जगेन्द्र हत्याकांड पर लखनऊ में पत्रकार संगठन ऐसे खामोश क्यों?

पूरे उत्तर प्रदेश में, लगभग हर जनपद में पत्रकार संगठन मौत के घाट उतारे गए पत्रकार जगेन्द्र सिंह के परिवार का साथ दे रहे हैं तथा आन्दोलनरत हैं, परन्तु लखनऊ के कई पत्रकार संगठन बिलकुल मौन हैं। सहायता करना तो दूर, यहां तक कि जगेन्द्र सिंह में ही कमियां गिनाते फिर रहे हैं। उन्हें याद रखना चाहिए कि पति/पिता की मृत्यु का दर्द उसकी निर्बल विधवा तथा अनाथ हुए बच्चे ही जान सकते हैं और आज उत्तर प्रदेश के माहौल में यह दिन किसी अन्य का भी आ सकता है। पिछले दस दिनों में तीन पत्रकारों पर हमले हुए हैं, यह अच्छा संकेत नहीं है।

लखनऊ में जी हजूरी का माहौल तथा विज्ञापन पाने की होड़, भला किससे छुपी है। लोग कहते हैं कि बड़े अखबार तो पूंजीपतियों के नियंत्रण में हैं तथा छोटे अखबार तथा पत्रिकाएं सरकारी विज्ञापनों पर ही जिन्दा रहने को मजबूर हैं। फिर भी अधिकांश राष्ट्रीय/स्थानीय चैनल व अखबार/पत्रिकाएं अकेले- अकेले जगेन्द्र सिंह की हत्या में असली पापी दोषियों को सजा दिलाने का अभियान चलाये हुए हैं, परन्तु लखनऊ के विभिन्न पत्रकार संगठन क्यों मौन है ? 

कुछ लोग तो शासन/सत्ता के काफी नजदीक बताये जाते हैं व लाभ भी पाते हैं। उन्हें आगे आना चाहिए । क्या जगेन्द्र की पत्नी व परिवार को आगे आने वाली और जटिल परिस्थियों की प्रतीक्षा है ? पत्नी अब स्वयं भूख हड़ताल पर है। बेहोश तक हो चुकी है। बच्चे अनाथ हैं। बिलख रहे हैं। जगेन्द्र का पिता न्याय के लिए गिड़गिड़ा रहा है। क्यों मौन हो दोस्तों। एक कैंडल मार्च ही निकालो। गाँधी प्रतिमा पर जाओ। यदि ऐसा हुआ भी होगा तो किसी को ज्यादा पता नहीं चला। जंगल में मोर नाचा, किसने देखा। दबाव बनाना होगा। यदि मेरी बात बुरी लगी हो तो माफ़ कर देना!

सूर्य प्रताप सिंह के एफबी वाल से

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