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जनसत्ता डॉट कॉम के संपादक ध्यान दें… ऐसे कैसे ‘सही’ होगी हिंदी?

नीरेंद्र नागर-

Jansatta की वेबसाइट पर ‘सही हिंदी’ के नाम से एक स्तंभ चलता है। आज उसमें अनधिकृत के बारे में छपा है। अनधिकृत का अर्थ, उसका संधि विच्छेद, उसके प्रयोग – सब दिए हुए हैं। काफ़ी उपयोगी है।

लेकिन उसी में पिछली कड़ियों के जो लिंक दिए हैं, उनको देखकर चौंक गया। चौंका इसलिए कि स्तंभकार ने अपरिहार्य का अर्थ बताते हुए ‘संधि विच्छेद’ किया हैं।

संधि तब होती है जब किसी एक शब्द के अंतिम और दूसरे शब्द के पहले वर्ण में मिलन के कारण कोई विकार होता है, कोई परिवर्तन होता है।

अनधिकृत में वह परिवर्तन होता दिख रहा है। अन् का ‘न्’ और अधिकृत का ‘अ’ मिलकर ‘न’ बना रहे हैं। लेकिन अपरिहार्य में ऐसा कहाँ हो रहा है? अ और परिहार्य के मिलने के बाद भी न ‘अ’ में परिवर्तन हुआ, न ‘प’ में। फिर संधि कैसी?

अपरिहार्य में समास है, नञ् तत्पुरुष समास।

इसी तरह आविष्कार में जो संधि विच्छेद किया गया है, वह सही नहीं है। इसमें आविः(स्)+कार की संधि हो रही है, न कि आ और विष्कार की।

उम्मीद है, जनसत्ता.कॉम के संपादक इस तरफ़ ध्यान देंगे और ऐसी सभी पुरानी एंट्रियों को दुरुस्त करवाएँगे।

पुनश्च : आविष्कार की संधि के बारे में मुझे भी नहीं मालूम था। संस्कृत के जानकारों से मालूम हुआ। उनका कृतज्ञ हूँ।

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