जन सरोकार वाली पत्रकारिता से इतना डरती क्यों है सरकार?

आज ये कहना पड़ रहा है कि पानी, बिजली, घर, सड़क, स्मार्ट सिटी, बैकों के कर्ज, किसान मौत, रेप और मुस्लिमों की हकीकत पर बात कीजिएगा तो नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। मिलिंद खांडेकर के बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी जी ने भी एबीपी न्यूज को अलविदा कह दिया है। बीते कुछ दिनों से बेबाकी से बात रखने का सिलसिला थोड़ा बढ़ गया था। सियासत को ये नागवार गुजरा और नतीजा आपके सामने है।

आज याद आ गया दिसंबर 2017 का वो दिन जब अल्बानिया की संसद में विपक्ष ने अटार्नी जनरल का चुनाव रोकने के लिए संसद में बम फेंके थे। लेकिन फिर भी स्पीकर ने धुंए में ही वोटिंग कराई थी। आज भी कुछ इसी तरह की वोटिंग हुई, जिसमें जन सरोकार वाली पत्रकारिता करने वाले हार गए ।

वैसे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 है। राज्यसभा में इनकी संख्या 245 है। देश भर में विधानसभा की 4120 सीटें हैं। 15,581 जिला पंचायतें हैं। 26 लाख ग्राम सभाएं हैं लेकिन किसी ने भी एक पत्रकार की आवाज को बुलंद करने की कोशिश कभी नहीं की, क्यों कि आज भी लोकसभा के 185 सांसद दागी हैं। देश के 543 सांसदों में से 443 सांसद करोड़पति-अरबपति हैं। देश की विधानसभाओं में 2183 विधायक दागी हैं। देश के 4219 विधायकों में से 2391 विधायक करोड़पति हैं, आपकी जेब में क्या है ?

वैसे एक बात बताइए कि सत्ता के लिए इनमें से सबसे जरूरी क्या है ?

– विकास
– हाफिज सईद
– मुगलिया सल्तनत
– राम मंदिर
– मुस्लिम

मुस्लिमों के नाम पर सियासत हो रही है लेकिन उनकी सुनेगा कौन? सेंसस 2011 की रिपोर्ट कहती है कि देश का हर चौथा मुस्लिम भिखारी है। इन गरीब मुस्लिमों की प्रति व्यक्ति आय 32 रुपए 66 पैसे है। इनमें 18 फीसदी से ज्यादा बेरोजगार हैं। ये मुस्लिम मुस्लिम का खेल इसलिए खेला जाता क्यों कि देश की 218 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम ही जीत और हार तय करते हैं । पश्चिम बंगाल से ऐसी 9 सीटें आती हैं। यहां मुस्लिमों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है । देश में 96 करोड़ हिंदू आबादी है और 18 करोड़ मुस्लिम आबादी है। तो बताइए कौन सा धर्म किसी की मदद करने से, उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान देने से रोकता है। मुझे समझ में नहीं आता कि रामचरित मानस और गीता को किस मद से पढ़ा जा रहा है। ये कैसे इसे परिभाषित कर रहे हैं। हिंदुत्व के नारे तले भीड़तंत्र ने कानून को ताख पर रख रखा है और सियासत चुपके चुपके चश्मा लगाकर सब कुछ देखा करती है।

अब आप मुझे बताइए कि इनमें से किस सेक्टर में सरकार ने आपके लिए काम किया ?

– राम मंदिर बना ?
– युवाओं को रोजगार मिला ?
– खेती लाभ का धंधा बनी ?
– देश का कौन सा शहर स्मार्ट सिटी बन गया ?
– आपको सस्ता और बेहतर इलाज मिलने लगा ?
– पुलिस की कार्यप्रणाली सुधरी ?
– शिक्षा का स्तर बदला ?
– संसद की तस्वीर बदली ?
– बैंक में कम दरों पर कर्ज मिलने लगा ?
– अवैध खनन बंद हो गया ?
– गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, महानदी साफ हो गई ?
– सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाना बंद कर दिया ?

अलबत्ता….

बैंकों में फ्रॉड बढ़ गया।
कानून का राज खत्म हो रहा है।
विकास दर नीचे आ रही है खुदकुशी के आंकड़े ऊपर जा रहे हैं।
देश के 79 करोड़ लोगों की प्रति दिन की आय 25 रुपए प्रतिदिन है।
प्रदूषण हर साल 10 लाख लोगों की जानें ले रहा है।
दूषित हवा से हर घंटे 206 मौतें होती हैं।
गंदा पानी पीने से हर घंटे 73 मौतें हो रही हैं।
गरीब देशों की लिस्ट में आज भी भारत का नंबर 119 में से 110 वां है।

बताइए क्या बदला, कहां बदला और कैसे बदला ? जरूरी चीजों के लिए सरकार के पास बजट नहीं है, होता तो देश में पुलों की, रेलों की और जेलों की हालत ये नहीं होती ।

अब बात 2019 की जिसके लिए ये चक्रव्यूह तैयार किया जा रहा है। तो 2019 में सबसे बड़ी लड़ाई परसेप्शन पर होगी। जिसकी छवि साफ उसका वोटबैंक साफ और चमकदार होगा। वैसे जिस परसेप्शन तले इमेज पॉलिशिंग की कोशिश हो रही है। उसकी नायिका इंदिरा गांधीं थीं। और इसी की दम पर राजीव गांधी को बहुमत मिला था। याद कीजिए शाइनिंग इंडिया का नारा, जो इसी के लिए तैयार किया गया था ।

लेकिन आंकड़े कहते हैं कि देश की कुल राजनैतिक फंडिंग का 89 फीसदी हिस्सा अकेले बीजेपी के खाते में जाता है। सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स की फाइलों में सिर्फ विपक्ष का ही नाम है, फिर परसेप्शन वाला चमत्कार होगा कैसे ?

देश के किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज है लेकिन किसका ध्यान किसानों की तरफ है। पिछले 28 बरस से किसानों की कर्जमाफी का खेल चल रहा है। 1990 में सबसे पहले वीपी सिंह ने 10 हजार करोड़ की कर्जमाफी की थी लेकिन उनके इस फैसले से बैंकों की हालत पतली हो गई थी। जबकि मौजूदा समय में देश का एनपीए 10 लाख करोड़ के पार है । जो आज नहीं तो कल माफ होगा ही, यानि उद्योगपतियों की फिक्र तो है लेकिन किसानों की नहीं है ।

वैसे बार बार जिस घुसपैठिया शब्द का इस्तेमाल कर के 2019 का सिंघासन तलाशा जा रहा है। वो मुकाबला मोदी और ममता के बीच होता नजर आ रहा है । अगर ऐसा होगा तो कौन किसकी तरफ होगा ।

पहले देख लीजिए कि मोदी की टीम में कौन होगा ।

उद्धाव ठाकरे
प्रकाश सिंह बादल
नीतीश कुमार
राम विलास पासवान
अनुप्रिया पटेल

अब देख लीजिए कि ममता बनर्जी की तरफ कौन कौन होगा क्यों कि ममता ने अल्संख्यक कार्ड खेल दिया है ।

राहुल गांधी (नरेंद्र मोदी का तोड़ ढूंढते ढूंढते उम्र गुजरी जा रही)
अखिलेश यादव (यूपी हारकर घर बैठे हैं)
मायावती (दलित राजनीति दम तोड़ रही)
तेजस्वी (लालू भरोसे राजनीति चलती है)
अरविंद केजरीवाल (मोदी विरोध एक मात्र चारा है)
नवीन पटनायक (परंपरागत वोटबैंक से खुश हैं)
स्टालिन (तमिलनाडु के बाहर कोई जानता नहीं है)
केसीआर (आज भी तेलांगाना आंदोलन में ही उलझे हैं)
विजयन (केरल के बाहर झांकना नहीं चाहते हैं)

अब याद कीजिए मंडल कमीशन का वो दौर जब कांग्रेस के पारंपरिक वोटबैंक को एक झटके में बांट दिया गया था । तो क्या सत्ता का ये घुसपैठिये वाला दांव फिर विपक्ष की कमजोर कड़ी को और कमजोर कर देगा, ममता बनर्जी इसी वजह से डरी हुई हैं ?

वैसे बात जन सरोकार वाली पत्रकारिता की हो रही थी। तो आंकड़े कहते हैं कि 2007 से 2017 तक देश में होने वाली रेप की घटनाओं में 100 में 75 फीसदी आरोपी कोर्ट से बरी हो गए । बरी होने वाले 55 फीसदी आरोपियों ने बाहर निकल कर फिर अपराध किया और सरकार निर्भया फंड की 90 फीसदी राशि खर्च ही नहीं कर पाई लेकिन सियासत के सामने जनसरोकार वाली पत्रकारिता का जिक्र मत कीजिएगा क्यों कि मर्द को भी इससे दर्द होता है ।

अब याद कीजिए वो वाला ऑर्डर जिसमें कहा गया था कि यूपी पुलिस की वर्दी पर राम-कृष्ण का बिल्ला लगने वाला है, कहां गया वो आदेश ? मथुरा पुलिस बन गई टूरिस्ट फ्रेंडली ?

इस देश की CBI किस काम की है?

क्योंकि बोफोर्स घोटाले में कुछ मिला नहीं।
डेनियल ऑर्म्स घोटाले में कुछ मिला नहीं।
ताबूत घोटाले में कुछ मिला नहीं।
बराक मिसाइल घोटाले में कुछ मिला नहीं।
जैन हवाला कांड में कुछ हुआ नहीं।
संसद घूसकांड में CBI फ्लॉप रही।
मायावती-मुलायम आय से अधिक संपति मामले में कुछ हुआ नहीं।
सेंट किट्स और लक्खूभाई पाठक मामले में CBI फ्लॉप रही।
आरुषि केस में CBI की कोताही दुनिया ने देखी।
चारा घोटाले की जांच 20 साल बाद भी जारी है।
खुद सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि CBI तो तोता है।

दो पूर्व डायरेक्टरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं । जिसमें रंजीत सिन्हा पर कोयला घोटाले में आरोप लगा तो वहीं एपी सिंह पर हवाला के दोषी मोइन कुरैशी की मदद कर के केस को प्रभावित करने का आरोप लगा। बीते 5 सालों में CBI के 25 अफसरों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा है। 9 हजार से ज्यादा केस पेंडिंग हैं। 2000 से ज्यादा मामलों में तो जांच तक शुरु नहीं हुई फिर लोग कहते हैं कि जनसरोकार वाली पत्रकारिता से चश्मे वाले साहेब को परहेज है।

एक दौर था जब सत्ता में कुछ ऐसे लोग रखे जाते थे । जो सरकार की निंदा करते थे । गलतियों को बताते थे ताकि उन्हें हटाकर अच्छी नीतियों को तैयार किया जा सके। नीतियों में संशोधन किए जा सकें। लेकिन आज लगता है कि निंदक नियरे राखिये वाली पत्रकारिता खत्म हो गयी है। अब तो चरण चूमिये और चाटिए, क्योंकि सियासत को खिलाफत से डर लगता है।

अनुराग सिंह
प्रोड्यूसर, न्यूज़ नेशन
singh.or.anu@gmail.com


कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Comments on “जन सरोकार वाली पत्रकारिता से इतना डरती क्यों है सरकार?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *