी को खुश करने को लखनऊ के विधान भवन के सामने स्थित हज हाउस तक को भगवा रंग में रंग देने का कारनामा भी कर दिखाया गया,यह और बात थी कि हो-हल्ला होने के नौकरशाही ने ठेकेदार की गलती बता कर पूरे मामले से पल्ला झाड़ लिया. काफी किरकिरी के बाद प्रदेश सरकार ने हज समिति के कार्यालय को भगवा रंग से रंगवाने वाले सचिव आर0पी0 सिंह को हटाया तो जरूर लेकिन तब तक इस एक अधिकारी की हरकत से योगी सरकार को ‘नुकसान’ हो चुका था.

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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इस लड़की के सवाल ने आईपीएस द्वारा नारी सुरक्षा पर दिए भाषण की निकाल दी हवा, देखें वीडियो

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा आजकल नारी सुरक्षा सप्ताह का आयोजन किया  जा रहा है. इसी क्रम में आगरा पुलिस भी शहर भर के कॉलेज व स्कूल में जागरूकता कार्यक्रम करा रही है. आगरा के बीडी जैन गर्ल इंटर कॉलेज में नारी जागरूकता कार्यक्रम में एसएसपी अमित पाठक ने छात्राओं को सुरक्षा और अपराध के बारे में कई सारी जानकारियां दी. पर बाद में एक लड़की ने नारी सुरक्षा को लेकर कुछ ऐसे सवाल मीडिया के सामने दागे जिससे पूरे आयोजन और भाषण की सार्थकता पर सवाल उठ गया.

लड़की ने कौन से सवाल उठाए और एसएसपी अमित पाठक ने अपने भाषण में क्या कहा, जानने के लिए देखें ये वीडियो….

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भाजपा राज में भी अशोक खेमका और अमिताभ ठाकुर के साथ न्याय नहीं हुआ!

Surya Pratap Singh : मेरे सहयोगी अशोक खेमका, IAS ने आज ट्विटर पर निम्न विचार लिखा ….

“Honest officers do not complain of frequent transfers. Alternative is far worse. Sidelined without work and face multiple roving inquiries.”

-Ashok Khemka, IAS @AshokKhemka_IAS

आप क्या सोचते हैं कि ईमानदार अधिकारी इसी तरह frustrate होते रहेंगे इस देश में ? या फिर कोई way out है ? कांग्रेस ने तो नहीं, परंतु क्यों वर्तमान हरियाणा सरकार ने अशोक खेमका के साथ न्याय नहीं किया? बिना काम के क्यों sidelined रखा गया है? क्यों उनके ख़िलाफ़ झूँठी जाँचों का अंबार लगा है?

मैं अपने विषय में नहीं लिख रहा, मैं तो सेवानिवृत्त हो गया हूँ…शायद मेरे बारे में लिखने की अब कोई उपयोगिता नहीं, परंतु क्या उत्तर प्रदेश में भी अमिताभ ठाकुर IPS व अन्य ऐसे कई निष्ठावान अधिकारियों के साथ अभी तक न्याय हुआ है? क्या दाग़ी व भ्रष्ट अभी भी मलाईदार पदों पर जमे नहीं बैठे हैं…. यही सब दागी व भ्रष्ट क्यों पसंदीदा है सब नेताओं के?  लोकतंत्र में कब तक चलेगा यह सब? प्रतिभा व योग्यता को कब तक नकारा जाता रहेगा? एक लोकगीत के अंश का आनंद लें:

ई मेंहगाई, ई बेकारी…..नफ़रत कै फैली बीमारी,
दुःखी रहै जनता बेचारी, बिकी जात बा लोटा-धारी,
जियौ बहादुर, खद्दर धारी….
देसवा का कंगाल करत हौ, ख़ुद का मालामाल करत हौ…
तोहरन दम से चोर बज़ारी
जियौ बहादुर, खद्दर धारी….

यूपी के चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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आईपीएस अफसरों पर मुकदमों की सूचना गृह मंत्रालय में नहीं है!

गृह मंत्रालय के पास आईपीएस अफसरों पर आपराधिक मुकदमों की सूचना नहीं है. यह तथ्य आईपीएस अफसरों के मामलों को देखने वाली गृह मंत्रालय की पुलिस डिवीज़न-एक द्वारा आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आईपीएस अफसरों पर दर्ज आपराधिक मुकदमों की सूचना मांगे जाने पर बताया गया है. जहाँ गृह मंत्रालय ने यह प्रार्थनापत्र नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को अपने स्तर से उचित उत्तर देने हेतु भेजा है, वहीँ उसने यह भी स्वीकार किया है कि आईपीएस अफसरों पर दर्ज होने वाले आपराधिक मुकदमों की सूचना की पत्रावली उसके द्वारा नहीं रखी जाती है. नूतन ने अनुसार आईपीएस अफसरों के कैडर नियंत्रण संस्था होने के बाद भी गृह मंत्रालय के पास यह बुनियादी सूचना उपलब्ध नहीं होना उनकी लापरवाही को दर्शाता है.

MHA has no record of FIRs on IPS

The Ministry of Home Affairs (MHA) has no records of criminal cases against IPS officers. This fact has been revealed by the response given by Police-I Division of MHA dealing with IPS officers,  to RTI Activist Dr Nutan Thakur as regards the various criminal cases registered against IPS officers in India.  While the MHA has forwarded the RTI application to National Crime Record Bureau to provide a suitable reply to Nutan, it has made it clear that the files in connection with registration of criminal cases against IPS officers is not maintained by it. As per Nutan, the lack of this important information by MHA which is Cadre controlling authority of IPS officers, shows the casualness of the Ministry.

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अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय की इस संवेदनशीलता को आप भी सलाम कहेंगे

आमतौर पर पुलिस महकमे से जुड़े लोगों को रुखा-सूखा और कठोर भाव-भंगिमाओं वाला आदमी माना जाता है. लेकिन इन्हीं के बीच बहुतेरे ऐसे शख्स पाए जाते हैं जिनके भीतर न सिर्फ भरपूर संवेदनशीलता होती है बल्कि वे अपने समय के साहित्य से लेकर कला और जनसरोकारों से बेहद नजदीक से जुड़े होते हैं. किसी जिले का पुलिस कप्तान वैसे तो अपने आप में दिन भर लूट हत्या मर्डर घेराव आग आदि तरह-तरह के नए पुराने अपराधों-केसों में उलझ कर रह जाने के लिए मजबूर होता है लेकिन वह इस सबके बीच अपने जिले की साहित्य की किसी बड़ी शख्सियत से इसलिए मिलने के लिए समय निकाल ले कि उनकी सेहत नासाज़ है तो यह प्रशंसनीय बात है.

गोपाल दास नीरज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. ”कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे….” रचने वाले गोपाल दास नीरज ने राजकपूर की ढेर सारी फिल्मों के गीत लिखे. मंच पर नीरज जी की सबसे ज्यादा डिमांड रही है. पद्म भूषण नीरज जी अलीगढ़ में निवास करते हैं. अलीगढ़ में एसएसपी के पद पर राजेश पांडेय हैं जो लखनऊ के भी एसएसपी रह चुके हैं. राजेश पांडेय को जब सूचना मिली कि नीरज जी की सेहत इन दिनों ठीक नहीं है तो वह फौरन वर्दी में ही उनसे मिलने उनके आवास की ओर चल पड़े.

परसों शाम करीब आठ बजे राजेश पांडे जब नीरज जी के आवास पर पहुंचते हैं तो उनकी सादगी देखकर दंग रह जाते हैं. नीरज जी के कमरे में कूलर चल रहा था. एसी नहीं है घर में. अलीगढ़ के एक डिग्री कालेज में प्रोफेसर रह चुके महाकवि पदमभूषण नीरज जी बेहद सरल सहज इंसान हैं. वे स्वास्थ्य कारणों से अब ह्वील चेयर पर चलते हैं. आठ बजे शाम पहुंचे एसएसपी राजेश पांडेय रात साढ़े दस बजे लौटे.

यह पहली बार नहीं जब राजेश पांडेय महाकवि नीरज जी के घर पहुंचे हों. करीब दो महीने पहले जब उन्हें पता चला कि नीरज जी की तबियत काफी बिगड़ गई है तो वो खुद एक नामचीन डाक्टर को साथ लेकर उनके यहां पहुंचे और इलाज में मदद की. राजेश पांडेय महीने में एक बार नीरज जी के यहां जाकर उनका हालचाल पूछ आते हैं. इस संवेदनशीलता को लेकर अलीगढ़ के लोग एसएसपी राजेश पांडेय की काफी सराहना करते हैं.

अलीगढ़ के युवा छात्रनेता जियाउर्ररहमान का कहना है कि हम सभी लोग पुलिस विभाग से लॉ एंड आर्डर बेहतर करने की तो उम्मीद करते हैं लेकिन कोई शख्स इससे आगे जाकर जब हमारे सुख-दुख में शरीक होने लगता है तो यकीनन अच्छा लगता है. पुलिस कप्तान राजेश पांडेय जी का यह बड़प्पन है जो अपने जिले अलीगढ़ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर शख्सियत गोपाल दास नीरज जी के इलाज में सक्रिय हिस्सेदारी लेते हैं और उन्हें स्वस्थ-प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं. उनके इस कदम से पुलिस विभाग के बाकी लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए और जो जिस इलाके में है, वहां की साहित्य, शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों की चर्चित हस्तियों को उचित मान-सम्मान और मदद करनी चाहिए.

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भ्रष्ट और चापलूस अफसरों ने सीएम योगी के हाथों आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के करियर का कत्ल करा दिया!

सुभाष चंद्र दुबे तो लगता है जैसे अपनी किस्मत में लिखाकर आए हैं कि वे सस्पेंड ज्यादा रहेंगे, पोस्टेड कम. सुल्तानपुर के एक साधारण किसान परिवार के तेजस्वीय युवक सुभाष चंद्र दुबे जब आईपीएस अफसर बने तो उनने समाज और जनता के हित में काम करने की कसम ली. समझदार किस्म के आईपीएस तो कसमें वादे प्यार वफा को हवा में उड़ाकर बस सत्ता संरक्षण का पाठ पढ़ लेते हैं और दनादन तरक्की प्रमोशन पोस्टिंग पाते रहते हैं. पर सुभाष दुबे ने कसम दिल से खाई थी और इसे निभाने के लिए अड़े रहे तो नतीजा उनके सामने है. वह अखिलेश राज में बेईमान अफसरों और भ्रष्ट सत्ताधारी नेताओं की साजिशों के शिकार होते रहे, बिना गल्ती सस्पेंड होते रहे.

चुनाव के वक्त चुनाव आयोग ने सुभाष चंद्र दुबे को गाजीपुर का एसएसपी बनाकर भेजा और वहां से वह सहारनपुर सीएम योगी के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में तब भेजे गए जब जातीय हिंसा चरम पर थी. भाजपा के लोगों ने सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी लव कुमार के घर पर धावा बोल दिया था. लव कुमार की पत्नी बच्चों को जान बचाने के लिए छिपना पड़ा था. ऐसी किरकिरी से ध्यान हटाने और लव कुमार को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने उनको नोएडा जैसे प्राइम जिले की पोस्टिंग दे डाली और सहारनपुर का जिम्मा तेजतर्रार अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे को सौंप दिया.

उधर, नोएडा के डीएम एनपी सिंह को सहारनपुर का जिलाधिकारी बना दिया गया. एनपी सिंह की पूरे सूबे में एक अलग छवि है. वह अपनी ईमानदारी, कठिन मेहनत, जन सरोकार के लिए जाने जाते हैं. माना गया कि एनपी और सुभाष दुबे की जोड़ी सहारनपुर में सब कुछ सामान्य कर देगी. ऐसा हुआ भी. लेकिन सीएम योगी और इन दो अफसरों के बीच संवादहीनता ने बीच के दलाल अफसरों को मौका दे दिया. इन दलाल अफसरों ने सीएम योगी के कान में अपने हिसाब से फीडबैक दे दिया.

एनपी और सुभाष दुबे ने अठारह अठारह घंटे तक साथ रहकर सहारनपुर में शांति लाने की कोशिश की लेकिन इन दोनों को यह आरोप लगाकर सस्पेंड कर दिया गया कि इनमें तालमेल नहीं था और इन लोगों ने मायावती को सहारनपुर में घुसने की अनुमति दे दी थी. खासकर मायावती वाले प्वाइंट को योगी ने गंभीरता से ले लिया. जबकि हकीकत यह है कि एसपीजी कवर प्राप्त मायावती दिल्ली से जब गाजियाबाद में घुसीं और मेरठ समेत कई जिलों को पार करती हुईं सहारनपुर पहुंचीं तो इसके लिए कोई एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

एसपीजी के लोग अपने वीवीआईपी के रूट पर कई दिन पहले से काम करने लगते हैं. मतलब यह कि यह सारा कुछ बड़े अफसरों के इशारे और सहमति से हुआ था लेकिन दोष मढ़ दिया गया सहारनपुर के तत्कालीन एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे और डीएम एनपी सिंह पर. कहा जाता है कि सहारनपुर की सीमा पर अगर मायावती को उस समय रोक दिया जाता तो सहारनपुर में उग्र हुए दलित समुदाय के लोग अपनी नेता को रोके जाने से नाराज होकर लंबा और बड़ा बवाल कर सकते थे जिसे फिर रोक पाना मुश्किल होता.

अपने छोटे से कार्यकाल में एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे ने सहारनपुर में ग्राउंड लेवल पर जो जो काम किए (कुछ दस्तावेज संलग्न हैं यहां), उसी का नतीजा है कि जो नए लोग वहां डीएम एसएसपी बनाकर भेजे गए, उन्हें बहुत खास कुछ नहीं करना पड़ा और नियंत्रित हालात का श्रेय खुद लेने का मौका मिल गया. वो कहते हैं न जो नींव के पत्थर होते हैं, उनका जिक्र कम होता है, उस मजबूत नींव पर खड़े महल को सब देखते सराहते हैं.

ये हैं सहारनपुर बवाल के असल कारण.. पर दोषियों पर कार्रवाई की जगह ईमानदार और मेहनती अफसरों को ही सस्पेंड कर दिया गया…

ये वह दस्तावेज है जिससे जाहिर होता है कि सहारनपुर के तत्कालीन डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दुबे ने ग्राउंड लेवल पर खूब सारा होमवर्क काम करने और डाक्यूमेंटेशन के बाद पब्लिक-प्रशासन-पुलिस के बीच तालमेल का एक फुलप्रूफ और जनपक्षधर तानाबाना बुना. आज इसी का नतीजा है कि सहारनपुर में सब कुछ पुलिस प्रशासन के नियंत्रण में है लेकिन इसका श्रेय एनपी-सुभाष को मिलने की जगह इन्हें निलंबन झेलना पड़ा और वाहवाही उनको मिल रही जिनका काम सिर्फ लगाना बुझाना और गाल बजाना है और अपने सियासी आकाओं का चरण चापन करना है.

आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे के खिलाफ जिस कदर जहर सीएम योगी के दिमाग में बोया गया है, उसका नतीजा यह है कि इन दोनों अफसरों को आजतक अपना पक्ष रखने के वास्ते सीएम से मिलने तक का समय नहीं दिया गया. जो बिचौलिए अफसर हैं, इस स्थिति का फायदा उठाकर अपने खास चंपू अफसरों को प्राइम तैनाती दिलाने में सफल हो जा रहे हैं और जो ईमानदार हैं, वह खुद को सपा राज जैसा ही प्रताड़ित पीड़ित महसूस कर रहे हैं. चाल चेहरा चरित्र को लेकर खुद को अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के नेताओं को यह देखना चाहिए कि भले सौ बेईमान माफ कर दिए जाएं, लेकिन किसी एक ईमानदार के खिलाफ गलत कार्रवाई न हो जाए.

चर्चा तो यहां तक होने लगी है कि पूरा सिस्टम अब इस कदर चापलूसों और चोरों से भरा हुआ हो गया है कि अब ईमानदार, तेवरदार और जन सरोकार वाला होना अपराध हो गया है. ऐसे लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही कोई ठीकठाक पोस्टिंग देर तक दी जाती है. इनके पीछे सारे बेईमान एकजुट होकर हाथ धोकर पड़ जाते हैं. सबको उम्मीद थी कि यूपी में भाजपा शासन आ जाने से लंबे समय से चल रहे सपा और बसपा के जंगलराज से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन हुआ ठीक उलटा. लग रहा है जैसे जंगलराज कांटीन्यू कर रहा है. वही भ्रष्ट और दागी अफसर मजबूत बड़े पदों पर जमे हैं जिन्होंने पिछले शासनकालों में जमकर मलाई खाई और अपनों को खिलाया. जिन्हें जेलों में होना चाहिए, वह योगी सरकार के गुड बुक में हैं और जिन्हें बड़ा पद कद मिलना चाहिए वे सस्पेंड बड़े हैं या कहीं कोने में फेंक दिए गए हैं.

सीएम योगी को अफसरों द्वारा दिए जाने वाले फीडबैक को परखने जांचने के लिए भी एक सिस्टम खड़ा करना चाहिए अन्यथा बेईमान और चापलूस अफसरों की झूठी बातों में आकर उनके हाथों बहुत सारा अनर्थ होता रहेगा, जैसे एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के मामले में हुआ है. इन दो अफसरों का निलंबन लगातार जारी रहने और इनकी बात तक न सुने जाने से ईमानदार किस्म के अफसरों में बेचैनी है. यूपी में कानून व्यवस्था से लेकर ढेर सारे क्षेत्रों में हालात न सुधरने का बड़ा कारण यही है कि अब भी प्रदेश का दो तिहाई हिस्सा भ्रष्ट अफसरों के शिकंजे में है जो भाजपा नेताओं को पर्दे के पीछे से ओबलाइज कर अपनी मनमानी कर रहे हैं.

उम्मीद करना चाहिए कि सीएम योगी के जो खास लोग हैं, वह आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे और आईएएस एनपी सिंह मामले में योगी को सच्चाई बताएंगे और इनका निलंबन खत्म कराने की दिशा में काम करेंगे. अभी अगर कोई भ्रष्ट अफसर सस्पेंड हुआ होता तो वह तगड़ी लाबिंग करके हफ्ते-दो हफ्ते में ही बहाल हो गया होता. लेकिन एनपी और सुभाष लाबिंग जैसे खेल तमाशों से दूर रहने वाले लोग हैं और अपने लिए राजनीतिक आका नहीं बनाए इसलिए अलग-थलग पड़कर भोगने के लिए मजबूर हैं. उनके पक्ष में कोई भी अफसर सीएम के सामने एक शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि टाप लेवल पर बैठे अफसरों को अपनी नौकरी बचाने और कुर्सी हथियाए रहने की कला खूब आती है.

आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन भी लगभग रीढ़ विहीन मुद्रा में ही रहते हैं. इनके पदाधिकारी भी कानों में तेल डाले चुप्पी साधे पड़े हुए हैं. यहां तक कि डीजीपी सुलखान सिंह से लेकर मुख्य सचिव राहुल भटनागर तक में अपने ईमानदार अफसरों को प्रोटेक्ट करने, उनका पक्ष रख उन्हें बिना वजह दंडित किए जाने से बचाने का दम नहीं दिख रहा अन्यथा आज एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे यूं निलंबित होकर बनवास नहीं काट रहे होते. ये उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि यहां बदलाव के पक्ष में वोट तो पड़ते हैं लेकिन भारी भरकम नोटों के तले जनभावना कुचली जाती है, सत्ता सिस्टम का करप्टर चरित्र पहले जैसा ही बना रहता है. जो ईमानदारी से ग्राउंड लेवल पर जनसरोकार के साथ काम करता है, उसकी नियति एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे बन जाना होता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे के व्यक्तित्व को लेकर यशवंत द्वारा लिखी गई इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ें…

ये भी पढ़ें, योगी राज में अफसरशाही का हाल….

एक नज़र इधर भी….

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चर्चित और जनपक्षधर आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जन सम्मान कल

यूपी के गाजीपुर जिले के पुलिस कप्तान और चर्चित आईपीएस अधिकारी सुभाष चंद्र दुबे का जन सम्मान कल (27 अप्रैल 2017) को गाजीपुर शहर स्थित जिला पंचायत सभागार में सुबह ग्यारह बजे से किया जाएगा. भड़ास4मीडिया के सौजन्य से आयोजित इस कार्यक्रम में जिले भर के आम जन के प्रतिनिधि और विभिन्न संगठनों के गणमान्य लोग शिरकत करेंगे. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह होंगे. कार्यक्रम में प्रवेश नि:शुल्क रहेगा और कोई भी व्यक्ति शामिल होकर अपनी बात रख सकेगा.

अपने जनपक्षधर और ईमानदार तेवर के जरिए सुभाष चंद्र दुबे ने अब तक हजारों निर्दोषों को फर्जी मुकदमों में फंसने और जेल जाने से बचाया है. साथ ही कई बड़े हाई प्रोफाइल मामलों का खुलासा कर उन्होंने खुद की एक अलग पहचान बनाई है. ऐसे दौर में जब अधिकारी किसी बड़े नेता के तलवे चाट कर प्राइम पोस्टिंग पाने का प्रयास करता है और उसी नेता के निर्देश के मुताबिक गलत सही काम करने कराने लगता है, सुभाष चंद्र दुबे ने इस शार्टकट को अपनाने से इनकार किया और अपनी खुद की राह बनाई. इस कड़ी में उन्होंने जो बिना दबे कई बड़े घपलों-घोटालों-अपराधों का खुलासा किया तो उनके दुश्मन सत्ता सिस्टम में बैठे नेता और अधिकारी हो गए. नतीजतन उन्हें बिना वजह निलंबन, उपेक्षा और विभागीय उत्पीड़न का दंश झेलना पड़ा.

सुभाष चंद्र दुबे को विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग ने गाजीपुर का पुलिस कप्तान बनाया. अपने इस ताजे कार्यकाल में सुभाष चंद्र दुबे ने अपनी सक्रियता, ईमानदारी, जुझारूपन और जनपक्षधरता के बल पर पुलिस को न सिर्फ सकारात्मक पुलिसिंग के लिए प्रेरित किया बल्कि खुद निजी स्तर पर सैकड़ों मामलों में दूध का दूध और पानी पानी करके निर्दोषों को फर्जी मुकदमों में फंसने व जेल जाने से बचाया, साथ ही दोषियों को सलाखों के पीछे किया.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह का कहना है कि आज के दौर में जब बेइमानों लोग सबसे ज्यादा संगठित हैं, ईमानदारों को भी एक मंच पर आना चाहिए और एक दूसरे का मनोबल बढ़ाना चाहिए ताकि आम जनता के प्रति सत्ता-सिस्टम और मीडिया की जवाबदेही बनी रहे. यशवंत के मुताबिक सुभाष चंद्र दुबे यूपी के उन चंद आईपीएस अफसरों में हैं जो सही गलत का फैसला किसी बड़े आदमी के फोन काल पर नहीं करते बल्कि कानून की किताब और मौके की सच्चाई से तय करते हैं. आगे भी भड़ास4मीडिया ईमानदार अफसरों को सम्मानित करता रहेगा. यह एक सिलसिला शुरू हुआ है जिसे जारी रखा जाएगा ताकि समाज में सच्चा और अच्छा करने वालों का मनोबल मजबूत रहे.

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आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे, ये दो अफसर क्यों हैं तारीफ के काबिल, बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में… चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा… अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा… दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में ‘लिहाज’ ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  … और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं… दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त… वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा… शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया… सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है… उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। 🙂

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया …..इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए…

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम – स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन…

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आईपीएस हिमांशु के निलंबन के बाद बोले अमिताभ ठाकुर- ‘सरकारी कर्मी को मिले घटनाक्रम पर टिप्पणी का अधिकार’

आईपीएस अफसर हिमांशु कुमार के निलंबन से उठ रहे हंगामे के बीच आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने अपने फेसबुक पर लिखा कि उनका व्यक्तिगत मत है कि बदलते समय में सरकारी कर्मी को भी विभिन्न विषयों और घटनाचक्र पर अपना मंतव्य देने का अधिकार मिलना चाहिए, जब तक वह मंतव्य देश की सुरक्षा, संरक्षा आदि से न जुड़ा हो अथवा अपने शासकीय पद की गोपनीयता भंग कर नहीं दिया जा रहा हो.  अमिताभ के अनुसार किसी स्तर पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार, सामान्य घटनाक्रम आदि पर सरकारी कर्मी को टिप्पणी करने का अधिकार देना पारदर्शिता, बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था और अभिव्यक्ति की आज़ादी के हित में है. उन्होंने कहा कि इस पर रोक लगाने विषयक नियम को उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी है जो अभी विचाराधीन है.

Govt Servants shall get right to opinion: Amitabh

In aftermath of IPS officer Himanshu Kumar suspension, IPS officer Amitabh Thakur said on Facebook that his personal stand is that with changing times, Government servants shall be permitted to comment upon various subjects and happenings, unless they are not prejudicial to national interest and state security and do not leak sensitive information.  He said any exposure of corruption and comments on happenings around are in the interest of better governance, administrative system and freedom of expression. He added that he has challenged the Service Rule that places such restrictions, which is pending before the High Court.

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सीएम योगी ने आईपीएस हिमांशु कुमार को निलंबित कर दिया

यूपी के युवा आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार को पुलिस विभाग के अंदर की पोल खोलना महंगा पड़ गया. उन्हें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने निलंबित कर दिया है. कहा जा रहा है कि इस कदम के बाद यूपी को एक नया अमिताभ ठाकुर मिल गया है, हिमांशु कुमार के रूप में, बशर्ते हिमांशु कुमार अपनी लड़ाई पूरे जोश और दम के साथ लड़ सकें. संभव ये भी है कि वे मामले को रफादफा करा कर फिर से बहाल हो सकते हैं. हालांकि हिमांशु ने सस्पेंड होेने के बाद ट्विटर पर लिखा है कि सत्य की जीत होती है. यानि उन्होंने इरादे जता दिए हैं कि वे झुकेंगे नहीं.

आईपीएस हिमांशु कुमार ने यूपी में नई सरकार बनने के बाद आरोप लगाया था कि पुराने पुलिस अफसर नई सरकार को खुश करने के लिए अचानक यूटर्न ले चुके हैं और एक जाति विशेष के पुलिस कर्मियों को दंडि़त कर रहे हैं. नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्रा ने हिमांशु कुमार से लंबी बातचीत की और उसका प्रसारण नेशनल वायस चैनल पर किया. इस बातचीत में हिमांशु ने खुलकर पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार के बारे में बताया.

योगी आदित्‍य नाथ के नेतृत्‍व में भाजपा की सरकार बनने के बाद एक आईपीएस अधिकारी हिमांशु ने डीजीपी पर जाति विशेष के अधिकारियों को ‘सजा’ देने का आरोप लगाया. जब मीडिया में उनके ट्वीट की चर्चा शुरू हुई तो सफाई देते हुए कहा कि लोगों ने गलत मतलब निकाला. यूपी कैडर के 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार फिरोजाबाद के एसपी थे. बयानों के बाद में उन्हें डीजी आफिस अटैच कर दिया गया. उन्‍होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘कुछ वरिष्‍ठ अधिकारियों में उन सभी पुलिस कर्मचारियों को सस्‍पेंड / लाइन हाजिर करने की जल्‍दी है जिनके नाम में ‘यादव’ है.’

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश मिश्रा ने रिपोर्ट दी कि ‘नोएडा और गाजियाबाद में 90 सिपाहियों को लाइन हाजिर कर दिया गया है।’ मिश्रा के मुताबिक इन्‍हें ‘कारखास’ कहते हैं और आईपीएस-नेता मिलकर इनसे वसूली कराते थे।’ इसी ट्वीट पर हिमांशु ने जवाब देते हुए पूछा कि ‘आखिर डीजीपी ने मेरे द्वारा बिसरख नोएडा में फाइल की गई एफआईआर की सही से जांच कराने की इजाजत क्‍यों नहीं दी? आखिर डीजीपी कार्यालय अफसरों को जाति के नाम पर लोगों को परेशान करने के लिए मजबूर क्‍यों कर रहा है?’

यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार बिहार के मोतिहारी के रहने वाले हैं. हिमांशु पर उनकी पत्नी प्रिया सिंह ने पटना के महिला थाने में दहेज प्रताड़ना और मानसिक शोषण करने का आरोप लगाया था. इनकी पत्नी प्रिया सिंह पटना की रहने वाली है. इन दोनों की 2014 में शादी हुई थी. लेकिन शादी के कुछ दिनों के बाद ही प्रिया ने मार्च 2015 में हिमांशु पर दहेज प्रताड़ना और मानसिक रूप से शोषण करने का आरोप लगाया था.

कोर्ट ने इनकी इस मामले में अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया था. पटना हाई कोर्ट की ओर से यूपी सरकार को हिमांशु के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए थे लेकिन, यूपी की अखिलेश सरकार लगातार हिमांशु को बचाती रही, ऐसा आरोप है. इस मामले पर आईपीएस हिमांशु ने ट्वीट कर बताया था कि उनकी पत्नी 10 करोड़ रुपए के लिए ब्लैकमेल कर रही हैं.

हिमांशु ने यूपी में योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद पुलिस विभाग में हुए तबादले पर प्रश्न उठाया था. यूपी की योगी सरकार द्वारा सस्पेंड किए जाने के बाद हिमांशु ने अपने ट्वविटर अकाउंट पर लिखा-सत्य की जीत होती है. 2010 बैच के आईपीएस अधिकारी हिमांशु कुमार फिलहाल डीजी ऑफिस से जुड़े हुए हैं. कुछ दिन पहले ही एसपी फिरोजाबाद के पद से इनका ट्रांसफर डीजी ऑफिस में कर दिया गया था. यूपी पुलिस का कहना है कि हिमांशु को अनुशासनहीनता के लिए सस्पेंड किया गया है.

आईपीएस हिमांशु कुमार और नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ के बीच की बातचीत सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=wF1993jy7AI&t=352s

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पांडे जी पांडे जी… गो माता को कटवाता जी…

Yashwant Singh : पुलिस अफसर अगर इमानदार बन जाएं, सत्ताधारियों की परवाह करना बंद कर दें और अपना दायित्व निभाते हुए काले कारनामे वालों का स्टिंग करना शुरू कर दें तो बस हफ्ते भर में सारी बुराइयां दूर हो जाएंगी… एक आईपीएस अफसर ने एक स्टिंग किया.. नतीजा हुआ, तबादला.. पुरानी लेकिन रोचक कहानी है… पता नहीं राणा साहब इन दिनों कहां पोस्टेड हैं…

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पांडे जी पांडे जी… गो माता को कटवाता जी… एक पांडे जी हैं. यूपी में. राज्यमंत्री स्तर के आदमी हैं. पांडे जी अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. पांडे जी गोकशी कराने का काम भी कराते हैं. पांडे जी का एक कार्यकर्ता है. वो भी पांडे जी है. वह गोरक्षा समिति मुजफ्फरनगर का प्रमुख रह चुका है. वह उत्तर प्रदेश ब्राहमण युवजन सभा का सदर है. वह भी पशु तस्करी कराता है. देखिए, एक स्टिंग आपरेशन, जिसे यूपी कैडर के एक आईपीएस अधिकारी ने कराया और पांडेयजी लोगों के पशु तस्करी में लिप्त होने के खेल का खुलासा किया. हालांकि वह आईपीएस अफसर अब शंट किया जा चुका है लेकिन पांडेयजी लोगों का खेल निर्बाध रूप से जारी है…. संपूर्ण खबर और संपूर्ण स्टिंग देखने के लिए यहां क्लिक करें…

इस स्टिंग के कारण आईपीएस नवनीत कुमार राणा पर गिरी गाज! (देखें वीडियो)
http://old1.bhadas4media.com/…/8985-2013-02-25-08-34-03.html

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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डीआईजी विजय भूषण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मनोरोगी’ बताया!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में तैनात डीआईजी विजय भूषण ने एक अजीबोगरीब पोस्ट को साझा किया है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मनोरोगी’ बताया गया है. एक बड़े पद पर आसीन पुलिस अफसर द्वारा अपने प्रधानमंत्री पर अभद्र टिप्पणी का यह मामला तूल पकड़ता, उससे पहले ही अफसर ने सफाई दे दी कि सिस्टम जनरेटेड इरर के कारण यह पोस्ट कई ह्वाट्सएप ग्रुपों में गलती से शेयर हो गया.

वाराणसी मंडल के पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) विजय भूषण की तरफ से जब प्रधानमंत्री को ‘मनोरोगी’ बताने वाली पोस्ट कई लोगों के पास पहुंची तो ज्यादातर सन्न रह गए. इस पोस्ट में मोदी को किसी मनोरोगी की तरह न चिल्लाने की सलाह दी गई थी. ये सलाह वाट्सअप में एक खुले पत्र के अंदाज में डाली गई. बाद में डीआईजी ने बताया कि यह पोस्ट उनके द्वारा नहीं लिखी गई है.

डीआईजी विजय भूषण के मुताबिक कई वाट्सअप ग्रुपों में उनका नंबर जुड़ा है. किसी में यह मैसेज बाहर से आया था. सिस्टम जेनरेटेड एरर के जरिए यह बाहर के ग्रुपों में चला गया. बाद में उन्होंने अपने आप को ग्रुप से हटा लिया है.

उत्तर प्रदेश के डीजीपी जावीद अहमद का कहना है कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं है. ज्ञात हो कि विजय भूषण राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं. 2003 में प्रमोशन पाकर आईपीएस बने. मूल रुप से इलाहाबाद जिले के रहने वाले इस पुलिस अधिकारी ने एम.ए. तक की शिक्षा ग्रहण की है. इन्हें सेवा में सराहनीय कार्य के लिए गैलेंट्री अवार्ड भी मिल चुके हैं.

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केंद्र सरकार ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर के कैडर परिवर्तन से मना किया

यूपी कैडर आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा मुलयम सिंह धमकी मामले के बाद से उन्हें नौकरी में कई प्रकार से प्रताड़ित किये जाने और कई अत्यंत ताकतवर लोगों द्वारा उन्हें जान को वास्तविक खतरा होने की बात कहते हुए 16 जून 2016 को गृह मंत्रालय, भारत सरकार को अपने कैडर परिवर्तन हेतु प्रेषित अनुरोध को केंद्र सरकार से अस्वीकृत कर दिया है.

मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश को भेजे अपने आदेश दिनांक 03 जनवरी 2017 में गृह मंत्रालय ने कहा है कि अमिताभ ने अपने और अपने परिवार वालों की सुरक्षा का खतरा बताते हुए किसी अन्य कैडर में भेजे जाने का आवेदन किया. गृह मंत्रालय द्वारा इसका परीक्षण किया गया और उस पर सहमति नहीं व्यक्त की गयी. अमिताभ ने कहा था कि उन्हें और उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर को ताकतवर लोगों से जान को खतरा है, इस कैडर में उनके लिए स्थिति लगातार बदतर हो रही है और उनके साथ शत्रुओं की तरह बर्ताव हो रहा है. हाल में उन्हें गृह मंत्रालय के आदेशों पर राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान की गयी थी.

Central Govt rejects IPS officer’s Cadre change request

The Central Government has rejected the prayer made by UP Cadre IPS officer Amitabh Thakur to the Home Ministry on 16 June 2016 for changing his Cadre from Uttar Pradesh to any other State, alleging serious harassment in his service and threat to life, after the Mulayam Singh phone threat made on 13 July 2015.

The order dated 03 January 2017 sent by the Home Ministry to the Chief Secretary, UP says that Amitabh had requested change of Care from UP to another cadre on grounds of threat to his life or his family members. It says that the representation has been examined by the Ministry and it has not been agreed to.

Amitabh had said that he and his wife activist Dr Nutan Thakur have real threat from powerful people. The situation is deteriorating every day and the State government officials are treating him as a sworn enemy. Only recently Amitabh has been provided security by the UP Government on directions of the Home Ministry.

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यूपी में अब मेरा काम कर पाना संभव नहीं : आईपीएस अमिताभ ठाकुर

यूपी कैडर आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने गृह मंत्रालय, भारत सरकार को दुबारा पत्र लिख कर अपना कैडर यूपी के बाहर किसी अन्य राज्य में किये जाने की मांग की है. अमिताभ ने मुलयम सिंह धमकी मामले के बाद से उन्हें नौकरी में कई प्रकार से प्रताड़ित किये जाने और कई अत्यंत ताकतवर लोगों द्वारा उन्हें जान को वास्तविक खतरा होने की बात कहते हुए 16 जून 2016 को गृह मंत्रालय, भारत सरकार को अपने कैडर परिवर्तन हेतु आवेदन उत्तर प्रदेश सरकार के माध्यम से भेजा था. उन्होंने 22 सितम्बर को इस सम्बन्ध में पुनः अनुरोध किया था. 

गृह मंत्रालय ने उन्हें बताया था कि उनका आवेदन पर मंत्रालय में विचाराधीन है. अमिताभ ने अपने पत्र में कहा है कि जून से स्थिति लगातार बदतर हो रही है और उनके साथ शत्रुओं की तरह बर्ताव हो रहा है. उन्होंने कहा है कि इन स्थितियों में वे यूपी कैडर में बिलकुल काम नहीं कर सकते हैं और उन्होंने अपना कैडर बदलने अथवा किसी केंद्रीय सेवा में तैनात किये जाने की बात कही है.

Not possible to work in UP anymore : IPS Amitabh Thakur

UP Cadre IPS officer Amitabh Thakur has once again written to Ministry of Home Affairs, Government of India for changing his Cadre from Uttar Pradesh to any other State. is under consideration before the Central government. Amitabh had sent this application on 16 June 2016 asking for Cadre change, alleging serious harassment in his service and threat to life, after the Mulayam Singh phone threat. He had again made a representation to the Central government on 22 September.

The Ministry of Home Affairs has told him that his application was under consideration before the Ministry. Amitabh has said in his letter that the situation is deteriorating every day and the State government officials are treating him as a sworn enemy. He said in the prevailing conditions, he cannot work anymore in UP and has sought Cadre change or appointment in some Central government service.

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देवरिया के खरवनिया गांव में क्यों जुटते है बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी?

अफसरों को नतमस्तक करने वाली कौन सी जादू की छड़ी है नन्द लाल जायसवाल और रामजी जायसवाल के पास?  देवरिया 17 नवम्बर : एक तरफ प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव जहां प्रशासनिक अधिकारियों को ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता का पाठ पढ़ाने में सदैव आगे रहते है वहीं प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी मुख्यमंत्री के उक्त आदेश को ठेंगा दिखाने में पीछे नहीं रहते है। वे भूमाफिया और अनेकों आरोपों से घिरे विवादित धन्ना सेठों के यहां पहुंच कर उनका महिमा मंडन करते हैं तथा उपकृत होते है। यहीं नहीं, ये प्रशासनिक अधिकारी जहां आम जनता से बड़ी मुश्किल मिलते हैं वहीं धन कुबेरों के घरों पर जाकर घण्टों बैठकर आनन्दित होते रहते है तथा महफिल सजाते हैं। 

वह जगह है देवरिया जिला मुख्यालय से लगभग 65 कि मी दूर खरवनिया गांव। जहां लगभग हर बड़ा अधिकारी जाने के लिए लालायित रहता है तथा जायसवाल बन्धुओं का अतिथि बनने का मोह नहीं त्याग पाता है। शहर और गांव की आम जनता आज तक यह नहीं समझ पाई कि आखिर उस गांव में पिछले एक दशक से बड़े बड़े अधिकारी और नेता किस तिलिस्म के तहत एक़त्रित होते हैं। बात हो रही है मंगलवार को गोरखपुर मण्डल के लभगग सभी आला अधिकारियों का देवरिया जिले के खरवनिया गांव में एकत्रित होने एवं प्रभावती देवी महावि़द्यालय के वार्षिक समारोह में उपस्थित होने के सम्बन्ध में।

कमाल यह देखिये कि सरकारी वरिष्ठ अधिकारियों ने आम जनता को धोखा देने के उददेश्य से भाटपाररानी तहसील दिवस मे शामिल का होने का बहाना खोज लिया। तहसील दिवस में एक साथ गोरखपुर के मण्डलायुक्त अनिल कुमार, गोरखपुर जोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल, पुलिस उप महानिरीक्षक शिव सागर सिंह, जिलाधिकारी देवरिया अनिता श्रीवास्तव व पुलिस अधीक्षक मोहम्मद इमरान सहित लगभग पांच दर्जन अन्य सरकारी अधिकारी और उनके मातहत उपस्थित हुए तथा एसडीएम व सीओ आदि तहसील दिवस की खाना पूर्ति करने के बाद सभी अधिकारी जायसवाल बन्धुओं का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए खरवनिया गांव पहुंच गए।

इन अधिकारियों ने खरवनिया गांव में पहुंच कर किया क्या। कुछ नहीं। गांव के विकास से कोई मतलब नहीं। जायसवाल बन्धुओं के निजी विद्यालय के वार्षिक समारोह में भाग लिया तथा वहां उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने का कोरम पूरा किया। तत्पश्चात जायसवाल बन्धुओं द्वारा दिए गए विशेष सम्मानों को तहे दिल से स्वीकार कर लिया। आम लोगों को घोर आश्चर्य होता है कि राम जी जायसवाल, नन्द लाल जायसवाल, आदि बन्धुओं का ऐसा कौन सा सामाजिक कृत्य है कि आला अधिकारी इन जायसवाल बन्धुओं का एक तरह से तलवे चाटने के लिए तैयार रहता हैं। इनके घर का कोई व्यक्ति दुश्मन देशों से युद्ध में लड़ते हुए न तो शहीद हुआ है और न ही इन लोगों ने समाज सेवा का कोई बड़ा कोई काम किया है। जबकि लोगों का आरोप है कि इन जायसवाल बंधुओं की एक गुटखा कम्पनी है जिसमें एमडी की हैसियत से जायसवाल बन्धु कार्यरत हैं तथा करोड़ों का व्यापार करते है एवं वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को हर तरह का शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सुख उपलब्ध कराते रहते हैं।

कहा जाता है कि इन अधिकारियों को नोएडा में बुलाकर खूब मेहमान नवाजी कराया जाता है जबकि दिखावे के लिए इन जायसवाल बन्धुओं का एकाध विद्यालय और फर्नीचर की दुकानें आदि हैं। बाकी भू माफिया के रूप में जमीनों को कब्जा करने तथा खुल कर दंबगई करना और अधिकारियों का ट्रान्सफर / पोस्टिंग इनका असली खेल है। इन जायसवाल बन्धुओं के अति घनिष्ठ सम्बन्ध लगभग सभी राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं के साथ भी है। चाहे वह सत्ताधारी दल सपा हो या विपक्ष की भाजपा या बसपा। आम लोगों के दिमाग में उक्त प्रकरण में सदैव यह प्रश्न बना रहता है कि नन्द लाल जायसवाल, रामजी जायसवाल आदि के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है कि बड़े-बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी इनके आगे नतमस्तक बने रहते हैं? लोगों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से इसकी जांच कराने की मांग की है कि आखिर खरवनिया गांव में ऐसा क्या है कि शासन प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी वहां पिछले एक दशक जुटते चले आ रहे है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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मंत्री यशपाल आर्य के लगातार अनैतिक दबाव बनाने के चलते आईएएस अक्षत गुप्ता की गई जान!

कल रात को खबर आई कि राज्य में तैनात आईएएस अधिकारी श्री अक्षत गुप्ता नहीं रहे. बताया जा रहा है कि दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. जैसा कि पिछले दिनों से समाचार पत्रों में खबरें आ रही थी कि मंत्री यशपाल आर्य उन्हें बदले जाने को दबाव बना रहे थे तो ये हार्ट अटेक उसी दबाव की परिणति तो नहीं. अक्षत गुप्ता का उदाहरण कोई पहला उदाहरण नहीं है कि उत्तराखंड की सत्ता में रहे बहुत से मंत्रियों ने अपने मन का काम ना होने पर अपने अधिकारो का दुरूपयोग किया है और अधिकारी विशेष को जितना हो सकता था जलील करने के साथ जमकर प्रताड़ित भी किया है. हां बहुत से कार्मिक उस दबाव को काउंसलिंग के चलते झेल गए और जो नहीं झेल पाये वे हार्ट अटेक जैसे हादसों के शिकार हो गए. कई अधिकारियों के पारिवारिक सदस्य उस दबाव का शिकार हुए हैं जो उनके सेवारत पारिवारिक सदस्य झेल रहे होते हैं.

इस बात की पूरी तरह से एक स्वतंत्र एंव निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, आखिर 39 वर्ष की उम्र में किसी स्वस्थ व्यक्ति को हार्ट अटेक यूँ ही तो नहीं आ जाता, जब तक कि वह व्यक्ति गम्भीर अवसाद में ना हो और अक्षत गुप्ता हार्ट पेशेंट तो कही से भी नहीं होंगे? अब मूल सवाल उस अवसाद का जो शायद अक्षत गुप्ता झेल रहे थे. आखिर क्यों चाहते थे यशपाल आर्य उधमसिंहनगर के जिलाधिकारी और एसएसपी में बदलाव? ऐसा कौन सा काम था जो डीएम अक्षत गुप्ता, यशपाल आर्य के कहने पर नहीं कर रहे थे और यशपाल उनसे जबरन करवाना चाहते थे और ना करने पर वे उन्हें हटवाने के लिए राज्य सभा चुनाव के बहाने से सरकार से सौदेबाजी तक करने लगे.

अक्षत गुप्ता की मृत्यु के बहाने से ही सही सवाल बहुत से हैं और अधिकारी भी बहुत से जो इन सत्तामद में चूर मंत्रियों की सनक के शिकार हुए है या होते रहेंगे. अक्षत गुप्ता के इतर तीन परिवारो को मैं स्वयं व्यतिगत रूप जानता हूँ जिन्हें बर्बाद करने में उत्तराखंड के मंत्रियों ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जिनके चलते वे और उनका परिवार आज भी अवसादग्रस्त जीवन जी रहें हैं. हाँ वे किसी जिले के डीएम ना हुए इसलिए मीडिया में उन्हें तवज्जो नहीं मिल पाई. लेकिन याद रहे, दुःख सभी का एक-सा ही होता है, डीएम हो या अनुसेवक.

उत्तराखंड के पत्रकार चंद्रशेखर करगेती के एफबी वॉल से.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो गई यूपी के मुख्य सचिव आलोक रंजन की क्रूर कथा

मुख्‍य सचिव आलोक रंजन को हार चाहिए, न मिले तो नकद तीस लाख रुपया दो… चोरी के आरोप में दो महीनों तक अवैध हिरासत में रखा अपने दो घरेलू नौकरों को… इसी सारे मामले से जुड़ी है लखनऊ के एसएसपी के तबादले की इंटरनल स्टोरी….

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : यूपी के मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने अपने घरेलू नौकरों पर जो कहर तोड़ा है, उसने मानवता ही सहम गयी। अपनी बहू के बेशकीमती हार की चोरी पर मुख्‍य सचिव इतना गुस्‍साये कि सारे कानून-कायदों को ही धता बता दिया। वे किसी भी कीमत पर यह चाहते थे कि हार बरामद हो जाए और अगर ऐसा न हो सके तो उस हार की कीमत वसूली पुलिस अफसरों के जिम्‍मे डाली जाए। अब चूंकि लखनऊ के एसएसपी राजेश पाण्‍डेय ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जता दी, तो आखिरकार राजेश पाण्‍डेय को दण्डित कर लखनऊ की बड़े दारोगीगिरी से ही अपमानित कर दिया गया। यह मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में खासा चर्चित हो चुका है और पूरा प्रकरण सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आपको बता दें कि तीन महीने के लिए एक्‍सटेंशन पर मुख्‍य सचिव पद पर जमे आलोक रंजन के घर से विगत 28 फरवरी को एक बेशकीमती हार चोरी हो गया था। यह हार यूपी के एक बड़े उद्योगपति ने आलोक रंजन के बेटे के बहू-उत्‍सव अवसर पर भेंट किया था. लेकिन लाखों की कीमत का ये हार रिसेप्शन की रात चोरी हो गया। हीरों के इस हार के अलावा लाखों रूपए के जेवर और कैश पर भी किसी ने हाथ साफ़ कर दिया था। इस हार को बरामद करने के लिए चीफ सेक्रेटरी आलोक रंजन के दो सरकारी नौकर पुलिस ने हिरासत में लिए। ये नौकर अलोक रंजन के घर पर कई साल से काम रहे थे. सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इन दोनों नौकरों को दो महीने तक थाने में अवैध हिरासत में रखा और यातनाएं दीं. इस के बाद भी जब हार और कैश नहीं मिला तो सोमवार को चीफ सेक्रेटरी के कहने पर लखनऊ के बडे़ दारोगा राजेश पांडेय को ही हटा दिया गया। ऐसा कहा जा रहा है कि आलोक रंजन चाहते थे कि अगर यह हार नहीं बरामद हो सकता हो तो फिर राजेश पांडेय ही उस हार के बदले पूरी नकदी का जिम्‍मा सभालें।

इंडिया संवाद न्यूज पोर्टल पर अंशुल जैन की एक रिपोर्ट छपी है जिसमें आलोक रंजन के घरेलू नौकर राजेश ने खुलासा किया कि 28-29 फरवरी को हुए रिसेप्शन के 4-5 दिन बाद उसे हार चुराये जाने के शक में पुलिस पकड़कर थाने ले आई। थाने पर उसे और एक अन्य नौकर सुशील रावत को काफी मारा-पीटा गया. यहाँ तक की दोनों को पुलिस ने सीएफएसएल लैब में लाई डिटेक्टर मशीन पर बैठा दिया. क्यूंकि दोनों ने हार चोरी नहीं किया था इसलिए वो चोरी गए हार के बारे में कुछ बता नहीं सके. पत्रकारों को पता न लग सके इसलिए दोनों नौकरों को पुलिस हज़रतगंज थाने से 20 किलोमीटर दूर बक्शी का तालाब थाने ले गई. दोनों नौकरों के खिलाफ पुलिस ने कोई रिपोर्ट तो नहीं लिखी लेकिन दो महीने तक अवैध हिरासत में ज़रूर रखा।

पुलिस सूत्रों का कहना था कि दोनों नौकर बेक़सूर थे लेकिन फिर भी चीफ सेक्रेटरी का हार बरामद करने का दबाव बढ़ता जा रहा था. इस बीच अखिलेश के पुराने मित्र रहे लखनऊ के डिप्टी एसपी अशोक वर्मा ने अखिलेश से मुलाकात की. वर्मा ने बताया कि नौकरों को बहुत ज्यादा यातनाएं देना उचित नहीं होगा क्यूंकि एक नौकर ने आत्महत्या करने तक की कोशिश की है. अखिलेश ने तब चीफ सेक्रेटरी को किनारे कर आदेश दे दिए कि नौकरों को तुरंत छोड़ दिया जाय।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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भाड़ की औकात बता दिया अकेले चने ने, अमिताभ ठाकुर को बधाई….

Braj Bhushan Dubey : भाड़ की औकात बता दिया अकेले चने ने। अमिताभ ठाकुर को बधाई…. मुख्‍यमंत्री जी के पिता पर अपराध दर्ज कराने से लेकर अपराधी, तस्‍कर, रिश्‍वतखोरों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले अमिताभ ठाकुर सीएम व उनके परिवार का कोप भाजन बन दस माह तक निलम्बित रहे। सत्‍याग्रह, लिखना पढना और उचित माध्‍यम से लेकर कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया तब जाकर हुआ निलम्‍बन वापस।

अब अमिताभ ठाकुर को डीजीपी कार्यालय से सम्‍बद्ध कर दिया गया है। उन्‍होने मुख्‍यमंत्री व डीजीपी को पत्र लिखकर कहा है कि हमें काम दो, हम जिस स्‍तर के हैं, हमें उस स्‍तर का काम दो। हमारा पांच हजार रोज का वेतन बन रहा है, हम फोकट के पैसे कैसे ले सकते हैं? देश के यशस्‍वी मानक हैं अमिताभ. हृदय की अनन्‍त गहराइयों से सैल्‍यूट ऐसे जांबाज पुलिस अधिकारी को।

गाजीपुर के जाने-माने नेता ब्रज भूषण दुबे के फेसबुक वॉल से.

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अमिताभ ठाकुर आईजी बन कर पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठे हैं

लखनऊ : मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान केवल सात दिन की तैनाती पाये वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक सुभाष चंद्र दुबे को दंगा न सम्‍भाल पाने को लेकर शासन ने दोषी ठहराया। दुबे को इस आरोप में मुजफ्फरनगर से हटाकर लखनऊ में पुलिस महानिदेशक कार्यालय में सम्‍बद्ध कर दिया गया और इसके 15 दिन बाद उन्‍हें निलम्बित भी कर दिया गया। अब हकीकत यह देखिये। सुभाष च्रंद्र दुबे की कार्यशैली बेदाग रही है। दुबे जहां भी रहे, अपनी कुशलता के झंडे गाड़ दिया। दंगा शुरू होने पर दुबे को शासन ने खासतौर पर सहारनपुर भेजा था। तब तक मुजफ्फरनगर में अपर महानिदेशक कानून-व्‍यवस्‍था, आर्इजी, डीआईजी समेत कई अधिकारी भी तैनात थे, ताकि वे अपनी निगरानी में दंगा सम्‍भालने की कोशिश करें। लेकिन प्रमुख गृह सचिव ने इसी बीच सात दिन की तैनाती के बाद ही दुबे को डीजीपी कार्यालय में अटैच कर दिया था।

कोई सहज बुद्धि का चपरासी या बाबू भी आसानी से समझ सकता है कि जब जहां एडीजी, आईजी, डीआईजी से लेकर भारी पुलिस बल मौजूद हो, ऐसे में एसएसपी जैसा अदना अफसर की क्‍या औकात होगी। लेकिन चूंकि इसके पहले प्रमुख सचिव गृह आरएन श्रीवास्‍तव से काफी नाराजगी हो गयी थी, इललिए आरएन श्रीवास्‍तव ने दुबे के गर्दन पर सस्‍पेंशन की आरी रख दी। दुबे पर श्रीवास्‍तव इस लिए खार खाये बैठे थे, क्‍यों कि उनके एक खासमखास आदमी और माध्‍यमिक शिक्षा के एक बड़े अफसर को दुबे ने 85 लाख रूपयों की नकदी के साथ गिरफ्तार किया था। यह रकम इंट्रेंस की घूस के तौर पर थी। लेकिन दुबे अडिग रहे, और मुजफ्फरनगर दंगे में उन पर काम लगा दिया गया।

लेकिन आज तक दुबे पर लगे आरोपों की फाइल देखने की जरूरत न तो मौजूदा प्रुमुख गृह सचिव देवाशीष पाण्‍डेय ने की, या फिर मुख्‍य सचिव आलोक रंजन ने। जानकार बताते हैं कि दुबे की यह फाइल देखते ही सच साफ दिख जाता है। इसके लिए आईएएस  बनने की जरूरत नहीं। ठीक यही हालत थी अमिताभ ठाकुर की। आठ साल पहले ठाकुर ने सरकारों की खाल खींचनी शुरू कर दिया। वजह थी, ठाकुर पर प्रताड़ना। ठाकुर का आईआईएम में दाखिला मिला, लेकिन शासन ने उसे छुट्टी नहीं दी। बोले, यह अराजकता है। अमिताभ ने उस पर ऐतराज किया तो शासन ने उसे औकात में लाने की साजिशें बुन दीं। पहले ढक्‍कन पोस्टिंग लगा दी।

यह भी सहन किया ठाकुर ने, लेकिन अपनी आवाज उठाये रखा। नतीजा यह हुआ कि शासन ने निलम्बित कर दिया। इतना ही नहीं, निलम्‍बन की तयशुदा समयसीमा खत्‍म होने के बावजूद निलम्‍बन खत्‍म नहीं किया। ठाकुर ने इसके लिए अदालत और सेंट्रल ट्रब्‍युनल पर अर्जी लगायी। आज ठाकुर आईजी बन कर अपनी पूरी ठसक के साथ अपने आफिस में बैठ रहे हैं। एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने अमिताभ के इस प्रकरण पर बहुत जोरदार चुटकी ली। बोले:- अब चाहे कुछ भी हो जाए, सरकारों और आला अफसरों की संवेदनहीनता व प्रताड़ना के चलते अमिताभ ठाकुर में प्रवेश कर चुका अदालती कीड़ा वापस नहीं जाने का।

सच भी है। आपको अगर इस लोकतंत्र में सत्ता सिस्टम से टकराना है तो राहत फिलहाल अदालत और मीडिया के माध्यम से ही मिल सकती है।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं.

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यूपी में आईपीएस अफसर ने सिपाही को दी गालियां और सरेआम पीटा (सुनें टेप)

लख़नऊ में तैनात आईपीएस अभिषेक सिंह द्वारा अम्बेडकरनगर के एक सिपाही वसीम हाशमी को कल पीटा गया था. आईपीएस अभिषेक के बाबा की बोलेरो के टक्कर से मौत हो गई थी. यह बोलेरो अम्बेडकरनगर में तैनात सिपाही वसीम हाशमी के रिश्तेदार की थी. आईपीएस द्वारा सिपाही को दी गई धमकी की वॉयस रिकॉर्डिंग सुनिए. नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए…

https://www.youtube.com/watch?v=KSij2ss6PXQ

ज्ञात हो कि हादसे में घायल अपने बाबा से हुई अभद्रता और फिर मौत के बाद भड़के यातायात निदेशालय के एसपी अभिषेक सिंह ने स्वाट टीम के सिपाही मो. हाशमी को सरेआम पीट दिया। अंबेडकरनगर के तहसील तिराहे पर मंगलवार हुई इस घटना से हड़कंप मच गया और सिपाही के समर्थन में बड़ी संख्या में लोग जुट गए। देर तक चले हंगामे के बाद दोनों पक्षों में लिखित समझौता हो गया। एसपी अजय कुमार सिंह ने बताया कि दोनों पक्षों में समझौता हुआ है कि वे आगे कार्रवाई नहीं चाहते। हालांकि इस दौरान अफसर के बाबा की मौत हो गई। बाद में एसपी को कड़ी सुरक्षा में लखनऊ भेज दिया गया। बताया जा रहा है कि मंगलवार दोपहर जिला मुख्यालय पर बेवाना थाना क्षेत्र के बुजुर्ग बलेशर एक जीप की टक्कर से घायल हो गए। उन्हें तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया। इस जीप में सिपाही का परिवार भी बैठा था। जीप उसके रिश्तेदार की बताई जा रही है। एक्सीडेंट के बाद लोगों ने जीप को घेर लिया।

इस बीच, हाशमी अस्पताल पहुंच गया। आरोप है कि हाशमी ने लखनऊ में तैनात आईपीएस अफसर अभिषेक के बाबा बलेशर से अभद्रता की। इसकी जानकारी अभिषेक को मिली तो पहले तो उन्होंने फोन पर हाशमी को धमकाया। दोपहर बाद अभिषेक खुद जिला मुख्यालय पहुंच गए। तब तक बलेशर की मौत हो चुकी थी। बताया जाता है कि एसपी सीधे तहसील तिराहे पहुंचे और सिपाही को जमकर पीटा। इस बीच, अकबरपुर कोतवाल महेंद्र पहुंचे और हाशमी को सीधे कोतवाली लेकर पहुंच गए। हाशमी के समर्थन में एक वर्ग विशेष के लोग थाने पहुंच गए और एसपी के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की मांग करने लगे। हंगामे की जानकारी मिलते ही एएसपी राहुल राज मौके पर पहुंचे। बाद में दोनों पक्षों के बीच लिखित समझौता हुआ। अभिषेक सिंह ने इस मामले में किसी भी तरह की मारपीट से इन्कार किया है।

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अमर उजाला पर विज्ञापन न मिलने से डीजीपी के खिलाफ खबर छापने का आरोप

अमर उजाला को विज्ञापन न देने पर डीजीपी के खिलाफ 31 जनवरी और 1 फरवरी को प्रकाशित खबरों के मामले ने तूल पकड लिया है। पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला न पढ़ने की चेतावनी जारी कर दी है। साथ ही अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ नगर कोतवाली देहरादून में मुकदमा दर्ज कर लिया है। सूत्रों की मानें तो अब अमर उजाला के पदाधिकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत से मिलकर मामले में समझौता कराने के प्रयास में लगे हैं।

पुलिस विभाग की तरफ से जारी यह पत्र चर्चा में है…

महिला दरोगा भर्ती से सम्बंधित विज्ञापन न मिलने से बौखलाए अमर उजाला अखबार ने डीजीपी उत्तराखंड महोदय के सम्बन्ध में पहले 31.1.16 को देहरादून में तथा 1.2.16 को हरिद्वार में, फिर उसका फॉलोअप छापा जो काफी भद्दा गैरजिम्मेदाराना तरीके से छापा है. इतने बड़े अखबार को ऐसी ओछी हरकत शोभा नहीं देती. एक ही खबर को ज्यों का त्यों दो दिन प्रदेश में अलग स्थानों में छापा गया। प्रदेश पुलिस के मुखिया के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी करना पूरे पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता और मनन का विषय है जो कि सीधे तौर पर उत्तराखण्ड पुलिस के मान सम्मान को ललकारते हुऐ पीत पत्रकारिता का जीता-जागता उदाहरण है।

पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर द्वारा किये गए विभागीय अच्छे कार्यों को तो कभी भी अमर उजाला ने तार्किक जगह नहीं दी। यदि कभी-कभार ऐसी ख़बरें छापी भी हैं, तो बाद के पन्नों में वो भी बेमन से, और बहुत कम शब्दों में। परंतु विज्ञापन न मिलने की खबर को अमर उजाला ने फ्रंट पेज की खबर बनाया है। सही में देखा जाये तो अमर उजाला का कुछ सालों में पैटर्न पूरी तरह से पुलिस विभाग के एंटी अखबार का है, और मात्र एक ही बदनाम पुलिस अधिकारी का व्यक्तिगत अखबार तक सीमित होकर रह गया है।

पुलिस विरोधी नकारात्मक खबरें इसमें बड़ी बड़ी और पुलिस विभाग के गुड वर्क की ख़बरें बहुत छोटी छोटी छापी जाती हैं। वर्तमान खबर तो मात्र सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन न मिलने के कारण छापी गयी है जबकि खबर में जमीन से जुड़े जिस केस को उछालकर जिक्र किया गया है, उस केस के करंट अपडेट को तो जानने की कोशिश तक नहीं की गयी और केस से जुड़े अधिकारीयों को सजा दिए जाने के बारे में लिखा है।

हकीकत में इस केस में धोखाधड़ी तो हमारे डीजीपी सर के साथ हुई है। अपने हक़ के लिये जमकर लड़ना कोई गलत बात नहीं। लेकिन अमर उजाला डीजीपी सर के विरोध में ख़बरें छाप कर उनकी छवि ख़राब कर पूरे पुलिस विभाग को छोटा करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर ने पुलिस परिवार का मुखिया होने की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और अपने अधीनस्थों के भलाई के लिए स्वयं व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासन में लंबे समय से लटकी पड़ी तमाम फाइलों की पैरवी की गयी तथा सिपाहियों की वेतन विसंगति, प्रमोशन, स्थायीकरण, नये पदों और पुलिस विभाग के आधुनिकीकरण आदि मामलों का बहुत तेजी से निस्तारण करवाया।

वर्ष 2015 में वेतन विसंगति एवं एरियर को लेकर काली पट्टी बांधने एवं सोशल मीडिया पर मेसेज फॉरवर्ड करने के मामले में जब सिपाहियों पर कार्यवाही की बात कई पुलिस अधिकारी कर रहे थे, अकेले डीजीपी सर ही थे, जिन्होंने किसी भी निर्दोष सिपाही पर कार्यवाही नहीं होने दी। उन्होंने किसी निर्दोष के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी, जबकि उस मामले में सैकड़ों सिपाहियों पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई थी। यहाँ तक कि डीजीपी सर ने सिपाहियों के हक़ के लिए वेतन विसंगति समय से ठीक न होने की स्थिति में अपना इस्तीफा तक देने की बात कही थी। यह डीजीपी सर के व्यक्तिगत प्रयासों का ही नतीजा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने एरियर के भुगतान के लिए अलग से बजट स्वीकृत किये जाने की बात कही है और जल्द ही सभी सिपाहियों को एरियर मिल भी जायेगा।  

साथियों, हम अपने पैसों के लिए तो एकजुट होकर लड़ते हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं परंतु हमारी हक़ और इज़्ज़त की लड़ाई में हमारे साथ खड़े होने वाले डीजीपी सर जब दो महीने में रिटायर होने वाले हैं, तो ऐसे समय में एक अखबार की मनमानी के कारण क्या हम उनकी, अपने विभाग और वर्दी की छवि को धूमिल होते हुए हाथ पर हाथ रखकर यूँ ही देखते रहें? क्या हमें उनके साथ, उनके समर्थन में एकजुट होकर खड़े नहीं होना चाहिए?

यह समय एकजुट होकर पुलिस विभाग को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय डीजीपी सर के साथ उनके समर्थन में खड़े होने का समय है। ऐसा लगता है कि अमर उजाला के पत्रकार अपनी मर्जी के मालिक हैं, जो मन में आया छाप दिया। जब प्रदेश पुलिस के मुखिया को ही यह अखबार कुछ नहीं समझ रहा है, तो आने वाले दिनों में छोटे अधिकारियों और सिपाहियों का क्या हाल होगा, जरा सोचो। विचार करो। एकजुट होकर इस अखबार के विरोध में खड़े हो जाओ। दिखा दो इन्हें उत्तराखंड पुलिस की एकता और हमारी ताकत। इसलिए इस अखबार को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी है कि इस अखबार का विरोध हर स्तर पर किया जाये।  

साथियों, आज से इस अखबार का विरोध शुरू कर दो और यह विरोध तब तक करते रहो, जब तक यह अखबार हमारे डीजीपी सर से इस खबर के बारे में माफ़ी न मांग ले। जिसके भी घर में, परिवार में, रिश्तेदारी में अमर उजाला अख़बार आता है, आज ही उसे बदलवाकर दूसरा अखबार लगवाओ और अपने हॉकर को तथा पत्रकारिता से जुड़े जिस भी शख्स को जानते हो, उसे भी बताओ कि तुमने यह अखबार क्यों बंद किया है? 

साथियों, यह पुलिस की एकजुटता दिखाने का समय है। मीडिया की दलाली को जवाब देने का समय है। हमारे सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले डीजीपी के स्वाभिमान की लड़ाई में साथ खड़े होने का समय है। ये दिखाने का समय है कि हम एक हैं और कोई भी हमें हल्के में नहीं ले सकता। देखना है, कौन जीतता है। हमारी एकता या बिकाऊ मीडिया।

जय हिन्द
जय उत्तराखंड पुलिस।

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पुलिस ने निकालनी शुरू की खुन्नस

अब पुलिस ने खुन्नस में अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि विज्ञापन वाला पीएचक्यू में घुसा। विज्ञानकर्मी पर 384, 385, 120 बी, 185, 186 की धारा लगायी गई है। देहरादून यूनिट में कार्यरत विज्ञापन के अभिषेक शर्मा के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा।

देहरादून से एक मीडियकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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वीमन हेल्पलाइन के बड़े दरोगा नवनीत सिकेरा को पत्रकार कुमार सौवीर ने दिखाया आइना

Kumar Sauvir : 1090 यानी वीमन हेल्प लाइन के बड़े दरोगा हैं नवनीत सिकेरा। अपराध और शोहदागिरी की राजधानी बनते जा रहे लखनऊ में परसो अपना जीवन फांसी के फंदे पर लटका चुकी बलरामपुर की बीडीएस छात्रा की मौत पर सिकेरा ने एक प्रेस-विज्ञप्ति अपनी वाल पर चस्पा किया है। सिकेरा ने निरमा से धुले अपने शब्द उड़ेलते हुए उस हादसे से अपना पल्लू झाड़ने की पूरी कवायद की है। लेकिन ऐसा करते हुए सिकेरा ने भले ही खुद को पाक-साफ़ करार दे दिया हो, लेकिन इस पूरे दर्दनाक हादसे की कालिख को प्रदेश सरकार और पूरे पुलिस विभाग के चेहरे पर पोत दिया है।

सिकेरा प्रेस विज्ञप्ति में कहते हैं:- “गुडम्बा थाना क्षेत्र में एक लड़की रानू (नाम बदला हुआ) ने शोहदों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। इस प्रकरण में रानू के पिता ने आरोप लगाया कि 1090 ने कोई मदद नहीं की। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रानू की कोई कॉल 1090 को प्राप्त नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में जब कोई शिकायत प्राप्त ही न हो तो मदद कर पाना असंभव है। रानू की कोई भी शिकायत 1090 में दर्ज नहीं है।”

सिकेरा जी, जब आप फोन ही नहीं उठाएंगे तो हर फोन अनआन्सर्ड ही रहेगी ही। मेरे पास ऐसी पचासों शिकायत हैं, लेकिन आपके पास एक भी नहीं। और, फिर जो दर्ज रिपोर्ट होती भी है तो आप करते क्या हैं उसका सिकेरा जी। कम से कम एक मामले में तो मैं जानता हूँ कि उसमें 15 हजार वसूल लिया था आपके विवेचक ने। वह मेरी 84 वर्षीय माँ का मामला था जो अकेले ही रहती थीं और उसे एक अपराधी ने भद्दी गालियां देते हुए मकान खाली न करने पर जान से मार देने की धमकी दी थी। उस खबर पर पुलिस के प्रवक्ता और सूचना विभाग के कुख्यात चोंचलेबाज़ डिप्टी डायरेक्टर डा.  अशोक कुमार शर्मा ने इस डाल से उस डाल तक खूब कुलांचें भरी थीं, केवल प्रदर्शन के लिए। ऐसे में आपकी ऐसी सफाई बहुत शर्मनाक लगती है। काम करना बहुत साहस का काम होता है। कुर्सी तो कोई भी तोड़ सकता है। है कि नहीं बड़े दारोगा जी?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

मूल पोस्ट>

यूपी में ‘समाजवादी’ जंगलराज : लखनऊ में छेड़खानी से परेशान एक मेडिकल छात्रा ने फांसी लगाकर जान दी

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भारत सरकार ने कोर्ट में कहा- अगर अफसरों को मौलिक अधिकार चाहिए तो पहले इस्तीफा दें

इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर द्वारा आईएएस, आईपीएस अफसरों द्वारा सरकारी कार्य और नीतियों की आलोचना पर लगे प्रतिबन्ध को ख़त्म करने हेतु दायर याचिका में भारत सरकार ने कहा है कि यह रोक लोक शांति बनाए रखने के लिए लगाई गयी है. राजीव जैन, उपसचिव, डीओपीटी द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार प्रत्येक सेवा संविदा में कुछ मौलिक अधिकारों का हनन होता है.

इसके अनुसार यदि सरकारी सेवकों को सरकार की किसी हालिया नीति अथवा कार्य की आलोचना का अधिकार दे दिया गया तो इससे अनुशासन नहीं बचेगा, जो कार्यक्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी जिससे प्रशासन में अराजकता आएगी और यह लोक शांति को प्रभावित कर सकता है.

हलफनामे के अनुसार हर व्यक्ति अपनी मर्जी से सेवा में आता है और उसे अधिकार है कि सेवा से अलग हो कर अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग करें, फ्री-लांसर सरकारी सेवा में न आयें. याचिका में कहा गया था कि अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली के नियम 7 में किसी भी प्रकार के मंतव्य पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाया गया है जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) में दिए किसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है.

Govt in HC: Bureaucrats resign to exercise Fundamental Rights

In a petition filed by IPS Officer Amitabh Thakur in Lucknow Bench of Allahabad High Court challenging the prohibition of All India Services officers to criticize government policy, the Central government has said that such restriction is placed in interest of public order.

The counter reply filed through Rajiv Jain, Under Secretary, DOPT says that every contract of service involves invasion of Fundamental Rights. It says if government servants are permitted to make adverse criticism of any recent government policy or action, there will be no discipline, leading to lack of efficiency in work, chaos in administration and ugly situations which in final analysis may lead to public disorder.

The counter reply also says that every person voluntarily joins these services and it is open for them to exercise their fundamental rights by resigning from the service. Free lancers need not enter government service.

The petition had said that rule 7 of the All India Services Conduct Rules 1968 with blanket prohibition on any adverse criticism of any current government act or policy is against the right to freedom of expression under Article 19(2).

भारत सरकार द्वारा दाखिल किए गए जवाब को देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

Counter reply by Govt of India

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आईपीएस सिकेरा से पत्रिका के संपादक महेंद्र ने माफीनामा छापने का वादा किया (सुनें टेप)

Navniet Sekera : भगवान से भी तेज UP.Patrika.com … अभी अभी एक नयी जानकारी आई है , कि उपरोक्त न्यूज़ दिनाँक Patrika news network Posted: 2015-12-25 17:07:54 IST से स्पष्ट है कि यह न्यूज़ 25 दिसंबर को शाम को 5 बजकर 7 मिनट 54 वें सेकंड में अपलोड की गयी…

स्वतः स्पष्ट है कि घटना यदि सच है तो एक या दो दिन पूर्व की फीनिक्स मॉल की होगी.. जबकि मेरा परिवार 25 दिसंबर की रात में 11.15 बजे का शो देखने वेव मॉल गया था..  मैं तो गया ही नहीं था.. इस आडियो को सुनें… पूरे सच का खुलासा हो जाएगा…. नीचे लिंक पर क्लिक करें>

https://www.youtube.com/watch?v=nwSu0LWKYyE

आईपीएस और आईजी नवनीत सिकेरा के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर>

पत्रिका वालों ने की बदमाशी, आईपीएस नवनीत सिकेरा के बारे में सरासर झूठी खबर छाप दी

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कैट ने दिया फैसला, ब्यूरोक्रेट्स की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबन्ध आवश्यक

एक महत्वपूर्ण फैसले में केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की लखनऊ बेंच ने आज आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर द्वारा आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के किसी भी सरकारी कार्य की आलोचना करने पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त किये जाने हेतु दायर याचिका को ख़ारिज कर दिया. नवनीत कुमार और ओपीएस मालिक की बेंच ने कहा कि राज्य के कर्मचारियों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ अपरिहार्य प्रतिबन्ध आवश्यक हैं और चूँकि अखिल भारतीय सेवा के अफसर सरकार में उच्च पदों पर तैनात रहते हैं, अतः उन पर यह प्रतिबन्ध और भी कड़ा होना चाहिए. उन्होंने कहा अनुशासन और नियंत्रित गवर्नेंस के लिए ये प्रतिबंध आवश्यक हैं.

कैट ने कहा कि देश में हजारों आईएएस तथा आईपीएस अफसर हैं और यदि उन्हें मनमर्जी अपने-अपने ढंग से बोलने की आज़ादी मिल जायेगी तो इससे भ्रमात्मक और विरोधाभाषी सन्देश जायेंगे और यह पूरे शासन व्यवस्था को नष्ट करते हुए अराजकता फैला देगा. अतः कैट ने श्री ठाकुर द्वारा अखिल भारतीय सेवा आचरण नियमावली 1968 के नियम 7  में दिए गए प्रतिबंधों को बहुत ही व्यापक और अस्पष्ट होने तथा अनुच्छेद 19(2) में दिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध होने के कारण निरस्त करने की मांग को ख़ारिज कर दिया.

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संजीव भट्ट को सेक्स वीडियो पर नोटिस निजता के अधिकार का हनन – IPS अमिताभ

निलंबित आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) पी के तनेजा को पत्र लिख कर निलंबित आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को कथित सेक्स-वीडियो के लिए नोटिस दिए जाने पर आपत्ति दर्ज कराई है.

उन्होंने कहा कि यद्यपि श्री भट्ट ने वीडियो में होने से मना किया है पर यदि वे उस वीडियो में होते भी, तब भी उसे तब तक प्रशासनिक कदाचार अथवा आईपीएस अफसर के लिए अनुचित नहीं कहा जा सकता था, जब तक वह निजी और सहमति से हुआ मामला था और इस मामले में मात्र उनके परिवार वालों को ऐतराज़ करने का अधिकार था.

श्री ठाकुर ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 1985 के इन रे रबिन्द्र नाथ घोष तथा इलाहबाद हाई कोर्ट के 1989 के स्टेट ऑफ़ यूपी बनाम बी एन सिंह मामलों सहित कई निर्णयों के आधार पर कहा कि एक सरकारी कर्मी के ऐसे निजी मामलों को प्रशासनिक कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता.

उन्होंने कहा कि श्री भट्ट की पृष्ठभूमि को देखते हुए एक निजी मामले को सार्वजनिक करने से कई सारे सवाल खड़े होते हैं और उनकी निजता के अधिकार का हनन दिखता है, जिसके लिए उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाना उचित होगा.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें – 

Suspended UP IPS officer Amitabh Thakur today wrote to Gujarat Additional Chief Secretary (Home) P K Taneja objecting to the notice given to suspended IPS officer Sanjeev Bhatt after surfacing of an alleged sex-video.

He said that while Sri Bhatt has denied being in the video, but even if he were there in the video with a woman other than his wife, it could never have been considered a misconduct and unbecoming of an IPS officer as long as the matter was private and consensual, where only his family members had a right to object.

Sri Thakur quoted many decisions including 1985 Calcutta High Court decision in re Rabindra Nath Ghosh and 1989 Allahabad High Court decision in State of UP vs BN Singh to state that an officer’s such private conduct cannot be made a ground for action.

He said given Sri Bhatt’s background, making a private matter public, raises many eye-brows and is an intrusion into his right to privacy for which responsibility shall be fixed.

अमिताभ ठाकुर से संपर्क : 94155-34526

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राजनेताओं ने बनाया पुलिस को लुटेरों का गिरोह: अमिताभ

लखनऊ : निलंबित आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने कल यूपी के माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री विजय बहादुर पाल द्वारा कन्नौज जिले के थाना इंदरगढ़ में एक कार्यक्रम में पुलिस को सरकारी लाइसेंस प्राप्त लुटेरा और लुटेरों का संगठित समूह कहे जाने पर ऐतराज़ जताते हुए कहा है कि आज पुलिस तंत्र की यह दशा राजनैतिक दवाब के कारण बन गयी है. 

ठाकुर ने कहा कि यदि सत्ता में बैठे राजनैतिक लोगों द्वारा पुलिस का दुरुपयोग किया जाना बंद हो जाए तो पुलिस पर लग रहे तमाम आरोप स्वतः ही समाप्त हो जायेंगे. उन्होंने कहा कि वे अपने स्वयं के मामलों में देख रहे हैं कि किस प्रकार बड़े-बड़े राजनैतिक लोग पुलिस को अपना हथियार बना कर उन्हें हर तरह से फंसाने का प्रयास कर रहे हैं. ठाकुर ने पुलिस वालों से मंत्री श्री पाल के बयान को नेताओं द्वारा पहले अपना गलत काम कराने और बाद में उल्टा दोषी बताने के दृष्टांत के रूप में लेते हुए भविष्य में किसी भी राजनैतिक व्यक्ति के अनुचित आदेशों को न मानने का आवाहन किया ताकि दुबारा उन्हें जनता के सामने लज्जित न होना पड़े.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें – 

Suspended IPS officer Amitabh Thakur reacted to Secondary Education State minister Vijay Bahadur Pal’s statement made yesterday at a public function in Indargarhi police station in Kannauj district calling the UP Police as a group of marauders and an organized group of robbers by saying that this is the result of huge political intervention. Sri Thakur said this situation will end the moment the political people in power stop misusing the police for their nefarious ends. He said he is witness to many of his examples of how the politicians are using some policemen to throttle justice and to conspire in framing him and his wife through all possible ways. Sri Thakur asked the policemen to take Sri Pal’s statement as an alarm bell of how the politicians misuse the police force and later blame them for the wrong-doings, and to stop obeying any illegal order of the politicians, so that the policemen do not have to listen to such words again.

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