यूपी के पत्रकारों, साथी पत्रकार जगेंद्र सिंह की शहादत को भूल मत जाना, सपा को जरूर हराना

आज यूपी में कई पत्रकार सपा की दलाली करने में व्यस्त हैं। ये लोग पत्रकार जगेंद्र सिंह की शहादत को भुलाकर उनका अपमान कर रहे हैं। लेकिन यूपी के ढेर सारे पत्रकार याद रखें हुए हैं वो बर्बरता जिसे सपा के लोगों ने पत्रकार जगेंद्र सिंह के साथ की थी। अगर सपाइयों की कमर न तोड़ी गई तो वो बर्बरता कल के दिन आपके साथ भी होगी। तब आपको पश्चाताप होगा कि हम उन लोगों की दलाली कर रहे थे जिन्होंने यूपी में कानून का नहीं, गुंडों एवं हत्यारों का राज चला रखा है। इसीलिए यूपी के पत्रकारों को शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या को याद रखकर इस चुनाव में पत्रकारिता करने की जरूरत है। सपा के गुंडाराज, बलात्कारराज, लूट, हत्या, भ्रष्टाचार, दबंगई, अपहरण को यूपी की जनता के सामने ना लाकर सपा की दलाली करने वाले पत्रकारों पर धिक्कार है।

क्या हुआ था शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह के साथ?

शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह को इसलिए जिंदा जला दिया गया, क्योंकि उसने प्रदेश के मंत्री राममूर्ति वर्मा के कामकाज पर सवाल उठाए थे। कोई ढाई सौ किलोमीटर दूर श्रावस्ती जिले के टीवी पत्रकार संतोष कुमार विश्वकर्मा के खिलाफ वहां के डीएम श्रीमान जुबैर अली हाशमी इसलिए कार्रवाई चाहते हैं क्योंकि उसने प्रदेश के ताकतवर सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव से सवाल पूछने की हिमाकत की थी।

जी हां, ये यूपी है। यहां कानून का नहीं बल्कि बाहुबली मंत्रियों का राज चलता है। शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र की गलती क्या थी कि उसे जान से हाथ धोना पड़ा? जगेंद्र एक ई-अखबार चला रहे थे जो फेसबुक पर ‘शाहजहांपुर समाचार’ के नाम से आज भी मौजूद है। पढ़ने पर आपको पता चलेगा कि वे अपने शहर से जुड़ी तकरीबन सभी छोटी-बड़ी खबरें इस पर देते थे। मुश्किल तब हो गई जब उन्होंने स्थानीय विधायक और सपा सरकार में मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ खबरें लिखीं।

सबसे पहले 28 अप्रैल को जगेंद्र के साथ मारपीट हुई, जिसमें उनका पैर तोड़ दिया गया। बकौल जगेंद्र, वे सरकार के आला अफसरों से मिले और अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई। उनके मुताबिक उसके बाद उल्टे पुलिस ने खुद उन्हीं के खिलाफ लूट, अपहरण और हत्या की साजिश का मामला दर्ज कर दिया। 22 मई को शाम पांच बजे उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया, ‘राममूर्ति वर्मा मेरी हत्या करा सकते हैं। इस समय नेता, गुंडे और पुलिस सब मेरे पीछे पड़े हैं, सच लिखना भारी पड़ रहा है ज़िंदगी पर। विश्वस्त सूत्रों से सूचना मिल रही है कि राज्य मंत्री राममूर्ति वर्मा मेरी हत्या का षड़यंत्र रच रहे हैं और जल्द ही कुछ गलत घटने वाला है।’

31 मई को जगेंद्र की कई खबरों में से दो पोस्ट राममूर्ति वर्मा के खिलाफ हैं। एक में वे सवाल उठाते हैं:- ‘राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के पास कहां से आई अरबों की संपत्ति?’ दूसरी खबर में वे लिखते हैं:- ‘बलात्कारियों को बचाने में जुटे सपा नेता।’

अगले ही दिन एक जून को पुलिस उनके घर जा धमकती है। वे अंदर से दरवाजा बंद कर लेते हैं। पुलिस वाले दरवाजा तोड़कर अंदर घुस जाते हैं। पेट्रोल में सराबोर जगेंद्र को जला दिया जाता है। पुलिस कह रही है कि आग खुद उन्होंने लगाई, जबकि जगेंद्र के परिवार के मुताबिक आग पुलिस ने लगाईI

जगेंद्र को लखनऊ में भर्ती कराया जाता है जहां आठ जून को वो मौत से हार मान लेते हैं। यहां महत्वपूर्ण ये है कि मौत से पहले मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में जगेंद्र ने सीधे-सीधे पुलिस को अपनी हत्या का ज़िम्मेदार ठहराया है। इसमें उन्होंने राममूर्ति वर्मा का नाम भी लिया है। राममूर्ति वर्मा के खिलाफ मामला तो दर्ज हुआ लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वे आज भी मंत्री हैं।

Dushyant sahu
dushyanttata321@gmail.com

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पत्रकार जगेंद्र केस में आरोपी पुलिसकर्मी बरेली क्राइम ब्रांच पर कोर्ट में बयान का बना रहे हैं दबाव

बरेली : शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह मर्डर केस में आरोपी पुलिसकर्मी बरेली क्राइम ब्रांच पर जबरन दो गवाहों के कोर्ट में बयान कराने का दबाव बना रहे हैं। इन गवाहों के बयान के जरिए वह खुद को केस से बचाना चाहते हैं, लेकिन बरेली के पुलिस अधिकारियों ने आईओ को बिना किसी दवाब के सही जांच करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं।

1 जून 2015 को जगेंद्र सिंह पर पुलिस टीम ने दबिश के दौरान पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी थी। जगेंद्र की 8 जून को मौत हो गई थी। मौत से पहले जगेंद्र ने मंत्री व कोतवाली एसएचओ व उनकी टीम पर जलाकर मारने का आरोप लगाया था। इस मामले में जमकर राजनीति हुई थी। इस मामले में एक मुकदमा जगेंद्र के बेटे की तहरीर पर दर्ज किया गया था और दूसरा मुकदमा एसएचओ कोतवाली की ओर से जगेंद्र सिंह पर दर्ज किया गया था।

दोनों मामलों की जांच बरेली क्राइम ब्रांच को सौंपी गई थी। जगेंद्र के बेटे की ओर से दर्ज एफआईआर में पुलिस चार्जशीट लगा चुकी है लेकिन एसएचओ की ओर से दर्ज मामले की जांच चल रही है। एसएचओ की एफआईआर में कोई भी गवाह नहीं था लेकिन बाद में दो गवाहों को पेश कर दिया गया था। इन्हीं दो गवाहों के बयान कोर्ट में कराने का दबाव बनाया जा रहा है।

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जगेंद्र हत्याकांड मामले पर प्रेस काउंसिल ने यूपी सरकार और यूपी पुलिस की कड़ी आलोचना की

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक पत्रकार की हत्या पर जारी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) की एक रिपोर्ट में यूपी पुलिस की और प्रशासन की भूमिका की निंदा की गई है। प्रेस काउंसिल ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए गंभीर उपाय करने की भी मांग की है। 8 जून को शाहजहांपुर में एक स्वतंत्र पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के बाद पीसीआई ने जांच के लिए एक टीम का गठना किया था। पीड़ित पत्रकार ने मरने से पहले दिए गए अपने बयान में कहा था कि मंत्री राम मूर्ति वर्मा के खिलाफ लिखने के कारण स्थानीय पुलिस ने उन्हें जिंदा जला दिया। रिपोर्ट में राज्य सरकार से एक निष्पक्ष एजेंसी द्वारा मुकम्मल जांच करवाने की अनुशंसा की गई है। रिपोर्ट में लिखा है-

‘पुलिस और प्रशासन ने ना तो इस घटना को गंभीरता से लिया और ना ही जगेंद्र द्वारा दिए गए बयान पर कोई कार्रवाई ही की। इसी कारण स्थिति नियंत्रण से बाहर चली गई। यह पूरी तरह से साफ है। यह पता चला है कि जगेंद्र सिंह और उनके विरोधियों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें व मामले दर्ज करवाये जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की। इसीलिए, इस मामले की गंभीरता और केस की जांच में हुई देरी को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह जल्द-से-जल्द एक निष्पक्ष जांच एजेंसी से पूरे मामले की जांच कराए।’

रिपोर्ट में राज्य सरकार को सलाह दी गई है कि वह अन्य राज्यों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए अपनाए गए तरीकों व नियमों को जाने। इसमें लिखा है-

‘किसी भी पत्रकार के खिलाफ अगर कोई मामला दर्ज करवाया जाता है तो कोई कदम उठाने या उसे हिरासत में लेने से पहले कम-से-कम एसपी स्तर पर स्वतंत्र समीक्षा की जानी चाहिए। पत्रकारों के साथ नियमित तौर पर बातचीत के लिए एक कमिटी का गठन किया जाना चाहिए और इस बात के भी इंतजाम किए जाने चाहिए कि यह कमिटी उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के साथ हो रहे उत्पीड़न की शिकायतें भी सुने।’

पीसीआई ने इस रिपोर्ट में राज्य सरकार से मांग की है कि मृत पत्रकार के परिवार को आर्थिक और अन्य जरूरी सहायता मुहैया कराई जाए।

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भेजा यूपी सरकार को नोटिस

उत्तर प्रदेश में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जलाकर मारे जाने के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह नोटिस उस याचिका पर सुनवाई के बाद जारी कि जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट में दाखिल पीआईएल को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर की गुहार लगाई गई है. सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को जलाए जाने और उनकी हत्या के मामले की स्वतंत्र जांच के लिये जगेंद्र के बेटे द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका वापस लेने की परिस्थितियों की सीबीआई जांच हेतु दायर याचिका पर विचार करने का निश्चय किया. इससे पहले याचिका दायर कर पत्रकारों की सेफ्टी के लिए गाइडलाइंस बनाए जाने की बात कही गई है.

इस बीच लखनऊ से खबर है कि पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल की वकालत से यूपी कांग्रेस खुद को शर्मिंदा महसूस कर रही है. पार्टी के विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया को चिट्ठी लिखकर कहा है कि जिन मामलों में कांग्रेस सीबीआई जांच की मांग कर रही है, उस मामले में कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में जांच का विरोध कर रहे हैं. इससे प्रदेश में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शर्मसार महसूस कर रहे हैं. माथुर ने सोनिया को लिखी चिट्ठी में कहा है कि शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के मामले में उनके परिवार के लोगों ने सरकार के मंत्री और पुलिस पर आरोप लगाया था.

यह पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र प्रसाद का संसदीय क्षेत्र रहा है. यूपी कांग्रेस सहित पार्टी के अधिकतर वरिष्ठ नेताओं ने मंत्री को हटाने और सीबीआई जांच की मांग की है. इसके उलट केंद्रीय नेता कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच का विरोध कर रहे हैं, इसलिए वह मामले में हस्तक्षेप करें. यादव सिंह केस में हाई कोर्ट के सीबीआई जांच के फैसले के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी. इस मामले में भी कपिल सिब्बल ने सपा सरकार की ओर से पैरवी की थी हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. कांग्रेस यादव सिंह के मसले को भी प्रमुखता से उठाती रही है.

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Scribe Jagendra Singh burning case : SC seeks response from Centre, UP on PIL

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Scribe Jagendra Singh burning case : SC seeks response from Centre, UP on PIL

New Delhi: The Supreme Court on Friday decided to entertain a plea seeking CBI probe into the circumstances leading to the withdrawal of a petition by a journalist’s son, who had sought an independent probe into the alleged burning and murder case of his father in which a state minister and five others have been booked. An application filed by a Lucknow scribe has claimed that the son of slain journalist, Jagendra Singh, was pressurised and threatened by the alleged killers of his father, following which he had written a letter to his lawyer on July 23 wishing to withdraw the petition.

He said this was substantiated by his interaction with him on social media. An FIR was registered against Samajwadi Party government’s Minister Ram Murti Singh Verma and five cops on the basis of a complaint by Jagendra’s son Raghvendra after the journalist died during treatment at a Lucknow hospital. A bench, headed by Chief Justice H L Dattu, issued notices to the Centre and Uttar Pradesh Government on the application filed by Mudit Mathur and sought replies from all parties within three weeks.

The court will hear the matter along with the main petition on which the notices were issued on June 22. The fresh plea has sought a probe into the case by a CBI team consisting of officers from outside Uttar Pradesh. The applicant has also sought laying down guidelines for protection of journalists, impartial grievance redressal mechanism for scribes apprehending assaults and other acts of victimisation and comprehensive victim and witness protection programme.

In the main petition filed by Delhi-based journalist Satish Jain, the apex court had also sought response from the Union Home Ministry, the state government and the Press Council of India. Jagendra was allegedly set on fire by police officials during a raid at his house in Awas Vikas Colony of Sadar Bazar area in Saharanpur on June one. He succumbed to injuries on June eight.

“On June 1, according to his family members, a group of policemen and goons came in two cars in late afternoon and barged into his house in Shahjahanpur. Initially, they had an argument with him reminding him he had been repeatedly told not to write anything about Verma, then they pinned him down, poured petrol on him and set him on fire,” the petition said.

“Journalist Jagendra invited Ram Murti Verma’s ire by posting reports on Facebook about illegal mining activities and land grabbing against the minister,” it alleged. Seeking CBI probe, the plea said inspite of all evidence, “no arrest has been made by the state police and there is every likelihood of destruction of evidence by them.

“The fact that police officials and a senior politician have been arrayed in the case as accused has shaken the confidence of public in investigation conducted by the State Police,” it said, adding that “it is desirable to entrust the investigation to the CBI”.

“Safety of Indian journalists has long been compromised, particularly in small towns where local authorities can wield enormous power. According to PCI, a statutory press watchdog group, 79 journalists were murdered in the past two and a half years in India, with very few convictions,” it said.

According to family members of the deceased, Jagendra had posted something on Facebook against Verma regarding his alleged involvement in illegal mining and land grabbing, after which the minister sent cops to his house who allegedly doused the scribe with kerosene and set him on fire. The FIR has been lodged under IPC 302 (murder), 120-B (criminal conspiracy), 504 (intentional insult with intent to provoke breach of the peace) and 506 (criminal intimidation). The Allahabad High Court had on June 16 directed the UP government to file a status report in the case within a week and asked it to inform it about the stage of investigating a PIL filed by an NGO, ‘We The People’.

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भेजा यूपी सरकार को नोटिस

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड के गवाहों को बचाना जरूरी : आईपीएस अमिताभ

लखनऊ : शाहजहांपुर के दिवंगत पत्रकार जागेंद्र सिंह के बेटे के अचानक मंत्री राममूर्ति वर्मा के पक्ष में बयान देने के बाद आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में जागेंद्र के लड़कों सहित सभी गवाहों की रक्षा करने और सच्चाई सामने लाने के लिए राज्य सरकार को उपयुक्त माहौल बनाने के निर्देश देने का अनुरोध किया है।

उन्होंने कहा कि इन लड़कों ने उनके सामने ही कहा था कि उनके पिता को राममूर्ति वर्मा के इशारे पर जलाकर मारा गया और मुख्यमंत्री से 30 लाख रुपये की मदद मिलने के आश्वासन के बाद जिस प्रकार जागेंद्र के बेटे और अन्य गवाह बार-बार अपनी बात बदल रहे हैं, उससे यह साफ दिखता है कि उन पर भारी दवाब और लालच डाला जा रहा है। प्रथम दृष्टया यह दवाब मंत्री राममूर्ति वर्मा द्वारा किया गया दिखता है। ऐसा दिखता है कि वर्मा अपनी ताकत और सत्ता का उपयोग कर गवाहों और साक्ष्यों पर अनुचित दवाब दे रहे हैं। ठाकुर ने मुख्य न्यायाधीश से इस मामले में न्याय की दृष्टि से दखल देकर राज्य सरकार को सभी गवाहों की पूरी रक्षा करने के निर्देश देने का अनुरोध दिया, ताकि सत्य सामने आ सके।

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यूपी सरकार ने जगेंद्र सिंह के परिवार को 30 लाख क्यों दिए!

टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर है कि शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह के बेटे ने कहा है कि उसे सीबीआई जांच नहीं करानी क्योंकि उसके पिता कन्फयूज्ड थे और इसी मतिभ्रम के कारण उन्होंने आत्मदाह किया था। उन्हें किसी ने जलाया नहीं और मंत्री एकदम निर्दोष है।

अच्छा है कि उनके बेटे को समय पर सद्बुद्घि आ गई। और यह भी बेहतर हुआ कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मतिभ्रम के शिकार पत्रकार जगेंद्र सिंह के मजिस्ट्रेट के समक्ष मृत्युपूर्व बयान को सही नहीं माना और इसी वजह से मंत्री को बर्खास्त नहीं किया। अब मेरी मुख्यमंत्री से अपील है कि कृपा करके मृत पत्रकार के परिवार को जो तीस लाख रुपये दिए गए हैं, वे तत्काल प्रभाव से वापस लिए जाएं और उनके परिवार के दो युवकों को किसी दया के आधार पर नौकरी नहीं दी जाए। इससे तो फिर यह साबित होगा कि सरकार स्वयं लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाती है। उलटे उनकी आत्महत्या की जांच होनी चाहिए और परिवार से कड़ाई से पूछताछ की जानी चाहिए ताकि दूध का दूध पानी का पानी हो सके। 

यह भी तो संभव है कि परिवार की कलह की वजह से शाहजहां पुर के इस पत्रकार ने आत्महत्या की हो। मुख्यमंत्री जी आत्महत्या के आरोपी के परिवार के साथ दया दिखाना संविधान का अपमान है और कोई आम नागरिक अगर इस आधार पर सीबीआई जांच की मांग करे और सुप्रीम कोर्ट जाए कि यूपी सरकार ने आत्महत्या करने वाले पत्रकार के परिवार को तीस लाख रुपये कैसे दिए, तो कोई बड़ी बात नहीं। अगर मुख्यमंत्री महोदय को धन देना ही था तो सरकारी खजाने की बजाय पार्टी फंड से देते।

शम्भूनाथ शुक्ल के एफबी वाल से

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जगेंद्र के घर वालों को धमका रहे आरोपी, पीएम से गुहार, पूरा परिवार यूपी छोड़ने की फिराक में

शाहजहांपुर (उ.प्र.) : जिंदा जलाकर मारे गए पत्रकार जगेन्द्र सिंह के परिवार को धमकाया जा रहा है। घटना की सीबीआई जांच करने की मांग करते हुए जगेंद्र के बेटे राहुल ने पिछले दोनो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। तभी से परिवार पर दबाव डाला जा हा है कि वे समझौता कर लें अन्यथा उनके साथ अच्छा न होगा। बताया जा रहा है कि जगेंद्र के दोनो बेटे पिछले कई दिनो से लापता हैं। उनका कोई पता नहीं चल रहा है। जगेन्द्र के पिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर सुरक्षा और न्याय की गुहार लगाई है। 

गौरतलब है कि शाहजहांपुर के खुटार निवासी जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह को अपनी निर्भीक पत्रकारिता के कारण जिंदा जलाकर मार दिया गया था। हत्याकांड में प्रदेश के मंत्री राममूर्ति वर्मा, थाना प्रभारी समेत कई लोग आरोपी हैं।

निर्ममतापूर्ण तरीके से मारे गए पत्रकार जगेंद्र सिंह का परिवार इन दिनो उत्तर प्रदेश में सत्तासीन पार्टी के स्थानीय नेताओं के आतंक में जी रहा है। मीडिया में मामला लगभग शांत हो जाने के बाद अब अपराधी फिर सिर उठाने लगे हैं। उनके परिवार को आरोपी धमका रहे हैं। परिवार इतनी दहशत में है कि उत्तर प्रदेश छोड़कर कहीं और जाकर बस जाने का मन बना रहा है। 

आंतक से सहमे जगेंद्र के पिता ने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई है कि उनके परिवार को सुरक्षा देने के साथ ही उनके बेटे को मार डालने के मामले में न्याय दिलाया जाए। उनके बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है कि घटना की सीबीआई जांच कराई जाए। मामले के आरोपी परिवार पर दबाव बनाते हुए कह रहे हैं कि समझौता कर लो वरना अच्छा न होगा। पूरा स्थानीय प्रशासन आरोपियों के इशारे पर चुप्पी साधे हुए है। इन्ही हालात में जगेंद्र दोनो बेटों ने डर कर गांव छोड़ दिया है। चार पांच दिनों से उनका कोई अता-पता नहीं चल रहा है। 

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पत्रकारों की लगातार जघन्य हत्याओं और उत्पीड़न के खिलाफ नोएडा से दिल्ली तक पैदल प्रोटेस्ट मार्च 8 जुलाई को, आप भी आइए

अब हमारे और आपके सड़क पर उतरने का वक्त है… पत्रकारों की लगातार जघन्य हत्याओं और उत्पीड़न के खिलाफ नोएडा से दिल्ली तक पैदल प्रोटेस्ट मार्च का कार्यक्रम तय किया गया है जो 8 जुलाई को यानि कल होना है. इसमें आप भी आइए. चुप रहने, घर बैठे का वक्त नहीं है अब. देश भर में पत्रकारों की लगातार जघन्य तरीके से हत्याएं हो रही हैं. जगेंद्र सिंह, संदीप कोठारी, अक्षय सिंह… समेत दर्जनों हत्या-उत्पीड़न के मामले हैं. यह सिलसिला बदस्तूर जारी है.

इन घटनाक्रमों से हर कोई स्तब्ध और दहशत में है. शासन-सत्ता के खिलाफ देश भर के मीडियाकर्मियों में गुस्सा है. ये मीडियाकर्मी तरह तरह से अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं. दिल्ली एनसीआर के कई पत्रकारों ने तय किया है कि वो चौथे खंभे को जमींदोज करने की साजिशों के खिलाफ पैदल ही प्रोटेस्ट मार्च निकालेंगे और गृहमंत्री से मिलकर ज्ञापन देने के साथ उन्हें अपनी चिंता से अवगत कराएंगे. दिल्ली एनसीआर के मीडियाकर्मी 8 जुलाई 2015 को गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के सेक्टर 14 स्थित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय से दिन में 11 बजे प्रोटेस्ट मार्च की शुरुआत करेंगे.

यह पैदल प्रोटेस्ट मार्च अक्षरधाम, आईटीओ, मंडी हाउस होते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के सरकारी आवास 17 अकबर रोड तक पहुंचेगा. वहां राजनाथ सिंह को 5 सूत्रीय मांगों का ज्ञापन सौंपा जायेगा. इस आयोजन में हर मीडियाकर्मी आमंत्रित है. यह प्रोटेस्ट मार्च मीडियाकर्मियों के सड़क पर उतर कर गुस्से का इजहार करने के लिए है. इसलिए इसमें हर उस मीडियाकर्मी और संवेदनशील नागरिक को शामिल होना चाहिए जो देश के चौथे खंभे की आवाज खामोश कराने की साजिशों के खिलाफ है. वरिष्ठ पत्रकार और भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह भी इस पदयात्रा में मौजूद रहेंगे. ज्ञात हो कि इस पदयात्रा को रोकने के लिए गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस की तरफ से लगातार फोन पत्रकारों के पास आ रहे हैं लेकिन मीडियाकर्मियों ने तय कर लिया है कि चाहें जो हो, वो हर कीमत पर पदयात्रा करते हुए अपने विरोध को गृह मंत्री तक पहुंचाने के लिए उनके आवास पर पहुचेंगे.

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संविधान के मौलिक अधिकारों का वजूद खतरे में, कसौटी पर नाकारा यूपी सरकार

अभी तक तो यूपी सरकार की किरकिरी कराने वाले चाचा जान ने कल्वे जव्वाद पर हमला बंद  भी नहीं किया था कि उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राम मूर्ति वर्मा का पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड में नामजद होना यूपी सरकार के लिए एक चिंता का सवाल बन गया है । सरकार पत्रकार हत्याकांड में नामजद मंत्री पर कत्तई एक्शन न लेने के मूड में है । अगर नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आकड़ों पर गौर किया जाय तो प्रतिवर्ष जितने पत्रकारों के देश भर में उत्पीड़न के मामले  प्रकाश में आते हैं, उसके 72 % मामले अकेले यूपी के होते हैं, जो राज्य के वजीर ए आलम अखिलेश के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। क्या अखिलेश के अंदर शासन व सत्ता को सुचारु रूप से चल़ाने का म़ाद्दा खत्म हो चुका है? क्या युवा शक्ति के आकलन में कोई सेंध है?

संविधान की दुहाई देने वाली यूपी सरकार अब पत्रकारों की हत्या में क्यों संवेदनहीनता दिखा रही है? क्योंकि मामला सत्ता पक्ष के मंत्री व पुलिस के हाकिमों से जुड़ा हुआ है? अगर कलमकारों पर हमलों में गिरावट नहीं आई तो समाज में फैले भ्रष्टाचार का खुलासा होना नामुमकिन हो जायेगा। इस घटना ने मानवता को शर्मसार करने के साथ ही साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात भी किया है। गौर किया जाय तो भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में एक प्रेस की स्वतंत्रता भी है, जिस पर अपराध का आरा चलने लगा है। प्रेस की स्वतंत्रता पर आंच ही नहीं धधक भी आने लगी है जिससे विश्व पत्रकारिता जगत क्षुब्ध है।

 पत्रकार जगेन्द्र सिंह की जलाकर हत्या किये जाने से देशभर के पत्रकारों में जहां रोष व्याप्त है, वही प्रदेश सरकार की कुम्भकर्णी निद्रा व मंत्री शिवपाल सिंह यादव के अमर्यादित बयान की चौतरफा निंदा जारी है। जब एक सरकार का जिम्मेदार सिपहसलार यह बयान दे कि बिना जाँच नहीं हटेगा कोई मंत्री तो फिर जाँच किस बात की ? अगर अभियुक्त एक अहम ओहदे पर व्याप्त हो तो निष्पक्षता पर एक सीधा प्रहार होगा ? विगत डेढ़ वर्ष पूर्व प्रतापगढ़ के तत्कालीन सीओ हत्याकांड में नामजद अभियुक्त किये गए मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया का नाम आने पर तत्कालीन मंत्री राजा ने अपने समस्त दायित्यों से त्याग पत्र दे दिया था । देश की सर्वोच्य जाँच एजेंसी सीबीआई की जाँच का सामना किया था और सीबीआई जाँच का प्रस्ताव अखिलेश की हुकूमत ने ही केंद्र के पास भेजा था । 

आखिर क्या कारण है कि प्रदेश की सरकार पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड की सीबीआई जाँच की सिफारिश नहीं कर रही है ? कहीं दागदार तो नहीं है मंत्री ? लेकिन सीओ की हत्या में सीओ ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिए थे लेकिन पत्रकार जगेंद्र सिंह प्रकरण में पत्रकार ने सात दिनों तक जीवन व मौत से संघर्ष करने के बाद प्राणों को त्याग दिया । एफआईआर पर गौर किया जाय तो सरकार के दबाव में नौकरशाहों ने तारीख पहली जून 2015 को दिए गए शिकायती पत्र को नजरअंदाज किया। पत्रकार की मौत के बाद नौ जून को दोपहर चार बजे पत्रकारों के दबाव में धारा 302, 504, 506, 120 बी आईपीसी के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया । 

ऐसी लचर प्रणाली से निष्पक्ष जाँच की उम्मीदें खत्म हो गई हैं । सर्वोच्य न्यायालय का सख्त आदेश है कि सात वर्ष की सजा वाले मामलों में अभियुक्त की गिरफ्तारी पुलिस कर सकती है । इस पर बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है ? क्या संविधान को नाकारा मानती है अखिलेश सरकार ? बताना मुनासिब होगा कि पत्रकार हत्याकांड की चश्मदीद गवाह शालिनी का 164 सीआरपीसी का बयान गोपनीय ढंग से कराना भी सवालों के घेरे में है ? राज्य सरकार ने शालिनी के सुरक्षा के लिए दो महिला पुलिस व एक सशस्त्र पुलिस कर्मी लगाया गया है। उसकी जिंदगी भी खतरे से खाली नहीं हैं । पत्रकार के हत्यारे भी यही खाकी वर्दी के भेड़िये ही हैं ।

वही उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव उद्यम एसपी सिंह ने स्पष्ट बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार की उदासीनता ने नौकरशाही के जमीर को झकझोरना शुरू कर दिया है । गिरफ्तारी में रोड़े की मुख्य वजह है वोट बैंक । पत्रकार बिरादरी को नसीहत देते हुए कहा है कि शोक सभा व कैंडल मार्च भर करने से काम नहीं बनने वाला। सरकार की समस्त खबरों का बहिष्कार करिए। सरकार के काले कारनामों को उजागर करने की जरुरत है । एसपी सिंह ने अफसोस जताया है कि यूपी में इस प्रकरण पर विपक्ष और प्रदेश की पूरी पत्रकार बिरादरी चुप है । अगर पत्रकार व पत्रकारिता आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल और अशोक खेमका जैसे निर्भीक व ईमानदार अफसरशाहों के पक्ष में खड़ी होती है तो पूरे अफसरशाहों को भी एक जुट होकर पत्रकारों के पक्ष में आगे आना चाहिए । अब देखना होगा कि सरकार का कब टूटता है तिलस्म ?

लेखक ज्ञानेंद्र तिवारी से संपर्क : 9454364181, gyanendra936@gmail.com

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मुआवजा मिल गया न, तो अब जंग छेड़ो दोस्‍तों, ताकि जगेन्‍द्र की चिता को न्‍याय मिले

कुछ मित्रों को लगता है कि जागेन्‍द्र के परिवारों को 30 लाख रूपये, दो बच्‍चों को सरकारी नौकरी और उसके घर की दूसरे से कब्‍जायी पांच एकड़ जमीन को छ़ुडवाने के सरकारी फैसले के बाद उनका परिवार संतुष्‍ट है और सरकार भी हल्‍की हो गयी है। ऐसे लोगों को लगता है कि यह तो धोखाबाजी हो गयी। जागेन्‍द्र के लिए जंग लड़ी हम सब लोगों ने और मलायी काट लिया उसके घरवालों ने, सरकार ने और सरकारी दलाल पत्रकारों ने। उन्‍हें लगता है कि अब यह सारा मामला ठण्‍डा हो चुका है और इस देश में अब इसके बाद कुछ भी नहीं हो सकता है। क्‍योंकि लोगों ने एक-दूसरे को खरीद-बेच लिया है।

हां हां, सरसरी तौर पर तो यही लग सकता है। लेकिन दोस्‍तों, हालात ऐसी नहीं है। सबसे तो हम मुआवजा की बात कर लें। क्‍या आप चाहते थे कि जिस कष्‍ट में जगेन्‍द्र ने अपने परिवार को पाला, किस तरह उसकी स्‍नातक में पढ रही छोटी समेत तीनों बच्‍चे अभी अविवाहित ही हैं। क्‍या यह मदद लेना कोई अपराध है दोस्‍तों ?

क्‍या जब हम या आप लोग कभी इस हालत में आ जाएं तो हमारे बच्‍चे सड़क पर खड़े दिखायी पडें ? क्‍या दुनिया को यह एहसास होता रहे कि ईमानदारी और जांबाजी का हश्र और उनके पीडि़त परिजनों का अंजाम ऐसा ही होता है ? क्‍या जागेन्‍द्र अथवा उसके परिवारीजनों के बारे में हम सब की कोई जिम्‍मेदारी नहीं है ? 

नहीं दोस्‍तों। है दोस्‍तों, है। खूब है।

हम सब ने तो अपनी जेब से जो भी हो सकता था, हल्‍का-फुल्‍का, भरसक दिया है। लेकिन असल मदद तो सरकार ने दी है। तीस लाख रूपया कम नहीं होता है मित्रों। सरकार ने इस परिवार को तीस लाख रूपयों की मदद दे दी है। 

क्‍या हम चाहते रहे हैं कि हम जागेन्‍द्र की लड़ाई लड़ते रहें और उसका परिवार भूखों मरता रहे। 

सरकार ने उस जमीन का कब्‍जा दिया दे दिया है, जिसपर एक दबंग परिवार कब्‍जा किये थे। लम्‍बे समय से। कोर्ट-कचेहरी, डीएम, शीएम-ढीएम तक पर अर्जी लगीं, आदेश भी हुए, लेकिन तामीला कुछ भी नहीं हुआ। इस इलाके में जमीन की कीमत मगर उधर जागेन्‍द्र मरा, उसकी जमीन वापस मिल गयी। इस इलाके में जमीन की कीमत प्रति बीघा 50 लाख रूपया बीघा है। यानी करीब पौने चार करोड़ रूपया।

क्‍या आप नहीं चाहते थे कि यह जमीन जागेन्‍द्र के परिवार को मिल जाए ?

सरकार ने उसे दो बेटों को नौकरी देने का ऐलान किया है, ताकि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। 

क्‍या आप लोग यह नहीं चाहते थे कि इन बच्‍चों को नौकरी मिल जाए ?

इनमें केवल एक प्रकरण पर ही मैं असहमत हूं। वह है कि जागेन्‍द्र के बच्‍चों को नौकरी देना। यह प्रश्‍न और उसका उत्‍तर बहुत पेंचीदा है। सिलसिलेवार देखिये। उसके तीन आश्रित बच्‍चे हैं। एक बेटी और दो बेटे। सरकार किस को नौकरी देगी। क्‍या दोनों लड़कों को नौकरी मिलेगी। ऐसे में तो एक बच्‍ची के साथ बड़ा बेइंसाफी हो जाएगी। और अगर एक लड़की को नौकरी मिलेगी तो फिर घर में बवाल होगा। वह बेटी हमेशा-हमेशा के लिए अपने पिता के घर में परायी और दुश्‍मन हो जाएगी। ऐसे में वह अगर त्‍याग के चलते यह नौकरी अपने भाई को सौंपने देने पर तैयार हो जाती है तो फिर सरकार का स्‍त्रीसशक्‍तीकरण का अभियान ही फुस्‍स हो जाएगा।

लेकिन असल बात तो यह है कि इन बच्‍चों को सरकारी नौकरी क्‍यों दी जाए। सरकार की नौकरी कोई लाखैरी तो होती नहीं है, जो सरकार ने इधर खींची और उधर किसी को भी थमा दी। नौकरी हासिल के लिए कुछ मानक होते हैं और उसे हासिल करने के लिए अभ्‍यर्थियों को कई अर्हताएं पूरी ही करनी होती हैं। सरकारी नौकरी के लिए भी बाकायदा परीक्षा होती है, भले ही वह अमीन की हो या फिर चपरासी अथवा अर्दली की। इन बच्‍चों को सरकारी नौकरी देना मानवीय प्रकरण तो हो सकता है, लेकिन लोकहित में सर्वथा अहित और मारक होगा।

नहीं, मेरा मानना है कि इस तरह रेवडि़यां बांटना अपराध है और हम सब को इसके खिलाफ लड़ाई छेड़नी चाहिए। विरोध करना चाहिए। हम सरकारी नौकरी में श्रेष्‍ठतत्‍व खोजें और यह तत्‍व इन बच्‍चों में मिल जाए, तो इससे बेहतर और क्‍या हो सकता है। लेकिन अगर वे मानक पर खरे नहीं उतरते हैं तो मैं पहला व्‍यक्ति होऊंगा जो इसका विरोध करूंगा।

दूसरी बात, पांच एकड़ की जमीन का कब्‍जा वापस दिला कर कोई अहसान नहीं किया है सरकार ने। यह तो सरकार की जिम्‍मेदारी थी। जो दायित्‍व इस सरकार ने निभाया है, वह तो जागेन्‍द्र के पहले ही हो जाना चाहिए था, लेकिन चूंकि सरकार और उसके अफसर केवल बेईमानी और लालच में रहते हैं, इसलिए उसकी जमीन को छुड़ाने के लिए उन्‍होंने कोई कदम नहीं उठाया। आज जब सरकार ने डंडा दिखाया तो जमीन वापस मिल गयी।

तो सवाल यह है कि सरकार केवल चंद मसलों पर ही कार्रवाई करेगी। क्‍या सरकार बतायेगी कि प्रदेश में कितनी जमीनाों पर दबंग लोग काबिज हैं और उससे कितने लोग भुखमरी की हालत पर पहुंच चुके हैं।

यह सटीक मौका है जब सरकार से इस बारे में कड़ाई के साथ सवाल किया जाए और उसका समाधान खोजने के लिए हम सब आंदोलन छेड़ें।

अब आखिरी बात, नकद 30 लाख रूपयों की मदद की। सरकार ने यह रकम दी है हत्‍या के पीडि़त परिजनों को। 

साफ बात है कि इसके तहत सरकार ने मान किया है, कुबूल लिया है कि यह हत्‍या राज-सत्‍ता यानी सरकार की असफलता के चलते हुई है। कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में अपनी बुरी हालत के चलते हुए इस हादसे का मुआवजा दिया है सरकार। यानी सरकार दोषी हे, इसलिए उसने इस रकम से अपने हाथ जागेंद्र सिंह के खून से धोने की चेष्‍टा की है। 

बधाई होनी चाहिए अखिलेश सरकार की। 

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम इतने में संतुष्‍ट हो जाएं। हमें देखना चाहिए कि यह मदद बिक्री-खरीद की शैली में ही हुई है, प्रायश्चित हर्गिज्‍ नही है। अगर प्रायश्चित होती तो जो वांछित अभियुक्‍त नामजद हैं, सरकार उन्‍हें तत्‍काल पकड़ती और अपनी सरकार के निजाम को मजबूत करती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं गया है। जाहिर है कि यह मुआवजा केवल लालीपाप ही भर है।

जाहिर है कि हम इस सौदे को खारिज करते हैं। उनकी मदद तो हमें कुबूल हैं, लेकिन उसके बहाने जो चींजें छिपाने चाहती है सरकार, हम उसका पुरजोर विरोध करते हैं। 

हमारी मांग है कि:- मुआवजा दिया है अब मुल्जिम भी पकड़ो और जल्‍द से पकड़ो।

दोस्‍तों। कोशिश करो कि यह नारा जोरदारी से लगाओ ताकि यह लौ बुझ न पाये

शेयर करो, कमेंट करो, लाइक करो, मुट्ठी बांधो, ललकार लगाओ, नारे लगाओ

यह सर्वाधिक और सर्वोत्‍तम मौका है, जब हम संकल्‍प ले लें, कि आइन्‍दा किसी नये जागेन्‍द्र को इस तरह न मरने देंगे

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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के. विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसों को दूर रखना अन्यथा पूरा मिशन तबाह कर देंगे

Kumar Sauvir : अखिलेश जी। मुझे अपनी मौत का मुआवजा एक कराेड़ से कम मंजूर नहीं… अपने मुआवजा सेटलमेंट के बंटवारे का पूरा प्‍लान तय कर लिया है मैंने…  पत्रकार-समिति के लोगों, 10-20 पेटी अलग ले लेना, पर मेरे हिसाब से नहीं… मैंने कर रखा है एक करोड़ मुआवजा के एक-एक पैसा का हिसाब प्‍लान… मेरी चमड़ी खिंचवाना व उसमें भूसा भरके मेरी प्रतिमा स्‍थापित कराना मित्रों… 

इसी तरह ही तो कटता है जीवन का कनेक्‍शन, और अपने लोग अचानक पराये हो जाते है। कुछ की नजर घर के माल-मत्‍ता पर, तो कुछ दोस्‍त-असबाब लोग तो मृतक की बीवी से आंख-मटक्‍का में जुट जाते हैं। पहले जो लोग उस महिला को भाभी जी भाभी जी कहते नहीं थकते थे, अब सीधे बावले “एनडी” सांड़ की तरह अपनी पूंछ सीधा कर अपने पांव से जमीन खुरच करके सरेआम फूं-फां करते चिल्‍लाते हैं:- “अरे हां हमार लल्‍लन-टॉप, यहर आवौ ना !”

पिछले तीन पहले नान-पेमेंट पर फोन और नेट का कनेक्‍शन कट गया, तो यकीन मानिये कि मुझे मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की याद आ गयी। जनता के प्रति उनकी निष्‍ठा और भाव-प्रवण त्‍याग देखकर मेरी आंखें ही बिलबिला गयीं। अश्रुधार। लगा मानसून केवल इसी की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन अखिलेश यादव ने मामला ठीक कर दिया। जागेन्‍द्र सिंह के परिवार को इतना रकम-इकराम थमा दिया कि अब बाकी लोगों को कोई दिक्‍कत नहीं। तो ऐसा है अखिलेस भइया, जरा हमारा भी हिसाब कर ल्‍यौ। मैं अपने जीते-जी सारे मामले सुलटाय देना चाहता हूं। कोई धमकी दे रहा है कि तुम्‍हारी पत्रकारिता तुम्‍हारे अंग-विशेष में घुसेड़ देंगे, कोई कह रहा है कि तुम्‍हारे परिवार को चैन से नहीं जीने देंगे, कोई मुझे निपटाने की चेतावनी कर रहा है, कोई नेस्‍तनाबूत करने की चादर बुन रहा है, कोई क्रिमेशन के लिए लकडी जुटा रहा है, किसी ने बिजली वाले श्‍मशान शुल्‍क का पैसा एकट्ठा कर लिया है, तो कोई कफन-दफन और लकड़ी को लेकर उत्‍साहित है। कुल मिलाकर लगातार यह बातें फिजां में तैर रही हैं कि:- कुमार सौवीर। जरा सम्‍भल जाओ। कहीं ऐसा न हो कि तुम्‍हारी भी मुस्‍कुराती फोटो घर की दीवार पर टंगे और उस पर चढ़ी हो एक माला। न हुआ तो कम से चरित्र पर छींटे फेंक डाली जाएंगी, फर्जी मुकदमों में फंसाया जाऊंगा, वगैरह-वगैरह

नहीं नहीं, यह मत समझना कि मैं इन धमकियों से घबरा गया हूं। नक्‍को णी नक्‍को। मुझे तो ऐसी चर्चाएं ज्‍यादा जोशीला बना देती हैं। ऐसे हमले मुझे उम्र को और तराशना शुरू कर देते हैं। मैं खुद को ज्‍यादा जवान महसूस करना शुरू कर देता हूं। और इसी यौवन में फिर नयी खबर खोजने में जुट जाता हूं। हर कोई प्रेम के अतिरेक में मुझे सलाह दे रहा है कि यह यह भेडि़यों का जंगल है और आप अकेले हैं, ध्‍यान रखियेगा। बहुत सतर्कता रखना। वगैरह-वगैरह। दिलासा भी मिल रहा है कि मैं साथ हूं, डोंट वरी—–

तो अब मैं असल बात पर आना चाहता हूं। सन-82 से पत्रकारिता शुरू की थी और आज 2015 के फेंटे में आ चुका हूं। जी-हुजूरी कभी की नहीं, इसलिए जिन्‍दगी में बेहिसाब कष्‍ट भोगे। न जाने कितनी नौकरी से निकाला गया। लेकिन पटी सिर्फ साहसी सम्‍पादकों से ही। जयब्रत राय और विश्‍वेश्‍वर कुमार जैसे कायर सम्‍पादक या तो मुझसे पिट गये या फिर खुद ही खुद को विदा कर गये। जब भी कहीं कोई अन्‍याय हुआ, मैं हाजिर रहा। अपने इसी संस्‍कार-प्रवृत्ति को आजतक सम्‍भाले हूं। इसीलिए जागेन्‍द्र सिंह के हौलनाक हादसे पर अपने खर्चे पर पहुंचा और जितनी भी मिली, सचाई बयान कर दी।

खतरों-धमकियों से डरना मेरी आदत नहीं। मैं जूझना ही सीखा है और आज जब मेरे खात्‍मे की तैयारियां चल रही हैं, मैं उससे भी भिड जाना चाहता हूं। मै चाहता हूं मैं आजीवन आम आदमी के लिए लड़ता रहूं। लेकिन अगर कोई मुझे पेट्रोल डाल कर फूके या ट्रक से नीचे फिंकवा दे, तो वह तो तत्‍काल दाह-संस्‍कार अनिवार्य होगा। लेकिन अगर मेरी गाेली मार कर हत्‍या की जाए, तो मैं अपने सभी मित्रों से आदेशात्‍मक-निवेदन रहेगा कि वे मेरी खाल खिंचवा लें और उसमें भूसा भर के कुमार-सौवीर-कद वाली जीवन्‍त प्रतिमा स्‍थापित करवा दें। पत्रकारिता के सद्य:स्‍तनपायी और नवागतों-छात्रों को अपने जीवन की शुरूआत इसी मुर्दा चमड़ी वाली जीवन्‍त प्रतिमा के दर्शन से कराया जाए, ताकि उनमें पत्रकारिता के दायित्‍वों और उसमें निहित खतरों को भांपने-आंकने और खुद में जिजीविषा उत्‍पन्‍न करने का साहस उमड़े।

इसलिए मैं अखिलेश यादव से सीधे और दो-टूक बात करने आया हूं। तो ऐसा है अखिलेश जी, आपकी सरकार में चंद पत्रकार और कुछ आपराधिक व्‍यक्ति मुझे ठिकाने को आमादा हैं। आप उन्‍हें रोक सकें तो बेहतर है, वरना मैं मर गया तो दिक्‍कत आपकाे भी होगी। अब तक तो लखनऊ के किसी पत्रकार की सामान्‍य मृत्‍यु पर 20 लाख रूपया देने का परिपाटी तो आपने ही शुरू की है। लेकिन जागेन्‍द्र का दाह-काण्‍ड हुआ तो आपने अपने सलाहकार पत्रकारों की सलाह पर मामला खूब टाला। लेकिन जब मैं समेत बाकी पत्रकारों ने जमकर हल्‍ला किया तो आपने जागेन्‍द्र के परिजनों को 30 लाख, दो बच्‍चों को नौकरी, 5 एकड़ फंसी जमीन का करार कर लिया।

कुछ भी हो, इस फैसले का मैं दिल से सम्‍मान और बधाई देता हूं। और मांग करता हूं कि अगर मुझे मार डालना ही अपरिहार्य हो तो मेरे मुआवजे की रकम कम से कम एक करोड़ की जाए। हालांकि मेरे साथी-संगी कम से कम पांच करोड़ की मांग करेंगे जरूर, लेकिन आप एक खोखे पर ही नक्‍की कर लीजिएगा। दूसरी बात यह है कि मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटियों को भरपाई के तौर पर कोई सरकारी दी जाए। यह अनुकम्‍पा मैं नहीं चाहता। इतना ही नहीं, शायद मेरी बेटियां भी ऐसी पेशकश को सिरे से ही खारिज कर देंगी। जिन हालातों में यूपी सरकार के कर्मचारी नौकरी करते हैं, मैं और हमारे बच्‍चे उसे स्‍वीकार नहीं करेंगे। एक खास बात यह कि सरकारी नौकरी सरकार की अनुकम्‍पा पर नहीं, व्‍यक्ति की क्षमता पर होनी चाहिए। अगर किसी में दम होगा, तो वह यथायोग्‍य नौकरी हासिल कर ही लेगा। हां, अगर आप चाहेंगे तो इस एवज में इन दोनों को 25-25 लाख रूपया अतिरिक्‍त एकमुश्‍त भुगतान दिला दीजिएगा। क्‍यों पत्रकार दोस्‍तों, सहमत हो या नहीं? ठीक है ठीक है ठीक है, धन्‍यवाद

चूंकि मेरे पास जमीन नहीं है। इसलिए कोई लफड़ा भी नहीं है। इसलिए आप तसल्‍ली से लम्‍बी-लम्‍बी सांसें ले सकते हैं। सरकार खुश हो सकती है, सरकारी नौकर बेफिक्र हो सकते हैं। यह तो रही मेरी मौत का मुआवजा वाले संघर्ष और सफलता की कहानी। अब देखिये, इस मुआवजा के बंटवारे का सटीक-सटीक और फाइनल मसौदा। तो मित्रों। जैसा कि आपको पता है कि यह रकम टैक्‍स-फ्री होगी, यानी पूरा एक करोड। इसमें 25-25 लाख रूपया तो सीधे मेरी बेटियों को बांट दीजिएगा। इसके अलावा बाकी रकम में से 25 लाख रूपया उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति को दिला दीजिएगा। मुझे खूब पता है कि रवि वर्मा जैसे बेहद बीमार पत्रकारों को मदद के तौर पर एक धेला भी नहीं मिला था। जब मैंने उनकी मदद के लिए 186 पत्रकारों के हस्‍ताक्षर से एक ज्ञापन तैयार किया, तो उसे हेमन्‍त तिवारी ने यह वायदा करके हासिल कर लिया कि रवि वर्मा को मुआवजा दिलायेगा।लेकिन दो साल पहले हेमन्‍त ने यूपी भवन में शराब पीने के बाद उगल दिया था कि उसने मेरा द्वारा तैयार किया गया ज्ञापन फाड़कर फेंक दिया था। हेमन्‍त ने बताया था कि चाहे कुछ भी हो, पूर्व हिसाम के कार्यकाल में कोई भी ऐसा काम नहीं करायेंगे, ताकि सारा दोषारोपण हिसाम पर ही हो।

इतना ही नहीं, जब 23 दिसम्‍बर-11 को मुझे ब्रेन स्‍ट्रोक पड़ा, तो के. विक्रमराव, हेमन्‍त और सिद्धार्थ कलहंस वगैरह एक भी तथा‍कथित मुझे व मेरे परिवारी जनों से मिलने तक नहीं आये, राहत तो कोसों दूर थी। ऐसे में दूसरे पत्रकारों के प्रति इन लोगों का व्‍यवहार क्‍या और कैसा होता, भगवान जाने। इसीलिए मैंन इस कोष की स्‍थापना अपनी मौत के मुआवजे की रकम से करना चाहता हूं, ताकि इसका इसका लाभ आम पत्रकारों को मिले। और चूंकि यह 25 रूपये मैं अपनी जान की कीमत पर पत्रकारों के कल्‍याण के लिए सहयोग-स्‍वरूप दूंगा, इसलिए नहीं चाहूंगा कि इस रकम ऐसे इतने घटिया मानसिकता के लोगों के हाथ पड़े। दोस्‍तों, इसका अलग कोष बनना चाहिए। लेकिन इतना जरूर ध्‍यान रखियेगा कि इस समिति अथवा कोष का संचालन हेमन्‍त तिवारी, के-विक्रमराव और सिद्धार्थ कलहंस जैसे लोगों के हाथ में न पड़े। अन्‍यथा यह मिल कर मेरी पूरी शहादत को मिट्टी में मिला देंगे।

इसलिए तत्‍काल मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति की बैठक कर नया चुनाव कराना और नई कार्यकारिणी को यह कोष सौंप देना। अगर किन्‍हीं जुगाड़-कारणोंवश यह लोग दोबारा चुनाव जीत जीते हैं, तो फिर भी इन लोगों के हाथ में यह कोष मत सौंपना। इसके लिए शलभमणि त्रिपाठी, ब्रजेश मिश्र, आलोक पाण्‍डेय, प्रांशु मिश्र, पंकज झा, नवलकान्‍त सिन्‍हा, अनूप श्रीवास्‍तव, रामदत्‍त त्रिपाठी, शरद प्रधान, आशीष मिश्र, सुधीर मिश्र, हिसाम सिद्दीकी, राजबहादुर, ज्ञानेंद्र शुक्‍ला, श्रेय शुक्‍ल, संतोष बाल्‍मीकि, राजीव मिश्र, अजय कुमार, मनमोहन, प्रभात त्रिपाठी आदि दिग्‍गजों को सौंप देना। रही बची 25 लाख रूपयों की रकम। तो उसे महिला कल्‍याण के लिए खर्च कर दीजिएगा, जो पत्रकारिता में संघर्ष कर रही हैं। मसलन ममता, दीपिका सिंह, बबिता अपूर्व, मंजू, शिरीन, बादेसबा वगैरह-वगैरह। इनके लिए उप्र मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार समिति की ओर से एक कोष बनवाइयेगा। बस, इतना ध्‍यान रखियेगा कि उसमें के. विक्रम राव, हेमन्‍त तिवारी और सिद्धार्थ कलहंस जैसे लोग कत्‍तई शामिल न हों, वरना यह लोग फेवीक्विक लगाकर कुण्‍डली मारे बैठे रहेंगे। वरना यह सब लोग मिल कर पूरा का पूरा मिशन तबाह कर देंगे, जैसे मान्‍यताप्राप्‍त समिति, श्रमजीवी पत्रकार सिंह और प्रेस-क्‍लब का हश्र किया है इन लोगों ने। इन लोगों की छाया से दूर ही रहना इस कोष को मेरे दोस्‍तों। अगर समय रहा तो जिन लोगों को इस ट्रस्‍ट की जिम्‍मेदारी दी जा सकती है, उनका भी नाम सिफारिश के तौर पर पेश कर दूंगा।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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संदीप-जगेंद्र हत्याकांड : खनन माफिया के सरपरस्त आम इंसान नहीं

उत्तरप्रदेश के जगेंद्र सिंह और मध्यप्रदेश के संदीप कोठारी की हत्याओं में एक समानता है और वह है दोनों अपने—अपने राज्यों के खनन माफिया के खिलाफ खबरें लिख रहे थे। ये वो माफिया है जिसकी सरपरस्ती भारत के हर राज्य में पॉवरफुल मंत्रियों नेताओं के पास होती है। ये माफिया इतना बेखौफ है कि पत्रकार तो बहुत दूर की बात है अगर कोई पुलिस अधिकारी, तहसीलदार या अन्य कोई इनके क्षेत्र में कार्रवाई के लिये घुस जाये तो ये दिनदहाडे ट्रेक्टर, डंफर से उसे कुचलने में कोताही नहीं बरतते।

मध्यप्रदेश में आईपीएस नरेंद्र सिंह की दिनदहाडे की गई हत्या से बडा कोई सबूत हो सकता है, शायद नहीं। हर महीने दो म​हीने में खदान माफिया द्वारा किसी न किसी पर हमले की खबरें आती रहती हैं,लेकिन एफआईआर से आगे कुछ होता नहीं है और होगा भी नहीं।

अगर मामला ज्यादा तूल पकडे मसलन,जगेंद्र सिंह की मौत जैसा तो मामला ऐसा सुलटाया जाता है कि बस हो गया काम अब कोई मुंह नहीं खोलेगा। जगेंद्र सिंह के मामले में सरकार घिरी रही हत्यारा मंत्री है साबित हो चुका है मगर सरकार का वही राग है पूरी जांच होगी उसके बाद कार्रवाई करेंगे। सबको पता है और बच्चा—बच्चा जानता है कि किसी मंत्री के खिलाफ कोई जांच कभी पूरी होगी नहीं मृतक का परिवार मुआवजा लेकर चुप बैठ जायेगा। किस्सा खत्म।

यहां पर एक बात जरूर कहूंगी कि कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जगेंद्र के पिता ने बेटे की मौत का सौदा किया। मान लिया एक बार ये मैं पूछना चाहती हूॅ उन लोगों से उनकी जगह वो होते तो क्या करते उस स्थिति में जब एक बेटे को जिंदा फूंक डाला गया हो और वह न्याय की गुहार लगाता अस्पताल में दम तोड चका हो। उसके बाद भी समाजवादियों के जी नहीं भरे तो संवेदना के बहाने घर पर पहुंचकर आपको धमकाया जा रहा हो कि चुप हो जाओ, किसी जांच की मांग मत करो धरना खत्म कर दो वरना अंजाम भुगतने तैयार रहना वगैरह—वगैरह। तब एक सामान्य इंसान की तरह आप सोचेंगे कि जाने वाला तो चला गया लेकिन अगर परिवार के किसी और सदस्य की भी बलि चढ गई तब क्या होगा? ऐसे में आपको मरने वाले के बच्चों की सुरक्षा और भविष्य की चिंता सतायेगी। क्योंकि वो आपकी औलाद की औलाद हैं।

उप्र की समाजवादी सरकार जिस तरह निरंकुश है और जो दांव—पेंच अपनाये जाते हैं सामान्य इंसान उसमें घबरा जाता है। बतौर पत्रकार आप अडे रह सकते हैं खतरों से खेल सकते हैं लेकिन आपका परिवार,एक मर चुके बेटे का बाप भाई,पत्नि,बच्चे पत्रकार नहीं होते। तो प्रतिक्रियायें देने में जरा सावधानी बरतें। बस ये गुजारिश है। तकलीफ तो होती है लेकिन उसे व्यक्त इस तरह ना करें कि रोने वालों को दिलासे के बजाय और ज्यादा तकलीफ ही मिले।

अब बात मध्यप्रदेश के संदीप हत्याकांड की। इस मामले में अच्छी चीज ये हुई कि आरोपी दबोच लिये गये और आरोपियों ने कबूल भी कर लिया। उप्र के अपराधियों की तरह अपराध स्वीकार करने की मक्कारी नहीं दिखाई। संदीप के परिवार ने भी सीबीआई जांच की मांग की लेकिन सरकार ने जांच एसआईटी को सौंप दी। ये वही एसआईटी है जो कई सालों से व्यापमं घोटाले की जांच कर रही है और जांच के चक्कर में कई बेगुनाह छात्रों तक को जेल की हवा खिला दी।

और जांच जारी है। मध्यप्रदेश के लाखों बच्चे जिनका भविष्य बरबाद हो चुका है उनके इस सवाल का जवाब आज भी किसी के पास नहीं है कि उन्हें बतौर हर्जाना क्या मिलेगा?

बहरहाल खनन का खेल जिनकी सरपरस्ती में चलता है वे कोई आम आदमी नहीं होते किसी भी मामले में न सामाजिक,ना आर्थिक,ना भावनात्मक तौर पर। जो खदानों में काम कर रहे हैं जिनके नाम ठेके हैं,उन्हें साफ हिदायत है जो भी रास्ते में आये कुचल दो अब नया तरीका शुरू हुआ जला दो। बाकी हम देख लेंगे।

लेखिका ममता यादव से संपर्क : himamta07@gmail.com

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जगेन्द्र प्रकरण : याचिकाकर्ता सतीश जैन और दिल्ली के पत्रकार विशेष ध्यान दें

मैं हमेशा कहता हूँ कि अच्छा, बुरा कुछ नहीं होता। अति ही बुराई है। सद्कर्म की भी अति हो जाये, तो परिणाम नकारात्मक ही आता है। आप आगे को भागिए और भागते रहिये, तो एक दिन लौट कर वहीं आ जायेंगे, जहां से चले थे, ऐसे ही पीछे को दौड़ने पर होगा। पीछे को दौड़ने वाला भी रुके न, तो वो भी एक दिन वहीं आ जायेगा, जहां से भागा था, इसीलिए बीच की अवस्था को शिखर कहा जाता है, संतुलन जीवन की सर्वश्रेष्ठ अवस्था है। शिखर पर ठहरे रहना होता है, मतलब संतुलन बनाये रखना होता है, लेकिन कोई शिखर पर पहुंचने के बाद भी संतुलन न बना सके, तो उस पार नीचे जाने का ही रास्ता होता है फिर। खैर, मन धर्म-अध्यात्म और कर्म पर चर्चा का नहीं है। मन है शाहजहांपुर के पत्रकार जगेन्द्र कांड पर बात करने का। इस प्रकरण में भी समाजसेवा की थोड़ी अति हो गई, जिससे परिणाम अपेक्षित नहीं आ पा रहा है। लखनऊ के चर्चित अधिवक्ता प्रिंस लेनिन ने उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में ही गहन अध्ययन के बाद जगेन्द्र प्रकरण में जनहित याचिका दायर की थी, जिस पर सरकार से जवाब माँगा गया। आशा थी कि बहस के बाद सीबीआई जांच के आदेश हो जायेंगे, उससे पहले दिल्ली के पत्रकार सतीश जैन ने उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर दी, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और प्रदेश सरकार से जवाब माँगा है।

दिल्ली के पत्रकार सतीश जैन की भी मंशा बहुत अच्छी रही होगी, लेकिन इससे उच्च न्यायालय- लखनऊ पीठ टालने की स्थिति में आ गई और 24 जून को अगस्त के प्रथम सप्ताह तक सुनवाई टाल भी दी, यह सब अति की समाजसेवा के चलते ही हुआ है, वरना परिणाम बेहतर आने की संभावना थी। अब भी सब कुछ खराब नहीं हुआ है, अभी सही करने का समय है, लेकिन अब दिल्ली के पत्रकार सतीश जैन को थोड़ा अधिक ध्यान देना पड़ेगा, उन्हें इस प्रार्थना पत्र का प्रिंट निकाल कर उच्चतम न्यायालय तक पहुंचाना होगा, क्योंकि पूरा प्रकरण इसी प्रार्थना पत्र पर टिका हुआ है, क्योंकि घटना के दिन जगेन्द्र को जिस मुकदमे में पुलिस गिरफ्तार करने गई थी, उस मुकदमे की तहरीर बाद में बदली गई थी। पूर्व में लिखी गई तहरीर में जगेन्द्र पर आरोप नहीं था, लेकिन बाद में जगेन्द्र को आरोपी बना दिया गया। पूर्व में दी गई तहरीर भी पुलिस को रिसीव कराई गई थी, फिर भी पुलिस ने दूसरी तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर लिया और यह सब जानते हुए भी पुलिस जगेन्द्र के पीछे पड़ी थी। 

शाहजहांपुर की कांशीराम नगर कालौनी निवासी अमित प्रताप सिंह भदौरिया नाम के युवक ने जगेन्द्र के विरुद्ध 22 अप्रैल को जानलेवा हमला करने का मुकदमा कोतवाली चौक में दर्ज कराया था, इस मुकदमे को लेकर ही पुलिस जगेन्द्र के पीछे पड़ी थी और 1 जून को जगेन्द्र के जलने की वारदात हो गई, जिसे पुलिस आत्महत्या करार दे रही है, जबकि जगेन्द्र ने मृत्यु से पूर्व कहा था कि उसे पुलिस ने जलाया है। जगेन्द्र की मृत्यु के बाद उनके बेटे राहुल ने राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा और कोतवाल श्रीप्रकाश राय सहित छः लोगों को नामजद करते हुए कई अज्ञात लोगों के विरुद्ध जगेन्द्र को जिंदा जला देने का मुकदमा लिखाया था।

अमित प्रताप सिंह भदौरिया ने ही 10 अप्रैल को चौक कोतवाली क्षेत्र की पुलिस चौकी अजीजगंज के चौकी प्रभारी शाहिद अली को हस्तलिखित तहरीर रिसीव कराई थी, जिसमें अन्य कई लोगों पर जानलेवा हमला करने और अपहरण का प्रयास करने का आरोप लगाया था, साथ ही इस तहरीर में जगेन्द्र को बचाने वाला दर्शाया गया था। इस तहरीर में स्पष्ट लिखा है कि हमलावर उसे पकड़ कर ले जा रहे थे, लेकिन जगेन्द्र और जितेन्द्र द्वारा चेतावनी देने पर छोड़ गये, लेकिन इस तहरीर पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। कोतवाली चौक में 22 अप्रैल को मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमें जगेन्द्र पर जानलेवा हमला करने का आरोप है। जाहिर है कि दूसरी तहरीर मनगढ़ंत है, झूठी है, फर्जी है, जिसके आधार पर जानते हुए पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया और फिर पुलिस जगेन्द्र के पीछे पड़ गई, उसी का दुष्परिणाम है कि आज जगेन्द्र नहीं है, मतलब संपूर्ण प्रकरण का आधार यही तहरीर है, इसलिए दिल्ली के पत्रकार सतीश जैन से आग्रह है कि वे इस तहरीर का प्रिंट निकाल कर अपने अधिवक्ता तक पहुंचाने का कष्ट करें, ताकि उच्चतम न्यायालय सही निर्णय ले सके। अगर, कोई सतीश जैन से परिचित हो, तो उससे भी आग्रह है कि वो यह सब सतीश जैन के संज्ञान में लाने का कष्ट करें।

बी पी गौतम से संपर्क : bpgautam99@gmail.com

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यह रहा जगेंद्र हत्याकांड के कातिल के फोन कॉल का ऑडियो सच, खुदकुशी का दावा सफेद झूठ

मुख्‍यमंत्री और उनकी पुलिस का कहना है कि जागेन्‍द्र सिंह दाह-हत्‍याकाण्‍ड की अभी जांच की जाएगी। लेकिन इसके पहले ही मैं आप मित्रों को सुना-दिखा रहा हूं कि किस तरह घेर कर मारा गया था जाबांज पत्रकार जागेन्‍द्र सिंह। मैं दे रहा हूं इससे जुड़े पुख्‍ता प्रमाण, जबकि हमारे मुख्‍यमंत्री ऐलान कर चुके हैं कि जांच के बाद ही किसी पर कोई कार्रवाई की जाएगी। पेश है उस रोंगटे खड़े कर देने वाले काण्‍ड के एक अभियुक्‍त की अपने एक परिचित से हुई बातचीत का ब्‍योरा—- 

एक परिचित:- हांय

अमित भदौरिया:- जो आप, हांय, पीतम को जा काम करके निपटाय द्यौ। 

एक परिचित:- आंय ?

अमित भदौरिया:- ठीक है, अभी तो खाली जे प्रोग्राम में लगे रहेंगे। कल इसको निपटाय द्यौ। बस, कल से लेकर परसों तक मिलकर। ठीक है ?

एक परिचित:- अच्‍छा अच्‍छा

अमित भदौरिया:- ठीक है

एक परिचित:- चलो ठीक है

अमित भदौरिया:- और कुछ मत करो

एक परिचित:- आंय आंय अांय ?

अमित भदौरिया:- पुलिस-वुलिस नहीं है, पुलिस नहीं है। ठीक है ?

एक परिचित:- ठीक है, तुम समझो ? 

अमित भदौरिया:- अभी हैं नोएडा में। जो करियो कि हमें हमें रखे धरो धोखे में। और हो गे। हमने अपनी मां कसम खायी है, आप से का कहें हम। ठीक है ? मतलब जे ना होनो चाहिये कि हमने अपनी मां कसम खायी है और मां की कसम खाकर कहते हैं। ठीक है ?

एक परिचित:- ठीक है

अमित भदौरिया:- हमने आपको बता दई। जे कि कल काम में लग गये, कपड़ा धोने में। अब निश्चिंत रहो, इस काम को मना ना करो। ठीक है ?

एक परिचित:- ठीक है ठीक है ठीक है

अमित भदौरिया:- जा भों—-वाले के। काण्‍ड और सूपड़ा साफ कराओ। ठीक है ?

एक परिचित:- ठीक है………………………………………………….( और फिर फोन कट जाता है )

सुन लिया आपने मुख्‍यमंत्री जी ! कि जागेन्‍द्र सिंह को लेकर जो भी सूचनाएं आपके पास हैं, बिलकुल गलत हैं।

यह है जागेन्‍द्र सिंह की हत्‍या का जाल बुनने वाली फोन-कॉल का लिप्‍यान्‍तरण, जिसमें जागेन्‍द्र सिहं को निपटा देने की साजिश की गयी थी।

जबकि आपकी पुलिस का दावा है कि जागेन्‍द्र सिंह ने आत्‍मदाह किया था ना ? 

लेकिन हकीकत यह है कि आपका यह दावा सरासर झूठ है। आपने इस मामले के अभियुक्‍तों को छुट्टा घूमने की खुली इजाजत दी दी ना ? नतीजा यह हुआ कि आपकी इसी पुलिस ने असल तथ्‍योंं-प्रमाणों की ओर से अपनी आंखें ही मूंद ली हैं। आपका खुला संरक्षण ही आपकी पुलिस के हौसले बढ़ाने के लिए पर्याप्‍त हो गया और इसके बाद पुलिस ने इस असली काण्‍ड की ऐसी की तैसी करते हुए नकली कहानी गढ ली। इतना ही नहीं, जागेन्‍द्र की मित्र शालिनी से भी यह कहला दिया कि जागेन्‍द्र सिंह ने आत्‍मदाह किया।

मेरे पास हैं प्रमाण। ठोस प्रमाण। 

इन प्रमाणों के आधार पर साबित कर सकता हूं कि जागेन्‍द्र सिंह ने हर्गिज आत्‍मदाह नहीं किया था। बल्कि हकीकत यह है कि उसकी हत्‍या की गयी थी।

कभी जागेन्‍द्र का शिष्‍य अमित कुमार भदौरिया पर जागेन्‍द्र ने मृत्‍यु-पूर्व बयान में आरोप लगाया है कि मंत्री राममूर्ति वर्मा की साजिश से पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय और अमित भदौरिया और गुफरान समेत अनेक अपराधियों ने उसे पहली जून को जिन्‍दा फूंका था। अब उसी अमित से पूछिये, वह बतायेगा कि जागेन्‍द्र सिंह के साथ उसने क्‍या किया था। आपकी पुलिस के संरक्षण में अमित फरार बताया जा रहा है। उससे पूछिये कि पिछली 29 मई-2015 यानी जागेन्‍द्र के दाह-हत्‍याकाण्‍ड के ठीक दो दिन पहले अमित ने किस से यह बातें की थीं, जिनका तस्‍करा मैंने ऊपर किया है।

जागेन्‍द्र सिंह के खिलाफ अमित भदौरिया ने 12 मई-15 शाम एक विवाद पर घटना के दो दिन बाद एक झूठी एफआईआर दर्ज करायी थी। इसमें शाहजहांपुर का कोतवाल श्रीप्रकाश राय, जो आपके चहेते मंत्री राममूर्ति वर्मा का खासमखास है, ने बाकायदा एक साजिश बुनी थी। राममूर्ति वर्मा ने कभी जागेन्‍द्र सिंह के शिष्‍य अमित भदौरिया को अपने पक्ष में तोड़ लिया था और कोतवाल श्रीप्रकाश सिंह आदि पुलिसवालों की मिलीभगत में जागेन्‍द्र की घेराबन्‍दी शुरू कर दी थी।

इस बातचीत में अमित ने साफ-साफ कह दिया था कि बस एक-दो दिन में ही काम-तमाम हो जाना है। अब सबसे अहम सवाल तो यह है कि आखिरकार कौन सा वह काम था, जिसे पूरा करने में अमित भदौरिया पुलिस की चिन्‍ता नहीं कर रहा था ? अमित किस का काम-तमाम करने की तैयारी कराना चाहता था ? आखिर वह क्‍या काम था जो इसी समय-अवधि में पूरा हो गया, और जागेन्‍द्र सिंह को जिन्‍दा जला दिया गया ?

मेरे पास अमित की एक बातचीत का भी ब्‍योरा है, जिसे अमित ने अपने एक मित्र से बातचीत में कुबूला है कि उसे पकड़ लिया गया है। यह ठीक उसी वक्‍त की फोन-कॉल का ब्‍योरा है, जब जागेन्‍द्र को पकड़ लिया गया है। इस फोन ब्‍योरा में अमित ने साफ-साफ कुबूल कर लिया है कि जागेन्‍द्र सिंह जल चुका है।

और मित्रों। अब मैं इस बातचीत को पुलिस को देने की तैयारी में हूं। 

आपका क्‍या ख्‍याल है मेरे दोस्‍त ?

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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मुआवजे ने किया सिद्ध किया, मंत्री दोषी

अमर शहीद पत्रकार जगेन्द्र सिंह के परिवार द्वारा मुआवजा स्वीकार कर लेने व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बात को मानकर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही जाँच से संतुष्ट होने की बात को दिल का ताड़ बनाकर पेश करने वाले साथियों से मेरा एक प्रश्न है। इन बातों को स्वीकार करने के अलावा उन गरीब, कमजोर, डरे हुए लोगों के पास क्या कोई दूसरा विकल्प था। जगेन्द्र को जिन्दा जला देने वाली घटना को आत्महत्या साबित करने में जुटी यूपी पुलिस के कार्य क्षेत्र में उनको सुरक्षित रहना है या नहीं? इनका फैसला समाजवादी पार्टी के तथाकथित गुंडों एव खाकी के द्वारा ही तो किया जाना है। जिन्दा रहना है तो बात मानो वर्ना कौन बचायेगा हम जगेन्द्र के परिवार को कही भी दोषी साबित नहीं कर सकते। 

जगेन्द्र, संदीप कोठारी व अन्य घायल पत्रकार को जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक “हम न तो चैन की नींद सोयेंगे और न सोने देंगे।” हमे भारत के संविधान पर पूरा विश्वास है और न्याय पाना हमारा अधिकार।

शासन और प्रशासन द्वारा शहीद पत्रकार के परिवार को दिया मुआवजा प्रच्छन्न रूप से ये इंगित करता है कि राज्य सरकार के कद्दावर मंत्री राममूर्ति वर्मा कहीं न कहीं दोषी हैं। दोस्तों आपके आस-पास में जो भी माध्यम हो, चाहे सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, उनसे अपनी सक्रिय जिम्मेदारी को निभाना है। इस यज्ञ में आप सभी का सहयोग अनिवार्य है।

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जगेन्द्र सिंह हत्याकांड : प्रेस परिषद के खलीफाओं तक ने खूब फायदा उठाया

लाश पर रोटियां कैसे सेंकी जाती हैं, उसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है जगेन्द्र सिंह हत्याकांड। छुटभैये पत्रकारों और नेताओं से लेकर प्रेसकौंसिल के खलीफाओं तक ने खूब फायदा उठाया इस प्रकरण का। जिन सरदार शर्मा के खिलाफ अपने जीवित रहते जगेन्द्र सिंह मोर्चा खोले रहे, हर कोई उन्ही से जाके पूछता रहा- जगेन्द्र पत्रकार था, तो कैसे? 

जंतर मंतर पर धरने के दिन ही पूरे प्रकरण को निपटाने की भूमिका बन गयी थी। प्रेसकौंसिल के जो लोग दिल्ली से गये, उनकी सेवा करने में साथ गये उ प्र सरकार के सूचना विभाग के अधिकारी ने अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई और सरकार की सेवा और जाँच से प्रेस कौंसिल समेत एक एक कर चश्मदीद महिला, फिर परिवारवाले और फिर पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर भी सहमत होते चले गए। 

आख़िरकार तय हुआ कि पत्रकार की मौत किडनी फेल होने से हुई है। जगेन्द्र के परिवार वाले समझौता न करते तो पुलिस खुलासे में जगेन्द्र का ब्लैकमेलर, चरित्रहीन और दलाल पत्रकार होना तय ही था, भला हो जे सी का, जगेन्द्र ने जाने कितनी बार उनके कारनामो के बारे में लिखा पर उन्होंने सारा मनमुटाव भुलाकर सभी पक्षों के लिए-लाभकारी समझौता करा दिया। समझौता का भविष्य हैं जे सी। और पब्लिक तेरी ऐसी की तैसी।

अरविंद पथिक के एफबी वाल से

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फिर वहीं पर जीमेंगे जागेन्‍द्र सिंह की तेरहवीं का भोज

देख्‍यौ भइया, तेवरिया ऐण्‍ड कम्‍पनी वालों ने तो शाहजहांपुर में जिन्‍दा फूंक डाले गये जागेन्‍द्र सिंह वाला मामिला को 20 लाख रूपया में डन ( नक्‍की-पक्‍का ) कराया था। सरकार और अफसरों के सामने डींगें खूब मारी थी कि,” यह बड़ा मुश्किल काम है। आजकल पत्रकार खुद को बहुत ईमानदार बनते हैं। ऐसे में इन पत्रकारों को सेट करना बड़ा मुश्किल होता है। खुद की छवि की भी बलि देनी पड़ती है।”

यही दलीलें देकर इस कम्पनिवालों ने भारी दलाली का काफी परसेंट चार्ज वसूला, बाकी किश्‍तों में वसूलने का आश्‍वासन जेब में रक्‍खा और काम-तमाम हुआ समझ कर यह कम्‍पनी और उसके कारकून लोग भुवनेश्‍वर निकल गये थे। बोले थे, “मामिला डन हो चुका है।”

लेकिन वह तो सोशल-साइट वाले तो बिलकुल्‍लै नासपीटे निकले। इन मुए फेसबुकियों ने ई मामिला में इत्‍ता हल्‍ला-दंगा कराय दिया, कि उसे सुलटाने में बाकी अफसरों को सरकार के टेंट से 10 पेटी एडीशनल चार्ज का पेमेण्‍ट करना पड़ा। वैट टाइप टैक्‍स उप्‍पर से।एक नहीं, दो-दो नौकरी भी देनी पड़ी, साथ में पांच एकड़ जमीन घाते में। इसे कहते हैं सरचार्ज। नतीजा, दलाली का हिस्‍सा फंस गया और जो धेला भर की इज्‍जत बची-खुची थी, वह भी दो-कौड़ी की साबित हो गयी। गले में स्‍पाण्डिलाइटिस वाला पट्टा अलग फंस गया।

फेसबुक पर यह मामला बिलकुल इसी तरह देखा, समझा, और छीछालेदर-टाइप फेंका जा रहा है। कई-कई दिनों से भीगे जूतों की बारिश इन दलालों पर हो रही है। अब आप भी थोड़ा मुजायका लीजिए ना:-

Sheetal P Singh ने जमकर धरचुक्‍क दिया। बोले:- “दस पेटी बढवा दिये ? बीस में तेवारी डन किये रहें ? “Shashi Kant Singh तो बे-हिसाब हमला कर बैठे। पूरी की पूरी भले न सही, लेकिन इस बिरादरी के एक हिस्‍से पर तो उन्‍होंने खंखार कर थूक ही दिया है। लिखा है:- “अब अखबारों और न्‍यूज चैनलों से ही नहीं; पत्रकारों से भी पूछा जा सकता है कि तुम किस पार्टी की रखैल हो।”

Aflatoon Afloo भी बहुत कड़े शब्‍दों में सवाल उठाते हैं:- “उच्चतम न्यायालय की नोटिस का क्या जवाब देती है बेहया अखिलेश सरकार देखा जाए ।”

अफलातून ने जब यह लिखा तो Shashank Shukla ने चेंप दिया:-” खीस निपोर देगी…।” Sanjay Mishra Patrakar कहते हैं कि :- “सौवीर सर, अब चाहे जो हो जाय,,,लेकिन आप ने ओखली में सर डाल कर सच्चाई दुनिया के सामने ला दी,,,सदियों तक पत्रकार जगत आप को गर्व के साथ याद करेगा…..।” कुछ ऐसा ही भय नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी जी को भी सता रहा है, लेकिन पूरे गर्व के साथ। वे लिखते हैं कि:- “गर्व ही नही, सौवीर जी की रक्षा भी करनी है.कहीं यह माफिया पुलिस गठजोड़ उनको परेशान न करें. “Drsk Gautam तारीफ करते हैं कि:-” Aap nahi bikey,aapka zameer nahi bikaa,aapka “

दिव्य रंजन पाठक इस घटना को भाजपा-सपा की मोहब्‍बत का दैवीय दृश्‍य देखते हैं। बोले:- “देखा, इसे कहते हैं योग (जोड़), वीजेपी वाले क्या करेंगे योग, आखिर योगीश्वर कृष्ण यदुवंशी थे….Khuli ladai ke liye aaka ।”

Prabhat Tripathi भी खूब चुटकी काटते हैं। बोले:- “जाने वाला तो चला गया, परिवार वालों ने कीमत भी ले ली। मुख्यमंत्री ने कौन सा अपनी जेब से देना है। लेकिन आपके डटे रहने को सलाम।” OM Prakash Mishra तो सत्‍ताधारियों को चुनाव की चुनौती दे रहे हैं।

Rajesh Mishra के पास सरकार को देने के लिए बेहिसाब:- “लानत है। ” Preet Times का सवाल है कि ” KYA EK DABANG AUR DILER PATRAKAR KE MAUT KI KEEMAT NAUKARI AUR 30 LAKH RUPAYA HI HAI”

तो अब चलो दोस्‍तों। हम भी अब चलते हैं हसीन किसी समन्‍दर के किनारे। फिर वहीं पर जीमेंगे जागेन्‍द्र सिंह की तेरहवीं का भोज।

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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जगेंद्र की फोरेंसिक रिपोर्ट से घटनाक्रम में नया मोड़, हत्या नहीं, खुदकुशी !!

लखनऊ की फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट ने जगेंद्र हत्‍याकांड को खुदकुशी करार दिया है। बताया गया है कि जगेन्द्र ने खुद आग लगाई थी. छाती के बाईं तरफ से आग से जलने के निशान पाए गए हैं. गौरतलब है कि जगेन्द्र ने घायल होने के बाद बयान दिया था और यूपी के मंत्री राममूर्ति वर्मा और यूपी पुलिस पर आग लगाने का आरोप लगाया था। 

एक टीवी रिपोर्ट के मुताबिक यूपी पुलिस के सूत्रों ने बताया कि फॉरेंसिक रिपोर्ट साफ तौर पर यह कह रही है कि जगेन्द्र ने खुद को आग लगाई, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई. जांच करने वाले फॉरेंसिक एक्सपर्टस अपनी रिपोर्ट में जगेन्द्र द्वारा खुद आग लगाने की बात कह रहे हैं. इसके पीछे उनका तर्क है कि जगेंद्र का दाहिना हाथ सुरक्षित है और बायां जला है. 

अगर उसे किसी ने जलाया होता तो दोनों हिस्सों में आग लगी होती. जगेंद्र भी दाहिने हाथ से काम करता था, इसलिए एक्सपर्ट्सअपनी रिपोर्ट में यह दर्शा रहे है कि उसने खुद आग लगाई.

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पत्रकार आधी जंग जीते, जगेंद्र के परिजनों को 30 लाख मुआवजा, दो को नौकरी का भरोसा दिया सीएम अखिलेश यादव ने

नई दिल्ली: पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड के आरोपी मंत्री पर तो अभी तक कार्रवाई नहीं हुई लेकिन परिवार से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तीस लाख रुपए के मुआवजे और घर के दो लोगों को नौकरी का भरोसा दे दिया है. इसके बाद परिवार ने धरना खत्म कर दिया है.

पत्रकार जगेंद्र के परिवार ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात की. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने परिवार को इंसाफ का भरोसा दिलाया है. अखिलेश के कहने पर परिवार ने धरना खत्म कर दिया है. पत्रकार जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गई थी. यूपी के मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा पर हत्या का आरोप है. घरवालों ने आरोप लगाया है कि कि मंत्री की तरफ से पैसे लेकर समझौते का दबाव बनाया जा रहा है.

शाहजहांपुर में इंसाफ के लिए परिवार धरने पर बैठा था. जगेंद्र सिंह के परिवार का आरोप है कि हत्या के आरोपी मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा की ओर से उन्हें समझौते के लिए धमकी दी जा रही है. परिवार ने इसकी शिकायत पुलिस से भी कर दी है और केस दर्ज हो गया है. मामले की जानकारी मिलते ही डीआईजी आर.के.एस राठौर खुद परिवार वालों से मिलने पहुंचे.

पत्रकार जगेंद्र सिंह के घरवालों के मुताबिक आरोपी मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के 2 लोग आ कर उन्हें समझौते के लिए धमकी दे रहे हैं. परिवार का कहना है कि उन्हें 20 लाख रुपये लेकर मामले को खत्म करने को कहा जा रहा है. गौरतलब है कि जगेंद्र ने मौत से पहले अपने बयान में पुलिसवालों पर यूपी के मंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर जलाने का आरोप लगाया था।

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पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड पर केंद्र और यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

नई दिल्ली : शाहजहांपुर के जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या के मामले को सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान ले लिया है। इससे हत्याकांड के आरोपी मंत्री और पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता भी आसान होने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। कोर्ट ने हत्याकांड के संबंध में यूपी सरकार, केंद्र सरकार और प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस भेजकर दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब कर लिया है। 

जगेंद्र हत्याकांड पर पत्रकार सतीश जैन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और केंद्र के अलावा प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी नोटिस भेजा है। याचिका में पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत की जांच सीबीआई से कराने की मांग भी की गई है। याचिका में मामले की सीबीआई जाँच के साथ-साथ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए भी दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। 

याचिका में कहा गया है कि अगर किसी भी पत्रकार की आकस्मिक मौत होती है तो इसकी जाँच कोर्ट की निगरानी अदालत के देखरेख में हो। याचिकाकर्ता के वकील आदिश अग्रवाल ने बताया कि प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया के मुताबिक पिछले ढाई साल में 79 पत्रकारों की हत्या हुई है। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई गाइडलाइन जारी की जाए। इसलिए काउंसिल को भी याचिका में पार्टी बनाया गया है। इस मामले में उसकी भूमिका अहम होगी क्योंकि ये एक सरकारी संस्था है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज चेयरमैन हैं।

उन्होंने कहा कि अब मध्यप्रदेश में भी पत्रकार की जलाकर हत्या कर दी गई है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दाखिल की जाएगी। इसमें सभी राज्यों को पार्टी बनाया जाएगा। इस वक्त राज्यों में पत्रकारों की हालत खराब है और ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई दो हफ्ते बाद करेगा।

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने पत्रकार जगेन्द्र सिंह केस में सीबीआई जांच के लिए पीआईएल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर स्थिति से अवगत कराने के आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि मात्र एक स्वतंत्र संस्था द्वारा तफ्तीश ही लोगों के मन में मंत्री और पुलिस की भूमिका के प्रति पर्याप्त विश्वास पैदा कर सकती है। ख़ास कर यदि इस बात पर ध्यान दिया जाए कि जगेन्द्र के आग लगने का एफआईआर उसके मरने के बाद ही दर्ज हो सका था। वह भी तब जब उनके परिवार वालों ने बिना एफआईआर हुए दाह संस्कार करने से साफ़ मना कर दिया था। 

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जगेंद्र हत्याकांड पर डीजीपी के खिलाफ कोर्ट जाएंगे कुमार सौवीर

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है – ”यूपी के डीजीपी अरविन्‍द जैन की पुलिस का कमाल यहां शाहजहांपुर में देखें तो आप दांतों तले उंगलियां कुचल डालेंगे, जहां मंत्री का इशारा था, अपराधी मोहरा बना था और अपराधी बना डाला गया हत्‍या का जरिया। सिर्फ दो दिन तक पुलिस ने एक सीधी-सच्‍ची एफआईआर को टाल दिया और उसकी जगह में एक नयी रिपोर्ट दर्ज लिख डालीा ताना-बाना इतना जबर्दस्‍त बुना गया कि उसके बल पर मंत्री-अपराधी-पत्रकार और पुलिस की साजिशों से जगेन्‍द्र सिंह के खिलाफ डेथ-वारण्‍ट तामील करा दिया। अब मैं इस प्रकरण पर सीधे अदालत में ही पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने जा रहा हूं, जिसमें डीजीपी अरविन्‍द जैन भी शामिल होंगे, जिन्‍होंने जान-बूझ कर भी एक असल मामले की तहरीर को मनचाहे तरीके से बदलवा दिया।

”मेरे पास है वह सुबूत, जिसमें शाहजहांपुर की पुलिस के कोतवाल और बाकी पुलिसवालों ने मंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर कोतवाल को कुछ इस तरह जकड़ दिया कि वह चूहेदानी में फंसे चूहे की तहर छटपटाने लगा। जगेन्‍द्र की रची-बची सांसों को इन्‍हीं हत्‍यारे गिरोहबाजों ने उस पर तेल डाल कर फूंक डाला।

”अब तो मैं दावे के साथ ऐलान करता हूं कि जगेन्‍द्र हत्‍याकाण्‍ड सीधे-सीधे पुलिस की मिली-भगत से हुआ था और इसमें मंत्री राममूर्ति वर्मा, अमित भदौरिया, गुफरान आदि अनेक खतरनाक षडयंत्रकारी शामिल थे।

”मेरे पास प्रमाण है। पुख्‍ता प्रमाण कि हल्‍की-फुल्‍की हाथापाई को पुलिस ने दो दिनों तक अपनी कोतवाली में नये सिरे से फर्जी लिखवा दिया और हालात इतना खतरनाक बना डाला कि आखिरकार जगेन्‍द्र सिंह जिन्‍दा फूंक डाला गया। ऐसे में आप यूपी सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा की साजिश साफ-तौर पर देख सकते हैं। इस फर्जी एफआईआर को बढ़ा-चढ़ा कर जिस तरह जगेन्‍द्र सिंह के खिलाफ पुलिस ने मामला तैयार किया, और आखिरकार उसे मौत के चंगुल में दबोच लिया गया, वह यूपी के मानव-समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक कहा जा सकता है।

जी हां, यह पुलिस की कपोल-कल्‍पना नहीं है, जो वह अदालतों में बिलकुल फर्जी तौर पर पेश किया करती है। अरे मेरे पास है इस बात के प्रमाण। पुख्‍ता प्रमाण, जिसे कोई भी अदालत संज्ञान ले लेगी।

”दस अप्रैल-2015 को सात बजे शाम एक हल्‍का-फुल्‍का झगड़ा हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष राजीव शर्मा के घर अमित भदौरिया से बीतचीत चल रही थी कि अचानक जगेन्‍द्र सिंह, रंजना हत्‍याकांड का गवाह आदित्‍य दीक्षित ऊर्फ मोनू और जीतेंद्र मोटरसायकिल से आये। इसके बाद एक कार से अनुराग मिश्र, विनोद, वकील और विजय राघव तथा ड्राइवर पहुंचे। अमित से झगड़ा शुरू हो गया। इनमें अनुराग और विनोद के हाथ में तमंचा था। इन लोगों ने पहले तो उन्‍हें साथ ले जाने की कोशिश की, लेकिन बाद में धमकियां देते हुए घटना स्‍थल से चले गये। 

”इसकी तहरीर अमित सिंह भदौरिया ने यहां के अजीजगंज बरेली मोड़ पुलिस चौकी को रात नौ बजे सौंपी थी। इस तहरीर को चौकी प्रभारी दारोगा शाहिद अली ने बाकायदा रिसीव किया और मुकदमा दर्ज करने के लिए कोतवाली-थाना को भेज दिया। कोतवाली में कोतवाली इंस्‍पेक्‍टर श्रीप्रकाश राय मौजूद थे, जो मंत्री राममूर्ति वर्मा के पालित श्‍वान माने जाते हैं।

”अब इसके बाद शुरू हो गयी जगेन्‍द्र को तबाह-बर्बाद करने की साजिशें। अगले दिन तो पूरी तरह साजिश को बुनने में लग गया और आखिरकार जब मंत्री समेत सभी लोग संतुष्‍ट हुए तो श्रीप्रकाश राय के मोहर्रिर ने अमित की नयी तैयार तहरीर दर्ज करा दी। 

”अब यह नयी रिपोर्ट नयी साजिशों का पुलिंदा बन गयी, जिसमें जगेन्‍द्र, आदित्‍य, अनुराग, विनोद आदि कई लोग आये, तमंचा लहराते हुए। जगेन्‍द्र ने अमित को जमकर लात-घूसों से पीटा। इस बीच अमित को जान से मार डालने के लिए जगेन्‍द्र ने बुरी तरह लात-घूंसों से पीटा, उसे घसीटा और बाद में धमकी देते हुए चले गये। पुलिस ने जगेंद्र और अनुराग समेत कई लोगों पर मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने इस रिपोर्ट को मुकदमा संख्‍या:- 937-15 के तहत,आईपीसी की धारा 363, 307, 323, 504, 506 के तहत दर्ज किया था। हैरत की बात है कि यह रिपोर्ट भले ही दो दिन बाद दर्ज हुई गयी, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट को लिखाने में हुए विलम्‍ब के लिए सीधे वादी को ही जिम्‍मेदारी ठहरा दिया। ”

कुमार सौवीर के एफबी वाल से 

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जलाकर मारे गये पत्रकार जगेंद्र और संदीप की हत्या का ज़िम्मेदार कौन?

उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार की जलने के बाद हुई मौत से ठीक पहले पत्रकार के अंतिम बयान में यह कहा जाना कि “मुझको गिरफ्तार करना था… तो कर लेते मगर पीटा क्यों ? और आग क्यों लगा दी?”, इतने सवालों को खड़ा कर देता है कि न तो उत्तर प्रदेश सरकार उनका जवाब दे पाएगी न ही पत्रकारिता जगत के दिग्गज! अभी ये मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था, कि मध्य प्रदेश में भाजपा शासित सरकार की नाकामी के तौर पर एक पत्रकार की जली हुई लाश बरामद हुई, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि खनन माफिया ने पहले पत्रकार का अपहरण किया और बाद में जलाकर मारा और लाश को दबा दिया। सरकार सपा की हो या बीजेपी की, पत्रकार कहां सुरक्षित है..? ये समझ में नहीं आ रहा ! और इसके लिए दोषी कौन है..? ये भी साफ नहीं हो रहा है !

सच्चे मन से सोचा जाए और सुनने की ताक़त हो तो इस सबके लिए सिर्फ हम सभी पत्रकार किसी हद तक दोषी हैं! बात तल्ख़ है लेकिन अगर किसी के पास पत्रकारों के ऊपर होने वाले ज़ुल्म की कोई दूसरी वजह हो तो बेधड़क बता सकता है?

टेलीविजन की पत्रकारिता और कई बड़े चैनलों में बड़े पदों पर रहते हुए लगभग 17 साल हो गये। कई चैनलों पर हमारे प्रोमो तक चले मगर आज भी कई ऐसे पत्रकारों को देखकर खुद से शर्म आती है जो कभी न तो किसी चैनल के पे रोल पर रहे और न ही कभी कोई ख़बर के नाम पर कारनामा अंजाम दिया और जिनकी न सिर्फ महंगी कार, महंगा स्टेटस और मंहगे मोबाइल मुंह चिढ़ा रहे होते हैं, बल्कि जिनका पुलिस और प्रशासन में रुतबा बड़े बड़ों से ज्यादा दिखाई देता है। लेकिन जब गहराई में जाते हैं तो शर्म आती है। उन कथित पत्रकारों पर जो प्रशासन और पुलिस के सिर्फ इसलिए चहेते बने हुए हैं कि उनको उनके लिए बतौर ढाल काम करना है और पुलिस प्रशासन के काले कारनामों पर न सिर्फ परदा डालना है बल्कि प्रेस कांफ्रेस में भी पुलिस और प्रशासन के प्रवक्ता के तौर पर सवाल जवाब करना और पत्रकारों के सावलों को काटना होता हैं।

इसी सब के दम पर चहेते बने ये लोग न सिर्फ अपने शहर में दलाली को अंजाम देते हैं, बल्कि पुलिस प्रशासन में ट्रांसफर और पोस्टिंग का धंधा जमाए बैठे हैं। किसी भी चैनल या अखबार में काम करने वाले पत्रकार ऑफिस जाकर मीटिंग और ख़बरों के दबाव को झेलने को जिस तरह मजबूर होते हैं, ठीक उसके उलट ये कथित पत्रकार सुबह ही नहा धोकर एसएसपी से लेकर थानेदार तक या डीएम से लेकर एसडीएम या तहसीलदार तक के ऑफिस की चौखटों के सलाम बजाने में लग जाते हैं। पत्रकारिता के यही झोला छाप पुलिस प्रशासन और सरकार का एक ऐसा टूल हैं जिनके होते हुए असली पत्रकारिता कभी पनप ही नहीं सकती। दरअसल इनके पनपने की एक वजह ये भी है कि इन लोगों को पोषित करने वाले और इनके दम पर अपने छोटे मोटे काम निकालने वाले कुछ लोग लोग हर संस्थान के कार्यालय में भी मौजूद हैं।

हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरी बात तल्ख लगी हो तो इसमें कोई ताज्जुब नहीं क्योंकि बात है ही तल्ख। शाहजहांपुर का शहीद पत्रकार जगेंद्र सिंह हो या फिर मध्य प्रदेश का संदीप, इनकी हत्या पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अपने पत्रकार साथियों से मैं आज यह पूछना चाहता हूं कि उनको अपनी तिकड़मबाजी और शाम ढलते ही शराब और कबाब की महफिल से फुरसत मिलेगी तो बहुत होगा कि कैंडल मार्च ऑरग्नाइज़ करने के अलावा वो और क्या कर सकते हैं। सच बताऊं, कई लोग तो कैंडल मार्च भी सिर्फ खुद को चमकाने और खुद माइलेज देने के लिए करना चाहते हैं। नहीं तो बताएं कि कितनों में ये साहस है कि एक पत्रकार पर जुल्म हो तो दूसरा खड़ा मिले?  

दरअसल वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार के कई अफसरों और मशीनरी के कई काले कारनामे उजागर करते हुए सबसे पहले मेरे ही कई पत्रकार साथियों ने मुझको समझाने और मोटे कमाई के एवज़ समझौता कराने की कोशिश की। लेकिन जब बात न बनी तो प्रशासन ने सीधे मुख्यालय पर बुलाकर धमकाने और पुचकारने का मिला जुला खेल खेला। और इस सबके दौरान भी एक दो दल्ले किस्म के कथित पत्रकार वहां मौजूद रहे। लेकिन जब प्रशासन और सरकार को लगा कि इसके हाथ लगे सबूत हमको फंसा सकते हैं तो उन्होने न सिर्फ चंद मिनट के अंदर कई थानों में कई एफआईआर मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ दर्ज कर दीं बल्कि कई जीपों में भर कर आई पुलिस घर और ऑफिस से काफी कागजात भी भर कर ले गई। लगभग एक महीने तक घर की बिजली और पानी तक काट दिया गया। जो बाद में हाइकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन को मजबूरन जोड़ना पड़ा।

इस मामले में मानसिक रूप में मैं किसी भी हद कर लड़ाई के लिए तैयार था। लेकिन सबसे मुश्किल काम था परिवार को समझाना। मेरा भाई जिसका को पुलिस ने एक दिन कर अवैध हिरासत में रखा। इस पूरे मामले में मैंने न तो तोई समझौता किया और न ही किसी के सामने झुका। हाइकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के बाद प्रशासन की मंशा पर पानी फिर गया और आज तक मामला अदालत में लंबित है। दिलचस्प बात ये है कि झूठी एफआईआर कराने वाले दो अफसरों के वांरट जारी किये गये और एक शख्स दो बार जेल भेजा जा चुका है। और कई का तो इससे से भी बुरा हुआ।   

इस मामले में मेरे कई पत्रकार और मेरे साथियों का इतना सहयोग मिला कि उसका एहसान उतारना मेरे लिए नामुमकिन है। कई साथी कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते रहे और इस मामले पर सीना तान कर सबसे पहले खड़ा होने वाला यशवंत सिंह और उनका संस्थान भड़ास फॉर मीडिया जीवन भर मुझको अपने एहसान तले दबा चुका है। लेकिन कुछ ऐसे भी निकले जिनके अंदर इतनी भी हिम्मत नहीं हुई कि वो प्रशासन और सरकार के खिलाफ तो क्या लिखते बल्कि सिर्फ सच्चाई तक सामने लाने की सोच भी नहीं सके। इस दौरान मैंने “ख़बर हर क़ीमत पर वाले” आईबीएन-7 के आशुतोष, आजतक के कई लोगों समेत कई दिग्गजों से बात की, मैंने उनको कहा कि अगर पूरे देश में कोई एक भी इंसान अपने बच्चे के सिर पर हाथ रखकर ये कह दे कि मैने या मेरे किसी आदमी ने कोई लेनेदेने या कोई समझौता किया है तो मेरा साथ न देना। लेकिन शायद उनकी या उनकी कंपनी की पॉलिसी के लिए कंपनी की कमाई पत्रकारों की मदद से ऊपर थी।

बहरहाल सवाल आज फिर वही है कि क्या सबसे तेज़ या ख़बर हर क़ीमत या किसी बड़े स्लोगन या ढिंढोरे वाले किसी भी चैनल को दो पत्रकारों को जलाकर माल डालने वाली ख़बर में भी इतना दम नहीं दिख रहा कि उसको मुहिम बनाया जा सके। बिग बी के ज़ुकाम पर या एश्वर्या के हनीमून के बैड की शीट का रंग बताने या अराध्या के एक भी मूवमेंट को लाइव दिखाने की होड़ वाले लोग आज भला क्यों चुप हैं। हम जानते हैं कि पिछले कई साल से जिन सवालों को हम उठा रहे हैं उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।

देश का किसान भूख से और आत्महत्या से त़ड़पता रहा देश का मीडिया कारोबार करता रहा। आज पत्रकारों पर ही खतरा मंडरा रहा है। मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनसे खुद को अलग और सुरक्षित मानते हुए बेफिक्र सा लग रहा है। जगेंद्र या संदीप कोई एक दिन में नहीं मार डाले गये। एक लंबी प्रक्रिया है। पहले समझाओ, फिर लालच दो, फिर धमकी दो, फिर सरकारी मशीनरी और पुलिस के दम पर झूठे मामलों में फंसा दो, फिर भी न माने तो कहीं नौकरी न करने दो, और अगर तब भी न माने तो जो हुआ वो सबके सामने है।

बस एक बात और। जो लोग पानी के जहाज़ में तीसरी मंज़िल पर बैठ कर तली में होने वाले सुराख़ को देखकर नीचे के मंज़िल पर वालों पर हंस रहे हैं, उनको एक बार तो अपनी समझ और अक़्ल का भी मुआयना कर लेना होगा, या फिर कम से कम आईना तो देख ही लें कि इतने दाग़ लेकर चेहरा किस किस को दिखाएंगे? साथ ही अब इतना तो तय है कि मीडिया का विस्तार हो चुका है, सोशल मीडिया, भड़ास और सौवीर, अमिताभ ठाकुर यशवंत और जैसे अड़ियल मौजूद हैं यानि अब मामला एकतरफा तो नहीं रहेगा।

लेखक आज़ाद ख़ालिद सहारा समय, इंडिया टीवी, साधना न्यूज, इंडिया न्यूज़ और कई चैनलों में कार्य कर चुके हैं फिलहाल एक हिंदी दैनिक और वेब पोर्टल http://www.oppositionnews.com में बतौर संपादक कार्यरत, संपर्क : azad_khalid2003@yahoo.co.in

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पत्रकार जगेंद्र और संदीप, दोनो की हत्या के पीछे खनन माफिया

बालाघाट (मप्र) : पत्रकार संदीप कोठारी हत्याकांड के संबंध में कटंगी के अनुविभागीय अधिकारी पुलिस जे एस मरकाम ने बताया कि पुलिस को पता चला है कि तीनों गिरफ्तार आरोपी अवैध खनन और चिटफंड के कारोबार से जुड़े हुए हैं और पत्रकार पर उनके खिलाफ अवैध खनन का एक स्थानीय अदालत में दर्ज प्रकरण वापस लेने का दबाव बना रहे थे। संदीप इसके लिए राजी नहीं था और संभवत: उसे इसकी ही कीमत चुकानी पड़ी है।

गौरतलब है कि जिले की कटंगी तहसील मुख्यालय से दो दिन पहले अपहृत चालीस वर्षीय पत्रकार का जला हुआ शव शनिवार रात महाराष्ट्र में वर्धा के निकट स्थित एक खेत से मिला है।

कटंगी के अनुविभागीय अधिकारी पुलिस जे एस मरकाम ने बताया कि इस सिलसिले में पुलिस ने कटंगी निवासी तीन लोगों राकेश नसवानी, विशाल दांडी एवं बृजेश डहरवाल को गिरफ्तार किया है। इन तीनों पर पत्रकार संदीप कोठारी का अपहरण कर उसे जिंदा जलाने का आरोप है। 

शाहजहांपुर में जिंदा जलाए गए पत्रकार जगेंद्र सिंह का मामला भी खनन से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश सरकार उक्त मामले को आत्महत्या बताने में लगी है। गवाह भी तैयार किए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश का मामला कहां तक जाएगा, यह देखने की बात है। अब सरकारें और माफिया इतने पवित्र हो गए हैं कि उनपर सवाल उठाना अपनी जान गंवाना है।

कृष्णकांत के एफबी वाल से

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जगेन्द्र के परिवार को लालच और धमकियां, डीएम दफ्तर के सामने पत्रकारों ने की तेरहवीं

शाहजहांपुर : पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत के बाद उनके परिवार को धमकी और लालच देने का सिलसिला जारी है। मृतक के परिजनों ने धमकाने की शिकायत पुलिस में दी है। पिछले सात दिनों से धरने पर बैठे परिजनों ने जगेन्द्र का तेहरवीं संस्कार भी कर दिया। जिले के तमाम पत्रकारों ने जिलाधिकारी कार्यालय के सामने जगेन्द्र का तेहरवीं संस्कार किया। इस दौरान पत्रकारों ने हवन पूजन कर 13 ब्राह्मणों को भोजन भी कराया। 

जगेंद्र के पिता सुमेर का कहना है कि बेटे की मौत के 13 दिन बीत जाने के बाद भी मामले में कोई न्याय नहीं मिला है, बल्कि उनके परिवार को पैसों का लालच दिया जा रहा है और बात न मानने पर धमकी दी जा रही है।

सूत्रों के मुताबिक जगेन्द्र के बेहद करीबी वकील ने परिवार से समझौता करने की सिफारिश की, जिसके बाद परिवार के लोग भड़क गए और वकील सहित उनके साथी को वहां से भागने को मजबूर कर दिया। परिवार ने मामले की शिकायत पुलिस से कर दी है। पुलिस ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी है।

उधऱ, हत्या की रिपोर्ट में नामजद आरोपी पर एक पत्रकार को धमकाने का आरोप है। कलक्ट्रेट में पत्रकार संघर्ष समिति द्वारा आयोजित धरना-प्रदर्शन में सहभागिता करने वाले पत्रकार सलमान ने आरोप लगाया है कि वह शनिवार शाम अखबार के दफ्तरों को धरना प्रदर्शन की दैनिक रिपोर्ट देने जेल रोड पर जा रहे थे। इस्लामियां तिराहे से बहादुरगंज की ओर बढ़ने पर जेल के पीछे वाले बर्फखाने के पास खड़े हत्या व गैंग रेप के आरोपी ने अपने एक अन्य साथी के साथ जान से मारने की धमकी दी।। सोमवार को इस संबंध में डीएम और एसपी से शिकायत की जाएगी।  

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जगेंद्र हत्याकांड : मंत्री, पुलिस और दलाल पत्रकार चौकड़ी की करतूतों का ये है जिन्‍दा सुबूत !

यह है एक निर्भीक पत्रकार को जिन्‍दा फूंकने के लिए हत्‍यारे मंत्री-माफिया-पुलिस और पत्रकारों की चौकड़ी का जिन्‍दा सुबूत। यह सुबूत है कि कैसे जगेन्‍द्र सिंह को मंत्री और पुलिसवालों ने अंतहीन उत्‍पीड़न और मारक तनाव दिये, बल्कि यूपी सरकार में सच बोलने वालों को हश्र क्‍या होता है।

मैं इस सरकार के मंत्री, सरकार की निर्मम-निष्‍ठुर-अमानवीय पुलिस, दलाल पत्रकार चौकड़ी की भर्त्सना करता हूं, जो बिल्कुल संगठित अपराध-गिरोहों की शैली अपनाये हुए हैं।

दस मई को एक हल्‍की झड़प के बाद अमित भदौरिया ने जगेन्‍द्र समेत कई लोगों पर मारपीट की तहरीर पुलिस को दी थी, जिसे बरेली मोड़ अजीजगंज पुलिस चौकी के प्रभारी ने 11 मई की सुबह बाकायदा रिसीव किया था, लेकिन इसकी एफआईआर 12 मई को दर्ज की गयी। 

इस एफआर्इआर में वह सारी सूचनाएं पूरी तरह तोड़-मरोड़ दी गयीं जो पहली तहरीर में दर्ज की गयी थीं। और जो नयी एफआईआर दर्ज करायी गयी, उसमें जगेन्‍द्र और उसके दोस्‍तों पर जानलेवा हमला करने का आरोप लगाया गया।

इसका ब्‍योरा हमारे पास है कि किस तरह पुलिस-अपराधी और पत्रकारों ने मंत्री के इशारे पर जगेन्‍द्र को इतना प्रताडि़त किया और आखिरकार फिर इसी चौकड़ी ने जगेन्‍द्र को जिन्‍दा फूंक डाला। हम यह मूल तहरीर भी पेश कर रहे हैं, जिसके बायें ओर बरेली के चौकी प्रभारी ने उसे अमित भदौरिया से रिसीव किया था, और दूसरी ओर है वह एफआईआर जिसमें पुलिस ने मंत्री-माफिया और पत्रकारों के इशारे पर तथ्‍यों को जागेन्‍द्र के खिलाफ जमकर तोड़ा-मरोड़ा। अब तो पुलिस के नाम पर उबकाई आने लगी है।

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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मध्य प्रदेश के पत्रकार संदीप कोठारी को जिंदा जलाकर जमीन में दफना दिया

एक बहुत बड़ी खबर मध्य प्रदेश से आ रही है. यहां बालाघाट के एक पत्रकार संदीप कोठारी को माफियाओं ने जला कर मार डाला है. नई दुनिया और पत्रिका जैसे अखबारों में काम कर चुके संदीप की खबरों से माफिया नाराज थे. संदीप बालाघाट के कटंगी कस्बे में कार्यरत थे. बताया जा रहा है कि माफियाओं ने इन्हें किसी बहाने से बुलाया और बहका कर महाराष्ट्र के नागपुर की तरफ ले गए. मध्य प्रदेश की सीमा से बाहर निकलने ही सूनसान इलाका देखकर माफियाओं ने पहले संदीप कोठारी को जिंदा जलाया उसके बाद जमीन में दफना दिया. इस सनसनीखेज और हृदयविदारक घटना जिसकी मिल रही है वह स्तब्ध है.

मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि बालाघाट के कटंगी में कार्यरत संघर्षशील, दबंग और निर्भीक पत्रकार संदीप कोठारी की हत्या करके नागपुर में जला दिया गया. 4 लोगों पर हत्या का आरोप लगा है जिनमें से 3 को गिरफ्तार कर लिया गया है. जिस वाहन में बिठाकर संदीप को ले जाया गया उसे भी पुलिस ने जब्त कर लिया है. कटंगी थाने की पुलिस पुलिस नागपुर रवाना हो गई है. संदीप कोठारी जब न्यूज़ कवरेज के लिए गए थे तभी उन्हें कटँगी से वाहन में बहला फुसला कर बिठाकर नागपुर ले जाया गया और जिंदा जलाकर जमीन में गाड़ दिया. इस घटना से पत्रकारों में जबरदस्त आक्रोश और रोष व्याप्त है.

संदीप कोठारी के शव की तलाश नागपुर वर्धा के जंगलों में की जा रही है. गिरफ्तार आरोपियों के नाम बृजेश और विशाल तांडी है. चर्चा ये भी है कि जमीन के एक सौदे में कमीशन की रकम को लेकर विवाद हुआ जिसके बाद हत्या हुई. फिलहाल जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं. लेकिन पत्रकार को जलाकर मार डालने की लगातार बढ़ती घटनाओं से मीडिया जगत हिल गया है.

उल्लेखनीय है कि इससे ठीक पहले अभी उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को मंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर कोतवाल और सिपाहियों ने जिंदा जलाकर मार डाला था. जगेंद्र मर्डर केस का हत्यारा मंत्री अब तक न अरेस्ट हुआ और न जेल गया। इसी दौरान यह एक नई घटना सामने आई है। इन घटनाओं के बाद अब पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है.

घटनाक्रम से संबंधित कुछ तस्वीरें…

गिरफ्तार हत्यारोपी… वो कार जिसमें संदीप को बिठाकर ले जाया गया… पत्रकार को जला मारने की सूचना मिलते ही थाने के बाहर लोग जमा होने लगे…

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अखिलेश सरकार सीबीआई से नहीं कराएगी जगेंद्र हत्याकांड की जांच, अब हाईकोर्ट की सुनवाई का इंतजार

शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग को प्रदेश सरकार ने ठुकरा दिया है। अब देश-प्रदेश के आंदोलित पत्रकारों और संगठनों की निगाह 25 जून को इस मामले की हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। हत्याकांड का मुख्य आरोपी प्रदेश सरकार का एक आरोपी राममूर्ति वर्मा के होने से इस मांग को ठुकराए जाने की मुख्य वजह माना जार हा है। हत्याकांड में कोतवाली प्रभारी समेत पांच पुलिस वाले भी अभियुक्त हैं। उन्हें निलंबित कर दिया गया है लेकिन एक भी हत्यारोपी अब तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है।

शाहजहांपुर में धरने पर बैठे पत्रकार जगेंद्र सिंह के पत्नी बच्चे व अन्य

गौरतलब है कि एक जून को पेट्रोल छिड़क कर जगेंद्र को उनके घर में जिंदा फूंक दिया गया था। लखनऊ के एक अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ा था। इस घटना की एक अदद चश्मदीद महिला गवाह भी मजिस्ट्रेट को दिए अपने बयान से मुकर चुकी है। उसे जगेंद्र सिंह की दोस्त बताकर मामले को दुष्प्रचारित किया जा रहा है। पुलिस ने उसके खिलाफ भी जगेंद्र की कथित ‘आत्महत्या’ में मदद की रिपोर्ट लिखी है। जगेंद्र ने इसी महिला के साथ मंत्री द्वारा बलात्कार करने का आरोप लगाया था। पुलिस उस महिला से किसी को मिलने नहीं दे रही है। मरने से पहले जगेंद्र बयान दे चुके हैं कि ‘मुझे पुलिस वालों ने मारा पीटा और आग लगा दी। मुझे गिरफ्तार कर लेते लेकिन मारा क्यों, तेल क्यों छिड़का।’ उन्होंने मरने से पूर्व साफ साफ राज्य के मंत्री राममूर्ति वर्मा का मुख्य गुनहगार के रूप में नाम लिया था। जगेंद्र ने फ़ेसबुक पर मंत्री के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी। 

जगेंद्र का मददगार कहे जा रहे पूर्व विधायक देवेंदर सिंह एक समय में राममूर्ति वर्मा के निकट के लोगों में थे। जगेंद्र हत्याकांड पर अब दोनो आमने-सामने हैं। घटना के संबंध में एसपी बबलू कुमार का कहना है कि घटना की निष्पक्ष जांच चल रही है। जबकि जगेंद्र के परिजन सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। इसके लिए वे पिछले लगभग एक सप्ताह से धरना दे रहे हैं। जगेंद्र के बेटे राहुल का कहना है कि जब रिपोर्ट में पुलिस वाले ही गुनहगार हैं तो वे निष्पक्ष जांच कैसे कर सकते हैं। वे सबूतों को मिटा रहे हैं। विधायक सुरेश कुमार खन्ना भी चाहते हैं कि घटना की सीबीआई जांच होनी चाहिए। अखिलेश सरकार ने सीबीआई से जांच कराने से मना कर दिया है। एक मानवाधिकार संगठन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका लगा रखी है कि घटना की सीबीआई से जांच कराने का आदेश दिया जाए। इस पर 25 जून को सुनवाई होनी है। 

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पत्रकारिता को उसका पुराना मिशन और चेहरा दिया जगेन्द्र ने

लगता है लोगों का इतिहासबोध कमजोर पड़ता जा रहा है। पढ़ने की शगल खत्म होती जा रही है, खास तौर पर राजनीतिक जीवधारी, अब किताबों से दूर होते जा रहें हैं। राजनीति की नई कोपलें तो अपनी इतिहास और भूगोल दोनों की सामान्य जानकारी से भी दूर होती जा रही हैं। वर्तमान में जीने वाली पीढ़ी अतीत से शायद कुछ सीखना ही नहीं चाहती। जबकि पहले के राजनेता अध्ययन में रूचि लेते थे और देश व दुनिया के इतिहास और आंदोलन की कहानी पढ़ते थें, पढ़ते ही नहीं थे, बल्कि अध्ययन से अपनी विचारधारा को भी परिपक्व और पुष्ट करते थें। गाँधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी, दीन दयाल उपाध्याय आदि अनेक राजनेता और ‘जननायक’ स्वअध्ययन में गहरी रूचि लेने वाले थे।

आज, कमर में समाजवाद का गण्डा बांधने वाली राजनीति की नई पीढि़याँ समाजवाद से कितनी दीक्षित हो सकी हैं और उसे कितनी समझ सकीं हैं, यह तो समाजवाद के पैरोकार ही जानें, लेकिन एक बात तो साफ है कि डा.राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाले धरतीपुत्र मुलायम सिंह और उनका समाजवादी कुनबा, देश को समाजवाद की नई परिभाषा दे चुका है। परिवारवाद को भी समाजवाद का मुलम्मा चढ़ा, ‘नव समाजवाद’ का संस्करण देने वाली समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार शायद अब स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी नहीं पढ़ती है। संघर्ष की गाथा अपने खून की स्याही से लिखने वाली पत्रकारिता की कुर्बानियों की कहानी नहीं पढ़ती है और न ही अपने नये सियासी प्रशिक्षुओं को पढ़ाती है। समाजवाद के कांवर को कंधों पर ढ़ोने का दावा करने वाले ‘नव समाजवादियों’ और खासतौर पर अखिलेश कबीना के मंत्रियों को भी पढ़ना चाहिए कि भारतीय पत्रकारिता की कहानी आत्मोसर्ग और बलिदान की जीवन्त दास्तां है। ‘सच’ कहने की कीमत पत्रकारिता ने वर्षो वर्ष उठायी है। अपने लहु को स्याही बनाकर संघर्ष की गाथा लिखने वाली पत्रकारिता जब ब्रितानी हुकूमत के सामने रीड विहीन नहीं हुई तो आज देश आजाद है। 68 साल हिन्दुस्तानी ज़म्हूरियत का उत्सव मनाने वाली भारतीय ‘जनमानस’ में पत्रकारिता आज भी विश्वास और आस्था की आधार बनी हुई है तो उसके मूल में बलिदानों और कुर्बानियों की निर्बाध परम्परा है जो आज भी जारी है। 

अखिलेश सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा और उन जैसी मानसिकता वाले नव समाजवादियों को शायद प्रयाग से निकलने वाला अखबार ‘स्वराज’ नहीं याद हो। भारतीय पत्रकारिता के बलिदान और आत्मोसर्ग की कहानी लिखने वाले इस ‘अखबार’ के 8 संपादकों को ढ़ाई साल के दरम्यान कुल 125 साल की सज़ा ‘सच’ कहने की मिली थी। बावजूद 75 अंक ‘स्वराज’ के निकले। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में सबसे अधिक त्रासदी झेलने वाले इस अखबार और इसके संपादकों ने जेल जाना, सज़ा पाना स्वीकार किया लेकिन ‘सच’ कहना छोड़ा नहीं। जिस अखबार के संपादक के लिए विज्ञापन निकलता था-‘‘एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी  यह श-रहे  तन्ख्वाह है, जिस पर ‘स्वराज’ इलाहाबाद के वास्ते एक एडीटर मतलूम है’’। उसी पत्रकारिता के बिरवे ने आज विशाल वट वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। जिसके मूल में बलिदान, आत्मोसर्ग और ‘सच’ कहने की हिम्मत है। जो उसकी नसों में, लहु के साथ ‘परम्परा’ बन प्रवाहित हो रही है। इस शक्ति को यदि किसी सत्ता या उसके कारिन्दों द्वारा क्षीण करने की कोशिश की जाये तो वह उसका भ्रम और अल्पज्ञान ही होगा। भारतीय पत्रकारिता की उस बलिदानी रवायत ने एक बार फिर हमारे समय में आकार लिया है। शाहजहाँपुर के सोशल मीडिया पत्रकार जागेन्द्र सिंह की मौत, आज उसी ‘सच’ को कहने की कीमत चुकायी है। अफ़सोस, सामने ब्रितानी हुकूमत नहीं बल्कि हमारी अपनी चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार है। 

सवाल उठता है कि क्या सरकार नामक संस्था जो अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा की गारंटी देने की दावा करती है। एक पत्रकार के जीवन की सुरक्षा नहीं कर सकी। आरोपी राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा अपना ‘सच’ और आलोचना सुन इतना आहत हो जाता हैं कि पत्रकार को ही रास्ते से हटाने की व्यू-रचना करने लगता है। पत्रकार के परिजन, बेटा और परिस्थितियां तो कम से कम यही बयां कर रही हैं। पत्रकारिता का दम घोटने के प्रयास में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया जाता है। एक पत्रकार को उसके घर में घुसकर पुलिस और मंत्री के गुर्गों द्वारा तेल छिड़क कर जिन्दा जलाने की कोशिश की जाती है और व्यवस्था मूक दर्शक बन पत्रकार के मरने का इन्तजार करती है। यदि यह बात झूठी भी हो तो क्या जागेन्द्र इस जानलेवा गर्मी में स्वयं अपने ऊपर तेल डालकर आग लगा लिया और मौत को गले लगा लिया। उसे यदि आत्महत्या ही करना होता तो बहुत से आसान तरीके हैं। आग लगाकर तड़पना और फिर लखनऊ के अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष करना वह क्यों चाहेगा। राममूर्ति वर्मा के पत्रकार की अत्महत्या किये जाने वाले बयान, किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। बावजूद अखिलेश सरकार द्वारा ऐसे आरोपी को अपने मंत्रिमण्डल में अभी तक बनाये रखना और मृतक पत्रकार के परिजनों को मंत्री के गुर्गों द्वारा धमकी दिये जाने के समाचार आखिर क्या संकेत दे रहे हैं।

मीडिया का जो धड़ा जीते-जी जागेन्द्र को सिंगल कालम का कोना तक नहीं दिया, आज उसके मौत के बाद फ्रंट पेज पर कवरेज दे रहा है। प्रदेश के हर जिले से विरोध-प्रदर्शन और ज्ञापन भेजकर आरोपी मंत्री और पुलिस के विरूद्ध वैधानिक कार्यवाही और गिरफ़्तारी की मांग की जा रही है। मृतक के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की मांग की जा रही है। भाजपा समेत विपक्ष के नेता इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं। पत्रकार संगठन बयानबाजी में लगे हुए हैं और तथाकथित समाजसेवी अपनी कैन्डिल मार्च और ज्ञापन भेजने में। राज्य सरकार जाँच की गठरी बनाना चाहती है। सब के बीच ‘सच’ कहने की सजा़ पाये जागेन्द्र सिंह के परिजनों की नंगी आँखे, ‘शून्य’ को निहार रही हैं। जागेन्द्र अकेला मरा था लेकिन उसके पीछे कई जिन्दगियाँ मर रही हैं। बेटे ने बाप खोया, पत्नी ने पति और माँ ने अपना बेटा तथा ‘शाहजहाँपुर समाचार’ पोर्टल ने अपना कलमकार खोया है।

यह सच है कि व्यक्ति अकेला नहीं मरता बल्कि उसके मरने से उसका परिवेश भी मरता है। उसके परिवार का भविष्य मरता है, उसके बेटे के आँखों के सपने मरते हैं। फिर जागेन्द्र तो एक पत्रकार था जो अपने परिवेश के साथ जीता और मरता था। उसकी जिन्दगी उतनी ही बेश कीमती थी जितनी एक लोकसेवक की होती है। सरकार का सिस्टम क्या इतना नकारा हो चुका है कि एक पत्रकार की जान-माल की सुरक्षा न कर सके, उल्टे सरकार के ही मंत्री उसकी जान लेने पर आमादा हो जायें। यह समाजवाद की कौन सी परिभाषा है जिसे अखिलेश सरकार नये संस्करण में परिभाषित करना चाहती है। आखिर सपा सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ क्यों उठायी जाती हैं। इसका भी ख्य़ाल अखिलेश सरकार करती है क्या । अभी जागेन्द्र की चिता की आग ठण्डी भी नहीं हुई कि कानुपर में दीपक मिश्रा नामक दूसरे पत्रकार के ऊपर  दिन-दहाडे गोलियों से फायर कर दिया गया। क्या यही ‘उम्मीदों का प्रदेश उत्तर प्रदेश’ है जिसे बनाने की कल्पना अखिलेश करते हैं। अमेरिका तक में उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की भद पीट रही है लेकिन ‘नव समाजवाद’ से दीक्षित समाजवादियों की नई पीढ़ी इसे भी ‘रूटिन-वे’ में लेने की आदत को ‘परम्परा’ बना चुकी है। फिलहाल जागेन्द्र मरा जरूर है लेकिन लोगों को जगा कर। एक साँचे में ढ़ली पत्रकारिता की वर्जनाओं और बाडबन्दी को तोड़ी है। पत्रकारिता को उसका पुराना मिशन और चेहरा दिया है। जो कभी ‘स्वराज’ ने दिया था।

लेखक एवं संपादक-शार्प रिपोर्टर अरविन्द कुमार सिंह से संपर्क : 9451827982 

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जगेंद्र हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं, खूनियों के खिलाफ आज से आरपार की लड़ाई शुरू : सौवीर

चौरी-चौरा हत्‍याकाण्‍ड में पकड़े गये 170 लोगों पर भी जघन्‍य आरोप लगे थे और अंग्रेजी हुकूमत ने इन सब को फांसी पर लटका देने का हुक्‍म दे दिया था। लेकिन उस समय महामना मदनमोहन मालवीय ने अपनी शिक्षक की नौकरी छोड़कर इन वकालत की पुरानी डिग्री निकाली और बिना कोई पारिश्रमिक हासिल किये, इनमें से 151 लोगों को फांसी के फंदे से आजाद कराने के लिए जी-जान लड़ा दिया। 

तो जब बिना कोई फीस वसूले मालवीय जी ने चौरीचौरा काण्‍ड में मुकदमा-पैरवी की, तो जागेन्‍द्र सिंह की मौत का मुकदमा लड़ने का फैसला अब मैंने कर दिया तो कौन सा अपराध कर दिया है भइया। कहने वालों ने तो आजकल मुझ पर यहां तक आरोप लगाने का अभियान छेड़ दिया है, कि जागेंद्र के तौर पर मैं किसी दलाल-गुण्‍डे और रंगदार की पैरवी कर रहा हूं। 

हा, कर रहा हूं, और हमेशा करता भी रहूंगा। मालवीय जी को साफ पता था कि 151 बरी हुए अभियुक्‍त निर्दोष हैं, और वे चीख-चीख कर अपना पक्ष खुली अदालत में पेश कर रहे थे। जबकि जागेन्‍द्र जिन्‍दा फूंक डालने के बादजूद चीख-चीख कर आरोप लगा रहा था कि मंत्री राममूर्ति वर्मा, कोतवाल श्रीप्रकाश राय, उसके चार साथी सिपाही, गुफरान और अमित भदौरिया ने उन्‍हें जिन्‍दा फूंक डाला है। 

अब मैं किसका साथ लेता, अपने विरोधियो के आरोपों से डर कर मैदान से भाग जाता, या फिर महामना मालवीय जी की तरह मैदान मैं लोगों को तर्क देता कि जागेन्‍द्र बेईमान, दलाल या अपराधी नहीं था।

मैंने मालवीय जी का चोला उठाया और जागेन्‍द्र की पैरवी शुरू कर दी। और उसके साथ विरोधी तो चंद मिले, लेकन असंख्‍य समर्थक-मित्र जुट गये। इन सभी के चेहरे और उत्‍साह से साफ लग रहा था कि इस मसले पर वे अलग-अलग मगर समवेत मदनमालवीय जी की भूमिका में तब्‍दील हो चुके हैं।

शाम को टाइम्‍स नाउ के ब्‍यूरा चीफ प्रांशु मिश्र, स्‍वतंत्र पत्रकार मुदित माथुर, दादा और मैंने ने तय किया कि फैसलाकुन लड़ाई छेड़ी जाएगी। आईबीएन के शलभमणि त्रिपाठी और एबीपी न्‍यूज के प्रभाष झा, नवलकांत सिन्‍हा, काशी यादव समेत अनेक पत्रकार-लेखक-समाजिक कार्यकर्तााओं ने इस प्रयास की सराहना की और हमने इस बारे में तय कर लिया कि इस बारे में अब आर-पार की ही लड़ाई छेड़ी जाएगी। 

हम आप सब साथियों, कार्यकर्ताओं, समाजसेवी, संघों के प्रतिनिधि आयें और इस आंदोलन को अपना समर्थन दें, यही है हमारी आप सब से गुजारिश। हमारा नारा है, जगेंद्र हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं। 

धरना- शनिवार 20 जून, शाम 5 बजे, जीपीओ गांधी प्रतिमा पर। पत्रकार जागेंद्र को जलाकर मार दिए जाने की निर्मम घटना के कई दिन बाद भी उनके हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं। सरकार खुलकर आरोपी मंत्री के पक्ष में खड़ी है। जांच के नाम पर खानापूरी की जा रही है…और जागेंद्र के परिजनों की मांग के बाद भी सरकार मामले की जांच सीबीआई को देने के लिए तैयार नहीं है। जो जागेंद्र के साथ हुआ है…कल को किसी भी पत्रकार के साथ हो सकता है। पत्रकारों पर हमले के मामले हाल के दिनों में बढ़े हैं…पर अगर आरोपों की जद में सीधे सीधे सत्ताधारी दल और पुलिस के लोगों का नाम आए तो हालात चिंताजनक हैं। ऐसे में आइए हम सब मिलकर इस हालात के खिलाफ एकजुट हों, और जागेंद्र को न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाएं। 

आइए,.हम सब, शनिवार 20 जून, 2015 को हजरतगंज,जीपीओ पार्क स्थित गांधी प्रतिमा पर धरने के लिए एकत्र हों। समय शाम 5 बजे.से 7 बजे तक। आपकी उपस्थिति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र को मजबूत करने का संबल बनेगी। समय अभाव के चलते हम चाहकर भी सभी साथियों को फोन पर सूचित नहीं कर पा रहे हैं।

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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