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सुख-दुख

मेरे लिए इरा का अर्थ है योद्धा!

राकेश प्रियदर्शी-

इरा जी से जब पहली बार मिला तो शायद 1993 के शुरुआती महीने रहे होंगे. मैं तब राँची से दिल्ली पहुँचा ही था, नवभारत टाइम्स के दफ़्तर में जाना अभी-अभी पत्रकारिता के छात्र रहे लड़के के लिए डराने वाला अनुभव था. वहाँ मैं पहली बार बाल मुकुंद सिन्हा के ज़रिए पहुँचा था जो जेएनयू में मेरे प्यारे मामा सत्येंद्र किशोर के सहपाठी थे, दिलीप सी मंडल ने कुछ वक़्त बाद, जब मैं इंडिया टुडे में काम कर रहा था, तब बताया कि नीरेंद्र नागर जी पांडव नगर में जहाँ रहते हैं, वहाँ रहने की कुछ गुंजाइश है. नागर जी से मिलने के लिए एक बार जो NBT आने-जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो वो एक बड़ा परिवार बन गया. वहीं डेस्क पर बैठे हर्ष देव जी, राजेश मित्तल जैसे सर्वदा सह्रदय अनेक लोगों से भेंट हुई.

इरा जी अलबेली थीं. खुले दिल वाली, हमेशा मदद करने को तैयार, उनके साथ काम करने वाले बताते थे कि वो हमेशा वही करती थीं जो उनको सही लगता था. थोड़ी मनमौजी, एकदम निडर, बेधड़क और हमेशा जो सच लगे उसके लिए लड़ने को तैयार. उस ज़माने में तो क्या, आज भी इरा जी जैसी पत्रकार मुझे कम ही नज़र आती हैं.

संघर्ष के दिनों में बिना कहे-पूछे चाय पिलाने और समोसे खिलाने वाली इरा जी.

मैं पिछले दो-तीन साल से उनके लगातार संपर्क में था, उन्होंने बताया कि उनकी तबीयत नरम-गरम रहती है. मेरे लंदन जाने से जो अंतराल पैदा हुआ था उससे उनकी गर्मजोशी में कोई कमी नहीं आई थी.

पिछले कुछ सालों में उनसे कई बार बातें हुई, वो छत्तीसगढ़ में बीते बचपन की यादों में सुख खोज रही थीं.

मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो ऐसे चली जाएँगी कि मैं अपने संघर्ष के दिनों में सच्चा स्नेह देने वाली इरा जी से मिल भी नहीं पाऊँगा. कई बार हुए वादे अधूरे रह गए.

मैं उनको इरा जी ही कहता था, लेकिन आप सचमुच बड़ी बहन थीं—इरा दी अलविदा!


संजय सिन्हा-

रगों में स्याही, कलम में लहू

फरवरी 1988 के आखिर में, ‘जनसत्ता’ अखबार में नौकरी के लिए मेरी लिखित परीक्षा हुई थी। परीक्षा के बाद इंटरव्यू हुआ। मुझे ट्रेनी उप-संपादक के रूप में रखा जाना था, और तब ‘पालेकर वेतन आयोग’ के अनुसार उप संपादक के लिए निर्धारित वेतन करीब 1800 रुपए प्रति माह था। लेकिन प्रशिक्षु होने के नाते मेरे लिए इसमें कुछ कटौती होनी थी।

इंटरव्यू में कई सवाल पूछे गए। स्थानीय संपादक बनवारी जी ने चलते-चलते मुझसे आखिरी सवाल पूछा कि संजय सिन्हा, भोपाल से दिल्ली नौकरी के लिए आओगे तो रहोगे कहां? इतने कम पैसे में दिल्ली में गुजारा कैसे करोगे (मुझे खुशी हुई थी कि उन्हें अहसास था कि पत्रकारों को वेतन कम मिलता है)? (मैं तो शुद्ध रूप से मिशन में ही आया था)

शायद बनवारी जी को ऐसा लगा होगा (मेरे चेहरे को देखकर) कि यह बच्चा हिंदी पत्रकारिता में आने की कोशिश तो कर रहा है लेकिन टिकेगा कैसे? मैंने कुर्सी से उठते-उठते कहा कि सर, मैं अपने अंकल के घर रह लूंगा। वे किदवई नगर में रहते हैं और जज हैं। बनवारी जी मुस्कुराए। उन्होंने कहा कि ठीक है।

इंटरव्यू के एक हफ्ते बाद मुझे तार से सूचना मिली कि मुझे इंडियन एक्सप्रेस समूह (जनसत्ता) में नौकरी मिल गई है और मुझे तत्काल जॉइन करना है।

जब मैं फरवरी 1988 में इंटरव्यू देने आया था, तब मैं नई दिल्ली स्टेशन से सीधे किदवई नगर एसडी झा अंकल के घर ही गया था। वे दिल्ली में जज थे।

उनसे मेरे मामा की दोस्ती थी। कुछ समय तक मामा राजनंदगांव में एसपी थे, और झा अंकल जज। उनकी दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि हम एक-दूसरे के परिवार में समा गए थे।

इरा झा, उनकी बेटी थीं और आज कहानी उन्हीं की है।

इरा झा मुझसे सीनियर थीं। वो झा अंकल की बड़ी बेटी थीं, और अंकल की बेटी मेरी दीदी।

जीवनभर मैं उन्हें दीदी ही बुलाता रहा।

वो नवभारत टाइम्स में थीं, और मुझे जनसत्ता में नौकरी मिली थी। हमारा पहले से परिचय था लेकिन अब हम पेशेवर दोस्त थे। लेकिन दीदी और छोटे भाई का रिश्ता जीवनभर बना रहा।

सही मायने में, वही पहली पत्रकार थीं, जिनसे हम रूबरू हुए।

यह सब झा अंकल और आंटी के कारण संभव हुआ।

दीदी वास्तव में एक पत्रकार थीं। विद्रोह उनका स्वभाव था। उनका पहला विद्रोह तो पत्रकार बनने का फैसला ही था। जज की बेटी जर्नलिस्ट? झा अंकल की दूसरी बेटी शिप्रा झा जज ही बनीं थीं।

इरा दीदी का दूसरा विद्रोह था शादी का फैसला। बस्तर की एक ब्राह्मण लड़की (झा) का जीवन साथी बनिया (मित्तल)? वो भी पत्रकार?

इत्तेफाक से, बाद में दीदी के पति अनंत मित्तल (जिन्हें मैं जीजाजी बुलाता रहा) ‘जनसत्ता’ में आ गए थे। वो भी मेरे सीनियर थे।

नौकरी में हम दोस्त थे, और घर में रिश्तेदार। झा अंकल की पहली बेटी की शादी एक बगावत की शादी थी। तब इंटरकास्ट मैरिज एक बड़ी बात थी। लेकिन वो पत्रकार थीं। प्रगतिशील थीं।

उन्होंने अपने पूरे जीवन में पत्रकारिता को जिया। वो सिस्टम से झगड़ती रहीं। दीदी चार बहनें थीं और चारों अलग-अलग मन मिजाज की थीं। मैं शुरू में कई दिन उनके घर रहा। झा अंकल के बेटे विक्रम से भी मेरी अच्छी दोस्ती थी। वे मुझसे बड़े थे और मुझ पर बहुत स्नेह रखते थे।

बाद में मैं जेएनयू के झेलम हॉस्टल चला गया, और फिर वहां से काका नगर। ये सब कहानियां हैं, जिन्हें मैं पहले ही सुना चुका हूं। बात यह है कि झा अंकल से मिलना छूट गया, लेकिन इरा झा से मिलना नहीं छूटा।

हमारी खूब मुलाकातें होती थीं। मैं उनके पांव छूता था, और वे मुझे गले लगाती थीं।

कल पता चला कि वो नहीं रहीं। दिल्ली में उनका निधन हो गया। इस मौके पर यादें मेरा पीछा कर रही हैं।

मैं मृत्यु के बाद की औपचारिकता नहीं निभा रहा। वो सच में एक पत्रकार थीं। जब पत्रकार अपनी कीमत लगाने के लिए मंडी में खड़े होने लगे, तब वो सिद्धांतों की पत्रकारिता पर डटी रहीं। मैंने कहा न, वे बस्तर की रहने वाली थीं। घोर आदिवासी इलाका।

दिल्ली में उनके संपर्क बहुत थे। सच में, वे मेरी नजर में पहली महिला पत्रकार थीं, जिनमें अंत तक जुझारूपन रहा। वो लड़ती थीं। गलत का विरोध करती थीं। अगर संजय सिन्हा ने कुछ गलत किया, तो उन्हें भी डांट मिलती थी, और अगर किसी मंत्री या संतरी ने कुछ गलत किया, तो उन्हें भी।

स्याही उनकी रगों में बहती थी, और कलम में लहू।

अब जब वे चली गईं, तो सिवाय अफसोस के कुछ नहीं होगा। लेकिन असल बात यह है कि वे सच में पत्रकार थीं। किसी की चमक-दमक का उन पर कोई असर नहीं था। जैसे झा अंकल थे, वैसे ही उनकी बेटी ईरा झा।

जहां भी वो रहेंगी, हक की लड़ाई लड़ती रहेंगी। ईश्वर को उन्हें दुबारा भेजना होगा, धरती पर। धरती (देश ) को ऐसे पत्रकारों की जरूरत है, जो हुकूमत की आंखों में आंख डालकर प्रश्न कर सकें। जिनमें दम हो, उसी संस्थान की गलतियों पर उसे कोर्ट में घसीट सकें, और उससे जीत जाएं, जिसमें वे नौकरी करती हों।

वे किसी से नहीं डरती थीं, शायद मौत से भी नहीं।

ईश्वर जी, संजय सिन्हा जानते हैं कि आपको अच्छे लोगों की बहुत जरूरत है। लेकिन प्लीज़ मेरी दीदी को जल्दी भेज देना। यह धरती (देश) पत्रकार विहीन हो गई है। कोई साला (गाली नहीं, तेवर है) मर्द (लिंग भेद नहीं है, मुहावरा है) का बच्चा दिख ही नहीं रहा। सारे बिक गए हैं, डर गए हैं या मेरी तरह पलायन कर गए हैं।

ऐसे में, इरा झा की याद आती रहेगी, जब तक फिर कोई ‘इरा’ रगों में स्याही और कलम में लहू लेकर नहीं आ जाती।

नोट-

  1. संस्कृत में ही ‘इरा’ नाम का अर्थ है ‘पृथ्वी’।
  2. ग्रीक में ‘इरा’ नाम का अर्थ है ‘शांति’।
  3. हिब्रू में इरा का अर्थ है ‘सतर्क’।
  4. पोलिनेशियाई में ‘इरा’ का अर्थ है ‘आकाश देवी’।
  5. बाइबल में, ‘इरा’ राजा डेविड के शक्तिशाली योद्धाओं में से एक थीं।

(मेरे लिए भी इरा का अर्थ है योद्धा)

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