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सियासत

धनखड़ जी, आप में और जया में कोई फर्क ही नहीं रहा!

शिशिर सोनी-

राज्यसभा में जो हुआ, वो एक दिन होना ही था। अति सर्वत्र वर्जयते. जया अमिताभ बच्चन पुकारा गया तो सपा सांसद को बुरा लग गया। हर दिन का वही रगड़ा। अरे मैडम, जो नाम आपने लिख कर दिया है वो ही आसंदी से पुकारा जायेगा न? पहली बार की सांसद तो आप हैं नहीं कि आपको प्रक्रिया पता न हो! वैसे भी आप अमिताभ बच्चन की पत्नी हैं इसलिए ही मुलायम सिंह ने अमर सिंह की अनुशंसा पर आपको पहली बार राज्यसभा में भेजा था। उसके पीछे की कहानी फिर कभी। मगर सच यही है कि आपकी पहचान मिसेज अमिताभ बच्चन ही है।

आपको लगता है कि आपकी अपनी पहचान है। आपने फिल्मों में अभिनय में नाम, दाम स्वयं की बदौलत कमाया है, तो मैडम वो भी ठीक है, लेकिन आप जैसे हर साल हजारों की संख्या में कलाकार आते और विलुप्त हो जाते हैं। लीना चंद्रवारकर को अगर ये गुमान हो जाए कि उनकी अपनी पहचान है इसलिए किशोर कुमार के नाम से उनकी पहचान न हो, माफ कीजियेगा ये मुगालता होगा। कृपया मुगालता न पालें। पालना ही है तो राज्यसभा में दूसरा फॉर्म भरें। अपना नाम जया भादुड़ी कर लें, किसने रोका है? खाली पीली सर्वोच्च सदन का कीमती वक़्त जाया न करें। संसद का सत्र ऐसे ही नहीं चलता, हम टैक्स पेयर्स की गाढ़ी कमाई का हिस्सा, ढाई लाख रुपया प्रति मिनट खर्च होता है। संसद में जनता के मुद्दे उठाएं। आपको लगता है आप बहुत बड़ी हस्ती हैं, पति का नाम नहीं चाहिए तो ये आपका व्यक्तिगत मसला है इससे आम जनता का क्या लेना देना?

राज्यसभा चलाते हुए नजमा हेपतुल्ला को देखा। भैरो सिंह शेखावत, हमिद अंसारी, वेंकैया नायडू के बाद अब जगदीप धनखड़ को देख रहा हूँ। आसंदी पर बैठ कर जितनी राजनीतिक टीका टिप्पणी, चाहे जब लम्बे लम्बे भाषण जगदीप धनखड़ दे रहे हैं, किसी ने ऐसा नहीं किया। राज्यसभा के सभी सांसद मिलकर अध्यक्ष चुनते हैं। इस आशा के साथ कि आसंदी पर बैठ कर वो पक्ष, विपक्ष की बातें निर्पेक्ष हो कर सुनेंगे। सब को समान मौका देंगे। ये बात सच है, ऐसा हो नहीं रहा। विपक्षी दल का नेता शैडो पीएम होता है। उस पद का एक संवैधानिक दर्जा है। दिख रहा है कि विपक्षी दलों, विपक्षी दल के नेता को बोलने पर टोकाटाकी जगदीप धनखड़ की आदतों में शुमार है।

शुक्रवार को जो हुआ उसकी पूरी जिम्मेदारी राज्यसभा अध्यक्ष के रूप में आसंदी पर बैठे जगदीप धनखड़ की मानी जायेगी। मसला बड़ा नहीं था। बहुत मामूली था। आसंदी से इसे तूल दिया गया। आपके चैंबर में किसने क्या कहा, किसने किस पत्र में क्या लिखा, कौन आपके बारे में क्या सोचता है, अखबार में आपके लिए कौन क्या बोलता है…इन सब सवालों के जवाब देश को सदन के पटल पर नहीं चाहिए। लेकिन सभापति ने आसंदी पर बैठ कर अपनी व्यक्तिगत पीड़ा का रोना रोया। कहा, ये सब मुझे इस पद लायक नहीं समझते। पत्र में कैसे-कैसे शब्द लिखते हैं। बड़े-बड़े नेता हस्ताक्षर कर शिकायत कर रहे हैं कि मैं दलगत भावना से सदन चला रहा हूँ। सदन में घनश्याम तिवाड़ी जी ने जो विपक्ष के नेता के लिए कहा, जिस पर विवाद हुआ, आपत्ति दर्ज की गई, उसपर चर्चा होनी चाहिए थी या सदन के बाहर जो हो रहा है उस पर सभापति के वेदना का पाठ होना चाहिए था? देश मूर्ख नहीं है। सब देख रहा है। समझ रहा है।

सभापति महोदय, विपक्षी दल आपके पद की गरिमा नहीं गिरा रहे, पर्दे के पीछे हुई बातों को सदन में रिकॉर्ड पर रख कर आप सभापति की गरिमा गिरा रहे हैं। आप में और जया अमिताभ बच्चन के कोई फर्क ही नहीं रहा। जया जी ने अपने नाम पर रोका टोकी की, आपने अपने नाक को आगे कर सदन की कार्यवाही पर रोका टोकी की। सदन चलाने के लिए बड़ा दिल रखिये। सभापति सदन को एक सूत्र में बांध कर चलने, चलाने वाला सर्वसम्मति से पद पर बिठाया गया लोकतंत्र का वो प्रहरी है जिनसे लोकतंत्र का मंदिर धड़कता है। अगर, वो ही सत्ता की चाशनी में पग जाएगा तो तय मानिये लोकतंत्र कसैला हो जायेगा।

विपक्ष के सदन के वॉक आउट करते वक़्त और बाद के अपने कहे का ट्रांसक्रिप्ट जरूर पढ़ियेगा। जिस तरह आपने विपक्ष को देश तोड़ने का षड्यंत्र करने वाला, मोदी के तीसरी बार पीएम बनने को नहीं पचाने वाला, केंद्र सरकार की आसंदी से एकतरफा ब्रॉन्डिंग करने वाला, बार बार इमरजेसी की बात उठा कर कांग्रेस को आसंदी से घेरने की कोशिश करने वाला, विपक्ष के नेता को मिस्टर खरगे बोलने वाला आदि, इत्यादि…ये सब अपना कहा पढ़ियेगा। आत्म विश्लेषण कीजियेगा।

ऐसा बहुत कुछ शुक्रवार को आपने कहा जो आसंदी से बतौर सभापति अशोभनीय माना जायेगा। दलगत भावनाओं से प्रेरित माना जायेगा। विपक्ष का आचार, व्यवहार, आचरण, अनुशासन सब संसदीय मर्यादाओं की कसौटी पर कसा जायेगा तो निश्चित रूप से सभापति के रूप में आपके अबतक के कार्यकाल, सदन चलाने के तरीके को भी कसौटी पे कसा जायेगा। मीमांसा किया जायेगा। विमर्श किया जायेगा।

ये भी शाश्वत सत्य है – अति-आत्मविश्वास, आत्ममुग्धता किसी पक्ष, व्यक्ति विशेष के लिए कभी उपयुक्त नहीं रहा।

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